मार्च, 2006 में अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश भारत की यात्रा पर आए. अमेरिकी राष्ट्रपति की इस यात्रा पर पूरी दुनिया की निगाहें लगी थीं क्योंकि इस दौरान भारत-अमेरिका के बीच परमाणु करार होना था. जैसी कि उम्मीद थी, करार हो गया. राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने इसका पूरा विवरण छापा. इस पूरी गंभीर बहस के बीच बुश के एक बयान की चर्चा भी छाई रही. नई दिल्ली में मीडिया से बात करते हुए उनका कहना था, ’अमेरिका भारतीय आम खाना चाहता है.’ परमाणु करार के साथ ही अमेरिका ने भारत से कृषि उत्पादों के आयात का एक समझौता भी किया था. राष्ट्रपति बुश इसी से उत्साहित थे. अगले साल से भारतीय आम वहां पहुंचने लगे और 17 साल के प्रतिबंध के बाद अमेरिकियों ने फिर से भारतीय आमों का स्वाद चखा.

बुश की आम वाली बात से ज्यादातर भारतीयों की यह धारणा और मजबूत हो गई कि उनके बराबर उन्नत परमाणु तकनीक हमारे पास भले ही न हो लेकिन हमारे पास आम हैं- वह फल जिसकी मुरीद पूरी दुनिया है. इस फल से लगाव और आम की हमारे यहां बहुतायत देखते हुए इस बात में कोई शक की गुंजाइश नहीं है कि यह इसकी जड़ें विशुद्ध भारतीय हैं. फिर अंग्रेजी में इसका नाम ‘मैंगो’ भी कुछ यही इशारा करता है. मलयालम में इसे मंगा कहा जाता है और तमिल में मानकाय. वास्कोडिगामा सबसे पहले (1498 में) केरल के मालाबार तट पर पहुंचा था. यहीं उसका पहली बार आम से परिचय हुआ और फिर यूरोप के एक बड़े हिस्से तक आम पहुंचे. इसके साथ ही मलयाली मंगा वहां मैंगो बन गया.

ऐसा नहीं है कि दुनिया में आम सिर्फ भारत में ही होता है. ब्रिटेन के सुपरमार्केट में ब्राजील या दक्षिण अफ्रीका के आम बहुतायत में मिलते हैं. वहीं अमेरिका के न्यूयॉर्क जैसे बड़े शहरों में छिले और कटे हुए आम सड़कों के किनारे मिलते हैं. यदि आप पूछेंगे कि ये आम कहां से हैं तो पता चलेगा कि या तो वे मैक्सिको से आए हैं या हैती से. लेकिन इन देशों तक पहला आम पहुंचने का इतिहास भारत से ही जुड़ता है.

अमेरिका में आम पहुंचने और उसके पैदा होने का इतिहास काफी दिलचस्प है. यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (यूएसडीए) के ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि अमेरिका 19वीं शताब्दी की शुरुआत से यहां आम उगाने की कोशिश कर रहा था. परड्यू यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर न्यू क्रॉप्स एंड प्लांटेशन के रिकॉर्ड बताते हैं कि पहली बार 1833 में डॉ हेनरी पेरिन मैक्सिको से आम के छोटे-छोटे पौधे फ्लोरिडा लाए थे. उन्होंने ये अपने घर के पास लगा भी दिए, लेकिन अमेरिका के मूल निवासियों द्वारा पेरिन की हत्या के बाद इनकी देखभाल नहीं हो पाई और ये सूख गए.

दूसरी कोशिश 1850 के दशक में हुई. तब वेस्टइंडीज से आम के पौधे लाए गए थे. लेकिन आम के ये पेड़ 1886 की ठंड बर्दाश्त नहीं कर पाए. फिर यूएसडीए ने देश में आम उगाने की जिम्मेदारी संभाली और पहली बार बंबई से छह पेड़ों की कलमें मंगाई गईं. इनमें से पांच यहां फलफूल नहीं पाए लेकिन एक पश्चिम फ्लोरिडा में जीवित बचा रहा. नौ साल के बाद इसमें फल भी आने लगे. इस पेड़ को मलगोआ (असली नाम मलगोबा) आम कहा गया. यह पेड़ बाद में कैप्टेन हैडेन द्वारा मियामी में दोबारा लगाया गया. अब आम की यह प्रजाति मलगोआ से हैडेन हो गई. इस आम की शिपिंग आसान है. परड्यू यूनिवर्सिटी के मुताबिक 1899 से लेकर 1937 तक यूएसडीए ने अमेरिका में आम का पेड़ उगाने की 528 कोशिशें की थीं. भारत के अलावा आम के पेड़ वेस्टइंडीज और फिलीपींस से बुलवाए गए थे.

अब अमेरिका सहित पूरे अमेरिका महाद्वीप में आम पाया जाता है. फिर भी यहां लोग भारतीय आमों को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं. इसकी वजह ये है कि स्थानीय किसानों ने वहां आमों की उन किस्मों को ज्यादा तवज्जो दी गई जिनकी ढुलाई आसान हो. जो जल्दी खराब न होते हों. इस प्रक्रिया में अमेरिकी आम भारतीय के मुकाबले कम गूदेदार और रसदार रह गए.

अमेरिका में आम पहुंचने की कहानी तो काफी आधुनिक है लेकिन माना जाता है कि एशिया में दूसरे देशों तक भारतीय आम के पहुंचने की शुरुआत ईसा से चौथी और पांचवीं शताब्दी के दौरान हुई थी. अपनी किताब ‘रोमांस ऑफ मैंगो’ में कुसुम बधवार लिखती हैं कि धर्म के विस्तार के साथ-साथ आम भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता रहा. बौद्ध धर्म से इसकी शुरुआत हुई, फिर इस्लाम ने इसे आगे बढ़ाया और आखिर में क्रिश्चियन मिशनरियों ने आम को कई देशों में पहुंचाया. मिशनरियों के जरिये यह पहले फिलीपींस पहुंचा. यहां से प्रशांत महासागर की यात्रा करते हुए मैक्सिकोवासियों ने आम का स्वाद जाना. मैक्सिको में आज भी आम की एक प्रजाति फिलीपींस की राजधानी मनीला के नाम पर - मनीला मैंगो कहलाती है.

पश्चिमी देशों तक आम को पहुंचाने का श्रेय पुर्तगाल को जाता है. गोवा के बारे में माना जाता है कि यहां मूल निवासी कलम के जरिए आम की अलग-अलग प्रजाति के पेड़ लगाने में माहिर हैं. पुर्तगालियों ने अफ्रीका के अपने दूसरे उपनिवेशों जैसे मोजांबिक में गोवा से ही आम पहुंचाए. माना जाता है कि दक्षिण अफ्रीका में आम मोजांबिक से ही पहुंचे. उस दौर में आम की यह यात्रा काफी मुश्किल भी रही होगी. आम का बीज जल्दी सूख जाता है और फिर उससे पौधा नहीं उगाया जा सकता. दूसरी बात यह भी है कि उस समय पौधों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान नहीं रहा होगा क्योंकि लंबी समुद्री यात्रा में इनका रखरखाव करना बहुत मुश्किल होता था.

अपनी किताब ‘द यूरोपियन डिस्कवरी ऑफ इंडियन फ्लोरा’ में रे डेसमंड एक वनस्पतिशास्त्री के हवाले से बताते हैं कि उसने एक बार आम के पौधे को समुद्री यात्रा के दौरान कितनी मुश्किल से बचाया था. पौधे को लगातार खारे पानी और समुद्री फुहार से बचाने के लिए उसे काफी जुगत लगानी पड़ी थी. 1833 के आसपास जब छोटे-छोटे ग्रीनहाउस बॉक्सों का निर्माण होने लगा तो आम के पौधे एक जगह से दूसरी जगह आसानी से ले जाए जाने लगे.

तकरीबन डेढ़ सौ साल पहले ऑस्ट्रेलिया के एक प्रांत क्वींसलैंड से भारत में घोड़े भेजे जाते थे. घोड़े उतारकर लौटते जहाजों में आम के पौधे क्वींसलैंड पहुंचे. परड्यू यूनिवर्सिटी के दस्तावेजों के मुताबिक 1875 में क्वींसलैंड में भारतीय आमों की 40 किस्मों के पेड़ लगाए गए थे. इस तरह भारतीय आम ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच गए.

ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह तो साफ है आम की पितृभूमि भारत ही है. इस समय पूरे विश्व की पैदावार का तकरीबन एक तिहाई यहीं पैदा होता है. लेकिन बीते सालों में अमेरिका से लेकर यूरोप और ऑस्ट्रेलिया तक अपने यहां भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगा लगा चुके हैं. इन देशों का कहना है कि भारतीय आमों पर कीटनाशकों का छिड़काव होता है. हालांकि अब फिर सभी जगह भारतीय आमों का निर्यात शुरू हो चुका है. आम भारत से पूरी दुनिया में फैल गए हैं लेकिन जॉर्ज बुश की बात का मतलब समझें तो आम के असली स्वाद के लिए लोग आज भी भारत की तरफ देखते हैं.