पहले हिमस्खलन, फिर भयानक भूकंप और इन हादसों के चलते हुईं 35 मौतें भी एवरेस्ट को फतह करने की इच्छा रखने वालों का जूनून कम नहीं कर पाई हैं. द हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक कई पर्वतारोही दुनिया की इस सबसे चोटी पर विजय पाने का सपना लिए नेपाल में फिर इकट्ठा हो चुके हैं और वे जल्द ही अपनी कोशिश शुरू करना चाहते हैं.

एवरेस्ट आरोहण अभियान नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अहम हैं. भारत का यह पड़ोसी देश इनसे अच्छी-खासी विदेशी मुद्रा जुटाता है. प्रति व्यक्ति एवरेस्ट अभियान का खर्च 30 से 60 हजार डॉलर तक आता है जिसमें 11 हजार डॉलर की परमिट फीस शामिल है.

2014 में हुई हिमस्खलन की एक घटना ने सीजन शुरू होने से पहले से ही खत्म कर दिया था. इस हादसे में शिखर तक का रास्ता तैयार कर रहे 16 शेरपाओं की मौत हो गई थी.

नेपाल के पर्यटन क्षेत्र के लिए बीते दो साल बहुत बुरे रहे. 2014 में हुई हिमस्खलन की एक घटना ने सीजन शुरू होने से पहले से ही खत्म कर दिया था. इस हादसे में शिखर तक का रास्ता तैयार कर रहे 16 शेरपाओं की मौत हो गई थी.

बीता साल तो और भी बुरा रहा. अप्रैल में आए और 7000 जिंदगियां लीलने वाले भयानक भूकंप का असर एवरेस्ट के इलाके में भी रहा. भूकंप की वजह से पहाड़ से गिरे बर्फ और चट्टानों के मलबे के चलते बेस कैंप में 19 लोगों की मौत हो गई. भूकंप ने जिस तरह से रास्तों और पुलों को नुकसान पहुंचाया उसके बाद कहा जाने लगा था कि एवरेस्ट अब लंबे समय तक वीरान रहेगा.

लेकिन 8848 मीटर ऊंची यह चोटी फिर पर्वतारोहियों को खींच लाई है. रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल माउंटेनरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष अंग शेरिंग शेरपा कहते हैं, 'कई लोग पूछताछ कर रहे हैं. इनमें वे भी हैं जिनके अभियान बीते दो साल के दौरान हुए हादसों के चलते टल गए थे और नए लोग भी.'

लेकिन अनिश्चितता अभी भी है. नेपाल सरकार ने अभी तक बीते साल भूकंप के चलते अभियान को अंजाम न दे सके 357 लोगों के परमिट बढ़ाए नहीं हैं. अभी तक उन 334 लोगों के परमिट बढ़ाए गए हैं जिनका अभियान 2014 के हादसे के चलते रद्द हो गया था.

फिर भी जोश बरकरार है. चढ़ने वालों का भी और चढ़ाने वालों का भी. बीते शनिवार ही 10 आइस डॉक्टरों की एक टीम बेस कैंप के लिए रवाना हो गई है. आइस डॉक्टर उन शेरपाओं को कहा जाता है जो खुंभू आइसफॉल नाम की जगह से कैंप 2 तक का रास्ता तैयार करते हैं.

1953 में एडमंड हिलेरी और शेरपा तेनसिंह के पहली बार एवरेस्ट पर पहुंचने से लेकर अब तक कुल 4093 लोग इस शिखर को फतह कर चुके हैं. 282 लोग इस अभियान के दौरान अपनी जान गंवा चुके हैं जिनमें 113 शेरपा भी शामिल हैं. इनमें से कइयों के शव तो अभी भी दुर्गम ऊंचाइयों में ही फंसे हैं.