बाहर हमले हो रहे हैं, संसद में राष्ट्रवाद पर बहस चल रही है. कुछ लोगों को ऐसा लग रहा है मानो झूठ, धोखाधड़ी और हिंसा का एक घातक गठजोड़ हर जगह मौजूद है जिसने प्रशासन, पुलिस और एक हद तक अदालतों को भी लाचार कर दिया है.

जिस समय संसद में बहस चल रही थी, इलाहाबाद में कचहरी के पास जेएनयू पर हो रहे हमले के खिलाफ एक प्रदर्शन पर हमला हो रहा था. काले कोट और सफ़ेद पैंट पहने लोग प्रदर्शन स्थल पर आ धमके और इकट्ठा लोगों को जगह छोड़ देने का हुक्म दिया. प्रदर्शनकारियों ने हैरानी से देखा कि उन्होंने फोन करना शुरू किया कि यहां कुछ लोग आ गए हैं जो ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे हैं और हम पर हमला कर रहे हैं.

देखते-देखते हमलावरों की भीड़ दो-ढाई सौ की हो गई और उन्होंने प्रदर्शनकारियों के बैनर और झंडे छीन कर उनके डंडे और छड़ों से उन पर हमला शुरू कर दिया. लड़कियों और औरतों को भी, जिन्हें आम तौर पर पहले नहीं हाथ लगाया जाता था, बुरी तरह मारा गया. लात-घूंसे से पीटा गया. अनेक लोग घायल हुए. हमलावर बाहर हैं और अगले हमले की तैयारी कर रहे हैं.

इलाहाबाद पीयूसीएल की सचिव उत्पला ने कहा कि आज तक उन्होंने इस तरह का माहौल नहीं देखा था. सरकार के खिलाफ प्रदर्शन पहले भी होते रहे हैं. आज यह नामुमकिन हो गया है.

ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चो को ज़िंदा जला दिए जाने के बाद उदार, कवि-प्रधानमंत्री ने हत्या पर विचार करने से ज्यादा धर्म-परिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस की चुनौती दी थी

इलाहाबाद के पहले यह हमला देश की राजधानी में हो चुका है. एक बार नहीं, दो बार, वह भी सर्वोच्च न्यायालय की नाक के नीचे. लेकिन उस हमले को मजाक की तरह लिया गया. पहले ऐसा लगा कि सर्वोच्च न्यायालय इससे बहुत चिंतित है. उसने फौरन वरिष्ठ वकीलों की एक टीम बनाकर हालत का जायजा लेने को पटियाला कोर्ट भेजा. इस टीम पर भी पटियाला कोर्ट के वकीलों ने हमला किया.

जब टीम लौटी तो अदालत ने उससे लिखित रिपोर्ट मांगी. हालात जिस तरह के थे, रिपोर्ट पर तुरंत विचार होना चाहिए था. ऐसा नहीं हुआ. दूसरे दिन भी रिपोर्ट पर बात न हुई. और फिर बात आई-गई हो गई, मानो कुछ हुआ ही न हो. क्या यह ज़रूरी न था कि हमारी सबसे बड़ी अदालत यह सख्त रुख लेती कि इस तरह की हिंसा नाकाबिले बर्दाश्त है? क्या यह न करने की वजह से ही इलाहाबाद के वकीलों को कल प्रदर्शनकारियों पर हमला करने की हिम्मत मिली?

इस विषय पर बात करना क्या अदालत की अवमानना है? यह संतोष का विषय है कि मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने प्रशांत भूषण की अर्जी सुनना कबूल कर लिया है जो उन तीन लोगों के खिलाफ है जो सीना ठोंक कर अदालत में किये हमले में अपनी भागीदारी को सही ठहरा रहे हैं और आगे भी हमले की धमकी दे रहे हैं. हम उम्मीद करें कि इस सुनवाई में उच्चतम न्यायालय न्याय की मर्यादा और उसकी शान को बहाल करेगा जिसकी सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. वरना दो दिन पहले इस अदालत की एक दूसरी पीठ ने प्रशांत भूषण से पूछा था कि क्यों इस पूरे मामले को इतनी तवज्जो दी जाए, हो सकता है ये साहबान सिर्फ डींग मार रहे हों!

हम सब याददाश्त को खंगालें और याद करें कि कौन सा ऐसा वक्त था जब शासक दल के बड़े सदस्य खुलेआम अपने विरोधियों को, जिन्हें वे देशद्रोही कहते हैं, गोली मार देने की धमकी दे रहे थे!

जिन्होंने हमला किया, वे जब उसका खुलेआम ऐलान करें तो उसे मजाक और बड़बोलापन कहा जाता है लेकिन कुछ अप्रिय और अस्वीकार्य नारों को देश में वास्तविक हिंसा ठहरा दिया जाता है.

हम सब याददाश्त को खंगालें और याद करें कि कौन सा ऐसा वक्त था जब शासक दल के सांसद ,विधायक और उसके बड़े सदस्य खुले-आम अपने विरोधियों को, जिन्हें वे देशद्रोही कहते हैं, गोली मार देने की धमकी दे रहे थे! ऐसा आज तक नहीं हुआ था. हमलावरों को आगे और हमले करने के लिए खुला छोड़ दिया गया है!

हिंसा अब कोई मुक्तिबोध की आशंका नहीं है. भारतीय जनतंत्र का यह रामदास-क्षण है. हिंसा एक असलियत है. इसका सामना क्या विचार-विमर्श से किया जा सकता है?

आज के समय संसद में बहस का विषय राष्ट्रवाद नहीं, सड़क और विश्वविद्यालयों में हो रही हिंसा को होना चाहिए था और उसके लिए जवाबदेही तय करने की कोशिश करते हुए सरकार को पाबंद किया जाना चाहिए था. लेकिन हम सब इस धोखे के जाल में फंस गए लगते हैं. यह कुछ वैसा ही है कि पहले कोई आपको पीट डाले और फिर कहे कि आइए इस पर विचार करें कि हमने आपके साथ ऐसा क्यों किया.

जो कातिल है, उसे मक्तूल से शिकायतें हैं. लेकिन यह होना था जब हमने हिंसा से परहेज न करने वालों को सत्ता सुपुर्द कर दी. ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चो को ज़िंदा जला दिए जाने के बाद उदार, कवि-प्रधानमंत्री ने हत्या पर विचार करने से ज्यादा धर्म-परिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस की चुनौती दी थी. बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किए जाने के हिंसक और रक्तरंजित अभियान के बाद इस पर बहस की बात की गई कि वहां मंदिर था या नहीं!

आज के समय संसद में बहस का विषय राष्ट्रवाद नहीं, सड़क और विश्वविद्यालयों में हो रही हिंसा को होना चाहिए था और उसके लिए जवाबदेही तय करने की कोशिश करते हुए सरकार को पाबंद किया जाना चाहिए था

हर बार, हर बार यह होता है कि इस प्रकार हिंसा का कोई मूल कारण खोजने की कोशिश की जाती है जिससे वह हिंसा जायज ठहराई जा सके. फिर पूरी बहस उस मूल कारण पर होने लगती है और हिंसा कहीं पीछे रह जाती है.

इलाहाबाद में भी जो हिंसा हुई, ज़रूर उसे यह कहकर उचित ठहराया जाएगा कि वहां भारत विरोधी नारे लगाए गए थे जिससे देशभक्त वकीलों का खून खौल उठा और वे खुद को न रोक पाए. यह सरासर झूठ है लकिन इसे इतनी आक्रामकता से फैलाया जाएगा कि इस झूठ को झूठ कहने वालों को ही इसे साबित करने की चुनौती दे दी जाएगी. आगे यह भी कहा जा सकता है कि हमने इसलिए पहले ही हमला कर दिया कि ऐसी देश-विरोधी गतिविधियां न हो सकें!

यह सब जानते हैं कि कन्हैया न तो नारे लगा रहा था और न कार्यक्रम का आयोजक था. लेकिन अब दिल्ली पुलिस की तर्क-बुद्धि के हिसाब से उसे ही यह साबित करना है कि वह सच कह रहा है. पुलिस और सरकार का आरोप अपने आप ही सच मान लिया गया है! इस झूठ और धोखे के व्यापार में तर्क और विवेक की जगह कहां है और कौन उसके लिए लड़ने को तैयार हो, क्योंकि उसे भी तुरंत शिकार बनाया जा सकता है.

आज़ाद भारत में जनतंत्र ने बहुत सारी चुनौतियां झेली हैं. लेकिन इस बार ऐसे लोगों से इसका सामना है जो अर्ध-सत्य और असत्य के उद्घोष के बाद सत्यमेव जयते का नारा लगा सकते हैं. इस क्रूर कपटता का सामना करने के लिए सारे जनतांत्रिक संसाधन इकट्ठा करने ही होंगे.