मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम. इसी मामले को 'शाह बानो केस' नाम से भी जाना जाता है. इस केस की जितनी अहमियत स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास में है उतनी ही अहमियत राजनीतिक इतिहास में भी है. माना जाता है कि देश में सांप्रदायिक तुष्टिकरण की राजनीति इसी मामले के बाद से शुरू हुई थी. इसे समझने के लिए पहले संक्षेप में शाह बानो मामले को समझते हैं.

शाह बानो मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली एक मुस्लिम महिला थीं. उनके पति ने जब उन्हें तलाक दिया तब उनकी उम्र 60 वर्ष से ज्यादा हो चुकी थी. इस उम्र में अपने पांच बच्चों के साथ पति से अलग हुई शाह बानो के पास कमाई का कोई जरिया नहीं था. लिहाजा उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के अंतर्गत अपने पति से भरण पोषण भत्ता दिए जाने की मांग की. न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला दिया. लेकिन उनके पति ने इस फैसले के खिलाफ अपील की और अंततः यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा.

शाह बानो के पक्ष में आए न्यायालय के फैसले का भारी विरोध हुआ. आखिरकार, राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 पारित कर दिया. इस अधिनियम के जरिये शाह बानो के पक्ष में आया न्यायालय का फैसला भी पलट दिया गया.

शाह बानो के पति का तर्क था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाकशुदा महिलाओं को ताउम्र भरण-पोषण भत्ता दिए जाने का कोई प्रावधान ही नहीं है. दूसरी तरफ शाह बानो का तर्क था कि दंड प्रक्रिया संहिता देश के प्रत्येक नागरिक (चाहे वह किसी भी धर्म का हो) पर सामान रूप से लागू होती है लिहाजा उन्हें भी इसका लाभ मिलना चाहिए. न्यायालय ने शाह बानो के तर्क को स्वीकार करते हुए 23 अप्रैल 1985 को उनके पक्ष में फैसला दे दिया. इस फैसले को मुस्लिम महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित करने के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना गया और शाह बानो का नाम भारत के न्यायिक इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया. लेकिन इसके तुरंत बाद ही इस फैसले पर राजनीति शुरू हो गई.

तमाम मुस्लिम संगठन इस फैसले का विरोध करने लगे. उनका कहना था कि न्यायालय उनके पारिवारिक और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करके उनके अधिकारों का हनन कर रहा है. जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे. आखिरकार राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित कर दिया. इस अधिनियम के जरिये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया गया. ऐसा होने पर हिंदूवादी संगठनों ने राजीव गांधी पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगाए और उनकी जमकर निंदा की. इससे विचलित हुए राजीव गांधी अब बहुसंख्यक तुष्टिकरण की राह पर निकल पड़े.

प्रसिद्द इतिहासकार राम चंद्र गुहा अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' में लिखते हैं कि शाह बानो केस पर हुई राजनीति से नाराज चल रहे बहुसंख्यक समुदाय के तुष्टिकरण के लिए राजीव गांधी ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाने में अहम भूमिका निभाई थी. लेकिन तुष्टिकरण की जिस राह पर राजीव गांधी निकल पड़े थे, उसके नतीजे बेहद घातक सिद्ध हुए. सांप्रदायिक ताकतें लगातार हावी होती चली गई, बाबरी मस्जिद गिरा दी गई और हजारों लोग धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ गए.

इस पूरे प्रकरण का एक बेहद दिलचस्प पहलू यह भी है. उस समय जब राजीव गांधी सरकार ने कानून बनाकर न्यायालय के फैसले को पलटा तो तत्कालीन गृह राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने अपनी ही सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए इस्तीफ़ा तक दे दिया था.

शाह बानो केस जीतकर भी वह नहीं पा सकीं जिसकी लड़ाई वे लड़ रही थीं. पहले तो मुस्लिम धर्मगुरुओं के दबाव में उन्हें स्वयं ही अपने पति से मिलने वाला भत्ता त्यागना पड़ा और बाद में राजीव गांधी सरकार ने न्यायालय के फैसले को ही पलट दिया था. हालांकि साल 2001 में सर्वोच्च न्यायालय ने डेनियल लतीफी मामले की सुनवाई के दौरान शाह बानो केस के फैसले को पुनः सही ठहराते हुए तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए भत्ता सुनिश्चित कर दिया.

इस पूरे प्रकरण का एक बेहद दिलचस्प पहलू और भी है. 80 के दशक में जब शाह बानो केस के फैसले का तमाम मुस्लिम संगठन और धर्मगुरु विरोध कर रहे थे, तब तत्कालीन गृह राज्य मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, स्वयं एक मुस्लिम होकर भी इसका जमकर समर्थन कर रहे थे. बल्कि जब राजीव गांधी सरकार ने कानून बनाकर न्यायालय के फैसले को पलटा तो आरिफ मोहम्मद खान ने इसके विरोध में सरकार से इस्तीफ़ा तक दे दिया था. 'इंडिया आफ्टर गांधी' में इस बारे लिखा गया है कि तब आरिफ ने एक साक्षात्कार में कहा था कि 'पूरी दुनिया में सिर्फ भारतीय मुस्लिम महिलाएं ही ऐसी होंगी जिन्हें इस भत्ते से वंचित किया जा रहा है.'

सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का जो सवाल लगभग तीस साल पहले आरिफ मोहम्मद खान ने उठाया था, वही सवाल आज फिर से सर्वोच्च न्यायालय में उठाया गया है. सर्वोच्च न्यायालय इन दिनों शायरा बानो नाम की एक मुस्लिम महिला की याचिका पर सुनवाई कर रहा है जिसमें ऐसे तमाम भेदभावों को समाप्त करने की बात कही गई है जो सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे हैं.

शाह बानो की तरह ही शायरा बानो भी एक तलाकशुदा महिला हैं जो अपने अधिकारों के लिए न्यायालय पहुंची है. उनका तर्क है कि ऐसी प्रथाओं की समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए जिनमें महिलाओं को सिर्फ निजी संपत्ति समझा जाता है.

शाह बानो की तरह ही शायरा बानो भी एक तलाकशुदा महिला हैं जो अपने अधिकारों के लिए न्यायालय पहुंची है. और शाह बानो की तरह ही इस मामले के भी कई न्यायिक और राजनीतिक पहलू हैं. इन्हें समझने की शुरुआत उन समीकरणों से करते हैं जिनके चलते शायरा बानो सर्वोच्च न्यायालय पहुंची हैं.

शायरा बानो उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली मुस्लिम महिला हैं. साल 2002 में उनकी शादी इलाहाबाद में रहने वाले रिजवान अहमद से हुई थी. शायरा का आरोप है कि उनके ससुराल वाले उनसे दहेज़ की मांग करते थे और उनके साथ मारपीट भी किया करते थे. उनका यह भी आरोप है कि उन्हें ऐसी नशीली दवाएं दी जाती थी जिनके कारण उनकी याददाश्त कमज़ोर होने लगी और अंततः वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं. शायरा के अनुसार अप्रैल 2015 में उनके पति ने उन्हें जबरदस्ती मायके भेज दिया और कुछ समय बाद 'तीन तलाक' देते हुए उनसे रिश्ता ही समाप्त कर दिया.

इसी तलाक की वैध्यता को चुनौती देते हुए शायरा सर्वोच्च न्यायालय पहुंची हैं. लेकिन शायरा की याचिका का मुख्य पहलू यह भी है कि उनके माध्यम से 'मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937' की धारा 2 की संवैधानिकता को भी चुनौती दी गई है. यही वह धारा है जिसके जरिये मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह, 'तीन तलाक' (तलाक-ए-बिद्दत) और 'निकाह-हलाला' जैसी प्रथाओं को वैध्यता मिलती है. इनके साथ ही शायरा ने 'मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939' को भी इस तर्क के साथ चुनौती दी है कि यह कानून मुस्लिम महिलाओं को बहुविवाह जैसी कुरीतियों से संरक्षित करने में सार्थक नहीं है.

शायरा का कहना है कि जहां भारत के कई अन्य समुदायों ने बहुविवाह प्रथा को समय के साथ समाप्त करते हुए इसे दंडनीय माना है. वहीं, मुस्लिम समुदाय आज भी ऐसा नहीं मानता. आज देश की सभी महिलाओं को इस प्रथा से संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन मुस्लिम महिलाओं को इससे बचाया नहीं जा रहा है.

शायरा का तर्क है कि ऐसी प्रथाओं की आज के प्रगतिशील समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए जिनमें महिलाओं को सिर्फ निजी संपत्ति समझा जाता है. उनका कहना है कि ऐसी कुरीतियों का समर्थन और इनका प्रचार सिर्फ वे इमाम और मौलवी करते हैं जो अपने पद का दुरूपयोग कर रहे हैं. शायरा ने जिन मुद्दों को अपनी याचिका में उठाया है उन्हें क्रमवार समझते हैं:

बहुविवाह:

बहुविवाह प्रथा को 'सती प्रथा' जितना ही घातक बताते हुए याचिका में कहा गया है कि इससे मुस्लिम महिलाओं को सिर्फ नैतिक या भावनात्मक नुकसान ही नहीं बल्कि आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी नुकसान भी हो रहे हैं. सर्वोच्च न्यायालय के ही कई फैसलों का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि बहुविवाह प्रथा को उसी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए जैसे कभी सती प्रथा को किया गया था.

शायरा का कहना है कि पारंपरिक तौर पर भारत में कई अन्य समुदायों में भी बहुविवाह प्रथा का चलन रहा है. लेकिन समय के साथ सभी ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया. याचिका में सरला मुद्गल केस का हवाला देते हुए कहा गया है कि 'इसाई समुदाय में 1872 के अधिनियम के तहत बहुविवाह को दंडनीय माना गया है, पारसियों में 1936 के अधिनियम के तहत यह दंडनीय है और हिन्दू, बौध, सिख तथा जैनियों में 1955 के अधिनियम के अनुसार बहुविवाह दंडनीय है. लेकिन 1939 का 'मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम' बहुविवाह को दंडनीय नहीं मानता. लिहाजा, जहां भारत की सभी महिलाओं को बहुविवाह जैसी प्रथा से संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है, वहीँ मुस्लिम महिलाओं को आज भी इस प्रथा से बचाया नहीं जा रहा है.'

तीन तलाक के बारे में याचिका में कहा गया है कि सऊदी अरब और पकिस्तान जैसे कई इस्लामिक देशों ने भी इस प्रथा पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगा दिया है. लेकिन भारतीय समाज में यह आज भी मौजूद है और भारतीय मुस्लिम महिलाओं को इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं.

शायरा की याचिका में यह भी कहा गया है कि विवाह संबधी कानून धर्म का हिस्सा नहीं हैं और समय के साथ ऐसी प्रथाओं को बदलना जरूरी है जो लैंगिक आधार पर भेदभाव करती हों. याचिका में मांग की गई है कि बहुविवाह जैसी प्रथा को समय की जरूरत और सार्वजनिक व्यवस्था तथा स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए समाप्त कर दिया जाना चाहिए.

तीन तलाक / तलाक-ए-बिद्दत

तीन तलाक के बारे में याचिका में लिखा गया है, 'इस प्रथा के चलते महिलाओं को संपत्ति की तरह समझा जाता है. यह प्रथा न सिर्फ मानवाधिकारों और लैंगिक समानता के विरुद्ध है बल्कि कई प्रख्यात विद्वानों के अनुसार यह इस्लामी आस्था का अभिन्न हिस्सा भी नहीं है. सऊदी अरब, पकिस्तान और इराक जैसे कई इस्लामिक देशों ने भी इस प्रथा पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगा दिया है. लेकिन भारतीय समाज में यह आज भी मौजूद है और भारतीय मुस्लिम महिलाओं को इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं.' याचिका में कुछ इस्लामिक विद्वानों के हवाले से यह भी कहा गया है कि 'कुरआन' में भी इस तरह के तलाक का जिक्र ही नहीं मिलता. बल्कि 'कुरआन' के अनुसार तलाक के वे ही तरीके सही हैं जिनमें तलाक के पुख्ता होने से पहले पुनः विचार करने की संभावनाएं हों.

शायरा के अनुसार 'तलाक-ए-बिद्दत' और पुनर्विचार का मौका दिए बिना ही तलाक देने जैसी प्रथाएं मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों के भी खिलाफ हैं. ऐसी प्रथाएं उनके सम्मान से जीने के अधिकार का हनन कर रही हैं. याचिका में कुछ ऐसे भी मामलों का जिक्र किया गया है जिनमें किसी मुस्लिम महिला को स्काइप, फेसबुक या एक एसएमएस करके ही तलाक दे दिया गया था. उड़ीसा की रहने वाली नगमा बीबी का उदाहरण भी याचिका में दिया गया है. नगमा के पति ने शराब के नशे में उसे तलाक दे दिया था. अगली सुबह उसे अपने किये का पछतावा भी हुआ लेकिन स्थानीय धर्मगुरुओं के अनुसार उनका तलाक हो चुका था. नगमा को उसके बच्चों के साथ वापस मायके भेज दिया गया और कहा गया कि वो दोबारा अपने पति के साथ तभी रह सकती है जब 'निकाह-हलाला' पूरा करे (नीचे देखें). ऐसे ही अन्य उदाहरण देते हुए याचिका में इस तरह के तलाक पर रोक लगाने की मांग की गई है.

याचिका में विधायिका पर भी निशाना साधते हुए कहा गया है कि समान नागरिक संहिता आज के समाज की जरूरत है लेकिन सरकार लगातार इससे बचना चाहती है.

निकाह-हलाला

याचिका के अनुसार निकाह-हलाला वह प्रथा है जिसके अंतर्गत कोई तलाकशुदा मुस्लिम महिला यदि अपने पति से पुनः शादी करना चाहती है तो पहले उसे किसी अन्य व्यक्ति से शादी करनी होती है. इसके बाद जब यह दूसरा व्यक्ति भी उसे तलाक दे, तभी वह अपने पहले पति से पुनः शादी कर सकती है. इस प्रथा को महिलाओं के लिए सबसे बुरा बताते हुए याचिका में कहा गया है कि यह प्रथा एक तरह से महिलाओं के बलात्कार की अनुमति देती है. कोई व्यक्ति यदि नशे में भी अपनी पत्नी को एकतरफा तलाक दे देता है तो उस महिला को या तो हमेशा के लिए अपने पति से अलग होना पड़ता है या साथ रहने से पहले किसी अन्य व्यक्ति से शादी करने को मजबूर होना पड़ता है.

इन सभी प्रथाओं को मौलिक अधिकारों का हनन मानते हुए और शायरा ने इन्हें असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है. उन्होंने अपनी याचिका में यह तर्क भी दिया है कि भारतीय संविधान का अनुछेद 25 जो धार्मिक स्वतंत्रता की बात करता है, उसकी भी कुछ सीमाएं हैं. शायरा का कहना है कि यह अनुच्छेद तभी तक सही कहा जा सकता है जब तक यह अन्य मौलिक अधिकारों का हनन ना करे और मानवाधिकारों के खिलाफ न हो.

यह याचिका इसलिए भी काफी अहम मानी जा रही है. क्योंकि यदि इसमें फैसला शायरा बानो के पक्ष में आता है तो यह न सिर्फ न्यायिक तौर पर एक ऐतिहासिक फैसला होगा बल्कि इसके निश्चित ही राजनीतिक परिणाम भी होंगे.

विधायिका पर भी निशाना साधते हुए इस याचिका में कहा गया है कि समान नागरिक संहिता आज के समाज की जरूरत है लेकिन सरकार लगातार इससे बचना चाहती है. सर्वोच्च न्यायालय स्वयं भी बीते कुछ समय से लगातार 'समान नागरिक संहिता' को लागू करने के लिए सरकार को इशारे करता रहा है. ऐसे में शायरा की याचिका ने न्यायालय को एक और मौका दे दिया है. सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल भी स्वतः संज्ञान लेते हुए एक याचिका पर सुनवाई शुरू की थी जिसमें मुस्लिम महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव चर्चा का विषय थे. उस याचिका को भी अब न्यायालय ने शायरा की याचिका के साथ शामिल कर लिया है. जस्टिस एआर दवे और जस्टिस एके गोयल इस याचिका की सुनवाई कर रहे हैं और उन्होंने केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से इस याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा है.

भाजपा के लिए 'समान नागरिक संहिता' हमेशा से एक अहम् मुद्दा रहा है. हालांकि सरकार में आने के बाद से इस मुद्दे पर उतनी चर्चा नहीं हुई है जितनी चुनावों से पहले भाजपा इस पर करती रही थी. कई जानकारों का मानना है कि विपक्ष में रहते हुए समान नागरिक संहिता की मांग करना जितना आसान है, सत्ता में आकर उसे लागू करना उतना ही मुश्किल. ऐसे में यदि न्यायालय स्वयं मुस्लिम बहुविवाह जैसी प्रथाओं को समाप्त कर दे तो समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए सरकार की राह आसान हो सकती है.

इसीलिए शायरा बानो की याचिका को बहुत ही अहम माना जा रहा है. यदि इस याचिका में फैसला शायरा बानो के पक्ष में आता है तो यह न सिर्फ न्यायिक तौर पर एक ऐतिहासिक फैसला होगा बल्कि इसके निश्चित ही राजनीतिक परिणाम भी होंगे. भारतीय न्यायिक और राजनीतिक इतिहास में जो जगह शाह बानो केस की है, शायरा बानो केस भी लगभग वैसी ही जगह बनाने से बस एक कदम की दूरी पर खड़ा है.

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