वह हॉस्टल जाने वाले रास्ते पर है. चलते–चलते अपनी बेखुदी में आगे चली जाती है. फिर पीछे लौटती है. यह वक्त जब शाम रात में तब्दील होती है, उसे बेहद पसंद है. रात बहुत तेजी से उतरती है. देखते ही देखते आसमान पर टंगा केसरिया बादल ओझल हो जाता है. चिड़ियाएं शोर मचाती हुई वापस लौटती और वृक्षों की कंदराओं में खो जाती हैं. उतनी जगह पर सिर्फ़ उनका हक़ है. वहां उनका उल्लास और जीवन दोनों सुरक्षित हैं. वह उन लम्हों की गवाह होना चाहती है... कितना कुछ एक साथ घटता है... होश साधना पड़ता है यह सब देखने के लिये... वह बैठ जाती है बीच राह में बनी सीमेंट की बेंच पर... जैसे अपने घर के नज़दीक बने मंदिर की सीढ़ियों पर बैठती थी. उनके साफ़ सुथरे होने की वजह से.

उसे ईश्वर में कोई आस्था नहीं है. उन तमाम मूर्तियों को देखकर या न देखकर भी उसके भीतर कुछ नहीं व्यापता. वह तो बस मां कुछ भेजती थी केला या नारियल जैसी कोई चीज़ तो ले जाकर पुजारी के सामने रख देती थी. उसके पास नारियल के कई ढेर होते थे जिन्हें वह हाफ रेट में बेच देता. वे उसी को चढ़ाते. उसी से खरीदते. वह भी कुछ कमा लेता. मंदिर एक बड़े से तालाब से सटा हुआ है. अन्दर जाओ तो तीनों तरफ से तालाब. आगे घाट की सीढियों पर औरतों और बच्चों की भीड़. कोई बरतन साफ कर रही होती. कोई पेटीकोट पहन खुद नहा रही होती. पेटीकोट फूल कर ऊपर तैरने लगता. उसे नीचे बिठाने की कोशिश करतीं. दूसरी तरफ भैंसे नहा रहीं होतीं. कुछ बच्चे हवा भरे ट्यूब पर लटकते तैर रहे होते. किसी ने मछलियों के लिये जाल डाले होते. छोटी–छोटी मछलियां जिनकी औकात बस एक कौर जितनी होती, नमक लगाकर सुखाई फिर तली जातीं. तालाब के किनारे मैला कपड़ा बिछा उन पर मछलियों की ढेरियां लगा औरतें या बच्चे बैठे होते. अपने काम से कच्चे–कीचड़ भरे रास्ते से लौटती कामगार औरतें जिन्हें ललचायी नज़र से देखतीं. हरी झलकियां मारता मैला पानी. सबकी गंदगियां साफ़ करते-करते थकता. मंदिर का बड़ा सा बरामदा खेलते बच्चों से भरा रहता. खुला हाल. जहां हवन वगैरह होते और बायीं तरफ के दूसरे बड़े कमरे में लगभग सारे भगवान...सिन्दूर से लिपे पुते. खुला-खुला स्पेस... भगवान अनंत में रहते हैं पर उन्हें धरती पर भी बड़ी सुन्दर-सुन्दर जगहें मिल जातीं हैं. उनके लिये बनाई जगहों पर कोई नहीं रह सकता, पुजारियों और पादरियों के सिवाय.

उसे न ईसा में दिलचस्पी थी न गणेश और दुर्गा में. वह तो इन जगहों पर इसलिए आती थी कि ऐसी जगहें बहुत खुली–खुली होती हैं. उनके घर की तरह छोटी और संकरी और बदबूदार नहीं

उसकी दादी उसे हर संडे चर्च लेकर जाती थी. सोमवार से शनिवार वह मंदिर जाती, रविवार चर्च. अपने वक्त में उसकी दादी की मां चर्च में सफाई का काम करती थी फिर उसने ईसाई धर्म कबूल कर लिया. जो सौगात में दादी ने तो ली, वह नहीं ले पाई. उसने उस चर्च का कोना-कोना देखा था. बहुत बड़ा हाल, कुर्सियां, ठीक सामने सलीब पर लटके ईसा, जिन्हें उसे बहुत देर तक देखना अच्छा लगता था. जलती हुई मोमबत्तियां... प्रार्थनायें, जिनका एक भी शब्द उसे समझ में नहीं आता था. आते-जाते साफ़-सुथरा सफ़ेद चोगा पहने पादरी. चमकते लोग... सजे-धजे बच्चे, जिनके लिये चर्च के बाहर बहुत से गुब्बारे वाले, खिलौने वाले खड़े रहते आँखों में उम्मीद लिये. जोर-जोर से बजते हुए घंटे,विशाल प्रांगण...

उसे न ईसा में दिलचस्पी थी न गणेश और दुर्गा में. वह तो इसलिए आती थी कि ऐसी जगहें बहुत खुली–खुली होती हैं. उनके घर की तरह छोटी और संकरी और बदबूदार नहीं जहां एक दूसरे से सटे गंदे घरों का शोर हर वक्त झीनी पुरानियों साड़ियों से बने पर्दों से टकराता रहता. वे साड़ियां जो बदन पर भी थरथरातीं हैं. दरवाज़ों पर भी. वे हर जगह फाड़ी जा सकती थीं... किसी भी वक्त उनके भीतर झांका जा सकता था. न इनके बदन पर चढ़ने का वक्त तय था न उतरने का. जिनसे कुछ नहीं ढांका जा सकता. न बाहर न भीतर. घर की कच्ची दीवारों पर न जाने कितनी कीलें ठुकी होतीं जिनपर मैले कपड़े उनकी निराशाओं और नाकामियों की तरह टंगे रहते, जिनसे हर वक्त एक अजीब किस्म की बदबू आती रहती... गुज़रे हुए कल की भयानक बदबू जिससे कहीं छुटकारा नहीं था.

जितने वक्त वह घर में रहती कोई न कोई आती-जाती रहती. अकेली नहीं, सूचनाओं के ज़खीरे के साथ. दूसरों के घरों की जासूसी में तो हर कोई अव्वल आना चाहता. पता नहीं उन्हें अपनी जिंदगी में सबसे कम दिलचस्पी क्यों थी? क्यों वे अपनी कोई बात नहीं करतीं? क्यों उनका जी यहां से भाग जाने का नहीं होता? क्या वे अपनी तकलीफें भूल जाना चाहती हैं? क्या वे इस कचरे की इतनी आदी हो चुकी हैं कि अब उन्हें कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया है? बच्चे स्कूल जाने के बजाय वहीं किसी गंद से खेल रहे होते या पुरानी सीमेंट की बोरियां ले कचरा बीनने निकल जाते. जब कचरे के ट्रक आकर बड़े-बड़े ख़ाली मैदानों में कचरा उलटते, वे उस पर टूट पड़ते. ख़ाली बोतलें... पेपर... प्लास्टिक... लोहा... जो मिलता उसका गुटका या इंजेक्शन...

छोटे–छोटे बच्चे दिन भर नालियों में मुंह मारती मुर्गियों के पीछे भागते नंगे एक फटी शर्ट पहने. उनके साथ कोई कुछ भी कर सकता था, करता था... दस या बीस रुपये में... वे बताने की हालत में भी नहीं होते थे...

पुरुषों का रात को पी गयी कच्ची दारू का नशा उतरता तो वे सामने बने मैदान में जुआ खेलने बैठ जाते. ज़मीन पर एक मैला तौलिया बिछा उसके इर्द गिर्द बिना नहाये खाये. उनके जिस्मों से भी बदबू आती. दारू की, पसीने की, कच्चे प्याज की... और भी न जाने किस -किस की. असहनीय. दरअसल यह गरीबी की बदबू थी और अज्ञान की... आदतों की...

दस लोग जुआ खेलते तो पचास देखने खड़े रहते. उसके बाबू की तरह ऐसे बहुत कम लोग थे जो रोजाना काम पर निकलते हों. अधिकतर या तो मजदूरी करते ठेकेदारों की साइड में या ट्रकों में मजदूरों के रूप में चलते. यह सब भी वक्ती होता. वे बहुत जल्दी–जल्दी काम बदलते और अधिकतर यहीं देखे जाते. कुछ ठेकेदारों की मदद से किन्हीं और प्रदेशों में जाकर काम करते. कभी लौटते, कभी नहीं. उनके मर या मारे जाने की खबर आती. कुछ दिन उनके घर में मातम रहता फिर वे पुरानी रूटीन में आ जाते. ज्यादा दिन मातम करना वे अफोर्ड नहीं कर सकते थे. वे भूख के भटकाये हुये थे. उनसे सबसे ज्यादा काम लिया जाता और उन्हें सबसे कम सोचा जाता है. कुछ ऑटो चलाते, कुछ रिक्शा. जो ऑटो चलाते थे उन्हें अक्सर पुलिस तंग करती. कई बार वे पुलिस की मार खाकर लौटते. जो रिक्शा चलाते, मार वे भी खाते थे. कभी सही बात पर कभी गलत बात पर. उन्होंने कभी जाना ही नहीं कि उनका अस्तित्व किसी के लिये जरूरी हो सकता है. वे तो खुद के लिये भी गैरजरूरी थे. वे सिर्फ़ एक भीड़ थे अपने लिये भी दूसरे के लिये भी और भीड़ की तरह ही उनसे व्यवहार किया जाता था. वे लगातार थकते-थकते बहुत जल्दी बूढ़े और बीमार होकर घर बैठ जाते. घर बैठकर भी वे नशा करते.

छोटे–छोटे बच्चे दिन भर नालियों में मुंह मारती मुर्गियों के पीछे भागते नंगे एक फटी शर्ट पहने. उनके साथ कोई कुछ भी कर सकता था, करता था... दस या बीस रुपये में... वे बताने की हालत में भी नहीं होते थे... लहूलुहान घर लौटते थे. कुछ दिन घर में पड़े रहते फिर निकलते. उनके पास तीनों में से कोई काल नहीं था. वे अनंत आवारा काल में टहलते. लड़कियां तो फिर भी माओं के साथ काम पर चली जातीं पर लड़के... जब उनके बापों के पास काम नहीं था तो उनके पास कहां से होता. वे कालोनीवासियों की कारें साफ़ करते या उनके छोटे -मोटे काम करते... दस या बीस रूपये में. बड़े जवान लड़के भी कहीं हफ्ता दो हफ्ता, महीना दो महीना काम करके फिर उसी तरह भटकने लगते. कोई मकसद नहीं था. न कहीं से चले थे, न कहीं पहुंचना था. जो था बस वही था.

‘तेरी बेटी तो काम में बड़ी होशियार है आशा. स्कूल नहीं जाती क्या?’

‘स्कूल जाने में नाटक करती है आंटी. तीसरी क्लास में है. पढ़ने में भी अच्छी है पर काम में ज्यादा दिल लगता है...’

घर औरतें चलातीं...सामने बनी अनेकों पॉश कालोनियों के घरों में काम करके. वह भी उठा करती थी मां के साथ सुबह पांच बजे. पानी भरने के बाद वे दोनों अपने घर का काम करतीं. चूल्हा जलाकर चावल चढ़ा देतीं और कोई भी साग. जो उस सीज़न में सस्ता मिल जाये. लाल भाजी, चौलाई, बथुआ, करमत्ता, चुनचुनिया (ये तालाब से निकलती है) मैट भाजी या कुम्हड़े के पत्ते, जो आसानी से मिल जाते थे. काली चाय बनती खूब सारी, जिसमें डुबोकर रात की बासी रोटियां खाई जातीं और आठ बजते न बजते उन्हें काम पर निकलना पड़ता, उसी बदबूदार रास्ते से... जिधर देखो कचरे के ढेर, नालियां बजबजाती रहतीं... कभी एकाध साल में उन नालियों की सफाई होती भी तो कचरा निकालकर उनके किनारों पर रख देते. कोई नहीं उठाता और वह पूरे मोहल्ले में फ़ैल जाता. ‘हम कचरे की संतान हैं. इसी कचरे में हमें बड़ा होना है. इसी कचरे में मरना है...' उसके बाबू कहते थे.

मां पांच घरों में काम करती थी. झाड़ू, पोंछा, बर्तन... वह मां का हाथ बंटाती. बर्तन जमा देती. टेबल पोंछ देती. फटका कर देती. बिस्तर बना देती. सुबह का वक्त उनके घरों में जितनी चीज़ें उतने काम. रसोई में न जाने क्या-क्या बन रहा होता. वे कटिंग के लिये उसे बुला लेतीं, कभी मसाला पीसने के लिये. वह इतनी बढ़िया कटिंग करती कि वे हैरान रह जातीं. कभी फ्रिज साफ़ करने के लिये कहतीं (उसने पहली बार जब बर्फ देखी तो इतनी खा ली कि जुकाम हो गया)... उनकी चीज़ों से भरी आलमारियां सजा देती. खिलौने पोंछ के रख देती. वे न भी कहतीं तो भी कर देती. वह काम से कभी नहीं घबराती थी, उसे अच्छा लगता था अपने घर से ज्यादा यहां. बहुत बार टीवी देखने मिल जाती थी. बाद में उन्होंने अपनी पुरानी टीवी उन्हें सस्ते में बेच दी थी. अपने घर को देखो तो हर तरफ कचरा...मैलापन... सीलन... टूटे–फूटे बर्तन... घर में हर चीज़ वहीं की नज़र आती. उनके कपड़े, चादरें, पुराने पलंग, लोहे की आलमारियां, पुराने जूते–चप्पल, मोज़े तक ... किस्म–किस्म के छोटे बड़े बरतन जो उनके घर फालतू थीं, यहां कीमती.. उसका अपना क्या था? वे खुद तक नहीं. उनके घर की हर चीज़ में उन्हीं की गंध आती थी. खुद से भी. वे परफ्यूम की खाली सुंदर कांच की शीशियां ले आते थे. उन्हें तोड़कर उनकी अंतिम कुछ बूंदें भी खुद पर छिड़क लेते थे और महकने की कोशिश में और ज्यादा गंधाने लगते थे... तो इन मालिकों के यहां जितने लोग उतने कमरे, उतने टीवी उतने मोबाइल. उनके पास सब कुछ बहुत सारा था... वह दिन भर पोंछती रहती.

मां को लगता था सिर्फ पढाई ही उसे इस जिन्दगी से निकाल सकती है. पर यह भी पता था उसके लिये बहुत रुपयों की ज़रुरत पड़ती है. पढता तो भाई भी था उससे एक क्लास नीचे पर न जाने क्यों मां को उससे पढ़ाई की उम्मीद नहीं थी

‘तेरी बेटी तो काम में बड़ी होशियार है आशा. स्कूल नहीं जाती क्या?’

‘स्कूल जाने में नाटक करती है आंटी. तीसरी क्लास में है. पढ़ने में भी अच्छी है पर काम में ज्यादा दिल लगता है...’

‘नहीं पढेगी तो मुझे दे देना... अच्छा पैसा देंगे. तू तो हमारी पुरानी बाई है... एक ही घर में रहोगे.’

‘पर हम तो इससे यह काम नहीं कराना चाहते आंटी.’

‘तो क्या डॉक्टर बनाओगे! करना तो यही पड़ेगा. हमको देखो. फीस देते–देते कमर टूट जाती है. पता नहीं इतना पैसा कभी वापस आयेगा भी कि नहीं. अब तो फॉरेन जाने का बुखार चढ़ा है सबको. कर्जा लेके भी भेजना पड़ेगा. तुम लोग सुखी हो बाई, मेहनत करते हो, खाकर सो जाते हो. हमारी तो नींद उड़ी रहती है.' 'कभी हमारी जगह रह कर देखो आंटी... सांस उड़ जायेगी...' मां घर आकर कहतीं.

मां को लगता था सिर्फ पढाई ही उसे इस जिन्दगी से निकाल सकती है. पर यह भी पता था उसके लिये बहुत रुपयों की ज़रुरत पड़ती है. पढता तो भाई भी था उससे एक क्लास नीचे पर न जाने क्यों मां को उससे पढ़ाई की उम्मीद नहीं थी. बस वे उसे किसी अच्छी जगह लगा देना चाहती थीं काम पर... उसे पुरानी मशीनों से बड़ा प्रेम है. वह मोहल्ले के लोगों की बिगड़ी हुई मशीनें बना देता और उसके एवज़ में पैसा लेता. वह फ्री में कुछ नहीं करता. कहता मैं बड़ा होकर गैरेज खोलूंगा. गैरेज का नाम सुनते ही मां को गुस्सा आ जाता. यहां के कुछ लोग गैरेज में काम करते और वे हमेशा गंदे रहते. मां को साहब लोगों जैसे साफ़-सुथरे काम पसंद हैं... और बिना पढ़े तो वे आ नहीं सकते. मां खुद पांचवीं तक पढी हैं. जिन के यहां काम करती हैं उनके यहां से पुरानी मैगजीन उठा लाती हैं फिर पढ़ती हैं. हालांकि ज्यादातर मैगजीन अंग्रेजी में होती थीं और सिर्फ़ यह देखने के काम आती थीं कि दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है, कितनी चीजें बनने लगी हैं और पैसे के बिना ये ज़िन्दगी नरक है. एक बार बहुत देर तक वे अंग्रेजी की एक मैगजीन पलटती रहीं. फिर उसे देखा... 'सुन मुनमुन, क्या तू मुझे कभी अंग्रेजी पढ़कर सुना सकती है?' वह नहीं समझ पायी इस बात का क्या जवाब हो सकता है? पर उस रात उसे नींद नहीं आई थी. वह बाबू को देखती रही थी जो सोने से पहले बड़े लोगों के कपड़े प्रेस करते हैं. एक छोटी-सी ठेलेनुमा दुकान किराये की... लोहे की भारी इस्त्री... हर वक्त कपड़ों पर फिसलती रहती...काम ज्यादा होता... वे थक जाते... उनकी बांहें दुखतीं... रात को सरसों का तेल लगाते... फिर भी वे कहते थे मैं अपने बच्चों को बड़ा आदमी बनाऊंगा. बड़ा यानी जिसके पास ज्यादा पैसे हों. आराम से रहते हों. अच्छी नौकरी करते हों. जिनके पास चीज़ों की बहुतायत हो. उन्हें महीने में एक बार राशन मिलता. 25 किलो चावल, दो किलो दाल, शक्कर, मिट्टी तेल, नमक, सब सस्ता... और वे उसी से काम चलाने की कोशिश करते.

एक बार बहुत देर तक वे अंग्रेजी की एक मैगजीन पलटती रहीं. फिर उसे देखा... 'सुन मुनमुन, क्या तू मुझे कभी अंग्रेजी पढ़कर सुना सकती है?' वह नहीं समझ पायी इस बात का क्या जवाब हो सकता है?

काम करके जब वे दोनों लौटतीं, उनके पास पांच घरों का बचा हुआ खाना होता. बासी चावल, सूखी रोटियां, जो वे घर आकर अंगारों पर गर्म करके खाते. गर्म सिर्फ वह करती. भाई तो इतंजार में बैठा रहता. ठंडी ही झपट लेता. खाकर बाहर भाग जाता जहां आवारा लड़कों का झुण्ड उसका इंतज़ार करता रहता... जो खाने और भटकने के सिवा कुछ न करते... मां ने उसे साहब लोगों की कारें धोने के काम में भी लगाया पर वह कभी जाता कभी नहीं. कभी-कभी खाना ख़राब भी होता वे फेंक देते. वह खाना जो साहबों के पेट के नाप से ज्यादा था, उनके पेट से कम, ऐसी सब्जियों के सब दीवाने थे. मां सब उन्हें दे देती. खुद बथुआ के साथ चावल ही खाती.

उन घरों में हवा पानी की तरह अफवाहें और पड़ोसी बेरोक–टोक आते जाते. अधिकतर अवैध संबंधों के किस्से. जवान लड़के–लड़कियां जो एक–दूसरे के साथ बड़े होते, अपना गोरखधंधा वहीं चलाए रखते... लड़कियों को साल में दो तीन बार ‘अनवांटेड किट’ की ज़रूरत पड़ती जो आसानी से कैमिस्ट के पास उपलब्ध भी थी. उसे अभी भी याद है उनके सामने वाले घर में एक लड़का, एक लड़की को देखने आया था तो बजाय लड़की के उसकी मां उसके साथ भाग गयी थी... अपने तीन बच्चों को अपने पीछे छोड़कर. मोहल्लेवालों को एक नयी चीज़ मिल गयी थी बात करने को. वैसे भी इन्हीं तरह के किस्सों में लोगों की दिलचस्पी होती है. नल पर नहाते या कपड़े धोते समय औरतों और आदमियों की ज़ुबानों पर यही बातें रहतीं... कपड़े जो हर बार और पुराने और मैले होते जाते थे, कपड़े जो अपनी निजता खो चुके थे... उसे यह सब बाद में समझ आया कि क्यों मां उसे साये की तरह अपने साथ रखती है और क्यों पढ़ाई के लिये कभी-कभी बहुत मारती है. मारने के बाद उसे हल्दी लगाती खुद भी रोती है और कभी जब समझाती है तब भी रोती है. आते-जाते कभी रास्ते में उसकी मुलाकात हंसी से भी हो जाती है जब बच्चे खिलखिलाते भागते हैं मुर्गियों और सुअरों के पीछे या जब टीवी पर कोई मनचाहा प्रोग्राम होता है या जब वह अपने स्कूल में होती है अपने दोस्तों के साथ. कभी-कभी वह सबसे छुपाकर उसे घर भी ले आती. किसी को भनक भी न लगने देती. वह सिर्फ नींद में उसके हाथों से निकल जाती और चेहरे पर फ़ैल जाती.

वे मैले–फटे कपड़ों के पीछे से झांकते अधनंगे-बदरंग–बदसूरत. दिनभर भटकने और रात को थक अपने ही अंधेरों में स्वप्नविहीन रातें गुज़ारने वाले क्रूर दिन थे

'तू नींद में बहुत सुन्दर लगती है रे' मां कहती.

हां. अगर नींद न हो हम सब भद्दे और बदसूरत हो जाएं...मर जाएं

बस्ती से बाहर निकलते ही सामने छोटी रेलवे लाइन है. यह ट्रेन सिर्फ मजदूरों के लिये चलती है... फ्री... रायपुर से धमतरी... आराम से चलती है. कोई दौड़ता–दौड़ता भी चढ़ जाए. लोग मूतने के लिये भी उतर जाते हैं फिर चढ़ जाते हैं. सुबह जल्दी आने वाले कामगारों को काफी सीन देखने को मिल जाते... सुबह–सुबह 'निपटान' को पटरियों के आसपास बैठी औरतें ट्रेन आते ही खड़ी हो जातीं या मज़बूर हों तो दूसरी तरफ देखने लगतीं. अपने पेटीकोट का एक टुकड़ा बची हुई शर्म के एक और छोटे टुकड़े पर गिरा... पुरुष और बच्चे आराम से बैठे होते अपने सामने प्लास्टिक की बोतल रखे जिसमें मैला पानी भरा होता. खिड़की से झांकते यात्रियों को देख वे खुद को और तान लेते, उनके होठों पर एक बेशर्म हंसी कूदने लगती. यात्री औरतें अपने सिर अन्दर कर लेतीं... बाहर की बेशर्मी से वे अपने भीतर शर्म महसूस करती थीं.

जल्दी आने वाले कामगारों को फिर कुछ समय सस्ते खाने की तलाश में भटकना पड़ता. दस रुपये में दो समोसे और एक चाय या एक प्लेट चावल दाल मार के. दाल महंगी हो गई तो बेसन मार के.

सुबह नौ बजे उस तरफ से आने वाले कामगारों का झुण्ड उतरता अपने साथ टिफिन लेकर और आसपास बन रही विशाल बिल्डिंगों में खो जाता. वे फिर शाम को दिखते सात बजे वाली ट्रेन से वापस जाते. दिन में दो फेरे खाली ट्रेन के और लगते जिसमें कुछ ही पैसेंजर होते. वह इन सारे दृश्यों को हजारों बार देख चुकी थी. कुछ भी तो रहस्य नहीं था उसके लिये. उसे नग्न मानव देह भद्दी लगती... मैली... दुर्गन्ध छोड़ती... उसे सफाई पसंद है और खुशबुएं जो उसे अपने मालिकों के घरों में मिलती. कपड़े धोते समय या किसी के नहाकर बाहर निकलते समय ..बहुत तेज, मदहोश करतीं... वह उनका बाथरूम धोते या उनकी ड्रेसिंग साफ़ करते वक्त कुछ अपने हाथ में भी छिड़क लेती और फिर देर तक उस महक के साथ रहती. वह गहरी-गहरी सांसें लेती बड़ी हसरत से सोचती. कोई इस ट्रेन से उतरे और उसका हाथ पकड़कर बहुत दूर ले जाये. वह एक असंभव सपना था पर क्या हर सपना शुरू में असंभव नहीं लगता?

'हम जितना काम करते हैं न बाबू साहेब उतना तो कोई दे सकता नहीं. हम तो उससे हमेशा कम मांगते हैं. हम तो बस आपकी कृपा चाहते हैं. सुना है इस कॉलोनी में इतना पढ़ा-लिखा और कोई नहीं. मैं अपनी इस बेटी को पढ़ाना चाहती हूं'

वे मैले–फटे कपड़ों के पीछे से झांकते अधनंगे-बदरंग–बदसूरत. दिनभर भटकने और रात को थक अपने ही अंधेरों में स्वप्नविहीन रातें गुज़ारने वाले क्रूर दिन थे. अपनी बेबसी–लाचारी–बदगुमानी को अपनी ही आंखों से छुपाने की व्यर्थ इच्छा रखने वाले. सूखी रोटियों से गले में अटकने और खारे पानी से पेट में उतरने वाले दिन जो गले में उभरे काँटों से छिलते रहते थे... इतने लम्बे और उजाड़ रास्ते कि लगता ही नहीं था कि यहां कभी कोई पड़ाव बनाया जा सकता है या इन दिनों की बंजर कोख में किसी बीज से कोई पौधा भी फूट सकता है. पर फूटा था...

'मुनमुन, अगर तू भी साथ दे तो चल एक घर और पकड़ते हैं...'

'पर मुझे स्कूल भी जाना होता है...'

'कर लेंगे रे. मैं कर लूंगी. एक नया साहब आया है मोहल्ले में. कहते हैं अकेला और बहुत पैसे वाला है. देखता ही नहीं किसी की तरफ़. घरवाली मर गयी है. एक का काम कितना होगा? पैसा भी अच्छा देगा...'

'तुम्हें कैसे पता पैसा अच्छा देगा? और तुझे किसने बताया?'

'शांति ने... वह करती थी उसका काम... पर उसका आदमी घर पड़ा रहता है दारू पीकर... बच्चों को मारता है तो उसे घर में ज्यादा रुकना पड़ता है. वह छोड़ रही है... कहती है ऐसा आदमी नहीं मिलेगा...'

और वे गईं... अच्छा-खासा घर. एक कमरे की तीनों दीवारों पर नीचे से ऊपर तक कांच की आलमारियों में भरी किताबें ही किताबें. देखकर मां हैरान रह गई.

'बाबू साहब, ये सारी किताबें आपकी पढ़ी हुई हैं?'

'हां, ज्यादातर. क्यों?'

'कुछ नहीं बाबू. हम इन्हें झाड़-पोंछ कर रखेंगे.'

'अच्छा! पर इन्हें तो कोई साफ़ नहीं करना चाहता. बाइयां कहती हैं हम इनका एक्स्ट्रा लेंगे...'

'हम नहीं लेंगे बाबू साहेब. ये मेरी बेटी है… मुनमुन… आपको जब वक्त मिले बस इसको थोड़ा पढ़ा देना...'

'ये भी तो लेना ही हुआ...' वे हंस पड़े.

'ये हम सफ़ाई के बदले में नहीं ले रहे हैं... हम जितना काम करते हैं न बाबू साहेब उतना तो कोई दे सकता नहीं. हम तो उससे हमेशा कम मांगते हैं. हम तो बस आपकी कृपा चाहते हैं. सुना है इस कॉलोनी में इतना पढ़ा-लिखा और कोई नहीं. मैं अपनी इस बेटी को पढ़ाना चाहती हूं. चाहती हूं इसे मेरे जैसे दिन न देखने पड़ें... बस एक मां की बात मान लीजिए...'

'ओके हर संडे सिर्फ एक विषय पढ़ाऊंगा और तुम घर जाकर रात को भी पढ़ना बल्कि हर रात पढ़ा करो... यह रात तुमसे कोई नहीं छीन सकता और यह रात जो तुम्हें देगी वह भी नहीं'

'बट मुझे तो सिर्फ सन्डे को टाइम मिलता है.'

'तो उसी दिन पढ़ा देना. मैं इसे अपने साथ ले आउंगी. बाकी दिन तो ये भी स्कूल जाती है.'

'तनख्वाह क्या लोगी?'

'मेरा काम देखकर देना बाबू साहब. न आप पहली बार काम करा रहे हो न हम पहली बार कर रहे हैं. बाबू साहेब हम काम बहुत अच्छा करते हैं...आप पूछ लो, सामने वाली आंटी हमको घर की चाबी देकर ऑफ़िस चली जाती हैं.'

'ओके... ओके... गो अहेड... आज से भी शुरू कर सकती हो?'

'बाबू साहेब, कल से आके करेंगे. घर से जल्दी निकलना पड़ेगा. नहीं तो आज सबको देर हो जायेगी.'

बाबू साहेब मुस्कराते उन्हें जाते देखते रहे.

वह एक खुबसूरत खुला हुआ संसार था जिसमें वह अपने अनजाने दाखिल हुई थी. उसके तब तक के स्वप्नों से भी बड़ा संसार. जिसमें किताबों की महक थी, पेंसिल की सरसराहट, ख़ाली कागज़ों की पुकार, इस जानकारी की शुरुआत कि कागज़ सिर्फ़ नावें बनाने के काम नहीं आते... उस पार भी ले जाते हैं... तुम्हें अपनी गोद में बिठाकर.

इतवार की सुबह वे अपनी घूमनेवाली कुर्सी पर आराम से बैठे मिलते. सांवला रंग. दुबले -पतले. छोटे-से. सफ़ेद कुरता-पैजामा पहने. पैरों में साधारण चप्पल. लगभग बाबू की उम्र के. उनके हाथ में कोई न कोई किताब होती. एक पेंसिल और एक लेटर पैड. छोटी सी साइड टेबल पर चाय या काफ़ी के कुछ मग्स ख़ाली पड़े होते और पानी की जग. जिन्हें उठाने के बहाने वह नज़दीक आती तो वे सिर्फ़ आंखें उठाकर उसे देखते फिर किताब में डूब जाते. दोनों मां-बेटी घर का काम मिनटों में कर देतीं. फिर मां चली जाती तो अपना बस्ता ले उनके निकट जमीन पर आकर बैठ जाती.

'आज क्या पढ़ना है?' उसे बगैर देखे वे अपना हाथ आगे बढ़ा देते. वह सारी किताबें उनके हाथ पर रख देती. वे चौंककर उसे देखते-मुस्कराते.

'तुम किसमें सबसे ज्यादा कमज़ोर हो?'

'सबमें...'

वह पहली बार था जब उसने आईने में खुद को ध्यान से देखा था. बढ़ता हुआ कद. सांवला रंग. दुबली-पतली काया. तीखी नाक. तेल लगे कसकर बंधे बाल. दो पतली -पतली चोटियां. उनपर बंधी लाल रिबन. नीली स्कर्ट और सफ़ेद शर्ट.

'ओके हर संडे सिर्फ एक विषय पढ़ाऊंगा और तुम घर जाकर रात को भी पढ़ना बल्कि हर रात पढ़ा करो... यह रात तुमसे कोई नहीं छीन सकता और यह रात जो तुम्हें देगी वह भी नहीं. बहुत लोग पैसा कमाने के लिये पढ़ते हैं. तुम खुद को बनाने के लिये पढ़ो. और एक सीधी सी बात और समझ लो. रात कितनी भी लम्बी हो. सुबह होती है. बशर्ते तुम सोते न रह जाओ.'

क्या था उन शब्दों में कि पूरी तरह समझ में न आने के बावजूद उसकी आंखें भर आईं. यह बेबसी थी जो कभी गुस्सा कभी आंसू बनकर फूटती थी. उसने कसकर पोंछ दिया. वे लगभग हर विषय पढ़ाते थे पर सबसे ज्यादा पढ़ाते थे अंग्रेजी. वह तब छठवीं में थी और अंग्रेजी पढ़ना बस शुरू ही किया था- ए बी सी डी...

वह उनके सांवले हाथों और सांवले चेहरे को देखती थी और सांवली आंखों को जो उसके सिवा सब देखती थीं. उसे पढ़ाते हुये कभी-कभी वे अपनी पत्नी की तस्वीर को देखने लगते थे. जिस पर पड़ी हुई बड़ी सी माला पंखे की हवा में डोलती रहती थी. वह उन किताबों को बड़ी हसरत से देखती थी. कभी छूकर कभी सूंघकर. कभी अपनी आंखों से सहलाकर. क्या वह इतनी मोटी किताबें कभी पढ़ पायेगी... और ऐसा करते हुये उन्होंने एक दिन देख लिया था... 'जब तुम इन्हें समझने के लायक हो जाओगी ये खुद-ब-खुद तुम्हारे पास आ जाएंगी.'

मौसम उन खिड़कियों से आये-गये. हवाएं चलीं. पत्ते गिरे फिर नए निकले. फूल खिले. फिर मुरझाए. बारिशें आईं. सर्दियां. फिर गर्मियां और गर्मियों में उसका रिज़ल्ट आ गया. बॉर्डर से पास होने वाली लड़की ने पहली बार सिक्सटी परसेंट को छुआ था. वह लगभग भागती हुई बदहवास घर आई थी और मां के गले से झूल गयी थी. सुनकर मां भी ख़ुशी से रो पड़ी थी.

वह दुपहर का वक्त था और शनिवार का दिन. जब उन दोनों ने वह बंद दरवाज़ा खटखटाया था. उनींदी आंखों से उन्होंने दरवाज़ा खोला था.

'बाबू साहेब' मां ने कांपते हाथों से रिज़ल्ट उनकी ओर बढाया था.

'ओह...' वे अन्दर गये, चश्मा उठाया और बाहर आये, देखा...

'वेरी गुड, कांग्रेट्स, वेल डन.'

'थैंक यू सर...' उसके मुंह से निकला था. यह भी तो उन्होंने ही सिखाया था...

'यह सब आपकी मेहरबानी है बाबू साहेब... हम आपका अहसान...' हाथ जोड़ते हुये मां का गला भर आया था.

दूसरे दिन वह पांच रुपये वाला साबुन ले आई थी पास की दुकान से... वो जिससे नहाने से खुशबू आती है... वह नहीं जिससे मां कपड़े धोती है और बच्चों को भी नहलाती है. पर वह कितने दिन चला था. चार दिन

'ओह... कम ऑन. ये सब रहने दो. मैंने कुछ नहीं किया सिर्फ़ रास्ता दिखाया और रास्ता दिखाना बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात है चलना और इसको अभी बहुत मेहनत करनी है. भूल जाओ कि तुम क्या हो सिर्फ़ यह याद रखो कि क्या तुम्हें होना है. कोई किसी को नहीं बना सकता. हम सिर्फ़ खुद को बना सकते हैं. ओके?'

'ओके बाबू साहेब.' उनके 'अरे-अरे' कहते भी मां ने उनके घुटने छू लिये थे और आंचल में दबाकर लाये एक पाव लड्डू का पैकेट उनके सामने कर दिया था. उन्होंने हंसकर ज़रा सा तोड़ा और कहा... बाकी इसे खिला दो, असली हक़दार यही है.

वह पहली बार था जब उसने आईने में खुद को ध्यान से देखा था. बढ़ता हुआ कद. सांवला रंग. दुबली-पतली काया. तीखी नाक. तेल लगे कसकर बंधे बाल. दो पतली -पतली चोटियां. उनपर बंधी लाल रिबन. नीली स्कर्ट और सफ़ेद शर्ट. यही उसके स्कूल का ड्रेस है. खुद को बनाना यानी बहुत सफ़ाई से रहना. सारे काम अच्छी तरह करना और सब कुछ सीखना... वापसी में मां ने यही तो समझाया था.

'सब कुछ सीखने में सबसे पहले क्या आता है?' पलट कर उसने पूछा था.

'सबसे पहले काम करना सीखना फिर और ज्यादा पढ़ना फिर... अपने सर से पूछियो कल ...' मां को तो खुद ही नहीं मालूम.

चलना शुरू करते समय हम नहीं जानते कहां जाना है. जो सीधी साफ सड़क दिख जाए बस उसी पर चल पड़ते हैं. यह तो दुनिया की तमाम बिछी सड़कों के मिजाज और मूड पर निर्भर है कि उनमें से कौन हमें पहचान ले और हमारा हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींच ले.

दूसरे दिन वह पांच रुपये वाला साबुन ले आई थी पास की दुकान से... वो जिससे नहाने से खुशबू आती है... वह नहीं जिससे मां कपड़े धोती है और बच्चों को भी नहलाती है. पर वह कितने दिन चला था. चार दिन. ख़त्म होते न होते उसने बहुत-सी चीजों की इच्छा जगा दी थी भीतर और उसकी आंखें उन चीजों को ढूंढ़ने लगी थीं.

वैसे पढना उसे कुछ खास अच्छा नहीं लगता था पर यह वह अपने अनुभव से जानती थी ... पढ़ने–लिखने वालों की कदर बहुत होती है... उसकी किताब खुली होती तो उसे कोई नहीं उठाता वहां से

‘मां, मैं उस आंटी का काम कर लूं?’ एक दिन उसने मां से पूछा था.

‘फिर यहां क्यों? पढ़ेगी नहीं? उसके लिये भी तो टाइम चाहिये. यहां ज्यादा रहेगी तो यह पेट कुत्ते की तरह तुझे यहीं बांध देगा. रोज़ एक ही बात कहती हूं... पढ़-पढ़ और पढ़ टीवी में देख, कितनी तरह का काम करती हैं लड़कियां और हमसे ज्यादा कमाती हैं... अंग्रेजी बोलती हैं, कैसी दिखतीं हैं. क्या हमारे भाग्य में यही काम है. निकल जा यहां से और कुछ और बनने की सोच... अच्छा सुन, तू टीचर भी तो बन सकती है. पढ़ा बच्चों को. दिन भर आवारा घूमते रहते हैं. हमारे लिये नहीं तो इनके लिये कुछ बन...’

उसे कुछ समझ में नहीं आया. वह कितने सारे काम एक साथ करना चाहती है...

‘सुबह छह बजे से ग्यारह बजे तक... मेरा स्कूल बारह बजे है...’ बहुत सोचकर उसने कहा, ‘और मां पढ़ने के लिये पैसा भी तो चाहिये...’

‘कर लेगी? वैसे कर ले. इस मोहल्ले में तो जितना कम रहेगी उतना अच्छा. एक आदमी सुधरा हुआ नहीं है. दिन रात दारू... गांजा. जुआ. दिनभर यहीं बैठे खुजलाते रहेंगे पर ये नहीं कि कुछ काम कर लें. हरामखोर सब... डौकी कमाये, ये खायें… मुहंजलों को शर्म तो है नहीं, नासपीटे सब के सब… कर ले... बस उनके आदमियों से बचकर रहना. दिखने में तो सब अच्छे हैं पर एक जानवर तो हर आदमी के भीतर रहता ही है...'

यह नहीं कि ये बात समझने की उसकी उम्र नहीं थी. वह समझी ज़रूर पर बचा नहीं पायी खुद को.

ज़िंदगी उतनी रफ़्तार से नहीं चलती जितनी रफ़्तार से कहानियां. यहां तो कदम –कदम पर इतने धक्के–यातनाएं और निश्चितता है कि अगला कदम भी यहीं पड़ेगा, हम पहले से जानते हैं... ‘न जानना’ उतना तकलीफ़देह नहीं होता जितना ‘जानना’ और इस जानने से छुटकारा पाने का कोई उपाय न था सिवाय इसके कि वहां से भाग जाएं...

हम सब ऐसे ही हैं, बाहर से कॉमन... अंदर से अनकॉमन. घर से, अपने से छिप–छिप के जीना और ज़िन्दगी को छिप-छिपकर पीना... नशे के घूंट की तरह. भीतर उतर जाये तो तुम्हें बहुत सी हकीक़तों से ऊपर उठा देता है

उसने किया वह काम और इतनी अच्छी तरह कि उस आंटी का उसके बिना काम ही नहीं चलता... वह दिन भर उसे अपने पास देखना चाहती थी. वहां उसने बहुत कुछ सीखा. कपड़े पहनने का तरीक़ा. बात करने का सलीका. कांटे चम्मच से खाने का. बॉडी लैंग्वेज़. उनकी कॉलेज़ पढ़ रही बेटी डॉली. जिसके लगभग सारे काम वह करती थी, अपनी सब फालतू चीज़ें उसे दे देती. अपने कपड़े तक, जिन्हें बाबू काट पीटकर उसके नाप का बना देते. अलबत्ता लिपस्टिक और नेलपालिश उसके काम के नहीं थे. एक बार लगाया तो पूरा घर ऐसा हंसा कि बाद में हफ़्तों इस पर मज़ाक होता रहा.

ग्यारह बजे वह वहां से निकल आती. घर आती. नीली ड्रेस पहनकर तैयार होती. काले प्लास्टिक के जूते पहनती और पुराना बैग जो किसी न किसी ने दिया होता. टांगकर पैदल निकल पड़ती. रोड पर आ जाने के बाद बहुत से बच्चे मिलते स्कूल जाते हुये. अच्छा लगता उनके साथ जाना आसपास की दुकानों को और वहां रखी चीज़ों को निहारते. दुपहर का खाना वहीं मिलता दो बजे... कैसा था... यह जानने की उसने कभी फ़िक्र नहीं की... किताबें भी मिलतीं और तीन सौ रुपया महीना भी.

वैसे पढना उसे कुछ खास अच्छा नहीं लगता था पर यह वह अपने अनुभव से जानती थी ... पढ़ने–लिखने वालों की कदर बहुत होती है... उसकी किताब खुली होती तो उसे कोई नहीं उठाता वहां से. घर चाहे जितना बिखरा हो. बाबू खुश होते. फ्री टाइम में वे लोगों के फटे कपड़े सिलते... उनके पास पैर से चलने वाली पुरानी मशीन है जो देर रात तक चलती रहती. एक बार उसने उनसे कहा. रात को मैं सारे कपड़े प्रेस करके रख दूंगी तो क्या आप वे पैसे मुझे दे देंगे? वे हंसते हुए मान गए. बहुत संभाल कर वह रात को खूब सारे कपड़े प्रेस करती. कई बार कुछ जल भी जाते और बाबू को खूब गालियां पडतीं. उसने नियम बना लिया रात को पचास कपड़े प्रेस करके ही सोना है. इस तरह बहुत साल पचास रुपये रोज के जमा करके वह मां को देती तो वे बैंक में डाल देतीं. एक हज़ार वो आंटी दे देती थी.

‘पैसे की कीमत तभी पता चलती है जब तुम्हारे पेट में रोटी न हो.’ मां कहती थी और वह यह बात जानती थी.

शायद बहुत वक्त हो गया है यहीं बैठे... उसने अपने चारों ओर देखा, हर लड़का–लड़की अपने अन्दर एक रहस्यमय संसार छिपाए घूम रहा है. हरेक को यही लगता होगा कि जो वह जानता है कोई नहीं जानता कि उसकी ज़िन्दगी और सोच सबसे अलग है. हम सब ऐसे ही हैं, बाहर से कॉमन... अंदर से अनकॉमन. घर से, अपने से छिप–छिप के जीना और ज़िन्दगी को छिप-छिपकर पीना... नशे के घूंट की तरह. भीतर उतर जाये तो तुम्हें बहुत सी हकीक़तों से ऊपर उठा देता है.

'तो क्या सोलह साल की लड़की को जीने की परमीशन नहीं मिलनी चाहिये?' कुछ न समझते हुये भी किस तरह उसके मुंह से निकल गया था वह नहीं जान पाई थी

कॉलेज और यूनिवर्सिटी में ही खुद को जानने की शुरुआत होती है. खुद को उलीचनाफिर भरना. खूब दोस्तियां करना, दोस्तों से लड़ना फिर उन्हें मनाना. दोस्तों के मामले में वह काफी खुशकिस्मत रही है. वे उसका साथ पसंद करते हैं. बचपन से ही ज्यादा काम करने की आदत के चलते देर रात तक बैठ कर उनके नोट्स बना देती. प्रेक्टिकल फ़ाइल्स बना देती. उनके कपड़े ठीक कर देती. कभी–कभी उनके लिये कुछ बना भी देती. वे सब उसके हाथ की मैगी बहुत पसंद करते हैं.

हमारी स्मृतियां ही हमारी देह का इतिहास होती हैं. मोटे-मोटे लफ़्ज़ों में लिखा वह इतिहास जो कभी तुम्हें खुद को भूलने नहीं देता. अजीब है न! लिखते भी हम हैं और हम ही भूल भी जाना चाहते हैं. आज क्यों स्मृतियों ने उस पर एकाएक हमला कर दिया है... कमाल की बात तो यह है कि देखते वक्त जिन दृश्यों को हम जरा भी तरजीह नहीं देते वही सबसे ज्यादा याद रहते हैं. ये देखो भीतर के आंसुओं में कितनी कागज़ की नावें तैरती आ गई हैं. आज उसे बड़ी शिद्दत से बाबू साहेब याद आ रहे हैं... कई साल वह उनसे पढ़ती रही थी और जब वे उस मोहल्ले से गये तो उसे एक बड़ा तोहफ़ा देकर उसका कॉलेज में एडमीशन करा दिया था.

'पढने के बाद तुम स्वतंत्र हो जाओगी. वापस आना न चाहो तो मत आना. तुम्हें देखकर मुझे अच्छा लगता है. धीरे-धीरे अपने सपनों का पीछा करना. तुम्हें सिखाते-सिखाते मैं भी कुछ नया सीख पाया.' यह उनकी विनम्रता थी. उसके पास तो ऐसा कुछ नहीं था जो वह किसी को दिखा-सिखा या दे सके. 'तुम्हारी लगन..तुम्हारी लगन ही तुम्हारी ताकत है और यही ताकत तुम्हें आगे ले जायेगी. तुम्हें यहां तक लाने में तुम्हारी मां का महत्वपूर्ण रोल है. इसे भूलना मत.'

'आपका भी है सर. आय एम वेरी ग्रेटफुल टू यू.' यह एक साधारण सा वाक्य था जो उसके पूरे अस्तित्व ने कहा था और जिसकी सांद्रता से उसकी आत्मा भीगी हुई थी.

कमाल की बात तो यह है कि देखते वक्त जिन दृश्यों को हम जरा भी तरजीह नहीं देते वही सबसे ज्यादा याद रहते हैं. ये देखो भीतर के आंसुओं में कितनी कागज़ की नावें तैरती आ गई हैं. आज उसे बड़ी शिद्दत से बाबू साहेब याद आ रहे हैं

'मैं जानता हूं तुम्हारे भीतर दो लड़कियां रहती हैं. एक सोलह साल की चंचल-कामुक-संसार को अपने ठेंगे पर रखने, सभी मान्यताओं-मूल्यों की धज्जियां उड़ाने की ख्वाहिश रखने वाली... जो किसी से नहीं डरती. और दूसरी बहुत ही धीर-गंभीर. लगभग 30-35 साल तक की औरत जो बड़ी मुश्किलों से यहां तक पहुंची है. जिसका अतीत ऐसा नहीं कि याद रखा जा सके पर वह कुछ बन जाने की मांग भी करता रहता है. वह चाहती है एक ऐसा भविष्य जो अतीत की पुनरावृत्ति न हो और वह इस सोलह साल की लड़की से डरती भी है.'

'तो क्या सोलह साल की लड़की को जीने की परमीशन नहीं मिलनी चाहिये?' कुछ न समझते हुये भी किस तरह उसके मुंह से निकल गया था वह नहीं जान पाई थी.

'बिल्कुल मिलनी चाहिये. यह हक़ है उसका और किसी से पूछने की जरूरत भी नहीं है पर यह कब होना चाहिये इसका फ़ैसला उस बड़ी औरत को करने दो. हो सकता है वह तुमसे प्रतीक्षा करने को कहे तो वह भी करना. प्रतीक्षा हमेशा आनंदित करती है.'

वे हमेशा ही ऐसी अविश्वसनीय बातें करते थे. ऐसी बातें जिन पर तुम यकीन भले न करो पर उसे माने बगैर कोई चारा भी नहीं होता.

'पर आपने मेरे लिये हॉस्टल की व्यवस्था क्यों करवा दी?'

'ताकि तुम यहां से दूर रह सको. दूसरी दुनिया में प्रवेश कर सको. इसे यहीं छोड़कर जाओ. इसे अपना हिस्सा मत बनाना. एक जीवन में हम न जाने कितनी दुनियाएं जीते हैं. और वे सच और झूठ एक साथ होती हैं.'

'सच और झूठ एक साथ?'

'तुम सपना देखती हो न नींद में?'

'जी' अनसमझी सी वह.

'उठकर क्या लगता है...'

'यही कि वह एक सपना था...'

'जीवन भी बिलकुल ऐसा ही है. एक दिन तुम्हें लगेगा यह सब सपना था.'

'आय डिडन्ट अंडरस्टैंड एनीथिंग...'

'लीव इट एज़ इट इज़. लाइफ़ इज़ अ ग्रेट टीचर यू नो?'

'क्या मैं कभी -कभी आपसे मिलने आ सकती हूं?' उसका स्वर टूट गया था.

'व्हाय? नो नीड माय डियर... आगे बढ़ो. एक अज्ञात तुम्हारी प्रतीक्षा में है.'