हाल ही में महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने भारत में वैवाहिक बलात्कार को कानूनन अपराध ठहराए जाने की संभावना से इंकार किया. उनका कहना था, ‘दुनिया भर में वैवाहिक बलात्कार को जैसे समझा जाता है, उस तरह से भारत में नहीं समझा जा सकता. इसके पीछे शिक्षा का स्तर, निरक्षरता, गरीबी, सामाजिक संस्कार, धार्मिक विश्वास और विवाह को एक धार्मिक संस्कार मानना जैसे कई कारण हैं.‘

भारत में वैवाहिक बलात्कार पर बात शुरू करने से पहले यह जानना जरूरी है कि हमारे समाज में बलात्कार और वैवाहिक बलात्कार को लेकर क्या सोच है?

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के अनुसार ‘स्त्री की सहमति/इच्छा के बिना बलात यौन संबंध‘ बनाना बलात्कार है. इस परिभाषा को देखें तो भारत में विवाह संस्था में बलात्कार का प्रतिशत काफी ज्यादा होगा. असल में बलात्कार जैसे घृणित काम को अभी तक भारतीय समाज किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा किए गये अपराध के रूप में ही जानता-समझता है. जबकि राष्ट्रीय क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े देखें तो 2014 में होने वाले कुल बलात्कारों के 90 प्रतिशत मामलों में घरवाले, रिश्तेदार या आस-पड़ोस के लोग शामिल थे. इसके बावजूद परिचित व्यक्तियों द्वारा की जाने वाली यौन हिंसा और बलात्कार को स्वीकारने की हिम्मत समाज हमारे समाज में नहीं है. ऐसे में ‘वैवाहिक बलात्कार‘ शब्द तो हमारे लिए और भी ज्यादा अटपटा और अस्वीकृत है.

असल में बलात्कार जैसे घृणित काम को अभी तक भारतीय समाज किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा किए गये अपराध के रूप में ही जानता-समझता है. हालांकि आंकड़े देखें तो इस अपराध के ज्यादातर मामलों में घरवाले, रिश्तेदार या आस-पड़ोस के लोग शामिल होते हैं.

भारतीय समाज में विवाह एक धार्मिक संस्कार है. यह पत्नी को पति की जरूरत और खुशियों के लिए हर समय तैयार रहने का सुझाव और आदेश देता है. भारतीय पति-पत्नी जीवनसाथी नहीं होते बल्कि विवाह संस्कार पतियों को पत्नियों के ‘परमेश्वर‘ का दर्जा देता है. जाहिर है परमेश्वर को हक है कि वह अपने बंदे के साथ जैसा मर्जी सलूक करे. मन करे तो पुचकारे, मन करे तो दुत्कारे. मन करे तो संसर्ग करे, मन करे तो बलात्कार. चर्चित सेक्सॉलाॅजिस्ट प्रकाश कोठारी के मुताबिक ज्यादातर भारतीय मर्द अपनी पत्नियों को नींद की गोली की तरह इस्तेमाल करते हैं. पुरुषों की नई पीढ़ी में अपवादों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन अभी भी उस सोच के पति ही ज्यादा हैं जिनका मानना है कि पत्नी आजीवन उनकी खुशी, सुख-सुविधा और जरूरत का ध्यान रखने वाली एक सहायिका भर है.

विवाह संस्था ही नहीं बल्कि कानून भी वैवाहिक बलात्कार की स्वीकृति देता हुआ सा दिखता है. कानूनन 16 साल से कम उम्र की लड़की के साथ सहमति से बनाया गया यौन संबंध भी बलात्कार ही है. लेकिन यदि 16 साल से कम उम्र की लड़की का बाल विवाह हुआ हो, तो उसके पति द्वारा बनाया गया यौन संबंध बलात्कार नहीं माना जाता.

इसलिए मेनका गांधी ने सही कहा कि हमारे यहां वैवाहिक बलात्कार को उस तरह से नहीं देखा-समझा जाता जैसे विदेशों में. बल्कि सच तो यह है कि वैवाहिक बलात्कार तो क्या, बलात्कार को भी हमारे यहां उस तरह से नहीं देखा जाता जैसे कि विदेश में. हमारे यहां बलात्कार होते ही ‘इज्जत का प्रेत‘ लड़की/स्त्री की देह छोड़कर भाग जाता है, जबकि विदेश में बलात्कार सिर्फ एक हादसा है. वहां बलात्कार के बाद घर-परिवार और आस-पड़ोस में पीड़िता का जीवन उस तरह से मुश्किल नहीं होता जैसे कि अपने यहां.

हमारे यहां बलात्कार होते ही ‘इज्जत का प्रेत‘ लड़की/स्त्री की देह छोड़कर भाग जाता है, जबकि विदेश में बलात्कार सिर्फ एक हादसा है. वहां बलात्कार के बाद घर-परिवार और आस-पड़ोस में पीड़िता का जीवन उस तरह से मुश्किल नहीं होता जैसे कि अपने यहां.

बलात्कार के बाद इज्जत चली जाने की सोच विशुद्ध भारतीय समाज की उपज है. हमारे अतीत में जौहर की जो तथाकथित ‘गौरवमयी परंपरा‘ थी उसके पीछे असल में इज्जत बचाने की ही सोच थी. आज कई सौ साल बाद अपनी विकसित चेतना से लड़कियां सोच पा रही हैं, कि ऐसे हादसे से जीवन कहीं ज्यादा बड़ा है और बलात्कार का उनकी इज्जत से कोई लेना-देना नहीं है.

असल में विवाह के भीतर और बाहर बलात्कार में दो बड़े फर्क हैं. एक, अनजान व्यक्ति द्वारा बलात्कार से लड़कियों की इज्जत का पलीता हो जाता है जबकि वैवाहिक बलात्कार में स्त्रियों की तथाकथित इज्जत बनी रहती है. दूसरा बलात्कार से अक्सर लडकियां भावनात्मक रूप से बेहद टूट जाती हैं, जबकि वैवाहिक बलात्कार में पत्नियां अक्सर यह सोचकर टूटने से बची रहती हैं कि पति को खुश और संतुष्ट रखना उनका पहला धर्म है. ऐसी भी बहुत सारी पत्नियां हैं जो पतियों के एकतरफा यौन संबंधों से बेहद त्रस्त रहती हैं पर, उनके पास कोई विकल्प नहीं होता.

बाल विवाह में धकेली गई छोटी बच्चियों को यौन शोषण से बचाने के लिए वैवाहिक बलात्कार को गैरकानूनी बनाने की प्रासंगिकता सबसे ज्यादा है. यह विडंबना ही है कि भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब जैसे जिन देशों में बाल विवाह का चलन तुलनात्मक रूप से ज्यादा है, वहां वैवाहिक बलात्कार को आज भी गैरकानूनी घोषित नहीं किया गया है, जबकि पश्चिम के देशों में यह कानून बहुत पहले से लागू है. अमेरिका में 1970 में वैवाहिक बलात्कार को कानूनन अपराध घोषित किया गया था. यूरोप के ज्यादातर देशों में 1990 में ही वैवाहिक बलात्कार कानूनन अपराध घोषित किया जा चुका है. तुर्की में यह फैसला 2005 और मलेशिया में 2007 में हुआ.

वैवाहिक बलात्कार का गैरकानूनी होना सिर्फ उन पतियों के लिए एक चेतावनी है जो अपनी पत्नियों के साथ यौन दासी जैसा व्यवहार करने की आजादी चाहते हैं.

वैवाहिक बलात्कार को सिर्फ इस कारण से गैरकानूनी घोषित न करना बेहद गलत है कि यह विदेशी सोच है और भारतीय समाज और परंपरा का हिस्सा नहीं है. बुनियादी मानवीय अधिकार पूरी दुनिया में एक से होते हैं. वैसे भी भारतीय समाज ने खान-पान और पहनावे में दुनिया भर के चलन अपना लिए हैं. तो फिर इस मुद्दे पर कानून बनाने को लेकर हिचक क्यों?

हर समाज में हमेशा ही और ज्यादा मानवीय व लोकतांत्रिक होने की गुंजाइश बनी रहती है. वैवाहिक बलात्कार पर कानून पति-पत्नी के बीच मित्रवत संबंधों की मांग करता है. वह बताता है कि पत्नी बन जाने भर से स्त्री का उसकी देह और दिमाग पर हक खत्म नहीं हो जाता. वैवाहिक बलात्कार का गैरकानूनी होना सिर्फ उन पतियों के लिए एक चेतावनी है जो अपनी पत्नियों के साथ यौन दासी जैसा व्यवहार करने की आजादी चाहते हैं.

निःसंदेह भविष्य में ऐसा कानून जरूरी है. लेकिन यह भी जरूरी है कि पहले उसके लिए ठोस जमीन तैयार करने का काम हो. इसके लिए लंबी तैयारी चाहिए होगी क्योंकि यह सदियों का व्यवहार है जो पुरुषों के लिए बेहद सुविधाजनक है. रातोंरात पतियों को इस बात के लिए तैयार नहीं किया जा सकता कि वे अपनी पत्नियों की इच्छा-अनिच्छा का सम्मान करें.

अचानक से वैवाहिक बलात्कार को कानूनी अपराध बनाने से भयंकर उथल-पुथल मच जाएगी और परिणाम कुछ नहीं आएगा. क्योंकि तब पतिगण घरों में कम जेल में ज्यादा मिलेंगे. हालांकि जो कह रहे हैं कि वैवाहिक बलात्कार कानून भारतीय परिवार व्यवस्था पर बहुत ज्यादा दबाव डालेगा, उनसे हम कहना चाहती हैं कि यदि भारतीय परिवार पत्नियों के यौन शोषण की नींव पर ही टिके हैं, तो हमें नहीं चाहिए ऐसे परिवार.

हम सिर्फ ऐसे परिवारों और पतियों को ही कुछ मोहल्लत देना चाहती हैं जो खुद में इस बदलाव को तैयार हों कि पत्नियां यौन दासी नहीं बल्कि साथी हैं. वह भी सिर्फ इसलिए कि यौन अपराध के लिए पतियों को जेलों में ठूंसना कोई हल नहीं है. मूल सवाल वैवाहिक बलात्कार की समस्या के समाधान का है. इसके लिए समाज में बहुत सारे स्तरों पर लगातार विमर्श चलाए जाने की सख्त जरूरत है. जहां लड़कों/पुरुषों को इस बात के लिए तैयार किया जा सके कि पत्नियों के संग यौन गुलाम की तरह व्यवहार सिर्फ गलत ही नहीं बल्कि पाप है.

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