पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख जाट नेता के तौर पर शुमार किए जाने वाले अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल के जनता दल यूनाइटेड में विलय की संभावनाओं के बीच अब खबर यह आ रही है कि दो और छोटी पार्टियों का विलय जेडीयू में हो सकता है. नीतीश कुमार और शरद यादव की अगुवाई वाली जेडीयू में जिन दो और पार्टियों के विलय की कोशिश चल रही है, वे हैं - झारखंड विकास मोर्चा (प्रजांतांत्रिक) और समाजवादी जनता पार्टी.

झारखंड विकास मोर्चा यानी जेवीएक के सर्वेसर्वा झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी हैं. मरांडी पहले भारतीय जनता पार्टी में थे. भाजपा की ओर से ही वे प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे. लेकिन बाद में जब वे भाजपा में हाशिये पर जाने लगे तो उन्होंने अपनी अलग पार्टी जेवीएम का गठन किया. अपने गठन से लेकर अब तक जेवीएम ने तकरीबन हर चुनावों में अपनी छाप छोड़ी है. हर बार लगता है कि जेवीएम प्रदेश में एक वैकल्पिक क्षेत्रीय पार्टी बनने की राह पर है. लेकिन मरांडी और उनकी पार्टी की त्रासदी यह है कि अक्सर जेवीएम की टिकट पर जीतकर आए जनप्रतिनिधि दल-बदल करके दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं. 2014 के विधानसभा चुनावों के बाद भी यही हुआ.

नीतीश कुमार के प्रमुख रणनीतिकार प्रशांत किशोर को यह लगता है कि जेडीयू अपने बूते अगर झारखंड में पैर जमाना चाहे तो यह बहुत मुश्किल है. लेकिन मरांडी को अपने साथ लाकर यह काम थोड़ा आसान हो सकता है.

झारखंड की राजनीति को समझने वाले लोग बताते हैं कि मरांडी की पार्टी जिस तरह से चुनावों के बाद बिखरती है, उससे अब लोगों में मरांडी के प्रति विश्वास कम होने लगा है. मरांडी की साफ-सुथरी छवि के प्रति व्यक्तिगत भरोसा तो अब भी उनमें है लेकिन साथ ही यह संदेश भी जा रहा है कि ऐसी पार्टी को वोट देने का क्या फायदा जिसके विधायक चुनावों के बाद दूसरे दल में चले जाने हैं. यही स्थिति मरांडी को जेडीयू के करीब ला रही है. मरांडी का फायदा यह है कि उनके पास जेवीएम के मुकाबले एक बड़ा सांगठनिक ढांचा होगा और फिर उनकी पार्टी के नुमाइंदों को छिन्न-भिन्न करना आसाना नहीं होगा. वहीं नीतीश कुमार के प्रमुख रणनीतिकार प्रशांत किशोर को यह लगता है कि जेडीयू अपने बूते अगर झारखंड में पैर जमाना चाहे तो यह बहुत मुश्किल है. लेकिन मरांडी को अपने साथ लाकर यह काम थोड़ा आसान हो सकता है.

समाजवादी जनता पार्टी (एसजेपी) की स्थापना पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने की थी. जब तक उनका जीवन रहा तब तक इस पार्टी का सीमित दायरे में ही सही उत्तर प्रदेश की राजनीति में थोड़ा दखल था. एक जमाने में मुलायम सिंह यादव भी इसी पार्टी में होते थे. बाद में मुलायम सिंह ने इसे छोड़कर समाजवादी पार्टी बनाई. चंद्रशेखर के निधन के बाद उनके बेटे नीरज शेखर ने भी अपने पिता की बनाई पार्टी से नाता तोड़ लिया और समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. अभी इस पार्टी को कमल मोरारका चलाते हैं. सियासी तौर पर देखें तो सजपा का उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी न के बराबर दखल है. लेकिन ऐसा लगता है कि प्रशांत किशोर जिस तरह से नीतीश कुमार का विस्तार बिहार से बाहर करना चाहते हैं, इसके लिए माहौल बनाने में उन्हें छोटी से छोटी पार्टी की एक भूमिका दिखती है.

जेडीयू की शुरुआती कोशिश तो यही थी कि इन सबका विलय जेडीयू में हो लेकिन जानकार यह भी बता रहे हैं कि अगर दूसरे दलों ने नई पार्टी बनाने की शर्त रखी तो उसमें भी जेडीयू को कोई दिक्कत नहीं होगी.

किन शर्तों पर इन पार्टियों का विलय जेडीयू में होगा, इसको लेकर बातचीत का दौर चल रहा है. मरांडी से सीधे नीतीश कुमार बात कर रहे हैं. वहीं कमल मोरारका से विस्तृत बातचीत का जिम्मा जेडीयू ने पार्टी महासचिव और राज्यसभा सांसद केसी त्यागी पर सौंपा है. बताया जा रहा है कि मोरारका और त्यागी के बीच कई दौर की बातचीत हुई है. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस बारे में कोई पक्की घोषणा हो सकती है.

हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि आरएलडी, जेवीएम और सजपा का विलय जेडीयू में होगा या फिर इस विलय के बाद कोई नई पार्टी बनेगी. जेडीयू की शुरुआती कोशिश तो यही थी कि इन सबका विलय जेडीयू में हो लेकिन जानकार यह भी बता रहे हैं कि अगर दूसरे दलों ने नई पार्टी बनाने की शर्त रखी तो उसमें भी जेडीयू को कोई दिक्कत नहीं होगी. अभी इस बारे में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है. सूत्रों की मानें तो सहमति इस बात पर बनती दिख रही है कि इन दलों के विलय से एक नई पार्टी बने.