भारत के तथाकथित उदारचित्त समुदाय ने भी दशकों से - भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही - भारतीय परंपरा के प्रति बेरुख़ी बरती है और उसकी व्याख्या और पक्षधरता का ज़िम्मा मानो संकीर्ण शक्तियों को सौंप दिया हैं. हम यह भूल ही गये कि हमारी परंपरा में ऐसा बहुत कुछ है जो हमें आगे ले जाने में मदद कर सकता है.

एक अजब कुतर्क इतनी बार किया गया है कि हमारी परंपरा में गतिशील तत्व बहुत कम हैं और वह अतीतजीवी है कि हम उसे तथ्य मानने लगे. जिसने भी परंपरा की बात की वह प्रतिक्रियावादी और प्रगतिविरोधी घोषित किया जाता रहा. अपनी परंपरा की आलोचनात्मक परीक्षा करने की बजाय संकीर्णतावश या नासमझी में हमने उसे निहायत आलोचना-विरोधी ढंग से या तो ख़ारिज कर दिया या हाशिये पर डाल दिया.

एक दौर में विचार की अल्पसंख्यकता की भारतीय परंपरा में जगह थी. तब पंडित, पुरोहित, मौलवी, धार्मिक संस्थाओं और अनुष्ठानों की खिल्ली उड़ाई जा सकती थी

हम यह भूल गये कि भारत में इतिहास का भले महत्व न हो, परंपरा का है. वह तरह-तरह के रूपों में मौजूद है और उसकी अवहेलना करना यथार्थ की अवहेलना करना है. सही है कि उसमें अन्याय के भी कई तत्व मौजूद हैं, ऐसी धारणाएं हैं जो स्वतंत्रता-समता-न्याय के सिद्धांतों से मेल नहीं खातीं या उनके विरुद्ध पड़ती हैं. इन सबको, उचित ही ख़ारिज किया जा सकता है. पर इसके बावजूद हमारी परंपरा में ऐसा बहुत कुछ है जो काम का हो सकता है. हमारी ज़िम्मेदारी है - बौद्धिक और सांस्कृतिक दोनों ही - कि हम परंपरा की नयी व्याख्याएं करें, उसे अंधानुकरण से बचाकर उसकी संजीवनी, संभावना और प्रश्नवाचकता को पहचानें और सामने लायें.

हमारी ज्ञान-संस्थाओं में भी पारंपरिक भारतीय ज्ञान को लगभग विचार में ही नहीं लिया जाता. यह भूलकर कि एक समय में संसार में हमारी, प्रतिष्ठा हमारे ज्ञान के ही कारण थी. यह भूलकर कि ज्ञान सिर्फ़ पश्चिम में नहीं अन्यत्र भी उपजा-विकसित हुआ है और हमारी पुण्य-भूमि ज्ञानभूमि भी रही है. लेकिन हमारे दर्शनों, विचारसरणियों आदि में औरों की दिलचस्पी है पर हमारी नहीं. यह आत्मवंचना (खुद को धोखा देने का काम) और आत्मनिर्वासन औपनिवेशिक मानसिकता के चलते हममें आया पर हम क्यों उसकी समाप्ति के सत्तर वर्ष बाद भी उसकी गिरफ़्त में हैं?

उदार तबकों की बेरुख़ी ने हमारी परंपराओं को संकीर्ण मनोवृत्तियों को सौंप दिया है जो उसकी बेहद अप्रामाणिक और मनमानी, विलगाव बढ़ानेवाली, जातीय अन्याय को वेदविहित बतानेवाली दुव्यार्ख्याएं कर रही हैं और उनसे साधारण जन दिग्भ्रिमित हो रहे हैं. कुछ बरसों पहले बहुत ज़ोर-शोर से यह कहा जा रहा था कि हम एक ज्ञानसमाज बनने की ओर बढ़ रहे हैं : आज भारत में हर तरह का ज्ञान संदिग्ध माना जा रहा है. हम सिर्फ़ पश्चिम के कौशलों में अपने को दीक्षित कर उनके तकनीकी मजदूर हो जाने पर गर्व कर रहे हैं.

कुछ बरसों पहले बहुत ज़ोर-शोर से यह कहा जा रहा था कि हम एक ज्ञानसमाज बनने की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन आज भारत में हर तरह का ज्ञान संदिग्ध माना जा रहा है

हमें जल्दी से जल्दी इस दुष्चक्र से निकलना होगा. हमें उन बुनियादी प्रश्नों से रूबरू होना होगा जो हमारी परंपराओं ने लगातार पूछे हैं. पुणे में गोविंद पनसारे की पहली पुण्यतिथि पर यह सवाल उठा कि अगर आज कबीर होते तो कई तरह के क़ानूनों के तहत जेल में सड़ रहे होते. यह कैसा लोकतंत्र हमने बनाया है, कैसे क़ानून का राज्य है कि प्रश्न पूछना, तीख़े प्रश्न पूछना, फिर वे सत्य की प्रकृति, राष्ट्र-राज्य की अवधारणा, ईश्वर के अस्तित्व, मनुष्य की नियति, समाज की स्थिति, सरकार की मर्यादाओं, दलितों-अल्पसंख्यकों-आदिवासियों-स्त्रियों के विरुद्ध अत्याचार, हिंसा आदि के बारे में हो तो उन्हें देशद्रोह माना जायेगा या कम से कम माना जा सकता है?

विचार की अल्पसंख्यकता की भारतीय परंपरा में जगह थी. पंडित, पुरोहित, मौलवी, धार्मिक संस्थाओं और अनुष्ठानों की खिल्ली उड़ाने की मुहलत थी. आज अगर नहीं है तो इसे भारतीय परंपरा से कोई समर्थन नहीं मिल सकता, न अवधारणा के स्तर पर, न व्यवहार और अनुष्ठान के आधार पर.

एक उजली परंपरा बल्कि परंपरा-समुच्य को दिनदहाड़े मैला और दूषित किया जा रहा है और हम हाथ पर हाथ धरे देख रहे हैं. गांधी के रूप में इसी परंपरा ने कुछ दशकों पहले अपने को आधुनिक और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करनेवाला बनाया था. गांधी ने कहा था कि छुआछूत का कोई औचित्य उन्हें वेदों में दिखा दिया जाये तो वे वेदों को खारिज कर देंगे लेकिन छुआछूत को नहीं मानेंगे. यह निर्भयता गांधी जैसे हिन्दू को परंपरा से ही मिली थी, निरी आधुनिकता से नहीं.


हमारे समय में उम्मीद की कितनी गुंजाइश है?

दशकों पहले गोविंद पनसारे ने गांधी जी की हत्या पर लिखा था - ‘कार्रवाई अलग हो सकती है, मुखौटे अलग, भाषा अलग पर लक्ष्य एक है... गांधी की हत्या किसी निजी इरादे से नहीं की गयी थी. वह निजी बदला लेने पर आधारित कोई अपराध नहीं था. जो उनकी विचारधारा, उनका दृष्टिकोण पसन्द नहीं करते थे उन्होंने गांधी को मारा. जिन्होंने क़त्ल किया उनकी अपनी विचारधारा थी. उन्होंने अपनी विचारधारा की सफलता के लिए गांधी को मारा.’

‘वे शक्तियां जो दूसरी धार्मिक आस्थाओं से नफ़रत करती है और असमता की धारणा का समर्थन करती हैं, गांधी के समय से हमारे समय में अधिक शक्तिशाली हो गयी हैं’

पनसारे ने अपने लेख का समापन करते हुए कहा - ‘वे शक्तियां जो दूसरी धार्मिक आस्थाओं से नफ़रत करती है और असमता की धारणा का समर्थन करती हैं, गांधी के समय से हमारे समय में अधिक शक्तिशाली हो गयी हैं.’ स्वयं गोविंद पनसारे की दिन-दहाड़े हत्या किसी निजी कारण से नहीं उनके विचारों से असहमत होने के कारण की गयी थी. यह हमारे समय की एक हत्यारी सचाई है: दाभोलकर और कलबुर्गी इस शिकार त्रयी के दो और नाम हैं.

मैंने पुणे में पनसारे की पहली पुण्यतिथि पर अपना स्मृति व्याख्यान इन्हीं उद्धरणों से शुरू किया. फिर यह देखने की कोशिश की कि हमारे समय में उम्मीद की कितनी गुंजाइश बनती है. आज सफलता, दौलत और सुरक्षा के पीछे भागता-बढ़ता मध्यवर्ग है. दुनिया बदलने की आकांक्षा को तजकर अपनी निजी हालत, किसी भी तरह, बदलने के उद्यम हो रहे हैं. बने-बनाए उत्तरों में संतुष्ट होती जिज्ञासा है. लोग ‘सब कुछ ठीक हो जायेगा’ के दैनिक आश्वासन पर भरोसा कर रहे हैं भले कुछ भी ठीक या बेहतर होता नज़र नहीं आता.

एक तरह की आत्मतुष्ट नैतिकता आज विकसित और मान्य है जिसमें आत्मालोचन की कोई जगह नहीं है. समाज के बजाय बाज़ार में आस्था लगातार बढ़ रही है. चूंकि अधिकांशतः दूसरों द्वारा रचा ज्ञान इंटरनेट पर सुलभ है, स्वयं ज्ञान रचने की ज़रूरत ही नहीं बची है. परंपरा को जानने-समझने-अवगाहने की अनिच्छा है, उसका निरे अनुष्ठान में अवमूल्यन हो रहा है. तेज़ गति-हड़बड़ी-अधीरता का एक नया नागरिक शास्त्र हम पर थोप दिया गया है. हमारे पड़ोस ध्वस्त हो चुके हैं और हम दरबों में रहकर सुरक्षित हैं.

तीन प्रमुख व्यवस्थाएं हमारे समय में लगातार हिंसक हो रही हैं: राजनीति, धर्म और बाज़ार. इनमें एक तरह का अघोषित पर स्पष्ट गठबंधन है

तीन प्रमुख व्यवस्थाएं हमारे समय में लगातार हिंसक हो रही हैं: राजनीति, धर्म और बाज़ार. इनमें एक तरह का अघोषित पर स्पष्ट गठबंधन है. तीनों में ही हमारी संवैधानिक मूल्य-त्रयी स्वतंत्रता-समता-न्याय लगभग हर दिन अपमानित और अवमूल्यित हो रहे हैं. प्रश्नवाचकता, असहमति, संवाद-विवाद को रोकने-थामने-झेलने की वृत्तियां मुखर और सशक्त हो रही हैं. अभिव्यक्ति, खान-पान, पुस्तकों, विचारों आदि पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाये जा रहे हैं. एक नये तरह का सामाजिक पाखंड दरपेश है. ‘कहो कुछ, करो कुछ’ और ‘अगर कहे के विरुद्ध कुछ होता दिखे तो उसके बारे में चुप रहो’. वचन की शुद्धता बची रहे, कर्म भले उससे अलग होता रहे.

सार्वजनिक धन की खुल्लमखुल्ला लूट मची है: हज़ारों करोड़ों के बैंक ऋणों को जो कि ज़्यादातर कॉरपोरेट समूहों को दिये गये थे, करदाताओं के पैसों से ‘राइट ऑफ’ करने का क़दम उठाया जानेवाला है. बाज़ार के बढ़ने और राज्य के कमज़ोर पड़ने का यह एक और उदाहरण है. सारे आंकड़े बता रहे हैं कि विकास की जिस तीव्र गति का वायदा किया गया था वह धीमी है और बढ़ती असमानता, अन्याय और शोषण के प्रति असन्तोष बढ़ रहा हैं. ऐसे में सिवाय इस बात के कि उम्मीद करना हमारा सहज स्वभाव है, क्या उम्मीद की जाये?

संघ-परिवार 90 वर्ष से भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का विफल प्रयत्न करता रहा है और अब सत्तारूढ होने पर उसकी अधीरता समझ में आती है

हमारी बहुलता और वैचारिक-सांस्कृतिक विविधता सदियों से भारत का सत्व रही है और उसे अंततः नष्ट या हाशिये पर नहीं डाला जा सकता. अगर संघ परिवार में कट्टरता बढ़ रही है तो अन्य विचारदृष्टियों और संगठनों में, सौभाग्य से, वह घट रही है. एक व्यापक उदार बिरादरी बनकर सक्रिय और मुखर हो रही है. साम्प्रदायिकता, दलित-विरोध, धार्मिक विद्वेष आदि के विरुद्ध एक अघोषित संयुक्त मोर्चा उभर रहा है. छात्रों में बढ़ता असंतोष और सकर्मकता शुभ लक्षण कहे जा सकते हैं. अब तक पालतू लगते ज़्यादातर मीडिया में भी कुछ साहस दिखायी देने लगा है. देशद्रोह और राष्ट्रवाद को लेकर जो व्यापक बहस छिड़ी है उसमें समावेशी और बहुलता-पोषक दृष्टि भी अपने को प्रभावशाली ढंग से विन्यस्त कर रही है.

संघ-परिवार 90 वर्ष से भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का विफल प्रयत्न करता रहा है और अब सत्तारूढ होने पर उसकी अधीरता समझ में आती है. इसलिए यही समय है कि सत्ताकांक्षा से मुक्त स्वतंत्रता-समता-न्याय के पक्ष में सत्याग्रही सिविल राजनीति व्यवस्थित ढंग से स्पष्ट और सक्रिय हो. उसे राजनीति के बजाय समवर्ती लोकनीति कहना बेहतर होगा. वह उम्मीद का दूसरा नाम और मुक़ाम हो सकती है.