दुनिया को एक बार फिर चौंकाते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने हिलेरी क्लिंटन को मात दे दी है. रिपब्लिकन पार्टी का यह 70 वर्षीय उम्मीदवार अमेरिका का 45वां और सबसे बुजुर्ग राष्ट्रपति होने जा रहा है. जब डोनाल्ड ट्रंप ने पार्टी की तरफ से उम्मीदवारी की दावेदारी की थी तो बहुतों ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया था. तब ज्यादातर यही मानकर चल रहे थे कि बड़बोले ट्रंप बाकी उम्मीदवारों के मुकाबले कमजोर साबित होंगे. एक के बाद एक विवादित बयान देकर उन्होंने इन आकलनों को वजन ही दिया. लेकिन सबको पछाड़ते हुए वे पार्टी के प्रत्याशी बन गए. उसके बाद भी बहुत से लोग इस संभावना को दूर की कौड़ी मान रहे थे कि वे हिलेरी से जीत पाएंगे. लेकिन आखिर में उन्होंने यह कारनामा भी कर दिखाया.

डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने की संभावना को कुछ समय पहले प्रतिष्ठित पत्रिका द इकॉनॉमिस्ट ने 10 वैश्विक ‘खतरों’ में शामिल किया था. इसे चीन की मंदी और कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट जैसे खतरों के बीच स्थान मिला था. सूची में आतंकवाद के खतरे के तुरंत बाद ट्रंप के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने की संभावना थी. अब जब अमेरिका ने उन्हें अपना राष्ट्रपति चुन लिया है तो स्वाभाविक ही सवाल उठता है कि दुनिया पर इसका क्या असर होने वाला है.

ट्रंप अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के मसलों में कम से कम हस्तक्षेप की नीति अपना सकते हैं. लेकिन अमेरिका की इस नीति का मतलब होगा कि भारत जैसे देशों को तब कुछ मामलों में आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभानी पड़े

डोनाल्ड ट्रंप अपने भाषणों में जो बातें कहते रहे हैं उनमें से कइयों का लब्बोलुआब यह है कि अमेरिका चीन और यूरोप द्वारा चतुराई से फैलाए गए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के जाल में फंस गया है. उन्होंने यह जताने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है कि अमेरिका के पूर्व के राष्ट्रपतियों द्वारा अपनाई गई ढुलमुल अप्रवासी नीति का शिकार बन चुका है. उनकी टिप्पणियां या कहें कि गुस्से में कही गई बातें अस्पष्ट होती हैं, तथ्यों से उनका वास्ता अक्सर नहीं होता और ये उनके मूड के हिसाब से बदलती रहती हैं.

उदाहरण के लिए इसी मार्च में एक न्यूज चैनल पर जब उनसे पूछा गया कि उनके सलाहकार कौन हैं तो ट्रंप का कहना था, ‘पहली बात तो यह है कि मैं सबकुछ खुद से ही बोलता हूं. मेरा दिमाग बहुत बढ़िया चलता है... मेरा पहला सलाहकार मैं खुद हूं.’ ठीक दो दिन बाद वे वाशिंगटन पोस्ट अखबार के संपादकीय मंडल के साथ बैठे थे जहां उन्होंने विदेश मामलों पर अपने सलाहकारों के बारे में खुलासा कर दिया. ये पांच कम जाने-पहचाने नाम थे जो अभी तक वाशिंगटन के सत्ता प्रतिष्ठानों में कुछ खास हलचल पैदा नहीं कर पाए थे.

इसलिए ऐसी अस्पष्टताओं और विरोधाभासों को देखते हुए यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने का भारत समेत बाकी दुनिया पर क्या असर पड़ने वाला है. हां, कुछ अनुमान जरूर लगाए जा सकते हैं.

दक्षिण चीन सागर मामले पर यदि अमेरिका और चीन के बीच सैन्य तनाव बढ़ता है तो इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों सहित भारत भी अछूता नहीं रहेगा

अमेरिका खुद को अलग-थलग रखने की कोशिश करेगा

वाशिंगटन पोस्ट के साथ बातचीत में ट्रंप का कहना था, ‘मुझे पता है कि एक दुनिया बाहर भी है लेकिन ,आप आखिर यह बात कब कहेंगे कि हमें अपना भी ख्याल रखना है.’ ट्रंप अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के मसलों में कम से कम हस्तक्षेप की नीति अपना सकते हैं. अमेरिका की इस नीति का मतलब होगा कि भारत जैसे देशों को तब कुछ मामलों में आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी.

यदि अमेरिका मध्य-पूर्व एशिया या अफगानिस्तान-पाकिस्तान से पूरी तरह अपने हाथ खींचेगा तो यहां आतंकवाद का असर बढ़ने की आशंका पैदा होगी और भारत इसकी उपेक्षा नहीं कर सकता. हालांकि इसके साथ ट्रंप यह भी कह चुके हैं कि पाकिस्तान के पास परमाणु बम हैं इसलिए अमेरिकी बलों का अफगानिस्तान में रुकना जरूरी है.

अमेरिका और चीन का औपचारिक भाईचारा भी खत्म हो सकता है

इस समय अमेरिका और चीन दक्षिण चीन सागर जैसे कई मसलों पर एक दूसरे को असहज करते रहते हैं. ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते तेजी से बिगड़ सकते हैं. हो सकता है दोनों के बीच व्यापार युद्ध छिड़ जाए. ट्रंप कई बार अपने भाषणों में चीन, जापान, मैक्सिको और यहां तक कि भारत पर भी अमेरिकी रोजगार छीनने का आरोप लगा चुके हैं. वे चीनी माल पर तगड़ा सीमा शुल्क (45 फीसदी तक) लगाना चाहते हैं और चीन के साथ व्यापार की शर्तों पर फिर से बातचीत करना चाहते हैं. इस कदम से अमेरिका की अर्थव्यवस्था और साथ ही वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा. विकासशील देशों में सबसे तेज गति से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था को भी इस चुनौती का सामना करना पड़ेगा.

वहीं दक्षिण चीन सागर मामले पर यदि अमेरिका और चीन के बीच सैन्य तनाव बढ़ता है तो इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देशों सहित भारत भी अछूता नहीं रहेगा.

ट्रिबेका डेवलपर्स भारत में ट्रंप का कारोबार देखते हैं. इस फर्म के मुताबिक ट्रंप और उनके बेटे कारोबार के लिहाज से भारत में काफी संभावनाएं देखते हैं और दूसरे शहरों में भी परियोजनाएं शुरू करना चाहते हैं

अमेरिका के पाकिस्तान से संबंध

पिछले साल ट्रंप ने दक्षिण एशिया की नीति तय करने वाले प्रतिष्ठानों में यह कहकर हलचल मचा दी थी कि परमाणु हथियारों की वजह से पाकिस्तान संभवत: दुनिया का सबसे खतरनाक देश है. ट्रंप का कहना था, ‘यदि पाकिस्तान अस्थिर होता है तो आपको भारत को साथ लेना पड़ेगा. पाकिस्तान पर लगाम रखने का काम भारत कर सकता है. उनके पास भी परमाणु हथियार हैं और काफी ताकतवर सेना है.’

भारत में कुछ लोगों को ये बातें अच्छी लग सकती हैं लेकिन ये बेहद गैरजिम्मेदाराना बयान थे. हालांकि पाकिस्तान को लेकर ट्रंप ने खुलकर जो कहा, ओबामा की राय भी उससे इतर नहीं थी.

एच-1बी वीजा

अति कुशल कामगारों को अमेरिका में रहने के लिए एच-1बी वीजा से जुड़ी ट्रंप की सोच काफी उलझी हुई लगती है. उनके वेबसाइट कहती है कि वे वीजा के खिलाफ हैं लेकिन, ट्रंप भाषणों में कहते हैं, ‘मैं इस मसले पर अपनी स्थिति में थोड़ा लचीलापन ला रहा हूं क्योंकि हमें देश में प्रतिभावान लोगों की जरूरत होगी ही.’.

हो सकता है ट्रंप की सोच में इस लचीलेपन के पीछे भारतीय-अमेरिकी समुदाय का वोटबैंक भी अप्रत्यक्ष रूप से काम कर रहा हो लेकिन, उनकी विदेशनीति के मुख्य सलाहकार सीनेटर जेफ सेजियंस एच-1बी वीजा के सख्त खिलाफ हैं. सीनेट में आव्रजन पर बनी उपसमिति का अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने एच-1बी वीजा कार्यक्रम पर सवाल उठाए थे. यानी ट्रंप के राष्ट्रपति बनने का मतलब है कि भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों की तकलीफ बढ़ सकती है क्योंकि वे ही सबसे ज्यादा एच-1बी वीजा के आवेदन देती हैं.

ट्रिबेका डेवलपर्स भारत में ट्रंप का कारोबार देखते हैं. इस फर्म के मुताबिक ट्रंप और उनके बेटे कारोबार के लिहाज से भारत में काफी संभावनाएं देखते हैं और दूसरे शहरों में भी परियोजनाएं शुरू करना चाहते हैं

भारत में ट्रंप के कारोबार पर कोई असर पड़ेगा?

डोनाल्ड ट्रंप रियल एस्टेट कारोबारी हैं. भारत में उनके दो ‘सुपर लग्जरी’ प्रोजेक्ट चल रहे हैं. इनमें पहला पुणे में पंचशील रियल्टी के साथ और दूसरा मुंबई में लोढ़ा ग्रुप के साथ चल रहा है. ट्रंप अगर राष्ट्रपति नहीं भी बनते तो भी भारत में उनका कारोबार बढ़ने की ही संभावना थी. ट्रिबेका डेवलपर्स भारत में ट्रंप का कारोबार देखते हैं. इस फर्म के मुताबिक ट्रंप और उनके बेटे कारोबार के लिहाज से भारत में काफी संभावनाएं देखते हैं और वे दूसरे शहरों में भी परियोजनाएं शुरू करना चाहते हैं.

अमेरिका में प्रवासी लोगों की स्थिति पर क्या असर हो सकता है?

बहुत से लोग मानते हैं कि अमेरिका में प्रवासियों के विरोध का माहौल अब गहरा सकता है. उनके समर्थकों का एक बड़ा तबका तुलनात्मक रूप से कम पढ़ा-लिखा है, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में कमजोर स्थिति में है और शायद इस वजह से प्रवासियों का कट्टर विरोधी है.

अमेरिका के एक थिंक टैंक ‘रैंड’ के अध्ययन के मुताबिक ट्रंप समर्थकों का मानना है कि प्रवासी, अमेरिकी परंपराओं और मूल्यों के लिए खतरा हैं. लोगों में इस तरह के डर और गैरकानूनी प्रवासियों को वापस उनके देश भेजने के वादों को ट्रंप ने भुनाया भी है. अमेरिका में गैर-श्वेतों के लिए असहिष्णुता बढ़ रही है. इसलिए बहुत से लोग मानते हैं कि ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद गैर अमेरिकी मूल के लोगों और गैर-श्वेतों के व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर हमले बढ़ सकते हैं. ट्रंप की रैलियों में भी इस तरह की हिंसा देखी गई है और यह इस बात का संकेत है कि यह चलन आगे बढ़ सकता है.

हालांकि जीत तय होने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने जो भाषण दिया उसे देखते हुए जरूरी नहीं कि ऐसा हो. देश से एकजुटता की अपील करते हुए ट्रंप का कहना था, 'मैं सभी अमेरिकियों का राष्ट्रपति हूं.'

(यह हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है)