सवाल : बिना किसी से पूछे आपको कैसे पता चलेगा कि आप चेन्नई में हैं?

जवाब : यदि किसी जगह कोल्ड वॉटर और नॉर्मल वॉटर लिखे नलके दिखें लेकिन दोनों से गर्म पानी निकले तो समझ जाइए कि आप चेन्नई में हैं.

यह सवाल-जवाब तमिलनाडु की राजधानी के बारे में खूब चर्चित मजाक है. वैसे इस मजाक को छोड़ दें तो भी इस शहर में कम से कम एक साल बिताने वाले लोगों का यहां के मौसम से जुड़ा अनुभव इससे अलग नहीं है. अब ऐसे में कोई आपसे कहे कि चेन्नई एक बार शीतलहर का भी सामना कर चुका है तो आप इसपर यकीन करेंगे? कर सकते हैं लेकिन यह मानकर कि वह पृथ्वी के निर्माण के आसपास की बात रही होगी. लेकिन ऐसा नहीं है. चेन्नई में शीतलहर की बात आधुनिक इतिहास की घटना है और जो अब से करीब दो शताब्दी पहले अप्रैल में ही हुई थी.

ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल, 1815 के आखिरी हफ्ते में दिन के समय चेन्नई का तापमान 10-11 डिग्री से ऊपर नहीं जा पा रहा था और रात में यह माइनस 2-3 डिग्री सेल्शियस तक पहुंच जाता था. उस समय मौसम में अचानक आए इस बदलाव के पीछे जो घटना जिम्मेदार थी उसने इस शहर तो क्या पूरी दुनिया के मौसम पर असर डाला था. दरअसल यह इंडोनेशिया के सुम्बावा में ज्वालामुखी फटने का नतीजा था. इसे आधुनिक इतिहास में ज्वालामुखी विस्फोट की सबसे बड़ी घटना माना जाता है.

कई इतिहासकार न सिर्फ जलवायु परिवर्तन बल्कि दूसरे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के लिए भी तम्बोरा ज्वालामुखी विस्फोट को जिम्मेदार मानते हैं

तंबोरा नाम का यह ज्वालामुखी इस घटना के एक हजार साल पहले से सुप्त अवस्था में पड़ा था. यहां के निवासियों को उस समय तक यह जानकारी नहीं थी कि वे जिस पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं वह एक ज्वालामुखी का तराई क्षेत्र है. यहां तब इंग्लैंड का राज चलता था. ब्रिटिश शासन के दस्तावेज बताते हैं कि ज्वालामुखी फटने के तीन साल पहले से इस क्षेत्र में रह-रहकर भूकंप के झटके आ रहे थे और आखिर में पांच अप्रैल को ज्वालामुखी में विस्फोट हो गया.

इस ज्वालामुखी में पहला विस्फोट और लावा बहने की प्रक्रिया सिर्फ दो घंटे चली. यह क्षेत्र अगले पांच दिन तक शांत रहा. 10 अप्रैल को इसमें दोबारा विस्फोट हुआ और कहा जाता है कि कुछ ही घंटों में यहां रहने वाली 12 हजार की आबादी काल के गाल में समा गई. उस समय इंडोनिशिया के जावा प्रांत के गवर्नर रहे थॉमस स्टेमफोर्ड रैफलिस ने इस घटना से जुड़े दस्तावेज अपने देश भेजे थे. इनके मुताबिक विस्फोट के बाद ज्वालामुखी से अगले तीन चार दिनों तक किलोमीटरों लंबी आग की लपटें निकलती रहीं और इससे निकली राख ने पूरे क्षेत्र को ढंक लिया. कुछ दिनों के बाद यह धुंध छंटी तब तक सुम्बावा में तकरीबन एक लाख लोग काल के गाल में समा चुके थे.

तम्बोरा ज्वालामुखी की तराई से आज भी नरकंकाल बरामद होते हैं
तम्बोरा ज्वालामुखी की तराई से आज भी नरकंकाल बरामद होते हैं

तंबोरा में जुलाई महीने तक रह-रहकर विस्फोट होते रहे. राख का निकलना भी बंद नहीं हुआ. ज्वालामुखी की राख में सल्फर के कण बहुतायत में पाए जाते हैं. कहा जाता है तम्बोरा में विस्फोट के समय निकले सल्फर की हजारों वर्ग किमी क्षेत्रफल की एक परत धरती के वायुमंडल में 10 से 13 किमी के बीच छा गई थी. सल्फर के कणों से तैयार यह धुंध या एयरोसेल कुछ ही दिनों में बंगाल की खाड़ी के ऊपर आ गया. एयरोसेल की खास बात होती है कि यह सूर्य की गर्मी को जमीन पर नहीं पहुंचने देता. इससे भारत के तटीय इलाके में तापमान कम होने लगा. इसका असर सबसे पहले और सबसे ज्यादा चेन्नई में देखा गया. 20 अप्रैल आते-आते यहां भीषण ठंड पड़ने लगी. कुछ दस्तावेजों के मुताबिक 25-30 अप्रैल के बीच एक दो बार ऐसा भी हुआ कि तापमान शून्य से नीचे पहुंच गया. हालांकि यह स्थिति ज्यादा दिन नहीं रही क्योंकि हवा के बहाव के साथ एयरोसेल की परत अरब सागर की तरफ निकल गई.

तंबोरा ज्वालामुखी फटने का असर यूरोप से लेकर अमेरिका तक में हुआ. इस दौरान वहां फसलें तबाह हो गईं और अकाल जैसी स्थिति निर्मित हो गई थी

तम्बोरा की वजह से एयरोसेल का बनना और उससे मौसम में ठंडक सिर्फ दक्षिण भारत में ही दर्ज नहीं की गई. इसका असर यूरोप से लेकर अमेरिका तक में हुआ. इस दौरान वहां फसलें तबाह हो गईं और अकाल जैसी स्थिति निर्मित हो गई थी. भारत में इसका एक असर यह रहा कि उस साल गर्मी का मौसम आया ही नहीं. मॉनसून काफी लेट हो गया. लेकिन यहां साल के अंत में इतनी बारिश हुई कि पूर्वी भारत में हैजा फैल गया. यह बात भी दस्तावेजों में दर्ज है कि उन समय भारत में हैजे से हजारों लोग मारे गए थे.

इस ज्वालामुखी विस्फोट का इतना असर था कि अगले साल यानी 1816 में भी दुनिया के किसी हिस्से में तीखी गर्मी नहीं पड़ी. इस घटना से तकरीबन हर देश प्रभावित हुआ. कई इतिहासकार न सिर्फ जलवायु परिवर्तन बल्कि दुनिया भर में आए दूसरे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के लिए भी तम्बोरा ज्वालामुखी विस्फोट को जिम्मेदार मानते हैं. जैसे चीन के युन्नान प्रांत में इसके बाद तीन सालों तक सूखा पड़ा और बाद में वहां के किसान मजबूर होकर अफीम की खेती करने लगे. जो बाद में म्यांमार और दूसरे दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों तक पहुंच गई. चीन में तो इसकी खेती नियंत्रित है लेकिन दूसरी जगहों पर यह बड़ा अवैध कारोबार है. पूरे विश्व में ऐसे ही कई परिवर्तनों के लिए तम्बोरा विस्फोट को जिम्मेदार माना जाता है.