भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 के युद्ध के बाद शायद यह सबसे अलग तरह का पत्राचार था. अगस्त, 1976 में भारत सरकार को पड़ोसी देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो का एक पत्र मिला. इसमें उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी को लिखा था, ‘आपके यहां खजाने की खोज का काम आगे बढ़ रहा है और मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि आप इस दौरान मिली संपत्ति के वाजिब हिस्से पर पाकिस्तान के दावे का खयाल रखेंगी.’

भारत और पाकिस्तान के बीच संपत्तियों के बंटवारे को लेकर विवाद चलते रहे हैं. तीन-चार साल पहले लंदन की अदालत में चल रहा वह मामला भी चर्चा में आया था जिसे ‘हैदराबाद फंड’ के नाम से जाना जाता है. आजादी के पहले हैदराबाद के निजाम की करोड़ों रुपये की रकम ब्रिटेन के एक बैंक में जमा थी और आज इसके स्वामित्व को लेकर भारत, पाकिस्तान और नवाब के वंशजों के बीच लंदन में मुकदमा चल रहा है. हालांकि यहां हम जिस मामले का जिक्र कर रहे हैं उसमें सबसे मजेदार बात है कि खजाना मिलने के पहले ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने इसमें हिस्सेदारी मांग ली थी.

यह घटना जयपुर राजघराने से संबंधित है और खजाने की खोज का अभियान जयपुर के नजदीक बने जयगढ़ किले में चलाया गया था. यह किला राजा जयसिंह (द्वितीय) ने 1726 में बनवाया था. यह एक सुरंग के जरिए आमेर किले से जुड़ा है जिसे 1592 में राजा मानसिंह (प्रथम) ने बनवाया था. मान सिंह अकबर के दरबार में सेनापति थे और अकबर की पहली राजपूत रानी हरका बाई के भतीजे भी थे. ऐसा माना जाता है कि हरका बाई को ही जोधा बाई के नाम से भी जाना जाता था. राजा मानसिंह ने मुगल सेना का नेतृत्व करते हुए कई लड़ाइयां जीती थीं. कहा जाता है कि एक ऐसी ही एक लड़ाई के लिए वे अफगानिस्तान भी गए थे. वहां उन्होंने विद्रोह तो कुचला ही, टनों सोना-चांदी लूटकर अपने साथ भी लाए. कहा जाता है कि यह संपत्ति उन्होंने मुगल सल्तनत के हवाले न करके आमेर के किले में छिपा दी.

आमेर-जयगढ़ किले के बारे में लंबे अरसे से ये कयास लगाए जाते रहे हैं कि यहां तहखानों में मानसिंह का गुप्त खजाना छिपा है. अरबी भाषा की एक पुरानी किताब हफ्त तिलिस्मत-ए-अंबेरी (अंबेर के सात खजाने) में भी इस बात का जिक्र है कि किले में अकूत सोना-चांदी छिपा हुआ है. जयगढ़ किले के नीचे पानी की सात विशालकाय टंकियां बनी हैं. माना जाता है कि खजाना इन्हीं में था.

इस खजाने की चर्चा 1976 में दुनियाभर में हुई. उस समय जयपुर राजघराने की प्रतिनिधि महारानी गायत्री देवी थीं. स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ते हुए लगातार तीन बार कांग्रेस प्रत्याशियों को हराने वालीं गायत्री देवी इंदिरा गांधी की प्रबल विरोधी थीं. 1975 में जब देश में आपातकाल लगा तो गायत्री देवी ने भी इसका विरोध किया था. हालांकि इस दौरान उन्हें बाकी विपक्षी नेताओं की तरह मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्युरिटी एक्ट) के तहत जेल नहीं भेजा गया. उन्हें विदेशी मुद्रा कानून उल्लंघन का आरोप लगाकर जेल भेजा गया था. बाद में इसी आधार पर जयगढ़ किले में आयकर अधिकारियों ने छापा मारा.

कहा जाता है कि यह कार्रवाई किले में कथित रूप से छिपाए गए खजाने की तलाश में की गई थी. आयकर विभाग के साथ-साथ इस कार्रवाई में पुलिस के दस्ते भी शामिल थे. बाद में सेना की एक टुकड़ी भी इस काम में लगाई गई. उस वक्त तीन महीने तक जयगढ़ किले में खजाने की खोज का काम चला था. जब यह जांच खत्म हुई तो सरकार ने आधिकारिक रूप कहा कि किले में कोई खजाना नहीं है.

लेकिन सरकार के इस बयान पर कई लोग संदेह जताते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जब सेना ने अपना अभियान समाप्त किया तो उसके बाद एक दिन के लिए दिल्ली-जयपुर हाईवे आम लोगों के बंद कर दिया गया. कहा जाता है कि इस दौरान जयगढ़ किले के खजाने को ट्रकों में भरकर दिल्ली लाया गया था और सरकार इसे जनता की नजरों से छिपाकर रखना चाहती थी. हाईवे बंद होने की पुष्टि कई विश्वसनीय स्रोतों से होती है लेकिन सरकार ने कभी इसका स्पष्टीकरण नहीं दिया.

खुद गायत्री देवी ने हमेशा इस बात से इनकार किया कि जयगढ़ किले से सरकार को कोई खजाना मिला था. उनके जीवनीकार धर्मेंद्र कंवर भी एक मीडिया रिपोर्ट में यही बात कहते हैं. इतिहासकारों के एक तबके की राय यह भी है कि जयगढ़ किले में खजाना था तो लेकिन राजा जयसिंह (द्वितीय) ने उसी की मदद से जयपुर शहर विकसित किया और इसलिए वह पूरी संपत्ति कभी की खत्म हो चुकी थी.

लेकिन राजघराने के कुछ सदस्य इस राय से इत्तेफाक नहीं रखते. वे दावा करते हैं कि छापे की कार्रवाई में सरकार को किले में जमा संपत्ति का कुछ हिस्सा मिला था. एक बात यह भी कही जाती है कि 1977 में जनता पार्टी की सरकार आने के बाद जयपुर राजघराने को किले से बरामद संपत्ति का कुछ हिस्सा लौटाया गया था. हालांकि इन सभी दावों के बीच कोई भी पक्ष पुख्ता तौर पर खजाने के बारे में कुछ नहीं बताता.

जहां तक जुल्फिकार अली भुट्टो के पत्र की बात है तो उन्हें दिसंबर, 1976 में आधिकारिक पत्र के जरिए जवाब दिया गया था. इसमें इंदिरा गांधी ने लिखा, ‘हमने अपने कानूनी सलाहकारों से कहा था कि वे आपके द्वारा पाकिस्तान की तरफ से किए गए दावे का ध्यान से अध्ययन करें. उनका साफ-साफ कहना है कि इस दावे का कोई कानूनी आधार नहीं है. वैसे यहां खजाने जैसा कुछ नहीं मिला.’