नार्सिसिज्म या आत्ममुग्धता इंसानों की एक ऐसी प्रवृत्ति है जिसपर सदियों से बहस चल रही है. हालांकि अब समाज विज्ञानियों ने निष्कर्ष निकाला है कि यह प्रवृत्ति दरअसल आधुनिक ‘महामारी’ में तब्दील हो सकती है. अब सवाल है कि आज के दौर में यह स्थिति कैसे बनी और क्या इससे बचा जाए?

नार्सिसिज्म का इतिहास

नार्सिसिज्म शब्द की उत्पत्ति तकरीबन 2000 साल पुरानी है. उस समय ग्रीस के साहित्यकार ओविड ने अपनी रचना लीजेंड ऑफ नार्सिसस में एक खूबसूरत शिकारी की कहानी लिखी थी जो एक दिन पानी के सोते में अपना प्रतिबिंब देख लेता है और उसके प्यार में पड़ जाता है. यह शिकारी अपनी ही खूबसूरत छवि से इस कदर मुग्ध हो जाता है कि सोते का किनारा नहीं छोड़ पाता और आखिर में यहीं अपनी जान दे देता है. इस जगह पर एक फूल खिलता है जिसे नार्सिसस कहा जाता है. इसी से ‘नार्सिसिज्म’ शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है.

नार्सिसिज्म के सिद्धांत को मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड ने लोकप्रियता दिलाई थी. ‘ईगो’ और बाहरी दुनिया से उसके संबंध की व्याख्या के जरिए फ्रायड ने नार्सिसिज्म के सिद्धांत को समझाया था. यह व्याख्या नार्सिसिज्म से संबंधित दूसरे सिद्धांतों के विकास की बुनियाद कही जा सकती है.

नार्सिसिज्म कब एक समस्या बन जाता है?

नार्सिसिज्म के कई स्तर हैं जहां यह स्वास्थ्यप्रद होने के साथ-साथ भयंकर बीमारी भी हो सकता है. स्वास्थ्यप्रद नार्सिसिज्म आम इंसानी जीवन में पाया जाता है. लोगों का खुद से प्यार करना, वास्तविक उपलब्धियों के दम पर उनमें आत्मविश्वास आना, किसी तरह के दुख से उबरने की क्षमता और सामाजिक संबंधों से खुद को ताकतवर समझने की भावना स्वास्थ्यप्रद नार्सिसिज्म के अंतर्गत आते हैं.

नार्सिसिज्म उस समय दिक्कत बन जाता है जब लोग आत्मकेंद्रित होने लगते हैं. दूसरों की भावनाओं के प्रति असंवेदनशील होते हुए अपनी ज्यादा से ज्यादा तारीफ और स्वीकार्यता इसी तरह के नार्सिसिज्म का लक्षण है. यदि किसी नार्सिसिस्ट व्यक्ति पर लोग उसके हिसाब से ध्यान नहीं देते तो वो ड्रग्स का शिकार बन सकता है. उसे गंभीर किस्म का अवसाद हो सकता है.

नार्सिसिस्ट लोग दुनिया के सामने अपनी भव्य छवि पेश करते हैं या अतिआत्मविश्वास दिखाते हैं. हालांकि इसके जरिए वे अपने असुरक्षाबोध या कमजोर आत्मविश्वास को छिपाने की कोशिश ही कर रहे होते हैं. हल्की सी आलोचना से भी वे बिखर जाते हैं. इन प्रवृत्तियों की वजह से नार्सिसिस्ट लोगों के सामाजिक संबंध बस उन्हीं से रह जाते हैं जो उनपर ध्यान देने की जरूरत को पूरा कर सकें. जब ये प्रवृत्तियां एक सीमा से ज्यादा बढ़ जाती हैं तो माना जाता है कि वह व्यक्ति नार्सिस्टिक पर्सनेलिटी डिसऑर्डर की चपेट में आ गया है.

युवा और खासकर पुरुषों के इस बीमारी के चपेट में आने की संभावना सबसे ज्यादा होती है. नार्सिस्टिक पर्सनेलिटी डिसऑर्डर का क्या कारण है इसका ठीक-ठीक पता अभी-भी नहीं है. माना जाता है कि बचपन में किसी तरह के शोषण या उपेक्षा के चलते लोगों में यह बीमारी घर कर सकती है.

नार्सिस्टिक पर्सनेलिटी डिसऑर्डर किस वजह से महामारी बन रहा है?

समाज विज्ञानियों का मानना है कि औद्योगीकरण के बाद विकसित हुए समाज में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं. बीते दशकों में समाज लगातार सामुदायिकता से व्यक्तिवाद की तरफ बढ़ा है. और इसके कारण नार्सिसिज्म ‘आधुनिक महामारी’ बन रहा है.

इन सामाजिक बदलावों ने लोगों में यह भावना भर दी है कि खुद को तवज्जो देना सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण है. बच्चों में आत्मविश्वास भरने के लिए उनके शिक्षक और अभिभावक हमेशा यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे कितने खास और सबसे अलग हैं. बच्चों के अपने दम पर कड़ी मेहनत से उपलब्धियां हासिल करने और उसके बूते आत्मविश्वास हासिल करने के पहले ही अभिभावक उनमें जबर्दस्ती आत्मविश्वास भरने की कोशिश करने लगे हैं.

समाज में व्यक्तिवाद के बढ़ने और उसके आधुनिक होने की प्रक्रिया में किसी व्यक्ति को अपने समाज या समुदाय से वैसा सहारा नहीं मिल पाता जैसा पहले मिला करता था. जबकि शोध बताते हैं कि सामाजिक संबंधों या अपने समुदाय या दोस्तों से जुड़ा रहना स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है. वहीं दूसरी तरफ समाज के आधुनिक होने की प्रक्रिया के दौरान सामाजिक प्रतिष्ठा, धन-दौलत और सेलिब्रिटी स्टेटस को सब बातों से ऊपर दर्जा दिया जाने लगा है.

इंटरनेट के विकास और खासकर सोशल नेटवर्किंग साइटों की लोकप्रियता हमारे सामाजिक व्यवहार पर बड़ा असर डाल रही है. इनकी वजह से हमारे संवाद के तौर-तरीके बदले हैं. फुरसत का समय हम इनपर बिताने लगे हैं. आज पूरी दुनिया में तकरीबन 94 करोड़ लोग फेसबुक के यूजर हैं. हाल ही में हुए कुछ अध्ययन बताते हैं कि फेसबुक की लत का आत्मविश्वास में कमी और नार्सिसिज्म से गहरा संबंध है.

नार्सिसिज्म से बचने का तरीका क्या है?

नार्सिसिज्म पर्सनेलिटी डिसऑर्डर का इलाज मुमकिन है. इसमें दवाओं के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक उपचार भी शामिल है. ध्यान की प्रक्रियाएं भी मानसिक स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए कारगर साबित होती हैं.

इसके अलावा हमें यह भी समझने की जरूरत है कि आत्ममुग्धता के लिए हम जो चीजें चाहते हैं क्या वे वास्तव में हमारी खुशी के लिए जरूरी हैं. हॉवर्ड के मनोवैज्ञानिकों द्वारा 75 साल तक किए गए एक शोध के मुताबिक खुशी पैसे और प्रतिष्ठा से नहीं आती बल्कि इसकी बुनियाद में वे सामाजिक संबंध होते हैं जो आपका सहारा हैं. यही वो सूत्र है जो हमारी सभ्यता को नार्सिसिज्म की महामारी से बचा सकता है.

(यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज में पीएचडी कर रहीं ओलिविया रिमेस का यह आलेख यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ था)