आम भारतीयों की जीवन रेखा कही जाने वाली रेलवे की कुछ समस्याएं ऐसी हैं, जो स्थायी तौर पर बनी हुई हैं. चाहे कोई भी सरकार आए, कोई भी रेल मंत्री रहे लेकिन ये जस की तस बनी रहती हैं. बल्कि कुछ समस्याएं तो ऐसी हैं, जो कम होने की बजाए दिनोंदिन और गहराती जाती हैं. मोटे तौर पर रेलवे की ज्यादातर समस्याएं पैसे की कमी से जुड़ी हुई हैं. रेलवे की कुछ और स्थायी समस्याओं और उनके समाधान के लिए इस रेल बजट में प्रस्तावित उपायों के जरिए यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या उन्हें लेकर कोई उम्मीद सुरेश प्रभु का दूसरा रेल बजट जगाता है.

परिचालन औसत

परिचालन औसत सुधारना रेलवे के लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी बना हुआ है. परिचालन औसत का मतलब यह है कि रेलवे को जो आमदनी होती है, उसका कितना हिस्सा उसे परिचालन पर खर्च करना पड़ता है. 2014—15 में यह 91.8 फीसदी था. इसका मतलब यह हुआ कि रेलवे को जो 100 रुपये की आमदनी हो रही है, उसमें 91.8 रुपये परिचालन पर खर्च हो जा रहे हैं. और नई योजनाओं आदि के लिए भारतीय रेल के पास सिर्फ छुट्टे पैसे ही बचते हैं.

पिछले बजट में प्रभु ने इसे घटाकर 88.5 फीसदी पर लाने का लक्ष्य रखा था. लेकिन 2016—17 का रेल बजट पेश करते हुए सुरेश प्रभु ने बताया कि 88.5 फीसदी का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता और पिछली साल के लिए संशोधित लक्ष्य 90 फीसदी है. हालांकि इस पर भी स्थिति अभी साफ नहीं है. सुरेश प्रभु की बात को आधिकारिक माना जाना चाहिए लेकिन पिछले दिनों पूर्व रेल मंत्री लालू यादव ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में 2015—16 में परिचालन औसत 120 फीसदी होने का दावा किया था.

सुरेश प्रभु ने अपने दूसरे बजट भाषण में 2016—17 के लिए परिचालन औसत का लक्ष्य 92 फीसदी निर्धारित किया है. परिचालन औसत बढ़ने की वजह बताते हुए उन्होंने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से रेलवे पर पड़ने वाले 28,450 करोड़ रुपये के अतिरिक्त खर्च का हवाला दिया है. यह एक व्यावहारिक समस्या है लेकिन 92 फीसदी का लक्ष्य तय करने का मतलब यह हुआ कि अधिक परिचालन औसत की स्थायी समस्या को दूर करने की दिशा में यह बजट बहुत कुछ करता हुआ नहीं दिख रहा. कहां तो पिछले साल 88.5 फीसदी का ख्वाब प्रभु दिखा रहे थे और अब कहां वे अगले साल इसे 92 फीसदी पर रोके रखने का लक्ष्य रख रहे हैं.

यातायात राजस्व

रेलवे को यातायात से होने वाली राजस्व आमदनी में जानकार बजट आने से पहले तय लक्ष्य में 17,000 करोड़ रुपये की कमी रह जाने की बात कह रहे थे. सुरेश प्रभु ने अपने बजट भाषण में इस बारे में जो तथ्य दिए हैं, वे इस आंकड़े के बेहद करीब हैं. 2015—16 में इस मद में तय लक्ष्य से 15,744 करोड़ रुपये कम की आमदनी हुई है. पिछले साल लक्ष्य 16.7 फीसदी बढ़ोतरी का रखा गया था. जो हासिल नहीं किया जा सका.

ऐसे में यातायात राजस्व में अगले वित्त वर्ष के लिए 18.9 फीसदी बढ़ोतरी का लक्ष्य मन में सवाल पैदा करता है. पिछले साल के रेलवे के प्रदर्शन को देखते हुए कई जानकार इस लक्ष्य को अव्यावहारिक मान रहे हैं. माल ढुलाई से होने वाली आमदनी भी तय लक्ष्य से तकरीबन 10,000 करोड़ रुपये कम रही. इस साल इस मद में पिछले साल के लक्ष्य से भी तकरीबन 8,000 करोड़ रुपये अधिक कमाई यानी 1.179 लाख करोड़ रुपये की आमदनी का लक्ष्य रखा गया है. पिछले साल के प्रदर्शन के साथ इस लक्ष्य को साथ रखकर देखने से इसे हासिल करना आसान नहीं लगता. इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि यातायात राजस्व बढ़ाने का लक्ष्य तो यह रेल बजट निर्धारित करता है लेकिन ​पिछले रेल बजट में इस मोर्चे पर तय रखे गए लक्ष्यों का हश्र देखकर यह संदेह पैदा होता है कि क्या रेलवे की इस स्थायी समस्या का कोई इलाज यह बजट कर पाएगा.

निवेश

भारतीय रेल के लिए निवेश का अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पाना भी एक स्थायी समस्या बन गया है. रेलवे की सभी समस्याओं की जड़ में पैसे की कमी को वजह बताया जाता है. इस वजह से न तो बुनियादी ढांचा मजबूत हो रहा है और न ही घोषणाओं पर क्रियान्वयन हो पा रहा है. भारतीय रेल के लिए जिस तरह का तकनीकी उन्नयन अपरिहार्य हो गया है, वह पैसे की कमी के कारण नहीं हो पा रहा है. सुरक्षा संबंधी जो उपकरण दूसरे देशों में सालों पहले से इस्तेमाल किए जा रहे हैं वे भारत में अब भी इस्तेमाल नहीं किए जा रहे. इसकी वजह पैसे की कमी को बताया जाता है.

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि निवेश बढ़ाने के बारे में प्रभु का रेल बजट क्या कहता और करता दिख रहा है. 2016—17 के लिए प्रभु ने रेलवे में 1.21 लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य रखा है. ये निवेश रेलवे में किन-किन क्षेत्रों में होगा, इस बारे में बजट मोटे तौर पर खामोश है. लेकिन जानकारों की मानें तो इसका एक बड़ा हिस्सा बुलेट ट्रेन परियोजना में जा सकता है. इस परियोजना के औचित्य पर एक अलग बहस चल रही है. इसमें पड़ने के बजाए यह जानने की कोशिश करते हैं कि प्रभु ने इस निवेश लक्ष्य को हासिल करने के लिए क्या रोडमैप अपने बजट में रखा है.

सुरेश प्रभु ने यह जानकारी दी कि भारतीय ​जीवन बीमा निगम अगले पांच साल में रेलवे में 1.5 लाख करोड़ रुपये निवेश करने को इच्छुक है. निवेश के दूसरे माध्यामों का जिक्र करते हुए प्रभु ने बताया कि सार्वजनिक निजी भागीदारी यानी पीपीपी से लेकर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों तक को रेलवे में निवेश करने के लिए मनाने की कोशिशें की जाएंगी. प्रभु ने रेलवे की परियोजनाओं से राज्य सरकारों को जोड़ने की योजना भी अपने बजट में सामने रखी है. इसके अलावा उन्होंने रेलवे योजना एवं निवेश संगठन की स्थापना की भी घोषणा की. यह संगठन मध्यावधि यानी पांच साल और दीर्घावधि यानी दस साल तक की कॉरपोरेट योजनाओं की पहचान करेगा और साथ ही उसे पूरा करने का रोडमैप देगा. इसके अलावा संगठन रेलवे की खास परियोजनाओं के लिए निवेश के विकल्प तलाशने का काम भी करेगा. ये सभी उपाय कागज पर तो अच्छे मालूम पड़ रहे हैं लेकिन जमीन पर कितना उतर पाते हैं, इस बारे में ठोस तौर पर कुछ कहना मुश्किल है.

सेवाओं का स्तर

सेवाओं का घटिया स्तर रेलवे की स्थायी समस्या है. इक्का—दुक्का रेलगाड़ियों को छोड़कर ज्यादातर देरी से चलने के लिए कुख्यात हैं. रेल में सफर करने वालों की यह सबसे बड़ी समस्या है. सेवाओं से संबंधित और भी कई ऐसी समस्याएं हैं, जिनके बारे में रेल यात्रियों ने मान लिया है कि अगर रेल में सफर करना है तो इनके साथ चलने की आदत डाल लेनी चाहिए.

ऐसे में इस रेल बजट में रेल मंत्री सुरेश प्रभाकर प्रभु का यह कहना आम यात्रियों को बेहद सुखद लगेगा कि वर्ष 2020 तक भारतीय रेलवे आम आदमी की लंबे समय से चली आ रही आशाओं को पूरा कर सकेगी. इनमें एक प्रमुख लक्ष्य यह है कि 2020 तक रेल गाड़ियों के समय पालन को 95 फीसदी तक पहुंचाना. यह लक्ष्य तो क्रांतिकारी है ही, एक और लक्ष्य ऐसा है जिसे अगर हासिल कर लिया गया तो रेल में सफर करने वालों को बड़ी राहत मिलेगी. कई रूटों पर कंफर्म टिकट नहीं मिल पाना एक स्थायी समस्या बन गया है. प्रभु ने कहा कि उनका लक्ष्य है कि 2020 तक सभी गाड़ियों में मांग के अनुसार आरक्षण उपलब्ध हो.

सेवाओं में सुधार के दूसरे लक्ष्यों में यह भी शामिल है कि माल गाड़ियां भी समय—सारणी के हिसाब से चलें. माल गाड़ियों की औसत गति 50 किलोमीटर प्रति घंटे हो और यात्री गाड़ियों की 80 किलोमीटर प्रति घंटे.

सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. स्वर्णिम चतुर्भुज रूट पर सेमी-हाई स्पीड ट्रेन चलाई जाएंगी. ऐसी ट्रेनों को इस बजट में तेजस नाम दिया गया है. ये ट्रेनें 130 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेंगी. इसके अलावा रेल मंत्री ने खानपान सेवाओं में सुधार की बात भी अपने बजट भाषण में की है.

इन वादों की एक कड़वी सच्चाई यह है कि हर रेल बजट में ऐसे वादे किए जाते हैं, जिन्हें उस वक्त क्रांतिकारी कहा जाता है लेकिन ये वादे हकीकत बनने के बजाए अगले बजट में फिर से दूसरे शब्दों में दोहरा दिए जाते हैं. इन वादों को लेकर प्रभु कितना गंभीर हैं, इसका जवाब अगले बजट में मिलेगा.