दो रोज़ पहले केरल के कन्नूर में सुबह-सुबह पहली और दूसरी क्लास के बच्चों को स्कूल ले जाते हुए ऑटो-ड्राईवर एवी बीजू को कुछ लोगों ने ऑटो से खींच लिया और उनपर चाकुओं और तलवारों से हमला किया. बच्चे खौफ में देखते रहे कि उन्हें रोज़ सुबह स्कूल ले जाने बीजू को कैसे बेरहमी से काटा जा रहा है. बाद में खून के छीटों वाली पोशाक में आतंकित बच्चों को वापस घर ले जाया गया.

सौभाग्य से बीजू को हस्पताल ले जाया गया और वे बच गए. लेकिन यह भाग्य पिछले महीने अपने मां-पिता के सामने काट डाले गए सत्ताईस साल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य पीवी सुजीत का नहीं था. वह बच नहीं सका. उस समय इसकी रिपोर्ट करते हुए सत्याग्रह ने चेतावनी दी थी कि कन्नूर में यह आखिरी राजनीतिक ह्त्या नहीं होने वाली है. बीजू भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं.

बीजू पर 1999 में सीपीएम के सदस्य कनकराजन की ह्त्या में शामिल होने का आरोप था. लेकिन वह साबित न हो सका था और उन्हें बरी कर दिया गया था.

इस बार के ह्मलावर और हत्यारे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(सीपीएम) से जुड़े हैं या उसके सदस्य हैं, ऐसा आरोप आरएसएस का है लेकिन यह मात्र उनका कयास नहीं है. कन्नूर और केरल के लोग जानते हैं कि सीपीएम और आरएसएस पिछले तीन दशकों से यहां आपस में यह खूनी संघर्ष कर रहे हैं. सत्याग्रह की ही रिपोर्ट के मुताबिक़ इन तीस बरसों में दोनों तरफ से दो सौ ऐसे क़त्ल हो चुके हैं. आप उनकी बात छोड़ दें जो सिर्फ कटे-फटे अंगों के साथ इन हमलों के बाद ज़िंदा बच गए हैं.

कन्नूर में ही तीसरी क्लास में अध्यापन कर रहे जयकृष्णन मास्टर को बच्चों के सामने तलवारों से काट डाला गया था. जयकृष्णन मास्टर आरएसएस के सदस्य थे. उस वक्त भी हमलावर सीपीएम से जुड़े बताए गए थे

बीजू पर हुए हमले ने उस घटना की फिर से याद दिला दी है जिसमें 1999 में कन्नूर में ही तीसरी क्लास में अध्यापन कर रहे जयकृष्णन मास्टर को बच्चों के सामने तलवारों से काट डाला गया था. जयकृष्णन मास्टर आरएसएस के सदस्य थे. उस वक्त भी हमलावर सीपीएम से जुड़े बताए गए थे और उनमें से एक को उम्र कैद की सज़ा भी हुई थी.

पिछले महीने ही कन्नूर की चकोली नामक जगह पर सीपीएम के एक कार्यकर्ता को उसकी दुकान से खींचकर काट डाला गया. आरोप आरएसएस के कार्यकर्ताओं पर है.

2014 में फर्स्ट पोस्ट ने सितंबर महीने में आरएसएस कार्यकर्ता ई मनोज की ह्त्या की रिपोर्ट करते हुए इस खूनी संघर्ष के इतिहास की बात की है. सितंबर 2014 में हिंदू अखबार में मोहम्मद नजीर ने भी इस पर विस्तार से लिखा है.

नजीर के मुताबिक़ सीपीएम इस चक्र की शुरुआत 1971 की सांप्रदायिक हिंसा से मानती है. उसकी दलील है कि चूंकि उस समय उसके कार्यकर्ता मुसलमानों की रक्षा में खड़े हुए, संघ ने उन्हें निशाना बनाया और वही सिलसिला आज तक जारी है.

2012 में इडुक्की में सीपीएम के जिला सचिव एमएम मणि ने खुलेआम यह कहा कि अस्सी के दशक में उनकी पार्टी ने अपने प्रतिद्वंदियों का सिलसिलेवार सफाया करने की नीति अपनाई थी. उसी महीने सीपीएम छोड़ चुके नेता टीपी चंद्रशेखर की ह्त्या हुई थी

मार्च 2008 का सीपीएम का एक दस्तावेज दावा करता है कि आरएसएस ने पहले पूंजीपतियों और मालिकों की ओर से हमलों का काम शुरू किया. इसमें यह दावा भी है कि सीपीएम का जनाधार इतना विशाल है कि अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए उसके सामने हत्याएं करने की मजबूरी नहीं है.

सीपीएम का यह उच्च नैतिक आधार तब ध्वस्त हो गया जब मई, 2012 में उसी के एक नेता इडुक्की के जिला सचिव एमएम मणि ने खुलेआम यह कहा कि अस्सी के दशक में उनकी पार्टी ने अपने प्रतिद्वंदियों का सिलसिलेवार सफाया करने की नीति अपनाई थी. याद रहे कि उसी महीने सीपीएम छोड़ चुके नेता टीपी चंद्रशेखर की ह्त्या हुई थी. इसमें भी सीपीएम के लोगों का हाथ था, यह सब मानते हैं.

मणि की स्वीकृति के बाद सीपीएम के पास अपनी सफाई के लिए कोई तर्क नहीं है. हिंसा के रास्ते आबादी पर अपना रुआब कायम करने की उसकी नीति सिर्फ कन्नूर तक सीमित नहीं है. बंगाल की राजनीति में भी हिंसा को प्रभुत्व स्थापित करने का जायज तरीका माना जाता रहा है.

जैसे कन्नूर में, वैसे ही बंगाल में प्रतिद्वद्वी राजनीतिक दल को अपने प्रभुत्व वाले इलाके में पांव न धरने देने के लिए मारपीट और ह्त्या तक करना साधारण बात रही है. नंदीग्राम और शिंगूर के आन्दोलनों पर पुलिस की मदद से तत्कालीन सत्तासीन सीपीएम के हिंसक हमलों की याद अभी ताज़ा है. दूसरे राजनीतिक दलों के दफ्तरों को जला देना वहां आम बात थी.

यह ठीक है कि हत्याओं की पृष्ठभूमि है और उसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन यह भी सच है कि हर ह्त्या एक अलग इंसान की ह्त्या है जिसकी एक मात्र पहचान उसकी किसी दल से प्रतिबद्धता ही नहीं है.

नंदीग्राम जा रही मेधा पाटकर पर सीपीएम के हमले ने 2002 में अहमदाबाद में मेधा पर साबरमती आश्रम में हुए हमले की याद दिला दी थी. उस समय उनपर आरएसएस से जुड़े लोगों ने हमला किया था.

सीपीएम को बंगाल में अब हिंसा की संस्कृति का उल्टा नतीजा भोगना पड़ रहा है. तृणमूल कांग्रेस ने उसी का तरीका अपनाकर उस पर हमले करना शुरू किया है. पहले की हमलावर सीपीएम की हालत अब इतनी खस्ता है कि वह अपने कायकर्ताओं की रक्षा नहीं कर पा रही और इसके लिए व्यापक समाज में उसके प्रति सहानुभूति भी नहीं है.

कन्नूर की हिंसा की इस सबसे नई घटना की, जिसमें जान नहीं गई, क्या सीपीएम निंदा करेगी या इसका औचित्य भी किसी तरीके से साबित करने की कोशिश करेगी? क्या इस ह्त्या के बारे में बात करते वक्त वह आरएसएस को पुरानी हत्याओं की याद दिलाकर यह बताना चाहेगी कि यह सिर्फ जैसे-को-तैसा है?

यह ठीक है कि हत्याओं की पृष्ठभूमि है और उसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन यह भी सच है कि हर ह्त्या एक अलग इंसान की ह्त्या है जिसकी एक मात्र पहचान उसकी किसी दल से प्रतिबद्धता ही नहीं है. बीजू का जुड़ाव आरएसएस से है लेकिन वह छोटे बच्चों को रोज़ स्कूल पहुंचाने वाला ऑटोवाला भी है. जयकृष्णन मास्टर एक राजनीतिक दल के सदस्य होने के साथ एक अध्यापक भी थे.

सीपीएम क्या यह कहकर इसे हल्का करना चाहेगी कि यह उसका स्वभाव नहीं, यह कन्नूर की स्थानीय विशेषता है? ऐसा ही कुछ नंदीग्राम के समय उसके नेता प्रकाश करात ने किया था जब उन्होंने हिंसा को बंगाल की राजनीतिक संस्कृति की खासियत बताया था

यह बात सीपीएम को अच्छी तरह पता है कि हिंसा के जरिए प्रभुत्व एक स्थाई अवस्था नहीं. हिंसा का तर्क दोनों तरफ से चल सकता है.

जनतंत्र में जनता को अपनी तरफ़ करने का यह आलस्यपूर्ण और बुजदिल तरीका है जिसमें उसे डराकर अपनी ओर किया जाता है. अधिक मेहनत भरा रास्ता है, अपने विचारों से लोगों को कायल करने का. जब अपने विचारों की ताकत पर भरोसा उठ जाता है तो हथियारों का सहारा लिया जाता है.

सीपीएम क्या यह कहकर इसे हल्का करना चाहेगी कि यह उसका स्वभाव नहीं, यह कन्नूर की स्थानीय विशेषता है? ऐसा ही कुछ नंदीग्राम के समय उसके नेता प्रकाश करात ने किया था जब उन्होंने हिंसा को बंगाल की राजनीतिक संस्कृति की खासियत बताया था, मानो इससे उनके दल की हिंसा कम हो जाती है. और इस संस्कृति को स्थापित करने में उनकी पार्टी का कितना हाथ है?

बीजू पर हमले की भर्त्सना करने के लिए आवश्यक नहीं कि पहले या उसी सांस में आरएसएस के हमलों की भी निंदा कर दी जाए. जैसा पहले कहा गया , हिंसा की हर घटना अलग है और बिना किसी विशेषण के उसकी निंदा ही उचित तरीका है.

सीपीएम यह न कहे कि वह जनाधार वाली पार्टी है और उसे हिंसा का सहारा लेने की ज़रुरत नहीं क्योंकि यह झूठ है.

कन्नूर के हिंसा-चक्र को रोकना एक राष्ट्रीय राजनीतिक दायित्व है और इसमें सीपीएम और आरएसएस समेत बाकी दलों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी.