विजय माल्या के देश छोड़ने के बाद उनके कारोबार, संपत्ति, उनके भारी-भरकम कर्जे और निजी जिंदगी से जुड़ी छोटी-छोटी बातें सार्वजनिक हो रही हैं. लेकिन इस बीच उनकी ‘राजनीतिक जिंदगी’ जहां हितों का टकराव एक बड़ा मुद्दा था, इसपर काफी कम बात हुई है.

दिवालिया हो चुकी किंगफिशर एयरलाइन के चेयरमैन विजय माल्या 2002 से राज्यसभा के सदस्य हैं. उसी समय से वे नागरिक उड्डयन मंत्रालय की कंसल्टिव कमेटी के सदस्य हैं. एक तरह से यह कमेटी उद्योग मंत्रालय के पूरे कामकाज पर नजर रखती है. मंत्रालय द्वारा बनाए गए विधेयकों की जांच करना और अनुदान के लिए उसकी मांग का मूल्यांकन करना इस कमेटी के कामकाज के दायरे में आता है.

दिवालिया हो चुकी किंगफिशर एयरलाइन के चेयरमैन विजय माल्या 2002 से राज्यसभा के सदस्य हैं. उसी समय से वे नागरिक उड्डयन मंत्रालय की कंसल्टिव कमेटी के भी सदस्य हैं

माल्या इस कमेटी के सदस्य रहे हैं. इस वजह से उनकी पहुंच तमाम महत्वपूर्ण सूचनाओं तक रही होगी यानी उनके पास नीतियों पर असर डालने की क्षमता भी रही होगी. पूर्व ग्रामीण विकासमंत्री जयराम रमेश इसे हितों के टकराव का गंभीर मामला बताते हैं.

यदि हम राज्यसभा के जरिए हितों के टकराव की बात करें तो हाल के सालों में ऐसे कई और उदाहरण सामने आए हैं.

कर्नाटक से चुने गए कुपेंद्र रेड्डी रियल एस्टेट कारोबारी हैं. रियल एस्टेट (रेग्यूलेशन एंड डेवलपमेंट) बिल, 2013 जिस सिलेक्ट कमेटी में भेजा गया था वे उसके सदस्य रहे हैं. भाजपा सांसद श्याम चरण गुप्ता एक बड़े बीड़ी कारोबारी हैं. पिछले साल उन्होंने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि तंबाकू से कैंसर नहीं होता. विवाद इसलिए ज्यादा बढ़ गया था क्योंकि वे उस संसदीय कमेटी के सदस्य थे जिसे सिगरेट और तंबाकू से संबंधित कानूनी प्रावधानों पर अपने सुझाव देने थे. 2009 में कमेटी ऑन पब्लिक अंडरटेकिंग विवादों में आई थी. यह कमेटी सरकारी उपक्रमों से संबंधित कामकाज देखती है. उस समय आरोप लगा था कि इसके तीन सदस्य टी सुब्बारामी रेड्डी (कांग्रेस), लगडापति राजगोपाल (कांग्रेस) और नामा नागेश्वर (तेलुगु देशम पार्टी) ने अपने कारोबारी हित साधने के लिए कमेटी के सदस्य होने का फायदा उठाया है.

ये उदाहरण बताते हैं कि उद्योगपति जब राजनीति में आते हैं तो किस तरह हितों का टकराव होता है और विवाद खड़े होते हैं. हालांकि आम जनता की नजर में माल्या इसके सबसे बड़े प्रतीक हैं.

यदि किसी विधानसभा में दो से ज्यादा ताकतवर पार्टियां हैं तो राज्यसभा सदस्य चुने जाने की प्रक्रिया तोड़ी-मरोड़ी जाने लगती है और यहीं कारोबारियों को मौका मिल जाता है

उद्योगपतियों के लिए राज्यसभा सरकार तक पहुंचने का आसान रास्ता है

तमिलनाडु के पूर्व शिक्षामंत्री थंगम थेनारासु के मुताबिक राजनीति को लेकर कारोबारियों की नजरिया बदल चुका है. थंगम कहते हैं, ‘उदारवादी अर्थव्यवस्था के पहले केंद्र में ऐसे मंत्री होते थे जो उद्योगपतियों के करीबी हुआ करते थे लेकिन उसके बाद खुद उद्योगपतियों ने राज्यसभा के जरिए राजनीति में आना शुरू कर दिया.’

एक पूर्व कांग्रेसी सांसद बताते हैं कि उद्योगपतियों के लिए संसद का विशेष आकर्षण होता है. वे कहते हैं, ‘यहां आप सीधे-सीधे नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं. जब किसी कानून का मसौदा तैयार होता है तो स्टैंडिंग कमेटी उसकी समीक्षा करती है. सरकारी तंत्र उसकी अंगुलियों पर होता है. वह किसी भी नौकरशाह को बुला सकती है. वैसे तो सांसद रहते हुए भी आपकी नौकरशाही में दखल हो जाती है.’

उद्योगपतियों द्वारा राज्यसभा सदस्य बनने को तरजीह देने की कई वजहें हैं : सबसे पहली तो यह कि यहां उनको लोकसभा की तरह चुनाव लड़ने के लिए जमीनी स्तर पर जूझना नहीं पड़ता. नवीन जिंदल को छोड़ दें तो ऐसे उद्योगपति-सांसद ढूंढ़ना मुश्किल है जो चुनाव लड़कर संसद पहुंचता हो.

राज्यसभा के तकरीबन सभी सदस्य राज्य विधानसभाओं में मतदान के जरिए चुने जाते हैं. कुछ सदस्यों को राष्ट्रपति नामित करते हैं. राज्यों मंभ विधायकों की संख्या के आधार पर पार्टियां राज्यसभा के लिए अपने उम्मीदवार नामित करती हैं.

‘राज्यसभा में आप सीधे-सीधे नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं. जब किसी कानून का मसौदा तैयार होता है तो स्टैंडिंग कमेटी उसकी समीक्षा करती है. सरकारी तंत्र उसकी अंगुलियों पर होता है'

यदि किसी विधानसभा में दो से ज्यादा ताकतवर पार्टियां हैं तो राज्यसभा सदस्य चुने जाने की प्रक्रिया तोड़ी-मरोड़ी जाने लगती है.

कांग्रेस के एक पूर्व सांसद बताते हैं कि इन राज्यों में विधायकों का यह आंकड़ा राज्यसभा सीटें बेचने और खरीदने के लिए परिस्थितियां बना देता है. विधानसभा में यदि तीसरी बड़ी पार्टी के पास अपना सदस्य राज्यसभा में भेजने लायक विधायक नहीं हैं तो वह इन विधायकों के जरिए कई तरह के फायदे हासिल करने की कोशिश करती है. चूंकि ऐसी पार्टियों को अमूमन लंबे समय तक सत्ता से दूर रहना पड़ता है और इसके जलते इनके पास फंड की कमी हो जाती है. राज्यसभा चुनाव के समय वे इस कमी को पूरा करने का काम करती हैं.

जयराम रमेश भी इस बात से सहमति जताते हैं, ‘यदि विधानसभा चुनावों में खंडित जनादेश यानी वोट तीन पार्टियों या गुटों में बंटेंगें तो तो यह चलता रहेगा. राजस्थान में हमेशा एक ही पार्टी का दबदबा रहता है. लेकिन कर्नाटक में पिछले 20-30 सालों से कुछ सीटों (राज्यसभा) की बोली लगती आई है. झारखंड भी इसी का उदाहरण है. आंध्र प्रदेश में तो राजनीति और कारोबार के बीच अंतर करना ही मुश्किल हो गया है.’

हमारी सहयोग वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक किसी उद्योगपति को राज्यसभा सीट हासिल करने के लिए 50 से 60 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं. इन परिस्थितियों में उद्योगपतियों के लिए राज्यसभा के जरिए संसद तक पहुंचना ज्यादा सस्ता और आसान रास्ता है. इसमें हारने की आशंकाएं भी कम होती हैं.

पिछले 12 साल में जनता दल (एस) के समर्थन से कुल चार राज्यसभा सदस्य चुने गए हैं – विजय माल्या, एमएएम रामास्वामी, राजीव चंद्रशेखर, डी कुपेंद्र रेड्डी. बेहद दिलचस्प बात है कि ये चारों उद्योगपति हैं

संसद में हितों के टकराव को लेकर कोई आवाज नहीं उठती

राज्यसभा सदस्य बनने वाले कारोबारियों की संख्या बीते सालों में बढ़ी ही है लेकिन ऐसा लगता नहीं कि हमारे नीति-नियंता हितों के टकराव वाले इस मुद्दे पर कुछ खास कर रहे हों.

यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में जनजातीय मामलों के मंत्री रहे किशोर चंद्र देव के मुताबिक सांसदों (या उनकी पार्टियों) को सदन के अध्यक्षों को अपने कार्यक्षेत्र के बारे में जानकारी देनी होती है और उस आधार पर उन्हें समितियों का सदस्य बनाया जाता है.

देव 2009 में एक संसदीय समिति के प्रमुख थे. इस समिति ने पाया था कि लोगों में यह भावना बढ़ती जा रही है कि सांसद समितियों की सदस्यता का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं. इस समिति ने सिफारिश की थी कि सभी सांसदों को संसदीय समिति में नियुक्त होने से पहले घोषणा करनी चाहिए कि उनका कार्यक्षेत्र क्या है. देव कहते हैं, ‘इससे सुनिश्चित किया जा सकता है कि वे उन समितियों में नियुक्त न किए जाएं जिनमें हितों के टकराव वाली स्थिति बने या फिर जब संबंधित उद्योग से जुड़ी चर्चा बैठक में हो तो वे उसमें शामिल न हों.’ हालांकि यह सिफारिश लागू नहीं की गई.

राज्यसभा के मूल उद्देश्य भी प्रभावित हो रहे हैं

संसद का उच्च सदन राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है. इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए राज्यसभा में उन लोगों चुना जाता है जिनकी विधायी कामकाज को मजबूत करने या देशहित में महत्वपूर्ण भूमिका रही हो. लेकिन यदि इस सदन और इसकी समितियों का ढांचा बदलेगा और इनमें कारोबारी ज्यादा प्रभावी होंगे तो यह अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पाएगा. मुद्दा सिर्फ यही नहीं है कि कारोबारी अपने हितों को साधने के लिए इन समितियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, इस वजह से यहां आम और गरीब लोगों की बात सुने जाने की संभावना भी कम हो जाएगी. बदकिस्मती से हमारी राजनीतिक पार्टियों के लिए फिलहाल यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है.

मुद्दा सिर्फ यही नहीं है कि कारोबारी अपने हितों को साधने के लिए इन समितियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, इस वजह से राज्यसभा में आम और गरीब लोगों की बात सुने जाने की संभावना भी कम हो जाएगी

यदि हम माल्या का ही उदाहरण लें तो राज्यसभा में उनका यह दूसरा कार्यकाल है. वे पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल (एस) के समर्थन से राज्यसभा सदस्य बने हैं. इस महीने की शुरुआत में जब माल्या से जुड़ा विवाद चर्चा में था तब देवेगौड़ा ने उनका बचाव भी किया था.

पिछले 12 साल में जनता दल (एस) के समर्थन से कुल चार राज्यसभा सदस्य चुने गए हैं – विजय माल्या, एमएएम रामास्वामी, राजीव चंद्रशेखर, डी कुपेंद्र रेड्डी. बेहद दिलचस्प बात है कि ये चारों उद्योगपति हैं.

पार्टी के वरिष्ठ नेता एमएस नारायणा राव के मुताबिक पार्टी ने इन लोगों का समर्थन इसलिए किया क्योंकि ये पार्टी में शामिल हो गए थे और पार्टी को समर्थन दिया था. राव कहते हैं, ‘यदि कोई कहता है कि हम राज्यसभा सीटें बेच रहे हैं तो यह सही नहीं है... उन्होंने पार्टी की मदद की थी. यदि सांसद और विधायक पार्टी में कुछ योगदान देते हैं तो यह खरीद-फरोख्त नहीं है.’ जनता दल (एस) सिर्फ कारोबारियों को राज्यसभा के लिए क्यों चुनती है? राव इस सवाल का जवाब देते हैं, ‘क्योंकि हमारे पास पर्याप्त सीटें नहीं होतीं. यदि हमारे पास और सीटें होंगी तो हम अन्य मसलों को ध्यान में रखकर राज्यसभा सदस्य चुनेंगे.’

कुपेंद्र रेड्डी इस बात से इनकार करते हैं कि उन्होंने जनता दल (एस) को कोई पैसा दिया था. वहीं राजीव चंद्रशेखर हमारे ईमेल के जवाब में लिखते हैं, ‘पैसे के दम पर राज्यसभा और लोकसभा में कुछ कारोबारी हित साधे जाते हैं.’ राजीव साथ में यह भी जोड़ते हैं कि दूसरे कार्यकाल में वे स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में निर्विरोध चुने गए हैं. हमने विजय माल्या को जो सवाल भेजे थे उनका हमें कोई जवाब नहीं मिला.

(यह हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है)