कल आम बजट पेश होने वाला है. बजट पर होने वाली कोई भी बात टैक्स की चर्चा के बिना अधूरी रहती है. जनता पर टैक्स लगता है तो सरकार की जेब में पैसा आता है और उससे देश चलता है. व्यवस्था चलाने के लिए पैसा जुटाने की यह जुगत बहुत पुरानी है जिसका इतिहास खंगालने पर कई मजेदार चीजें मिलती हैं.

उदाहरण के लिए 1535 में इंग्लैंड के सम्राट हेनरी अष्टम ने दाढ़ी पर टैक्स लगा दिया था. उनकी भी दाढ़ी थी, लेकिन यह पता नहीं चलता कि वे यह टैक्स देते थे या नहीं. वैसे यह टैक्स आदमी की सामाजिक हैसियत के हिसाब से लिया जाता था. हेनरी अष्टम के बाद उनकी बेटी एलिजाबेथ प्रथम ने नियम बनाया कि दो हफ्ते से बड़ी हर दाढ़ी पर टैक्स लिया जाएगा.

1698 में रूस के शासक पीटर द ग्रेट ने भी दाढ़ी पर टैक्स लगाया था. पीटर की इच्छा थी कि रूस का समाज भी यूरोपीय देशों के समाज की तरह आधुनिक हो और लोग नियम से दाढ़ी मुंडवाते रहें. तब रूस में दाढ़ी टैक्स चुकाने वालों को एक टोकन मिलता था जिसे उन्हें हर समय साथ लेकर चलना पड़ता. टोकन तांबे या चांदी का होता था और उस पर लिखा होता था कि उस शख्स ने दाढ़ी कर चुका दिया है. कहने की जरूरत नहीं कि कोई दाढ़ी वाला शख्स अगर बिना टोकन पाया गया तो उसकी शामत आ सकती थी.

आत्मा पर टैक्स

इन्हीं पीटर द ग्रेट ने 1718 में सोल यानी आत्मा पर भी टैक्स लगाया. यह उन लोगों को देना होता था जो यह यकीन करते थे कि उनके पास आत्मा जैसी कोई चीज है. बच वे भी नहीं सकते थे जो यह यकीन नहीं करते थे. कहते हैं कि उनसे धर्म में आस्था न रखने का टैक्स लिया जाता था. चर्च और पहुंच वाले वर्ग से ताल्लुक रखने वालों को छोड़कर यह सबको देना होता था. टैक्स वसूली का वक्त हो और कोई घर से गायब मिले तो उसका टैक्स पड़ोसी को देना होता था. यानी आम लोगों के लिए एक काम यह भी बढ़ गया था कि टैक्स वसूली के वक्त वे अपने पड़ोसियों पर नजर रखें. पीटर द ग्रेट ने यह टैक्स इसलिए लगाया था कि इससे रूस की सेना को शक्तिशाली बनाने के लिए जरूरी भारी रकम जुटाई जा सके. वे इन दोनों कामों में सफल रहे.

खिड़की टैक्स

1696 में इंग्लैंड और वेल्स के राजा विलियम तृतीय ने खिड़कियों पर टैक्स लगाया. क्यों लगाया, इसकी भी कहानी दिलचस्प है. उस समय राजा के खजाने की हालत खस्ता चल रही थी. इसकी हालत सुधारने के लिए पहले इन्कम टैक्स का रास्ता था लेकिन उन दिनों वहां पर इसका भारी विरोध हो रहा था. इन्कम टैक्स चुकाने के लिए अपनी कमाई सार्वजनिक करना जरूरी था. लोगों का मानना था कि यह उनके मामलों में सरकार का दखल है. वे इसे व्यक्तिगत आजादी पर खतरा करार दे रहे थे.

तो आखिर में प्रजा भी संतुष्ट रहे और खजाने की हालत भी दुरुस्त हो जाए, इसके लिए विंडो टैक्स का रास्ता निकाला गया. माना गया कि आदमी के पास अगर पैसा ज्यादा है तो घर भी बड़ा होगा और इसलिए खिड़कियां भी ज्यादा होंगी. तो टैक्स खिड़कियों की संख्या के हिसाब से लगाया गया.

हालांकि बहुत से लोगों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया. उन्होंने टैक्स लगते ही अपने घरों की खिड़कियों को इस कारीगरी से ईंटें लगाकर बंद कर दिया कि टैक्स हटे तो तुरंत ही उन्हें हटाकर मकान की सुंदरता बहाल की जा सके.

कुंवारों की शामत

नौवीं सदी में रोम के सम्राट ऑगस्टस ने बैचलर टैक्स लगाया था. इसका मकसद शादी को बढ़ावा देना था. ऑगस्टस ने उन शादीशुदा जोड़ों पर भी टैक्स लगाया जिनके बच्चे नहीं थे. यह 20 से 60 साल की उम्र तक के लोगों पर लागू होता था. बैचलर टैक्स 15वीं सदी के दौरान ओटोमन साम्राज्य में भी प्रचलित था. इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने भी 1924 में 21से लेकर 50 वर्ष की आयु के बीच के अविवाहित पुरुषों पर बैचलर टैक्स लगाया. यानी कुंवारों की शामत थी.

20वीं सदी की शुरुआत में कनाडा में आने वाले हर चीनी पर हेड टैक्स लगाया जाता था. न्यूजीलैंड में भी कुछ इसी तरह का टैक्स चलन में था. बाद में दोनों ही देशों ने इस तरह के नस्लवादी व्यवहार के लिए माफी मांगी.

आज भी ऐसे विचित्र टैक्स जारी हैं. डेनमार्क और हंगरी जैसे देशों ने चीज, बटर और पेस्ट्री जैसी खाद्य सामग्री पर फैट टैक्स लगाया हुआ है. इस टैक्स के दायरे में वे सभी चीजें आती हैं, जिनमें 2.3 परसेंट से ज्यादा सेचुरेटेड फैट है. इस टैक्स का मकसद लोगों को मोटापे और उसके चलते होने वाली बीमारियों से बचाना है. ज्यादा टैक्स की वजह से चीजें महंगी होंगी, तो लोग कम खाएंगे और उनकी सेहत ठीक रहेगी.