इस बात के संकेत तो राष्ट्रपति के अभिभाषण से ही मिलने लगे थे कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार लोगों के बीच बनी इस धारणा को तोड़ना चाहती है कि यह सरकार कॉरपोरेट घरानों की सरकार है. रेल बजट और आर्थिक सर्वेक्षण से भी ऐसे ही संकेत मिले थे. लेकिन जब वित्त वर्ष 2016-17 का बजट केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में पेश किया तो यह बिल्कुल साफ हो गया कि मोदी सरकार को यह समझ में आ गया है कि उसे हर हाल में इस धारणा को तोड़ना ही होगा कि यह सरकार ‘अदाणी-अंबानी जैसे लोगों की सरकार’ है. सत्याग्रह ने बजट के इसी लाइन पर होने की जानकारी अपने पाठकों को दो दिन पहले ही एक रिपोर्ट के जरिए दी थी.

जिस तरह से मोदी सरकार के इस तीसरे बजट में किसान, गांव और गरीबों के लिए योजनाओं और आवंटन की घोषणा अरुण जेटली ने की है, उसके कई राजनीतिक मतलब हैं. लेकिन जिस तरह से ये घोषणाएं की गई उनके आधार पर ही यह कहा जा सकता है कि सरकार कॉरपोरेट घरानों के करीब होने की अपनी छवि को तोड़ने के लिए बेताब दिख रही है.

अपने बजट भाषण में अरुण जेटली ने भारत की तस्वीर बदलने के लिए नौ स्तंभों का जिक्र किया. इनमें भी सबसे पहले उन्होंने कृषि का नाम लिया

अपने बजट भाषण में अरुण जेटली ने भारत की तस्वीर बदलने के लिए नौ स्तंभों का जिक्र किया. इनमें भी सबसे पहले उन्होंने कृषि का नाम लिया. फिर उन्होंने ग्रामीण विकास का जिक्र किया. इसके बाद सामाजिक क्षेत्र में होने वाले काम की बात वित्त मंत्री ने की. फिर बारी आई शिक्षा और रोजगार सृजन की. तब जाकर बुनियादी ढांचा, वित्तीय सुधार, गवर्नेंस और कारोबार की परिस्थितियों में सुधार आदि की बात वित्तमंत्री अरुण जेटली ने की. अरुण जेटली इसी क्रम में इन सभी विषयों से जुड़ी योजनाओं की घोषणा भी की जिससे कि लोगों की मोदी सरकार की प्राथमिकताओं का अंदाजा लग सके.

ग्रामीण विकास के लिए अरुण जेटली ने 87,765 करोड़ रुपये आवंटित करने की घोषणा की. फसल बीमा योजना के लिए 5,500 करोड़ रुपये का प्रस्ताव वित्त मंत्री ने किया. उन्होंने सिंचाई के लिए 20,000 करोड़ रुपये का कोष बनाने की बात भी अपने बजट भाषण में की. 2016-17 में किसानों को नौ लाख करोड़ रुपये कर्ज देने का लक्ष्य केंद्र सरकार ने इस बजट के जरिए रखा है. कृषि क्षेत्र में 100 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रस्ताव भी वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट में किया है. हर सेवा पर आधा फीसदी का कृषि कल्याण सेस लगाने की घोषणा भी आम बजट में वित्त मंत्री ने की है. इसका मतलब यह हुआ कि अब सेवा कर बढ़कर 15 फीसदी हो जाएगा. इस पर सवाल उठेंगे लेकिन सरकार अपने बचाव में किसानों की चिंता और उनके हितों की रक्षा की बात करेगी.

2018 के मई तक वित्त मंत्री ने ग्रामीण भारत के संपूर्ण विद्युतीकरण कर लक्ष्य रखा है. जाहिर है कि अब तक जिन गांवों में बिजली नहीं पहुंची है, वहां के लोगों को जेटली की यह बात अच्छी लगेगी. तंबाकू उत्पादों में भी एकदम गरीब लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली बीड़ी को छोड़कर हर चीज को महंगा करने का उपाय वित्त मंत्री ने कर दिया.

महंगी गाडि़यों को और महंगा करने के उपाय भी बजट के जरिये वित्त मंत्री ने किए हैं. लेकिन कॉरपोरेट टैक्स में कमी का जो अनुमान लगाया जा रहा था वैसा वित्त मंत्री ने नहीं किया

पांच लाख से कम कमाने वाले करदाताओं के लिए जो 2,000 रुपये की कर राहत थी उसे वित्त मंत्री ने बढ़ाकर 5,000 रुपये कर दिया. उधर एक करोड़ से अधिक आमदनी वाले लोगों पर जो 12 फीसदी का सरचार्ज लगता था, उसे वित्त मंत्री ने बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया. वहीं दस लाख से अधिक कमाई करने वालों के लाभांश पर भी कर का थोड़ा और बोझ सरकार ने बढ़ाया है.

इसके अलावा महंगी गाडि़यों - जिनकी कीमत 10 लाख रुपये से अधिक है - को और महंगा करने के उपाय भी बजट के जरिये वित्त मंत्री ने किए हैं. लेकिन कॉरपोरेट टैक्स में कमी का अनुमान लगाया जा रहा था लेकिन वित्त मंत्री ने ऐसा नहीं किया. इन फैसलों के आधार पर सरकार और उसके प्रवक्ता ये कह सकेंगे कि ये सरकार अमीरों की नहीं गरीबों की है.

जिस वक्त ये घोषणाएं संसद के अंदर वित्त मंत्री अरुण जेटली कर रहे थे उसी वक्त बंबई शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक लगातार नीचे जा रहा था. इस सेंसेक्स के नीचे जाने का भी एक मतलब होता है. इस बार के बजट के वक्त इसके नीचे जाने का मतलब यह है कि जो घोषणाएं जेटली गांव, गरीब और किसान के लिए कर रहे थे, उसे बाजार पसंद नहीं कर रहा था. मतलब ये घोषणाएं कॉरपोरेट घरानों के हितों को पोषित नहीं करती. यह शायद पहली बार होगा जब मोदी सरकार को नीचे जाता सेंसेक्स बुरा नहीं लग रहा होगा क्योंकि इससे भी वही संदेश जा रहा था जो मोदी सरकार भेजना चाहती होगी.

बजट की शुरुआत में ही जेटली ने गांवों, गरीबों और किसानों को लेकर बजट प्रस्ताव किए. जेटली के बजट भाषण के एक घंटा पूरा होने तक सेंसेक्स 150 अंक से अधिक नीचे जा चुका था. जब कर प्रस्तावों की घोषणा अरुण जेटली कर रहे थे तो उस वक्त तक तो सेंसेक्स 600 से अधिक अंकों का गोता लगा चुका था.

यह शायद पहली बार होगा जब मोदी सरकार को नीचे जाता सेंसेक्स बुरा नहीं लग रहा होगा क्योंकि इससे भी वही संदेश जा रहा था जो मोदी सरकार भेजना चाहती होगी.

इन घोषणाओं का सबसे बड़ा सियासी संकेत यह है कि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के साथ-साथ उनकी पार्टी में जो लोग रणनीतियां बनाते हैं, उन सभी को लग गया है कि जिस तरह की छवि केंद्र सरकार की बन रही है, उससे चुनावी लाभ तो दूर हर कदम पर चुनावी नुकसान ही होगा. पिछले साल दिल्ली चुनावों में हार के बाद केंद्र सरकार कोई सबक लेती नहीं दिखी थी लेकिन फिर बिहार में पूरा दम लगाने के बावजूद जिस तरह से भाजपा को मुंह की खानी पड़ी, उससे सरकार और भाजपा में नीतियां बनाने वालों के दिमाग में यह साफ हो गया कि अगर चुनाव जीतते रहना है तो सरकार की छवि बदलनी होगी. इस लिहाज से देखें तो अरुण जेटली के इस बजट और बिहार के चुनाव परिणामों की बीच खास संबंध देखा जा सकता है.

अर्थव्यवस्था की बदहाली का वास्तविक अंदाज साल 2015-16 के आर्थिक सर्वेक्षण से साफ-साफ लगता है. जाहिर है कि ऐसे में विकास के नाम पर और लोगों को बड़े-बड़े सपने दिखाकर सत्ता में आई नरेंद्र मोदी सरकार का बेचैन होना स्वाभाविक ही है. सरकार को यह लगने लगा है कि जितनी उम्मीदें लोगों ने उससे लगा रखी हैं, वह उन्हें पूरा करने में कामयाब नहीं हो रहे हैं. ऐसे में आम लोगों के बीच सरकार की यह छवि बन रही है कि यह सरकार वैसी नहीं है जिसे उन्होंने चुना था. कुछ लोग इसे अदाणी-अंबानी की सरकार भी कहते हैं.

जाहिर है कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगर किसी सरकार की ऐसी छवि बनेगी तो यह उसे बेचैन करेगी. क्योंकि लोक सभा के लिए आम चुनाव तो भले ही पांच साल में एक बार होते हों लेकिन हर साल सरकार को कई छोटे-बड़े चुनावों की परीक्षा से गुजरना पड़ता है. इन चुनावों में हार-जीत को सीधे तौर पर केंद्र की सरकार की लोकप्रियता या अलोकप्रियता से जोड़ दिया जाता है.

ऐसी स्थिति में कोई भी सरकार अपनी उस छवि को तोड़ने की कोशिश करेगी जो उसे आम आदमी से दूर और कॉरपोरेट घरानों के नजदीक दिखाती हो. मोदी सरकार भी इसी कोशिश में है. राष्ट्रपति के अभिभाषण, रेल बजट और आर्थिक सर्वेक्षण के बाद अब आम बजट ने इस बात पर मुहर लगा दी है.