धर्म की तरह अध्यात्म भी प्रायः निजी मामला है. वह जब भी संगठित या समूहबद्ध होता है तो धर्म की ही तरह आक्रामक और अपने ही बुनियादी सरोकारों से विरत होने लगता है. हम सदियों से ऐसा होता देखते आये हैं. हमारे समय में चूंकि समूह-दृश्यता बहुत बढ़ गयी है, हम इसे व्यापक पैमाने पर देख रहे हैं.
एक आध्यात्मिक गुरु ने पिछले सप्ताह दिल्ली में यमुना के किनारे के सूखे इलाके में लगभग जबरन घुसकर एक विश्व संस्कृति समारोह आयोजित किया. विश्व शान्ति और सद्भाव के अत्यन्त शुभ उद्देश्य से आयोजित इस भव्य समारोह के जो पोस्टर सारी दिल्ली में लगे उनमें इन गुरु महोदय की तसवीरें ऐसी थीं मानो यह उनके अनुयायियों का सम्मेलन हो, विश्व संस्कृति समारोह नहीं. पर्यावरणविदों ने यमुना को प्रदूषित करने के इस सुनियोजित प्रयत्न को लेकर अनेक तर्कसम्मत, तथ्यसंगत आपत्तियां उठायीं जिन्हें अस्वीकार कर गुरु महोदय ने इसे यमुना को स्वच्छ करने का अभियान बताया. राष्ट्रीय हरित आयोग ने जब इन आपत्तियों और वस्तुस्थिति का आकलन करते हुए पांच करोड़ का जुर्माना आयोजकों पर लगाया तो पहले तो गुरु ने कहा कि वे जेल चले जायेंगे पर एक पैसा भी जुर्माना नहीं देंगे. फिर कुछ शाब्दिक हेर-फेर से जब उसे जुर्माना नहीं क्षतिपूर्ति कहा गया तो उन्होंने चुपके से उसकी एक क़िस्त भर दी.
समारोह के पोस्टरों पर गुरु के साथ प्रधानमंत्री और कुछ छोटे-मोटे आयोजक नेताओं की तस्वीरें भी थीं. अध्यात्म का सत्ता के प्रति आकर्षण, उससे निकटता का यह एक और प्रदर्शन था. राष्ट्रपति ने एक मौक़े इस आयोजन में जाने से इनकार कर दिया पर प्रधानमंत्री और दिल्ली के मुख्यमंत्री के अलावा कई अन्य मंत्रियों ने वहां की शोभा बढ़ायी. तीन दिनों के इस समारोह के लिए जो व्यवस्था की गयी थी उसे हटाने में काफ़ी समय लगेगा और पर्यावरणविद् सप्रमाण कह रहे हैं कि यमुना को स्थायी क्षति पहुंची है.
इस देश में धर्म या अध्यात्म, किसी जाति या राजनैतिक दल का शासन नहीं, संविधान और कानून का शासन है. कोई आध्यात्मिक गुरु खुल्लमखुल्ला क़ानूनी आदेश की अवज्ञा कर उसी संविधान से ताकत पानेवाले शासन का समर्थन और वाहवाही पा सकता है, यह अध्यात्म और लोकतंत्र, दोनों के लिए बेहद दुखद है. अध्यात्म के श्रेष्ठ मूल्य स्वतंत्रता-समता-न्याय हमारे संविधान में समाहित हैं और अध्यात्म और धर्म को उन्हीं के अंतर्गत भारत में रहने और अपनी जगह बनाने की अनुमति दी जा सकती है, उनसे असंबद्ध रहकर नहीं. यह समझना कठिन है कि क़ानून और पर्यावरण की व्यवस्थाओं का यह खुला उल्लंघन किस धार्मिक संहिता, आध्यात्मिक चिंता और भारतीय परंपरा से मेल खाता है.
असहिष्णुता के कुछ और रूप
इधर सहिष्णुता की घटी जगह को लेकर जो बहस होती रही है उसमें ध्यान लगातार सरकारों, राजनैतिक दलों, उनसे जुड़े संगठनों-संघों के आचरण पर केन्द्रित रहा है. इस पर इधर कुछ ध्यान गया है कि अनेक सामाजिक विश्वास और मूल्य, आचरण और व्यवहार भी अब तक ऐसे हैं कि वे कई वर्गों के प्रति - जिनमें मुख्यतः दलित, आस्था और विचार के अल्पसंख्यक, स्त्रियां और आदिवासी आदि शामिल हैं - गहरी और व्यापक असहिष्णुता दिखाते-बरतते रहे हैं. इनके साथ हिंसा, अत्याचार, दुर्व्यवहार आदि की घटनाएं रोज़ अख़बारों में छायी रहती हैं. इन्हें अनदेखा और असंबोधित नहीं किया जाना चाहिये.
स्वयं बौद्घिक समाज में ऐसी असहिष्णुता व्यापक रही है और अपनी सारी प्रखरता और कीर्ति के बावजूद वाम संगठनों में भी वह लगातार रही है. हम जैसे लोग जो अपनी तुच्छ बुद्धि से हर तरह की कट्टरता का - फिर वह विचारधारा, धर्म, अध्यात्म, धनदौलत आदि किसी भी आधार पर क्यों न हो - विरोध करते हैं, दोनों ओर के कोपभाजन होते हैं. यह जो बीच की जगह है, उसे बढ़ना चाहिये. उसे बचाने वालों को और अधिक सशक्त करने की जरूरत है.
भारतीय उद्यमी रोहन मूर्ति ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय को काफ़ी बड़ी राशि भारतीय क्लैसिकों के नये, सुसंपादित एवं सुनियोजित अंग्रेज़ी अनुवाद की एक नयी सीरीज - मूर्ति क्लैसिकल लाइब्रेरी - के लिए दी. बहुत कम समय में इस सीरीज में संस्कृत के अलावा थेरीगाथा, तुलसीदास, सूरदास आदि के ग्रंथ प्रकाशित और बहुप्रशंसित हुए हैं. इस सीरीज के सामान्य संपादक कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रख्यात संस्कृत विद्वान् डॉ शेल्डन पॉलक हैं. कुछ बुद्धिजीवियों ने, जिनमें अंग्रेज़ी कवि-विद्वान् मकरन्द परांजपे और अदम्य मोदी-समर्थक विदुषी मधु किश्वर शामिल हैं, रोहन मूर्ति से आग्रह किया कि वे डॉक्टर पॉलक को मूर्ति क्लैसिकल लाइब्रेरी के सामान्य संपादक के पद से हटा दें.
डॉ शेल्डन पॉलक की प्रतिष्ठा उनके विचारों की प्रखर उदारता के कारण रही है और उन्होंने एक ऐतिहासिक महत्व की अवधारणा प्रतिपादित की है कि भारतीय क्लैसिक सिर्फ़ संस्कृत में ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी हैं. उनका अनुवाद भी इस सीरीज के अन्तर्गत हो रहा है. उन्हें संपादक के पद से हटाने की मांग अबौद्धिक होने के साथ-साथ वैचारिक असहिष्णुता का भी अत्यन्त निंदनीय उदाहरण है. रोहन मूर्ति ने न सिर्फ़ इस अटपटी मांग को ख़ारिज कर दिया बल्कि लिखकर कारण बताते हुए डॉ पॉलक के संपादन का बचाव भी किया है. विडंबना यह है कि इस मामले में बुद्धिजीवी तो बुद्धिविरोधी आचरण कर रहे हैं और एक उद्योगपति बुद्धि की परंपरा से मेल खाने वाला व्यवहार कर रहा है!
जब समाज में ध्रुवीकरण को तेज़ करने की वृत्तियां सक्रिय हों तो सृजन ओर विचार के समुदाय की ज़िम्मेदारी यही बनती है कि वह इनका प्रतिरोध करे, न कि इन्हें बढ़ावा दे. ऐसी छुटभैया हरकतों से हमारी बुद्धि और विचार दोनों ही लांछित और दूषित होते हैं.
पश्चिमी अमूर्तन से स्वतंत्र, कला का एक भारतीय अमूर्तन भी है
जैसे शास्त्रीय संगीत का वैसे ही अमूर्त कला (एब्सट्रैक्ट आर्ट) का मैं दशकों से निर्लज्ज प्रेमी रहा हूं. मुझे उनमें अर्थरचना और विस्तार की जो संभावनाएं नज़र आती रही हैं वे अन्यत्र या अन्यथा संभव नहीं लगतीं. इसलिए यह बात मुझे बहुत सुखद लगती है कि इधर भारत के दो अमूर्त मूर्धन्यों वासुदेव गायतोंडे और नसरीन मोहमदी के काम ने पश्चिम का ध्यान आकर्षित किया है और वहां के बड़े संग्रहालयों में दोनों की बड़ी प्रदर्शनियां आयोजित हुई हैं. स्पेन के बाद अब अमरीका के न्यूयार्क में हाल ही में नसरीन की एक बड़ी प्रदर्शनी शुरू हुई है.
नसरीन अपने काम में अत्यन्त संयमी और अल्पभाषी हैं. उनमें स्वर्गीय कमलेश का एक पद उधार लेकर कहें, ‘वागर्थ की अल्पता’ है. वे जो बनाती हैं उस पर भारी अर्थ का बोझ नहीं डालतीं. कई बार लगता है कि हमारे आपाधापी और चीज़ों की बहुलता से आक्रान्त समय में नसरीन की कला विपुलता में नहीं अल्पता में अपनी पवित्रता खोजती और अर्जित करती है. यह बहुत कुछ को तजकर-छोड़कर, अपने को लगभग निरस्त्र कर पाया गया कलाध्यात्म है.
जैसा कि होता आया है गायतोंडे और नसरीन दोनों की अन्तरराष्ट्रीय मान्यता बहुत देर से उनके मरणोपरांत आयी है. उसने यह भी स्थापित किया है कि पश्चिमी अमूर्तन से अलग और स्वतंत्र भारतीय अमूर्तन भी है और उसने आधुनिक समय में उल्लेखनीय और बेहद उजली उपलब्धि अर्जित की है. इस तरह के अन्तरराष्ट्रीय प्रक्षेपण से एक सबक यह भी सीखा जा सकता है कि इस समय हो रही भारतीय अमूर्त कला की उपेक्षा उचित और तर्कसंगत नहीं है और उस पर भी आलोचकों, संग्राहकों और कलावीथिकाओं को ध्यान देना चाहिये.
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