मीडिया और हमारे समाज में अकसर यह डिस्कोर्स ऊंचा सुर पकड़ लेता है कि बलात्कार की शिकार हुईं महिलाओं और लड़कियों को हम रेप ‘विक्टिम’ कहें या रेप ‘सरवाइवर’. ऐसा ही डिस्कोर्स एसिड हमलों की शिकार हुईं महिलाओं को लेकर भी होता है. जाहिर बात है कि हम न सिर्फ इन सभी को सरवाइवर की तरह देखना चाहते हैं बल्कि चाहते हैं कि हमारा पूरा समाज भी उन्हें इसी रूप में देखे और उन्हें हर कदम पर मदद भी करे.

लेकिन क्या ऐसे समाज का निर्माण कर लिया गया है? या फिर संपादकीय लेखों के खूबसूरत वाक्य-विन्यास और टीवी की ओजस्वी डिबेटों से इतर हमारा समाज आज भी इन महिलाओं को सरवाइव करने के मौके देने की जगह लगातार पीड़ा ही दे रहा है? और क्या रेप सरवाइवर सिर्फ बुद्धिजीवियों को पसंद आने वाला एक शब्द भर है जबकि हमारे समाज को तो असल में बलात्कार की शिकार लड़कियों को बार-बार यही याद दिलाना पसंद है कि वे ‘बलात्कार पीड़िता’ हैं?

अगर आशावादी न होना गुनाह नहीं है तो यह डाक्यूमेंट्री देखकर आप भी कुछ देर के लिए बुझ जाएंगे और हमारे समाज में पाए जाने वाले उन अनेकों अमानुष टाइप मनुष्यों के ‘गेट वेल सून’ होने की कामना करेंगे 

कुछ ऐसे ही सवालों को एक बार फिर एक नयी डाक्यूमेंट्री उठाती है जो बलात्कार की शिकार महिलाओं-लड़कियों के प्रति हमारे समाज की उदासहीनता से ज्यादा हमारे समाज द्वारा उनसे घृणा करने की प्रवृत्ति को टटोलती है. अगर आशावादी न होना गुनाह नहीं है तो यह डाक्यूमेंट्री देखकर आप भी कुछ देर के लिए बुझ जाएंगे और हमारे समाज में पाए जाने वाले उन अनेकों अमानुष टाइप मनुष्यों के ‘गेट वेल सून’ होने की कामना करेंगे जो अपने देश की बेटियों को सरवाइवर नहीं बनने देते.

यह भी याद रखिए कि हारूकी मुराकामी ने अपने उपन्यास 1क्यू84 में कहा था, ‘सिर्फ शरीर बलात्कार का निशाना नहीं बनता. हिंसा हमेशा प्रकट रूप में सामने नहीं आती और हर घाव से खून नहीं फूट पड़ता’. कुछ चीजें इतने चुपचाप हमारे आस-पास घटती हैं कि हमें पता ही नहीं चलता. शायद इसीलिए कुछ लोगों को उनपर डाक्यूमेंट्री बनानी पड़ती है.

सोशल-सटायर ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ जैसी सलीकेदार फिल्म बनाने वाले विनोद कापड़ी ने अपनी डाक्यूमेंट्री ‘अछूत कन्या’ में यही ज्वलंत विषय उठाया है जिस पर एक लंबे अरसे से डाक्यूमेंट्री स्पेस विचार-विमर्श करता आया है. जब सारा शोर थम जाता है, खबरों के खोजकर्ता वापस अपने-अपने दफ्तर चले जाते हैं और सड़कों पर उतर आया हूजुम एक के प्रति अपना कर्तव्य पूरा करने के बाद किसी और के लिए उमड़ने लगता है, तब से लेकर आगे के अनगिनत सालों तक बलात्कार की शिकार किसी महिला या लड़की की जिंदगी आखिर कटती कैसे है? ‘अछूत कन्या’ बदले हुए नामों वाली राधा कुमारी, सुमन रानी और कविता के अंधेरे में डूबे चेहरों के माध्यम से ऐसी ही जिंदगियों की पड़ताल करती है.

जैसा कि जरूरी कहानियों का सिद्धांत होता है, उन्हें कहा जाना कभी-कभी फिल्ममेकिंग की गुणवत्ता और डाक्यूमेंट्री के नियमों के पालन से ज्यादा जरूरी होता है.’ अछूत कन्या’ ऐसी ही एक डाक्यूमेंट्री है जिसे कहा जाना भी जरूरी है और देखा जाना भी

वे जिंदगियां असाधारण तकलीफों से गुजरती हैं और सामान्य जीवन जीने को तरसती हैं. वरना क्यों होता किसी सुमन रानी के साथ ऐसा कि उसे और उसके परिवार को रेप की दर्दनाक घटना के बाद से तीन साल बाद अब तक 10-12 मकान बदलने पड़ते और उसके छह भाई-बहनों का स्कूल जाना बंद हो जाता. क्यों ऊबर रेप केस वाली कविता के पिता अपनी बेटी में जीवन जीने के हौसले को देखकर दुख से भर जाते और कहते कि अगर मैं इंडिया की जगह किसी और देश में होता तो एक बहादुर लड़की का बाप कहलाता. वे देश छोड़ने के लिए भी तैयार क्यूं रहते और क्यूं कहते कि इस देश में जंगलराज है. और क्यूं कविता ही अपने केस की सुनवाई के दौरान बुरका पहनकर कोर्ट जाती जहां वकील उसपर आरोप लगाते कि उनके रईस क्लाइंट से पैसे उगाहने (तीन करोड़) के लिए ही वह ऐसे ‘झूठे’ इल्जाम लगा रही है. ऐसा भी क्यूं होता कि पहचाने जाने के बाद देशभर की गलियों में मौजूद मोहल्ले वाले इनमें से किसी भी रेप सरवाइवर को घूरना छोड़ नहीं पाते.

‘अछूत कन्या’ चार ऐसी ही जिंदगियों की टेक लेकर रेप सरवाइवर्स के प्रति हमारी न्याय-व्यवस्था, गली-मोहल्लों में रहने वाले पड़ोसियों, नौकरी देने वाली कंपनियों, रिश्तेदारों, यार-दोस्तों और महिलाओं के प्रति दूसरी महिलाओं के कठोर आचरण को बयान करती है.

वैसे तो कैमरे का काम इस डाक्यूमेंट्री में सामान्य है. कट-इन और कट-अवे शाट्स भी उतने प्रभावशाली नहीं रखे गए हैं कि उत्सुकता को उस स्तर पर लगातार बरकरार रख पाएं. बैकग्राउंड स्कोर कहीं-कहीं ज्यादा ही मेलोड्रामा पैदा करना चाहता है और वायस-ओवर भी जरूरत से ज्यादा बोलता है, वह भी थोड़ा धीरे-धीरे. ऐसी डाक्यूमेंट्री जिसके ज्यादातर फ्रेम्स में अंधेरा है, क्योंकि सभी रेप सरवाइवर्स के चेहरे अंधेरे में डूबे हैं, उनमें कुछ विजुअली स्ट्राइकिंग भी होना ही चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इतनी जरूरी बात पूरी पहुंच सके. लेकिन इस सबके बावजूद अंधेरे में डूबे हुए कुछ चेहरे जब अपनी-अपनी कहानी कहते हैं, आप अपने आस-पास की दुनिया पर थोड़ा कम विश्वास करने लगते हैं. यही इस डाक्यूमेंट्री की सफलता है जो भले ही तकनीकी तौर पर बेहद दक्ष नहीं है लेकिन अपनी बात पूरी दक्षता से करती है.

इसमें एक सिल्वर लाइनिंग भी है. अंधेरे को चीरती हुई वह खुशहाल जिंदगी जिसे डाक्यूमेंट्री अपने आखिर में दिखाती है

वैसे ‘अछूत कन्या’ थोड़ी और गहराई में भी उतर सकती थी. वह केवल सरवाइवर्स और उनके परिवार वालों से ही बात करती है. आस-पड़ोस वालों का नजरिया, वकीलों का चेहरा और अपराधी की सोच को कैमरे में कैद करने की बिलकुल कोशिश नहीं करती. लेकिन जैसा कि जरूरी कहानियों का सिद्धांत होता है, उन्हें कहा जाना कभी-कभी फिल्ममेकिंग की गुणवत्ता और डाक्यूमेंट्री के नियमों का पालन करने से ज्यादा जरूरी होता है.’ अछूत कन्या’ ऐसी ही एक डाक्यूमेंट्री है जिसे कहा जाना भी जरूरी है और देखा जाना भी.

इसमें एक सिल्वर लाइनिंग भी है. अंधेरे को चीरती हुई वह खुशहाल जिंदगी जिसे डाक्यूमेंट्री अपने आखिर में दिखाती है. बलात्कार के बाद की जटिल यात्रा में एक सरवाइवर की दोबारा शादी होती है और वह एक कठिन जंग की विजेता बनकर हमारा दिल खुश कर देती है. आप भी देखिए, तभी इस खुशी को समझ भी पाएंगे.

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