‘समाज की समूहिक चेतना सिर्फ तभी संतुष्ट होगी जब अपराधी को फांसी दी जाएगी.’ संसद पर हमलों के दोषी मोहम्मद अफज़ल (अफज़ल गुरु) की फांसी को बरकरार रखने वाले अपने फैसले यह पंक्ति सर्वोच्च न्यायालय ने लिखी थी. यह फैसला अगस्त 2005 को सुनाया गया था. तब से ही न्यायालय द्वारा लिखी यह पंक्ति चर्चा का विषय बनने लगी थी. लेकिन राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में इस पंक्ति की असल चर्चा 9 फरवरी 2013 के बाद तेज हुई. यही वह दिन था जब अफज़ल गुरु को फांसी दी गई थी.

इस फांसी की खबर जब अगले दिन के अखबारों में छपी तो उनमें से अधिकतर में इस पंक्ति का जिक्र किया गया था. कुछ अखबारों का तो शीर्षक ही कहता था कि ‘क्या अब हमारी सामूहिक चेतना संतुष्ट हो गई है?’ अफज़ल की फांसी के दो दिन बाद प्रसिद्द लेखिका अरुंधती रॉय का भी एक लेख कई अंग्रेजी अख़बारों में छपा. इनमें से एक अखबार में इस लेख का शीर्षक था ‘अफज़ल गुरु की फांसी भारतीय गणतंत्र पर एक धब्बा है.’ इस लेख में अरुंधती ने न्यायालय के लगभग 140 पन्नों के फैसले में से कुछ चुनिंदा पंक्तियों का जिक्र करते हुए ‘सामूहिक चेतना’ के आधार पर किसी को फांसी देने की बात पर आश्चर्य जताया था. यह लेख काफी चर्चित हुआ और इसके बाद से न्यायालय द्वारा कही गई ‘सामूहिक चेतना’ की बात की और भी ज्यादा निंदा होने लगी.

सर्वोच्च न्यायालय की निंदा उस संदर्भ को समझे बिना या उसकी अनदेखी करके की जा रही थी जिसमें उसने यह बात कही थी. निंदा करने वालों ने सिर्फ एक पंक्ति के चलते न्यायालय के पूरे फैसले को ही संदेह के घेरे में ला खड़ा किया

लेकिन यह निंदा उस संदर्भ को समझे बिना या उसकी अनदेखी करके की जा रही थी जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह बात कही थी. निंदा करने वालों ने सिर्फ एक पंक्ति के चलते न्यायालय के पूरे फैसले को ही संदेह के घेरे में ला खड़ा किया. फैसले की गलत व्याख्या करते हुए कई लोगों ने ऐसे भी लेख लिखे जिनमें कहा गया कि ‘सर्वोच्च न्यायालय ने अफज़ल गुरु को सिर्फ इसलिए फांसी पर लटका दिया क्योंकि उसे ‘समाज की सामूहिक चेतना को संतुष्ट’ करना था. कई लेखों में यह भी कहा गया कि अफज़ल गुरु के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे. ऐसे लेखों, और न्यायालय के फैसले की ऐसी व्याख्याओं का असर यह हुआ कि आज कई लोग, बिना सर्वोच्च न्यायालय फैसले को पढ़े हुए, यह मानने लगे हैं कि अफज़ल गुरु को साक्ष्यों के आधार पर नहीं बल्कि ‘सामूहिक चेतना’ को संतुष्ट करने के लिए ही फांसी दी गई थी.

इसका एक उदाहरण जेएनयू में पिछले साल हुए विवाद के दौरान भी देखने को मिला. जेएनयू में बीते साल फरवरी में अफज़ल गुरु की फांसी पर चर्चा के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. इस कार्यक्रम के विवादों से घिरने पर जब इसके आयोजकों/समर्थकों से राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर सवाल किये गए तो जेएनयू के छात्र अनिर्बान भट्टाचार्य का कहना था, ‘सर्वोच्च न्यायालय साफ़-साफ़ अपने फैसले में लिखता है कि अफज़ल गुरु के खिलाफ कोई भी सबूत नहीं है. फांसी तो दूर, उन्हें अभियुक्त बनाए जाने के भी सबूत मौजूद नहीं हैं. लेकिन उस फैसले में यह भी लिखा है कि समाज की सामूहिक चेतना को संतुष्ट करने के लिए अफज़ल गुरु को फांसी देना पड़ेगा.’

इसके उलट सर्वोच्च न्यायालय का वह फैसला यदि पूरा पढ़ा जाए तो साफ़ होता है कि न्यायालय को इस बात पर ज़रा भी संदेह नहीं था कि अफज़ल गुरु अपराधी है और उसे फांसी की सजा होनी चाहिए. लगभग 140 पन्नों के इस फैसले को पढने पर यह साफ़ तौर से समझा जा सकता है कि ‘सामूहिक चेतना’ वाली बात अफज़ल गुरु को हुई फांसी का आधार कतई नहीं थी और उसे सिर्फ साक्ष्यों के आधार पर ही दंडित किया गया था.

घटना के दिन भी अफज़ल गुरु और इन आतंकवादियों के बीच तीन फ़ोन कॉल की गई थी. फ़ोन के आधार पर ही इस मामले के अन्य आरोपितों की जानकारी भी पुलिस को मिली

अफज़ल गुरु की फांसी को न्यायोचित बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में किन बातों को आधार बनाया था? क्यों अफज़ल को अन्य सभी आरोपितों से ज्यादा दोषी पाया गया था? किस सन्दर्भ में न्यायालय ने ‘सामूहिक चेतना’ वाली बात कही थी? इन सभी सवालों के जवाब इस फैसले को पढ़ने से साफ़ हो जाते हैं. जस्टिस पी वेंकटराम रेड्डी और जस्टिस पीपी नाओलेकर की पीठ द्वारा दिए गए इस फैसले के आधार पर यदि इस पूरे मामले को समझें, तो वह इस तरह है:

13 दिसंबर 2001 को पांच आतंकवादी एक एंबेसडर कार में सवार होकर संसद भवन पहुंचे. हथियारों से लैस इन आतंकवादियों ने संसद पर हमला करते हुए 9 लोगों की हत्या की. मरने वालों में एक माली और आठ सुरक्षाकर्मी शामिल थे. सुरक्षाकर्मियों के साथ हुई मुठभेड़ में इन पांचों आतंकवादियों को भी मार गिराया गया. इसके बाद जब पुलिस ने इस मामले की जांच शुरू की तो सबसे पहले वह फ़ोन और सिम कार्ड पुलिस के हाथ लगे जो आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल किये गए थे. इन फोन नंबरों की कॉल डिटेल निकालने पर पुलिस को अफज़ल गुरु की जानकारी मिली. घटना के दिन भी अफज़ल गुरु और इन आतंकवादियों के बीच तीन फ़ोन कॉल की गई थी. फ़ोन के आधार पर ही इस मामले के अन्य आरोपितों की जानकारी भी पुलिस को मिली. इनमें अफज़ल का भाई शौकत हुसैन गुरु, उसकी पत्नी अफसान गुरु (जिसका नाम शादी से पहले नवजोत संधू था) और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एसएआर गिलानी शामिल थे.

घटना के दो दिनों के भीतर ही इन चारों आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिय. लगभग छह महीनों तक चली जांच के बाद चार जून को पुलिस ने इन सभी आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया. इस मामले की सुनवाई विशेष न्यायालय में हुई जिसने दिसंबर में अपना फैसला सुनाते हुए अफसान गुरु को पांच साल की कैद और अन्य तीनों आरोपितों को फांसी की सजा सुनाई. इसके बाद यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंचा. 29 अक्टूबर 2003 को उच्च न्यायालय ने अपना फैसला देते हुए अफसान गुरु और एसएआर गिलानी को बरी कर दिया जबकि अफज़ल गुरु और शौकत की फांसी को बरकरार रखा.

अफज़ल गुरु पर फैसला देते हुए न्यायालय ने माना कि उसने आतंकवादियों की हर तरह से मदद की थी. दिल्ली में उन आतंकवादियों के ठहरने से लेकर उन्हें गाडियां, मोबाइल फ़ोन, और बम बनाने के पदार्थ तक दिलवाने का काम अफज़ल ने किया था

उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ दोनों ही पक्षों ने अपील की और अंततः यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया. यहां राम जेठमलानी, शांति भूषण और गोपाल सुब्रमण्यम जैसे बड़े वकीलों ने अलग-अलग पक्षों की पैरवी की. इन सभी के तर्कों को सुनने के बाद न्यायालय ने जो फैसला सुनाया उसमें शौकत की फांसी को माफ़ करते हुए दस साल की कैद में बदल दिया गया. बाकी तीनों आरोपितों पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी वही रुख अपनाया जो दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपनाया था. यानी अफसान गुरु और एसएआर गिलानी को बरी कर दिया गया और अफज़ल गुरु की फांसी को बरकरार रखा गया.

अफज़ल गुरु पर फैसला देते हुए न्यायालय ने माना कि उसने आतंकवादियों की हर तरह से मदद की थी. दिल्ली में उन आतंकवादियों के ठहरने से लेकर उन्हें गाडियां, मोबाइल फ़ोन, और बम बनाने के पदार्थ तक दिलवाने का काम अफज़ल ने किया था. लगभग 80 लोगों ने इस मामले में गवाही दी थी जिनमें वे लोग भी शामिल थे जिनसे इन आतंकवादियों ने मोबाइल, सिम या गाड़ी खरीदी थी. इनमें से अधिकतर लोगों ने अपनी गवाही में बताया कि अफज़ल गुरु इन आतंकवादियों के साथ यह सब सामान खरीदने आया था. इसके साथ ही जो लैपटॉप अफज़ल गुरु से बरामद किया गया था उसमें उन पहचान पत्रों की कॉपी भी मिली जो आतंकवादियों ने संसद में घुसने के लिए इस्तेमाल किये थे.

अफज़ल गुरु ने जांच के दौरान अपना अपराध स्वीकार भी किया था. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला देते हुए अफज़ल के कबूलनामे को आधार नहीं बनाया. बल्कि अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही अफज़ल को दोषी मानते हुए न्यायालय ने लिखा, ‘विस्फोटक पदार्थों के जरिये संसद भवन पर किया गया हमला एक ऐसे षड्यंत्र का हिस्सा था जिसमें अफज़ल गुरु भी शामिल था. अफज़ल यह जानता था कि जो विस्फोटक बनाए जा रहे हैं उनका उपयोग आतंकवादी (सह-षड्यंत्रकारी) संसद भवन पर हमले के लिए करने वाले हैं. बल्कि उसने स्वयं भी विस्फोटक बनाने के लिए कई केमिकल पदार्थ इन आतंकवादियों के ठिकानों पर उपलब्ध करवाए. हमारे सामने जो साक्ष्य मौजूद हैं उनसे यह साफ़ प्रतीत होता है.’

यहीं सामूहिक चेतना का जिक्र करते हुए न्यायालय ने माना, ‘यह घटना, जिसके कारण जान-माल की भारी क्षति हुई, इसने पूरे राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है और समाज की सामूहिक चेतना सिर्फ तभी संतुष्ट होगी जब अपराधी को फांसी दी जाएगी.’

अफज़ल को फांसी देने के विशेष अदालत और उच्च न्यायलय के फैसले को सही ठहराते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में लिखा है, ‘इस बात में कोई संदेह ही नहीं है कि इस मामले में मौत की सजा ही सबसे उचित है. निचली अदालत और उच्च न्यायालय द्वारा भी यही सजा दी गई है. यह मामला, जिसका भारतीय गणतंत्र के इतिहास में और कोई समानांतर नहीं है, स्पष्ट रूप से बताता है कि यह दुर्लभतम से भी दुर्लभ (रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर) मामला है.’

इस मामले को रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर की श्रेणी में रखते हुए न्यायालय ने अपने फैसले में लिखा है कि षड्यंत्रकारियों द्वारा किये गए इस अपराध को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. यहीं सामूहिक चेतना का जिक्र करते हुए न्यायालय ने माना, ‘यह घटना, जिसके कारण जान-माल की भारी क्षति हुई, इसने पूरे राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है और समाज की सामूहिक चेतना सिर्फ तभी संतुष्ट होगी जब अपराधी को फांसी दी जाएगी. आतंकवाद और षड्यंत्र की जिस घटना ने भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को चुनौती दी है, उसकी भरपाई सिर्फ तभी हो सकेगी जब उस व्यक्ति को अधिकतम सजा दी जाए जो इस विश्वासघाती कार्य में एक षड्यंत्रकारी साबित हो चुका है. अपीलकर्ता (अफज़ल गुरु), जो कि आत्मसमर्पण कर चुका आतंकवादी है और जो लगातार राष्ट्र से विश्वासघात करने पर तुला हुआ था, समाज के लिए एक खतरा है और इसका जीवन समाप्त हो जाना चाहिए. इसलिए, हम उसकी फांसी को बरकार रखते हैं.’

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में लिखी इन बातों से साफ़ है कि अफज़ल गुरु की फांसी का आधार ‘समाज की सामूहिक चेतना’ नहीं बल्कि वे तमाम साक्ष्य थे जो न्यायालय के सामने पेश किये गए थे. इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने अफज़ल को फांसी दी और इन्हीं के अभाव में शौकत और एसएआर गिलानी की फांसी माफ़ की.

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एसएआर गिलानी (जो 9 फरवरी 2006 को जेएनयू में भी मौजूद थे) के बारे में न्यायालय ने यह भी कहा था कि इस पूरे मामले में गिलानी पर भी इतना संदेह तो जरूर होता है कि उन्हें इस घटना की जानकारी थी

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एसएआर गिलानी (जो 9 फरवरी 2006 को जेएनयू में भी मौजूद थे) के बारे में न्यायालय ने यह भी कहा था कि इस पूरे मामले में गिलानी पर भी इतना संदेह तो जरूर होता है कि उन्हें इस घटना की जानकारी थी. लेकिन न्यायिक सिद्धांतों का हवाला देते हुए न्यायालय ने माना कि संदेह चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, वह कभी भी साक्ष्य की जगह नहीं ले सकता. इसीलिए उच्च न्यायालय के फैसले को सही ठहराते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भी गिलानी को सभी आरोपों से बरी कर दिया.

कई लोगों द्वारा यह भी सवाल उठाया जाता है कि अफज़ल गुरु को अपनी पैरवी के लिए अच्छे वकील नहीं दिए गए. यह सवाल सर्वोच्च न्यायालय में भी उठाया गया था. इस पर न्यायालय ने माना कि शुरुआत में अफज़ल ने स्वयं ही कोई वकील करने से इनकार कर दिया था. इसके बाद विशेष न्यायालय ने ही उसके लिए एक वकील नियुक्त किया था. साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी माना कि अपीलीय स्तर पर आकर यह कहना बिलकुल गलत है कि दोष वकील का था. न्यायालय के अनुसार अगर इस तर्क को स्वीकार किया जाता है तो यह एक ऐसी परंपरा को स्थापित कर देगा जहां कोई भी व्यक्ति केस हारने के बाद अपील में यही तर्क देने लगेगा कि उसका वकील अयोग्य था.

इस रिपोर्ट का उद्देश्य अफज़ल गुरु को हुई फांसी को सही या गलत साबित करना नहीं है. बल्कि यह बताना है कि गलत तथ्यों के आधार पर और न्यायालय के फैसले को गलत तरीके से प्रस्तुत करते हुए इस फांसी को गलत कहना सही नहीं है. सही आधारों पर इस फैसले की कितनी भी निंदा की जा सकती है. देश के हर नागरिक को यह अधिकार है कि वह किसी भी फैसले की आलोचना/ समालोचना/ निंदा या उस पर तर्क-वितर्क कर सकता है. यह अधिकार संविधान ही हर नागरिक को देता है और सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं कई बार इस अधिकार को सुनिश्चित किया है.

किसी भी न्यायालय का फैसला एक ‘सार्वजनिक दस्तावेज’ होता है. इस पर चर्चा, वाद-विवाद, तर्क-वितर्क भी किये जा सकते हैं और इसकी निंदा भी की जा सकती है. लेकिऩ इसे तभी सही माना जा सकता है जब ऐसा सही तथ्यों के आधार पर किया जाए.

साल 2005 में ‘राजेंद्र सैल बनाम मध्य प्रदेश बार एसोसिएशन’ मामले में एक फैसला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि किसी भी न्यायालय का फैसला एक ‘सार्वजनिक दस्तावेज’ होता है. इस पर चर्चा, वाद-विवाद, तर्क-वितर्क भी किये जा सकते हैं और गुण-दोष के आधार पर इसकी निंदा भी की जा सकती है. जब तक किसी न्यायाधीश की मंशा पर सवाल न उठाए जाएं या जब तक न्यायाधीश पर व्यक्तिगत टिप्पणी न की जाए, तब तक किसी भी फैसले की निंदा करना गलत नहीं है.

इसीलिए अफज़ल गुरु के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला भी निंदा से इतर नहीं है. इस फैसले के गुण-दोष के आधार पर इसकी आलोचना हो सकती है और इस पर चर्चा भी. अफज़ल गुरु को फांसी दिए जाने का समय, प्रक्रिया और इस प्रक्रिया में रही कमियों पर भी बहस हो सकती है. न्यायालय द्वारा कही गई ‘सामूहिक चेतना को संतुष्ट’ करने वाली बात पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं. लेकिन यह सवाल सही तभी कहे जा सकते हैं जब सही तथ्यों के साथ उठाए जाएं. यह कहना कि न्यायालय ने सिर्फ ‘सामूहिक चेतना को संतुष्ट’ करने के लिए अफज़ल गुरु को फांसी दे दी, या यह कहना कि अफज़ल गुरु को फांसी देते हुए न्यायालय ने साक्ष्यों को नहीं बल्कि ‘सामूहिक चेतना’ को आधार बनाया है, सरासर गलत है.