विराट कोहली पर आज पूरा भारत निसार है. ऐसा लग रहा है जैसे उनकी बल्लेबाज़ी की तुलना के लिए प्रतीक और उपमाएं कम पड़ रही हैं. हालांकि इसकी एक वजह लोगों के क्रिकेट ज्ञान की भी कमी है और भाषा ज्ञान की भी.

एक तरह से देखें तो विराट कोहली जैसा विशिष्ट बल्लेबाज ऐसे भारतीय समय में पैदा हुआ है जिसमें औसतपन और छिछलेपन की जगह बढ़ती जा रही है. यहां बम फोड़ कर खुशी जताई जाती है, शराब पीकर ग़म मनाया जाता है, तोड़फोड़ के साथ आंदोलन चलते हैं, जोड़तोड़ से राजनीति चलती है और चीख-चीख कर लगाए गए नारों से देशभक्ति साबित होती है. इसी सतहीपन के बीच क्रिकेट का वह राष्ट्रवाद भी पैदा होता है जो किसी जीत के जश्न को बुख़ार में बदल डालता है.

जो एक बात विराट कोहली को अपने समकालीन और पूर्ववर्ती बल्लेबाज़ों से आगे ले जाती है, वह क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में उनका लगभग एक समान प्रदर्शन है. इसमें कुछ योगदान उनके क्रिकेट-समय का भी है.

ऐसे में विराट की बल्लेबाज़ी की ख़ूबसूरती या महानता का पैमाना बस इतना ही रह जाता है कि उन्होंने कितने मैचों में जीत दिलाई या जीत के अवसरों पर उनका औसत कितना बड़ा है. इस पैमाने का ख़तरा या नुकसान बस इतना है कि असफलता की घड़ी में विराट जैसे बल्लेबाज को उतने ही ताने सुनने पड़ सकते हैं जितने जीत के मौक़ों पर कसीदे. शायद क्रिकेट के असली मुरीदों को वह तस्वीर याद होगी जब 2015 के वर्ल्ड कप में सेमीफ़ाइनल मुक़ाबला हारकर घर लौट रही टीम के साथ मायूसी से चल रहे विराट कोहली को उनकी उन दिनों की मित्र अनुष्का शर्मा सांत्वना और सहानुभूति के साथ हवाई अड्डे से बाहर ला रही थीं. तब कोई कहने वाला नहीं था कि विराट कोहली फिर भी बहुत बड़े बल्लेबाज़ हैं, वे क्रिकेट के नए दौर के सबसे बड़े नायक हैं.

हमारे लिए यह एक मौजूं सवाल हो सकता है कि वह कौन सी चीज़ है जो विराट कोहली को इतना बड़ा बल्लेबाज़ बनाती है. इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने अभी तक के प्रदर्शन के बूते ही वे सुनील गावसकर और सचिन तेंदुलकर के साथ भारत के सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ों की पंक्ति में आ खड़े होते हैं. यही नहीं, उनका खेल देखकर किसी को विवियन रिचर्ड्स के दबदबे की याद आ सकती है और किसी को एबी डीविलियर्स के करिश्मे का जवाब दिख सकता है. सच तो यह है कि जो एक बात विराट कोहली को अपने समकालीन और पूर्ववर्ती बल्लेबाज़ों से आगे ले जाती है, वह क्रिकेट के तीनों प्रारूपों में उनका लगभग एक समान प्रदर्शन है. बेशक, इसमें कुछ योगदान उनके क्रिकेट-समय का भी है.

भारत के पहले लिटिल मास्टर सुनील गावसकर टेस्ट मैचों में सलामी बल्लेबाज़ी के शिखर बनाते रहे, लेकिन वनडे में पीछे रह गए- शायद इसलिए कि उनकी निर्मिति के दिनों में वनडे का चलन नहीं था. सचिन आए तो टेस्ट मैच और वनडे दोनों मोर्चों पर छाए रहे, लेकिन वे टी-20 में वैसी धाक नहीं जमा सके- क्योंकि इसकी पैदाइश भी एक तरह से उनके उत्तरकाल में हुई. दूसरी तरफ़ कई दूसरे बल्लेबाज़ हैं जो सिर्फ वनडे या टी-20 के लिए बने दिखाई पड़ते हैं, क्योंकि टेस्ट मैचों का धीरज शायद उनके ज़माने के पहले की कोई शै है. वे टी-20 में बिल्कुल सांस रोक देने वाले शॉट लगा सकते हैं, लगभग हाराकिरी का हौसला दिखाते हुए वे किसी मैच का नक्शा बदल सकते हैं. लेकिन बल्लेबाज़ी के व्याकरण को जैसे नए सिरे से रचते हुए क्रिकेट का नया शास्त्र नहीं बना सकते.

वे पहाड़ की तरह टिकना भी जानते हैं और नदी की तरह बहना भी. वे किसी पुराने खिलाड़ी से भी होड़ लेते हैं और किसी नए खिलाड़ी को भी टक्कर देते हैं. उनके व्यक्तित्व में जो आक्रामकता दिखती है, उनकी शख्सियत में जो गुस्सा नज़र आता है, वह उनकी बल्लेबाज़ी में नहीं है

ऐसे बल्लेबाजों में रफ़्तार तो है, धीरज नहीं है. सफलता की भूख तो है जिसे वे अपने हुनर से हासिल भी करते हैं, लेकिन वह संयम नहीं है जो निरंतर सफलता का शास्त्र गढ़ सके, क्रिकेट की ऐसी कविता लिख सके जो सबके भीतर उतर सके. क्रीज़ पर देर तक टिकने में उनके घुटने दुख जाते हैं. एक लय में की जा रही गेंदबाज़ी अंततः उन्हें लुभा कर अपने जाल में फंसा लेती है. बाहर जाती गेंदों को चुनने और छोड़ने का कौशल उनके पास नहीं दिखता. यह उनकी कमज़ोरी नहीं है, उनके समय की अधीरता की निशानी हैं. वे इस अधीरता की संतानें हैं, इसी समय में जड़े हुए हैं.

लेकिन विराट कोहली जैसे इस समय का अतिक्रमण करते हैं. ब्रायन लारा ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ विराट कोहली की पारी देखने के बाद कहा कि उनकी टाइमिंग बहुत ही अच्छी है. सच यह है कि सामयिकता की यह अचूक पहचान ही विराट कोहली को बड़ा बनाती है. वे बिल्कुल सही समय पर गेंद पर सही प्रहार करते हैं. वे क्रीज पर टिकना जानते हैं, गेंदों को उचित सम्मान देना जानते हैं. सब्र की अहमियत जानते हैं, पहाड़ की तरह टिकना भी जानते हैं और नदी की तरह बहना भी. वे किसी पुराने खिलाड़ी से भी होड़ लेते हैं और किसी नए खिलाड़ी को भी टक्कर देते हैं. जाहिर है, उनके व्यक्तित्व में जो आक्रामकता दिखती है, उनकी शख्सियत में जो गुस्सा नज़र आता है, वह उनकी बल्लेबाज़ी में नहीं है. जहां विराट सर्वश्रेष्ठ हैं, वहां वे अपने गुस्से को पीछे छोड़ते हैं, अपनी क्षमता पर भरोसा करते हैं और उचित समय पर उचित फ़ैसले करते हैं. वे रघुवीर सहाय की उस त्रासद पंक्ति का प्रतिसिद्धांत रचते हैं जिसमें कवि कहता है - क्रोध होगा विरोध नहीं. हमारे समय में क्रोध ही क्रोध है, विरोध नहीं है. लेकिन विराट कोहली की बल्लेबाज़ी देखिए तो उसमें क्रोध नहीं विरोध दिखता है. ऐसा प्रतिरोध जो किसी लक्ष्य तक पहुंचने में भरोसा रखता है. उनमें एक गहराई है जो लगातार हमारे समय में दुर्लभ होती जा रही है. हालत यह है कि हमारे भीतर इस दुर्लभता की पहचान तक नहीं बची है.

विराट कोहली ने ऐसे पढ़े-लिखों पर जितनी सख्ती से लानत भेजी है, उससे विराट के युवा बड़प्पन की एक और पहचान होती है. अनुष्का के बचाव में उनका एक ट्वीट उन्हें उनकी कई यादगार पारियों से भी बड़ा बनाता है

अगर बची होती तो ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ विराट कोहली की करिश्माई पारी का जश्न मनाते हुए हम अनुष्का शर्मा पर कीचड़ नहीं उछाल रहे होते. दरअसल यह अनुष्का पर छींटाकशी नहीं थी, बल्कि विराट की बल्लेबाज़ी का अपमान थी. इस घटना ने फिर याद दिलाया कि हमारा क्रिकेट प्रेम हमारे रुग्ण राष्ट्रवाद की कोख से निकला है और हमारे आहत मर्दवाद को राहत देता है.

विराट कोहली ने ऐसे पढ़े-लिखों पर जितनी सख्ती से लानत भेजी है, उससे विराट के युवा बड़प्पन की एक और पहचान होती है. अनुष्का के बचाव में उनका एक ट्वीट उन्हें उनकी कई यादगार पारियों से भी बड़ा बनाता है. क्योंकि इसमें उस नकली-खोखले भारत को आईना दिखाने का साहस है जो चेहरे पर तिरंगा पोत कर स्टेडियम में नारे लगाता है और फिर सोशल मीडिया के सात पर्दों के पीछे छुप कर किसी लड़की पर फब्ती कसता है. इस एक ट्वीट से विराट कोहली उन तमाम क्रिकेट प्रेमियों की निगाह में कुछ और ऊंचे हो गए हैं जिन्हें नए दौर का क्रिकेट प्रेम भी तमाशा लगता है और देशप्रेम भी.