4 नवम्बर सन 2000. यह वह तारीख है जब 28 साल की इरोम शर्मिला ने भूख हड़ताल की शुरुआत की थी. ठीक दो दिन पहले मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सटे मलोम में शान्ति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मिला एक बैठक कर रही थीं. उसी समय मलोम बस स्टैंड पर सुरक्षा बलों द्वारा ताबड़तोड़ गोलियां चलाई गईं. इसमें करीब दस निरपराध लोग मारे गये. वैसे यह ऐसी कोई पहली घटना नहीं थी लेकिन इरोम शर्मिला के लिए यह दमन का चरम था. पहले से ही आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट (अफ्स्पा) का विरोध कर रही इरोम शर्मिला ने उसके खिलाफ एक अनोखी जंग छेड़ दी. तब शायद लोगों को लगा होगा कि एक युवा ने भावुकता में बहकर यह कदम उठा लिया है. आज इस घटना को बीते अठारह से ज्यादा साल हो चुके हैं और इरोम शर्मिला के संघर्ष के सच्चाई लोगों के सामने आ चुकी है. यह और बात है कि एक वक्त ऐसा भी आ गया जब खुद उनके लोगों ने उनके संघर्ष को अपना मानने से इनकार कर दिया और तभी इरोम के आंदोलन मणिपुर में शांति की उम्मीद भी खत्म हो गई.

सोलह सालों के इस लंबे अनशन से जब शर्मिला का शरीर कमजोर और जर्जर हो चुका था तो भी उनके इरादे पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर नजर आ रहे थे. यह संघर्ष मात्र भावुकता नहीं, मणिपुर का यथार्थ था जिसे बदलने की जिद इरोम शर्मिला ने ठान रखी थी. मणिपुर के हिम्मत हारने के बाद वे कुछ नहीं कर सकती थीं, शायद इसलिए उन्होंने किसी से शिकायत भी नहीं की. आज चौवालीस साल की हो चुकी इस लौह महिला में जीवटता अब भी कायम है इसलिए आंदोलन के साथ बहुत कुछ खत्म होने के बाद भी वे जिंदगी से निराश नहीं हुईं. अब वे अपना वो सपना जी रही हैं जो उन्होंने हमेशा देखा था, बतौर स्त्री सामान्य जीवन जीने और परिवार बसाने का सपना. इरोम शर्मिला ने अपने सबसे कठिन वक्त में कोमल भावनाओं से लबालब कविताएं भी रची हैं. उनकी कुछ कविताओं का सरल हिंदी भावानुवाद.

बिना शीर्षक

जब जीवन अपने अंत पर पहुंच जाएगा

तब तुम मेरे इस बेजान शरीर को

ले जाना और कोबरू बाबा की मिट्टी पर रख देना

मेरे शरीर को आग की लपटों के बीच

अंगारों में तब्दील करने के लिए

कुल्हाड़ी और फावड़े से उसके टुकड़े-टुकड़े करना

मेरे मन को वितृष्णा से भर देता है

ऊपरी खोल को एक दिन खत्म हो जाना ही है

इसे जमीन के नीचे सड़ने देना

आने वाली नस्लों के काम का बनने देना

इसे बदल जाने देना किसी खदान के अयस्क में

मैं शान्ति की सम्मोहक खुशबू फैलाऊंगी

कांगलेई से, जहां मैं पैदा हुई थी

जो गुजरते वक्त के साथ

सारी दुनिया में फ़ैल जाएगी.


आज की रात

दो सदियों के मिलन की इस रात में

मैं दिल को छू लेने वाली सभी आवाजें सुनती हूं

ओ, समय कही जाने वाली प्यारी देवी

इस वक्त तुम्हारी यह असहाय बेटी बड़ी उधेड़बुन में हैं

यह आधी रात मुझे बेचैन बना रही है

मैं भूल नहीं पाती हूं इस दुनियावी कैद को

उन बहते हुए आंसुओं को

जब चिड़िया अपने पंख फडफडाती है

उनको जो पूछते हैं कि

ये चलने लायक पैर किसलिए हैं ?

वे जो कहते हैं कि ये आंखे किसी काम की नहीं!

ऐ कारागार! तुम नष्ट हो जाओ

तुम्हारी इन सलाखों और जंजीरों की ताकत

इतनी क्रूर है कि इसने न जाने कितनी जिंदगियों को

वेवक्त चीरकर रख दिया है.


जाग जाओ

जाग जाओ

भाइयो और बहनो

देश के रक्षको, जाग जाओ

हमने एक लंबा सफ़र तय कर लिया है

यह जानते हुए भी कि हम एक दिन नहीं होंगे.

हमारे दिलों में डर क्यों बैठा हुआ है?

यह डर मुझमें भी है

इस मुश्किल कदम के असर से

चिंता और डर से भरी हुई

ईश्वर की प्रार्थना करते हुए

सत्य को अपने कमजोर शरीर से सराहते हुए

मैं अलविदा कहना चाहती हूं

लेकिन जीवन के लिए तरसती भी हूं

जबकि मृत्यु के बाद फिर जन्म होना है

मैं अपने लक्ष्य को पाने के लिए इतनी बेताब हूं