‘जो उसको जानता है, उसके लिए वो अज्ञात है. जो उसको नहीं जानता उसके लिए वो ज्ञात है’ ( स्रोत - केन उपनिषद)

अज्ञेय ने शायद यही सोचकर अपना उपनाम ‘अज्ञेय’ रखा हो. दरअसल उस समय उनको जानने वालों के लिए कवि के रूप में अज्ञेय अज्ञात थे और जो व्यक्ति के रूप में उन्हें नहीं जानते थे, वे उनकी कविताओं से उन्हें पहचान रहे थे. वैसे उनका पूरा नाम सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन (7 मार्च 1911- 4 अप्रैल 1987) था. बाद में उन्होंने इसके साथ उपनाम अज्ञेय भी जोड़ लिया था. उस दौर में कवियों के लिए एक उपनाम जरूरी था हालांकि अज्ञेय लीक पर चलनेवाले नहीं लीक को तोड़नेवाले लेखक थे. इस उपनाम के जरिए वे लेखक और कवि को एक-दूसरे से अलगाना चाहते थे.

यह भी बड़ी दिलचस्प बात है कि बाकी साहित्यकारों का चेहरा-मोहरा कभी चर्चा में रहा हो या न रहा हो लेकिन अज्ञेय ने अपने समय में इसकी वजह से भी चर्चाएं बटोरी थीं. ज्यादातर हिंदी लेखकों की तरह वे दीन-हीन या उदास-बेजार से नहीं दिखते थे. शायद इसमें उनकी विचार शक्ति का अहम योगदान हो लेकिन उनका चेहरा दीप्त और एक तरह की कुलीनता लिए हुए था. इसको लेकर भी उनकी निंदा और स्तुति दोनों होती रही. वह दुख से घिरा चेहरा नहीं था. दुख हुआ भी तो उसने अज्ञेय की आभा को मांजकर प्रखर करने का ही काम किया होगा. उन्होंने कहा भी है, ‘दुख सबको मांजता है... ’ (कविता - असाध्य वीणा).

अज्ञेय ने गद्य की तमाम विधाओं में हाथ आजमाया है और यहां उन्हें खूब सराहना भी मिली. लेकिन गद्य लेखक के बनिस्बत उनका यायावर और कवि रूप ज्यादा सहज और सरल है. जैसे उनकी इन पंक्तियों को देखें - ‘पार्श्व गिरि का नम्र / चीड़ों में डगर चढ़ती उमंगों सी / बिछी पैरों में नदी / ज्यों दर्द की रेखा / विहग शिशु मौन नीड़ो में मैंने आंखभर देखा / दिया मन को दिलासा / पुनः आऊंगा / भले ही दिन बरस – दिन- अनगिन युगों के बाद / क्षितिज ने पलक-सी खोली / दमककर दामिनी बोली / अरे यायावर रहेगा याद?’

मासूम और भोले से किसी यात्री के दृश्यों में बंध-बंधकर रुकते कदम, छोड़ जाने की पीड़ा, ‘फिर आऊंगा’ का दूसरों से ज्यादा खुद को दिया जाने वाला आश्वासन और इसके साथ उदासी. ये सब बातें यहां सीधे मन से जुड़ जाती हैं. यहां उनके उपन्यास के पात्रों की तरह कोई असामाजिक-सा व्यक्ति नहीं है. यहां विचारों की गठरी अपने सर उठाए चलने वाला कोई चिन्तक भी नहीं है. यहां खुद से और प्रकृति से प्यार करनेवाला कोई एक सहज इंसान है.

हालांकि ‘असाध्य वीणा’ तक पहुंचते-पहुंचते यह यात्रा भी थोड़ी दार्शनिक हो जाती है. बौद्ध धर्म और चिंतन की छाया में वे जीवन को देखना और आंकना शुरू कर देते हैं. इससे पहले की कविताओं में गुंथे उनके विचार बहुत सहज हैं.

अज्ञेय के बारे में यह एक विचित्र बात है कि एक कवि के रूप में उनकी यात्रा एक अकेले की यात्रा से सामाजिकता और समाज की तरफ मुड़ती दिखती है – ‘यह दीप अकेला स्नेहभरा / है गर्व भरा मदमाता पर / इसको भी पंक्ति को दे दो.’ वहीं उनके उपन्यासों में शुरू में जो थोड़ा बहुत समाज है वह भी धीरे-धीरे एकांत और अकेलेपन की यात्रा की तरफ क्रमशः बढ़ता जाता है. उनके तीन प्रमुख उपन्यास हैं – शेखर एक जीवनी, नदी के द्वीप, और अपने-अपने अजनबी, इन तीनों से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है.

कवि रूप में उनका निश्छल भोलापन हमें अपनी तरफ अगर अनायास खींचता है तो कहानियों-उपन्यासों में हर बिंदु पर कई सिरों से विचार करते पात्र विवश करते हैं कि हर सवाल पर फिर से सोचा जाए

इस तरह से एक ही साथ अज्ञेय के दो रूप हैं. दोनों एक-दूसरे के बिलकुल विरोधी पर दोनों ही सच्चे और सही हैं. कवि रूप में उनका निश्छल भोलापन हमें अपनी तरफ अगर अनायास खींचता है तो कहानियों-उपन्यासों में हर बिंदु पर नए सिरे से सोचते , सवाल करते पात्र विवश करते हैं कि हर सवाल पर फिर से सोचा जाए.

‘शेखर एक जीवनी’ उनका पहला उपन्यास था. यह आत्मकथात्मक शैली का उपन्यास है और शायद इसलिए अज्ञेय को इस बारे में कहना पड़ा था, ‘शेखर एक जीवनी की कुछ घटनाएं और स्थान उनके जीवन से मिलते-जुलते हैं. लेकिन जैसे-जैसे शेखर का विकास होता गया, शेखर और रचनाकार एक दूसरे से अलग होते गए.’ यह सफाई होते हुए भी सफाई नहीं थी. अज्ञेय का लिखना बहुत सुचिंतित और सुगठित हुआ करता था. दृष्टि बिलकुल साफ़ और स्पष्ट. वे व्यक्ति की निजता के बहुत बड़े हिमायती थे. सफाई देना उनका न स्वभाव था, न उद्देश्य पर आत्मकथात्मक उपन्यासों की यह सबसे बड़ी परेशानी होती है कि उपन्यास के हर फ्रेम को लोग रचनाकार से जोड़कर देखते हैं. लोगों की मनोवृत्तियों और मनोविज्ञान को गहरे से पकड़ने और पहचाननेवाला यह लेखक इस बात को खूब अच्छी तरह से समझता-बूझता था. शायद इसी वजह से उन्हें यह बात कहनी पड़ी होगी.

‘शेखर एक जीवनी’ को लेकर लोगों के मन में बहुत से सवाल थे. वह स्वीकार होकर भी उस तरह स्वीकार्य नहीं था. उपन्यास में जो सहज था वह समाज के लिए सहज नहीं था. शेखर, शशि (शेखर की रिश्ते की बहन) से यहां एक प्रसंग में कहता है, ‘कब से तुम्हें बहन कहता हूं, लेकिन बहनें जितनी पास होती हैं उतनी पास तुम नहीं हो और जितनी दूर होती हैं उतनी दूर भी नहीं हो.’ यह बात उस समय के समाज और पाठकों के लिए झटके जैसी थी.

अज्ञेय के तीसरे उपन्यास ‘अपने अपने अजनबी’ में यह एकांत और गहरा होता है. यहां नैतिक-अनैतिक का सवाल थम जाता है. दार्शनिकता गहरी हो जाती है

शेखर जन्मजात विद्रोही है. वह परिवार, समाज और मर्यादाएं सबके प्रति प्रश्न और विद्रोह दोनों रखता है. वह स्वतंत्रता का पक्षधर है. व्यक्ति-स्वतन्त्रता का उसके निजी जीवन में बहुत गहरा अर्थ है. शेखर खुले तौर पर क्रांतिकारी है. मतलब वह वही करता है जिसकी गवाही उसका मन देता है. नैतिक-अनैतिक की परवाह यहां बिल्कुल नहीं है. ऐसा क्रांतिकारी चरित्र तब के साहित्य में बहुत दुर्लभ था. दुर्लभ होने की एक बड़ी वजह शायद यह थी कि तब साहित्यकारों के लिए इस बात के मायने ज्यादा हुआ करते थे कि समाज रचना के माध्यम से उनके बारे में क्या सोचेगा. इस नजर देखें तो अज्ञेय दुर्लभ प्रकृति के साहसी थे. शेखर एक जीवनी का उस दौर में खूब विरोध हुआ पर वह बिकी भी उसी तरह से बेपनाह. विरोध करनेवाले लोग भी इसे एक बार तो पढ़ते ही थे और अधिकतर यह पढना छुप-छुपाकर ही था.

अज्ञेय का दूसरा उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ भी कुल मिलाकर पिछले उपन्यास के निज और एकांत का विस्तार है. यहां कहानी और क्षीण हुई है. यहां कुल मिलाकर चार पात्र हैं. उसमें भी दो मुख्यपात्र हैं. ये पात्र अपने ही भीतर जीते हैं. बाहर की दुनिया से इनका कोई लगाव नहीं है. मन की स्थिति बस आत्म-मंथन और आत्मालाप वाली है. नैतिकता के तकाजे यहां और भी कम हैं. मध्यमवर्गीय संवेदना वाले अति-बुद्धिजीवी ये पात्र एक-दूसरे के लिए भी जो सोचते –महसूस करते हैं वह इनके अपने भीतर ही भीतर है. उस पात्र का इससे कोई वास्ता नहीं. यहां हर एक पात्र ‘नदी का द्वीप’ है. हर एक का एकांत, अपना निजी एकांत.

तीसरे उपन्यास ‘अपने अपने अजनबी’ में यह एकांत और गहरा होता है. यहां नैतिक-अनैतिक का सवाल थम जाता है. दार्शनिकता गहरी हो जाती है. शायद यह अज्ञेय की परिपक्व उम्र का तकाजा भी था. इस उपन्यास में कैंसर से पीड़ित एक वृद्ध महिला और एक युवा स्त्री दोनों कुछ दिन बर्फ से ढके एक घर में एक साथ रहने को लाचार होते हैं. वे एक साथ यह महसूस करते हैं, ‘न तो मनुष्य अपने हिसाब से जीवन चुन सकता है, न ही मृत्यु. वह बस अपने किए की जुगाली भर कर सकता है.’ इस उपन्यास में जब वृद्धा की मृत्यु हो जाती है तो युवा स्त्री वह बर्फ से ढंका घर छोड़ देती है. आखिर में वह चुनने की स्वतंत्रता की खोज करते हुए आत्महत्या कर लेती है.

आलोचकों के हिसाब से ‘अपने अपने अजनबी’ पश्चिमी दर्शन के अस्तित्ववाद से प्रेरित था. हालांकि यह आरोप पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि लेखक द्वारा इस रचना को भारतीय दर्शन के आशावाद से जोड़ने की सजग कोशिश दिखती है. अज्ञेय एक ध्रुव से दूसरे विपरीत ध्रुव की ओर चलते हुए इसी संतुलन को साधने वाले साहित्यकार थे.