जेएनयू की घटना पर चर्चा और बहस तो अभी भी जारी है लेकिन इस पूरी बहस से कुछ जरूरी सवाल गायब हैं, फिर जवाब की तो अपेक्षा ही कैसी. पहला, जो उत्तेजना में देशभक्ति के नारे लगा रहे हैं उनमें कितना देशप्रेम है? दूसरा, जो ‘भारत की बरबादी तक, जंग रहेगी‘ या ‘भारत को दो रगड़ा, दो रगड़ा‘ जैसे नारे लगा रहे हैं, वे भारत की बरबादी के बाद खुद को कहां, कितना और कैसे फलता-फूलता पाते हैं? सवाल यह भी है कि क्या सच में देेश को गाली देना अभिव्यक्ति की आजादी है? अफसोस कि एक गलत गिरफ्तारी ने इन सारे जरूरी सवालों को बहस से ही बाहर कर दिया.

अभिव्यक्ति की आजादी का रोना रोने वालों से पूछना चाहिए कि दुनिया में ऐसा कौन सा देश है जो अपनी सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था पर हमला करने वाले के पक्ष में बोलने, लिखने और प्रदर्शन करने की आजादी देता हो. जहां हमलावर के पक्ष में बोलते हुए पूरे देश की ही बरबादी की बात करने तक का स्पेस मिलता हो और उसके बाद भी आप सुरक्षित हों. इस मामले में भी सिर्फ अपना ही देश अतुलनीय है.

कुछ देशों के हाथ में आपसी बैर और परस्पर सौहार्द की दो रेखाएं समानांतर चलती हैं. आप चाहकर भी यह नहीं कर सकते कि सिर्फ सौहार्द की रेखा को रख लें और बैर की रेखा को मिटा दें या फिर बैर की ही रेखा को लंबा कर लें और सौहार्द की रेखा को खत्म कर दें. ऐसे देशों में भाषा, भोज और भेस की इतनी जबरदस्त विविधता होती है कि उनका डीएनए ही परस्पर नफरत और प्रेम, दोनों से मिलकर बना होता है. पता नहीं दुर्भाग्य से या सौभाग्य से भारत उन्हीं देशों में से है जिसके नसीब में ये दोनों रेखाएं साथ हैं.

विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी का रोना रोने वालों से पूछना चाहिए कि दुनिया में ऐसा कौन सा देश है जो अपनी सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था पर हमला करने वाले के पक्ष में बोलने, लिखने और प्रदर्शन करने की आजादी देता हो.

देश की विविधता के बारे में घमंड से भरना बेहद आसान है, किंतु उस विविधता को निभाना कहीं ज्यादा मुश्किल. एक के लिए जो सही और सहज है, दूसरे के लिए वही बेहद असहज और जी का जंजाल है. निःसंदेह पूर्वाेत्तर भारत और कश्मीर के लोगों के लिए सेना और सुरक्षा बल का ठीक वही मतलब नहीं है जो बाकी भारतवासियों के लिए है. वहां के लोग सुरक्षा बलों से कुछ-कुछ वैसे ही असुरक्षित महसूस करते हैं जैसे किसी दुश्मन से. लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं. यही फौज आंख गड़ाए दुश्मन से भी निपटती है और बाढ़, भूकंप, दंगों या किसी भी किस्म की आपदा के समय जीवनरेखा भी बनती है. सेना के जवान साल-साल भर अपने घर-बार और बच्चों को छोड़कर बैठे रहते हैं. जरूरत पड़ने पर देश के लिए अपना खून भी बहाते हैं, जान भी देते हैं.

असहिष्णुता पर अधूरे संदर्भों में चली एकतरफा बहस के बाद अब राष्ट्रवाद और राष्ट्रद्रोह की बहस उफान पर है. चिंता जताई जा रही है कि भारत की बहुलता और बौद्धिक सर्जनात्मकता को खत्म करके एक ही विचार-दृष्टि की तानाशाही स्थापित करने की साजिश हो रही है. कहा जा रहा है कि देश की बौद्धिक सोच को लांछित करके उसका अवमूल्यन करने की कोशिश हो रही है. ऐसे माहौल में प्रगतिशीलों से कुछ सवाल पूछे जाने चाहिए. सबसे पहला तो यह कि जिसे भारत की सोच माना जा रहा है, क्या वह सच में हमारी अपनी ही है? क्या वह शुद्ध भारतीय सोच है? हमारी शिक्षा प्रणाली क्या सच में हमारी खुद की है? अंग्रेजों के समय में सेना के सिपाहियों के तबादले जल्दी-जल्दी होते थे. इसके पीछे तर्क था कि ज्यादा समय एक जगह टिकने पर विद्रोह की संभावना बढ़ जाती है. हमारी फौज में आज तक ज्यों के त्यों तबादले होते चले आ रहे हैं बिना औचित्य जाने. क्या यह हमारी सोच है?

दरअसल हमारी बौद्धिक और सर्जनात्मक बहुलता का विकास अभी तक किसी और के हिसाब से हुआ है. इस सबमें कुछ-कुछ अपना भी घुला-मिला है, पर सारा का सारा खालिस खुद का तो नहीं ही है.

हमारी अदालतों में होने वाली छुट्टियां भी अंग्रेजों की देन हैं. जिन अदालतों में लाखों-करोड़ों मुकदमे फैसले के इंतजार में पड़े हों, उन अदालतों को क्या सच में साल में दो बार छुट्टी मनाने जाना चाहिए? क्या यह हमारी सोच, सुविधा और संस्कृति के हिसाब से लिया गया निर्णय है? कितने ही कानून हैं जो अंग्रेजी राज के समय से चले आ रहे हैं. क्या वे हमारी सोच हैं? अपनी भाषा में सोचने, बोलने, लिखने में हमें शर्म आती है. कम से कम अधिकांशतः हिंदी भाषियों का तो यही हाल है. क्या यह शर्म हमारी खुद की सोच की पैदाइश है?

दरअसल हमारी बौद्धिक और सर्जनात्मक बहुलता का विकास अभी तक किसी और के हिसाब से हुआ है. इस सबमें कुछ-कुछ अपना भी घुला-मिला है, पर सारा का सारा खालिस खुद का तो नहीं ही है. ऐसे में सत्तासीन तत्वों के एक वर्ग द्वारा अतीत में झांकने या लौटने की जो कवायद चल रही है उसकी तुलना किसी गोद लिए गए ऐसे बच्चे से की जा सकती है जो होश संभालते ही सबसे पहले अपनी जैविक मां को खोजता है, उसके बारे में जानने को किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता है. ये जो बार-बार अतीत की तरफ लपक रहे हैं, अपनी जड़ों को टटोलने की बात कर रहे हैं, राष्ट्र की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं; वे असल में पहली बार अपनी तरह से सोचने की हिम्मत कर रहे हैं. जिसे अपनी तरह से सोचने या निर्णय लेने की आदत ही नहीं वह पहली बार में सटीक और व्यावहारिक निर्णय कैसे ले सकता है? इसलिए इस सोच में कहीं कुछ कट्टरता है तो कहीं अपने अतीत में जाकर खुद पर फक्र करने और आत्मसम्मान से भरने का भाव भी है.

जब पूरी दुनिया को अपने अपने खूनखराबे से दहलाने वाले लाखों कट्टरपंथी मुस्लिम इस्लाम की मूल व्याख्या नहीं बदल पा रहे तो कुछ मुठ्ठीभर कट्टरपंथी हिंदू, भला हिंदू धर्म की परिभाषा कैसे बदल सकते हैं? 

लेकिन दिक्कत यह है कि नया सोचने की इस पूरी प्रक्रिया को ही हेय दृष्टि से देखा जा रहा है. निश्चित तौर पर इस प्रक्रिया में अति भी है और कहीं-कहीं बिल्कुल एक सीधी रेखा पर चलने की गलत जिद भी. लेकिन जो सिर्फ विरोध के नाम पर विरोध कर रहे हैं, वे भी तो सीधी ही रेखा और गलत जिद पर अड़े हैं. यदि संस्कृत भाषा पर जर्मनी में जबरदस्त शोध हो तो हम गर्व से फूले न समाएं कि हमारी भाषा जननी पर विदेशी शोध कर रहे हैं. लेकिन अगर हमारे यहां संस्कृत को फिर से नए सिरे से खोजने, जानने और पढ़ने-पढ़ाने की बात की जाए तो खुद को प्रगतिशील कहने वालों के कान तुरंत खड़े हो जाते हैं.

आज पूरी दुनिया में इस्लाम के नाम पर भयंकर कत्लेआम करने वालों की संख्या बढ़ गई है. लेकिन सारे प्रगतिशील सब्र के साथ तर्क देते हैं कि इस्लाम यह नहीं बल्कि शांति और प्रेम का पाठ पढ़ाने वाला धर्म है. तो फिर वे इससे क्यों दहशत में हैं कि कुछ मुठ्ठीभर कट्टरपंथी हिंदू पूरे हिंदू धर्म की नई परिभाषा लिख देंगे जो देश के लिए खतरे की बात होगी? जब पूरी दुनिया को अपने अपने खूनखराबे से दहलाने वाले लाखों कट्टरपंथी मुस्लिम इस्लाम की मूल व्याख्या नहीं बदल पा रहे तो कुछ मुठ्ठीभर कट्टरपंथी हिंदू, भला हिंदू धर्म की परिभाषा कैसे बदल सकते हैं? प्रगतिशील ऐसी ही मानसिकता, उदारता और सब्र के साथ हिंदू उग्रपंथियों को क्यों नहीं सुनते या देखते जिस सब्र और सहजता से वे इस्लामी कट्टरता को देखते और उससे निपटते हैं? वे ये विश्वास क्यों नहीं कर पाते कि ये कुछ कट़टरपंथी हिंदू मिलकर सौहार्द, प्रेम और सदभाव के मेल से बनी हिंदू धर्म की मूल भावना को ऐसे ही खत्म नहीं कर सकते?

निःसंदेह कट्टरपंथ अपने आप में एक धीमा जहर है जिसकी मात्रा जितनी बढ़ेगी, पूरे समाज का स्वास्थ्य उतनी ही तेजी से गिरेगा. उस पर समय रहते बात और कार्रवाई निहायत जरूरी है. लेकिन सबसे अहम यह है कि हर कट्टरता पर बात हो और उसका विरोध हो. हर किस्म की कट्टरता हमें बराबर रूप से असहज बल्कि बेचैन करे. लेकिन हम एक की कट्टरता पर मौन रहते हैं या कट्टर होने के कारणों और तर्कों को खोजने लगते हैं, जबकि दूसरे की कट्टरता पर खाना-सोना तक भूल जाते हैं. संतुलन से दूर खड़ी यह वैचारिक प्रवृत्ति आखिरकार हमारे समाज और देश का नुकसान ही करेगी.