कोई साल भर पहले की बात है. जर्मनी के म्युनिक से प्रकाशित होने वाले अखबार 'ज़्युइडडोएचे त्साइटुंग' को एक अजीब-सा संदेश मिला. संदेश में उसे बिना एक कौड़ी लिए ढेर सारे सनसनीखेज गोपनीय दस्तावेज देने की पेशकश की गई थी. अखबार को शक हुआ कि यूं ही कोई ढेर सारे सनसनीख़ेज़ दस्तावेज छापने के लिए क्यों देगा? तब भी पेशक़श इतनी चटपटी थी कि जर्मन दैनिक उसे ठुकरा नहीं सका.

दस्तावेज़ असली हैं या नकली और उनमें कितना दम है, इसकी छानबीन अकेले करने के बजाय म्युनिक के इस अखबार ने दूसरा तरीका निकाला. उसने जर्मनी के सार्वजनिक रेडियो-टेलीविज़न प्रसारकों 'एनडीआर' (नॉर्थ जर्मन रेडियो) और 'डब्ल्यूडीआर' (वेस्ट जर्मन रेडियो) के अलावा विश्व के कुछ दूसरे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ मिलकर काम करने का निश्चय किया. इसके बाद दुनिया भर के कोई 400 चुने हुए पत्रकार काम में जुट गए.

अखबार को शक हुआ कि यूं ही कोई ढेर सारे सनसनीख़ेज़ दस्तावेज छापने के लिए क्यों देगा? तब भी पेशक़श इतनी चटपटी थी कि जर्मन दैनिक उसे ठुकरा नहीं सका.

यह काम आसान नहीं था. कुल डाटा 2.6 टेराबाइट के बराबर था. इन पत्रकारों को ईमेलों, पत्रों, प्रमाणपत्रों, क़ानूनी दस्तावेज़ों, सनदों इत्यादि के रूप में मौजूद करीब एक करोड़ 15 लाख दस्तावेज़ों की सत्यता की छानबीन करनी थी. साथ ही उनसे जुड़े व्यक्तियों से संपर्क कर यथासंभव उनसे स्पष्टीकरण मांगना था. चार अप्रैल से विश्व भर में 108 पत्र-पत्रिकाओं और अन्य समाचार माध्यमों द्वारा इन दस्तावेजों और उनसे निकले निष्कर्षों का प्रकाशन शुरू हो गया है.

'पनामा पेपर्स'

'पनामा पेपर्स' नाम से चर्चित हो चुके इन दस्तावेज़ों का संबंध मुख्य रूप से मध्य अमेरिकी देश पनामा और ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स में दर्ज ऐसी 2,14,000 तथाकथित 'लेटरबॉक्स' (पत्रपेटी) फ़र्मों से है, जो कोई सच्ची फ़र्में नहीं होतीं. वे किसी व्यक्ति की असली पहचान और ग़लत आय को छिपाने के उद्देश्य से किसी दूसरे देश में बना ऐसा मुखौटा होती हैं जिसका पत्र व्यवहार के लिए उस देश में एक पता और बैंक-खाता होता है.

यूरोप के द्वीप-देश आइसलैंड के वर्तमान प्रधानमंत्री सीगमुंदुर गुनलाउग्ससोन अपनी पत्नी के साथ मिल कर 2009 तक एक फ़र्जी लेटरबॉक्स कंपनी चला रहे थे. उनकी पत्नी ने दावा किया कि फ़र्म वास्तव में केवल उन्हीं के नाम थी, बैंक ने ग़लती से उनके पति का नाम भी जोड़ दिया.

छोटे-मोटे देशों में स्थित इन फ़र्मों के माध्यम से टैक्स की चोरी करने वाले, भ्रष्टाचार की आय को छिपाने वाले, मादक द्रव्यों या हथियारों की तस्करी में लिप्त या इसी प्रकार के दूसरे ग़लत धंधों की काली कमाई के मालिक अपने काले (अवैध) धन को छिपाने या उसे सफ़ेद (वैध) बनाने का गोरखधंधा करते हैं. इन फर्मों को शेल कंपनियां भी कहा जाता है. लीक हुए दस्तावेज़ों से दुनिया भर के ऐसे क़रीब 140 बड़े-बड़े नेताओं, सरकारी अधिकारियों, मैनेजरों, खिलाड़ियों इत्यादि की कलई खुल गई है.

आइसलैंड में जनविद्रोह जैसी स्थिति

पनामा पेपर्स लीक की पहली बड़ी गाज यूरोप के द्वीप-देश आइसलैंड की सरकार पर गिरी है. वहां के प्रधानमंत्री सीगमुंदुर गुनलाउग्ससोन ने इस्तीफा दे दिया है और राष्ट्रपति से संसद भंग करने की सिफारिश की है. राष्ट्रपति का कहना है कि वे विपक्षी दलों के साथ सलाह-मशविरे के बाद ही कोई फैसला करेंगे. इस घटनाक्रम से भारत के लिए भी असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है क्योंकि आइसलैंड के विदेश मंत्री गनर ब्रैगी स्वाइसन इन दिनों भारत दौरे पर हैं.

आइसलैंड के प्रधानमंत्री सीगमुंदुर गुनलाउग्ससोन
आइसलैंड के प्रधानमंत्री सीगमुंदुर गुनलाउग्ससोन

गुनलाउग्ससोन अपनी पत्नी के साथ मिल कर 2009 तक एक फ़र्जी लेटरबॉक्स कंपनी चला रहे थे. इस बीच उसे सिर्फ उनकी पत्नी के नाम कर दिया गया है. पनामा पेपर्स लीक के बाद उनकी पत्नी ने दावा किया कि फ़र्म वास्तव में केवल उन्हीं के नाम थी, बैंक ने ग़लती से उनके पति का नाम भी जोड़ दिया. यह दिखावटी कंपनी मुख्य रूप से लाखों डॉलर की बैंक-प्रतिभूतियों की देखरेख करने और उनसे होने वाली आय को छिपाने का काम कर रही है. यह भी पता चला कि प्रधानमंत्री ही नहीं, आइसलैंड के गृहमंत्री और वित्तमंत्री भी समुद्रपार के देशों में ऐसी फर्में खोल कर केवल तीन लाख की जनसंख्या वाले अपने नन्हे-से द्वीप-देश को चूना लगा रहे हैं.

'सन 2000 में जब पहली बार ऐसे आरोप लगे थे, तब परिवार के एक सदस्य ने उन्हें सरासर ग़लत बताते हुए कहा था कि यह तो बहुत ही धार्मिक परिवार है.'

'पनामा पेपर्स' का प्रकाशन होते ही आसलैंड में जनविद्रोह जैसी स्थिति पैदा हो गई. राजधानी राइक्याविक में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर कर प्रधानमंत्री और उनके भ्रष्ट मंत्रियों के त्यागपत्र की मांग करने लगे. भ्रष्टाचार और बढ़ती बेरोजगारी के मुद्दे को लेकर वहां पहले से ही सरकार और जनता के बीच टकराव की स्थिति थी. बीते साल मई में भी सरकार के इस्तीफे की मांग करते हुए हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए थे. इस नए प्रकरण ने आग में घी डालने वाला काम कर दिया. बढ़ते जनदबाव के बीच गुनलाउग्ससोन को इस्तीफा देना पड़ा.

नवाज़ शरीफ़ जैसे 12 शीर्ष नेताओं के भी नाम

इन दस्तावेज़ों में पत्रकारों को 12 ऐसे शीर्ष नेताओं के नाम मिले जो अपने देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री हैं या रहे हैं. उदाहरण के लिए, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का नाम उनकी बेटी मरियम सफ़दर और दो बेटों हसन और हुसैन शरीफ़ के बहाने से मिलता है.

दस्तावेज़ों की छानबीन कर चुके पत्रकारों ने शरीफ़-परिवार के बारे में अपनी टिप्पणी में लिखा है-'पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के चार में से तीन बच्चों सहित उनका परिवार हमेशा विवादों से घिरा रहा है. इस्पात, शक्कर और कागज़ की मिलों वाले कारोबार के जाल और विदेशों में उनकी लंबी-चौड़ी ज़मीन-जायदाद के कारण उनकी अमीरी हमेशा चर्चा में रही है. पाकिस्तान में कब कौन सी पार्टी सत्ता में रही है, इसे देखते हुए पाकिस्तान के इस एक सबसे अमीर परिवार पर अवैध संपत्ति जुटाने, कर-प्रवंचन और धनशोधन के आरोप लगते रहे हैं…कभी सऊदी अरब में निर्वासित कर दिया गया, तो कभी सभी आरोपों बरी भी कर दिया गया. सन 2000 में जब पहली बार ऐसे आरोप लगे थे, तब परिवार के एक सदस्य ने उन्हें सरासर ग़लत बताते हुए कहा था कि यह तो बहुत ही धार्मिक परिवार है.'

चॉकलेट के कारोबारी पोरोशेंको डॉलर-अरबपति हैं. देश में आर्थिक सुधारों का दावा करते हैं. जनता से देशप्रेम की मांग करते हैं. और खुद? खुद समुद्रपार लेटरबॉक्स फ़र्म बना कर काला धन देश की पहुंच से परे पहुंचा रहे हैं.

'हसन 16 साल पहले लंदन चले गए और हुसैन देश से बाहर रह कर (शरीफ़) परिवार का कारोबार चला रहे हैं. मरियम के बारे में कहा जाता है कि उन्हें अपने पिता की पार्टी का नेतृत्व संभालने के लिए तैयार किया जा रहा है.' मरियम और उनके दोनों भाइयों ने पत्रकारों द्वारा संपर्क करने पर कुछ भी कहने से मना कर दिया.

यूक्रेन के धनकुबेर-राष्ट्रपति पेत्रो पोरोशेंको का भी नाम इन दस्तावेज़ों में है. यूरोपीय संघ में शामिल होने की तलब में रूस से नाहक दुश्मनी मोल लेकर उनका देश विभाजन और गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा है. चॉकलेट के कारोबारी पोरोशेंको डॉलर-अरबपति हैं. देश में आर्थिक सुधारों का दावा करते हैं. जनता से देशप्रेम की मांग करते हैं. त्याग और बलिदान का उपदेश देते हैं और खुद? खुद समुद्रपार लेटरबॉक्स फ़र्म बना कर काला धन देश की पहुंच से परे पहुंचा रहे हैं.

दस्तावेज़ों से पता चलता है कि अर्जेंटीना के राष्ट्रपति , वहां के सबसे नामी फुटबॉल खिलाड़ी लिओनेल मेसी, अज़रबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीयेव, सऊदी अरब के शाह, यूक्रेन के पूर्व प्रधानमंत्री पाव्लो लाज़ारेंको और कई अरब-इस्लामी देशों के मंत्रियों व उच्च अधिकारियों ने भी फ़र्जी फ़र्में बना कर पनामा या उस जैसे दूसरे देशों में काला धन छिपा रखा है. चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सहित वहां के कई नेताओं का नाम भी इस प्रकरण से जुड़ रहा है. कहा जा रहा है कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कई विश्वासपात्रों के नाम भी इन दस्तावेज़ों में हैं.

'ऑफ़शोर' कंपनियां खोलना और चलाना या बैंक खाते रखना अवैध नहीं है. यह काम अवैध तब हो जाता है, जब उसकी आड़ लेकर छिपाया जाने लगता है कि कंपनी या खाते का असली मालिक कौन है और उन्हें किस काम के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

उनमें से एक हैं सेर्गेई रोल्दूगिन, जो पुतिन की पुत्री के बपतिस्मे के समय उसके रस्मी संरक्षक रहे हैं. रोल्दूगिन ने संभवतः कई बनावटी फ़र्मों का जाल बुन रखा था, जिसकी सहायता से उन्होंने कुछ ही वर्षों के भीतर दो अरब डॉलर की रकम इधर-उधर घुमाई-फिराई. यह बात सही हो सकती है, पर कई मानते हैं कि सिर्फ इसके आधार पर यह मान लेना उचित नहीं होगा कि ऐसा राष्ट्रपति पुतिन की मिलीभगत से ही हुआ हो. लेटरबॉक्स फ़र्में चलाने वाले अपना काम पूरी गोपनीयता के साथ और केवल अपने लाभ के लिए करते हैं न कि किसी बाहरी व्यक्ति के साथ साझेदारी में. जर्मनी की सीमेंस कंपनी के डेढ़ दर्जन मैनेजरों और 15 बड़े बैंकों या उनकी शाखाओं इत्यादि के अधिकारियों के भी नाम मिले हैं. हो सकता उन में से कोई जर्मनी की चांसलर या किसी मंत्री का सुपरिचित भी हो. लेकिन यह कोई जरूरी नहीं कि उसने चांसलर या मंत्री के साथ मिलीभगत कर रखी हो.

अखिल यूरोपीय पुलिस एजेंसी 'यूरोपोल' के वित्तीय अपराध जांच विभाग के प्रमुख इगोर अंजेलेनी के अनुसार किसी दूसरे देश में तथाकथित 'ऑफ़शोर' (अपतटीय) कंपनियां खोलना और चलाना या बैंक खाते रखना अवैध नहीं है. यह काम अवैध तब हो जाता है, जब उसकी आड़ लेकर छिपाया जाने लगता है कि कंपनी या खाते का असली मालिक कौन है और उन्हें किस काम के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

ऑफशोर कंपनियां अवैध नहीं

ऐसी कंपनियां और बैंक-खाते होना क्योंकि अवैध नहीं है, इसलिए ऐसे बैंकों व एजेंसियों की भी कमी नहीं है, जो इस काम में परामर्श देने और कागज़ी औपचारिकताएं पूरी करने का धंधा करती हैं. पनामा की 'मोसाक फोंसेका चांसलरी' क़ानूनी सहायता देने वाली एक ऐसी ही एजेंसी है. 'पनामा पेपर्स' वाले दस्तावेज़ उसी के डेटाबैंक से उड़ा कर लीक किये गए हैं. लीक करने वाला व्यक्ति अभी तक अज्ञात है. उसने जर्मनी और एक जर्मन अख़बार को ही क्यों चुना, यह भी एक रहस्य ही है.

मोसाक फोंसेका ऑफशोर कंपनियों की स्थापना और उन्हें चलाने में मदद देने के अतिरिक्त बौद्धिक संपत्ति के संरक्षण और विदेशी सरकारी निविदाओं (टेंडरों) के लिए आवेदन में परामर्श देने जैसे और भी कई काम करती है.

'मोसाक फोंसेका चांसलरी' के पास 500 कर्मचारी हैं, जो पूरी दुनिया में फैले हुए हैं. उसके कार्यालय पनामा के अलावा बेलीज़, कोस्टा रीका, ब्रिटेन, नीदरलैंड (हॉलैंड), माल्टा, हांगकांग, सीशेल, साइप्रस, बहामा, अंगुइला, समोआ और अमेरिका के नेवादा तथा वायोमिंग राज्यों में स्थित हैं. यह एजेंसी ऑफशोर कंपनियों की स्थापना और उन्हें चलाने में मदद देने के अतिरिक्त बौद्धिक संपत्ति के संरक्षण और विदेशी सरकारी निविदाओं (टेंडरों) के लिए आवेदन में परामर्श देने जैसे और भी कई काम करती है.

एक जर्मनवंशी की चांसलरी

मोसाक फोंसेका चांसलरी की स्थापना 1977 में एक जर्मनवंशी वकील युर्गन मोसाक ने की थी. युर्गन का परिवार उनके बाल्यकाल में ही पनामा में बस गया था. 1986 में उन्होंने पनामा के ही रामोन फोंसेका के साथ साझेदारी कर ली. तब से एजेंसी के नाम में दोनों मालिकों के पारिवारिक नाम जुड़ गए हैं. रामोन फोंसेका भी एक वकील हैं, जो कुछ समय पहले तक पनामा के राष्ट्रपति के भी सलाहकार थे.

'मोसाक फोंसेका चांसलरी' के डेटाबैंक से उड़ाए गए दस्तावेजों ने इस समय संसार के 140 देशों के सैकड़ों बड़े पदाधिकारियों और हज़ारों-लाखों अन्य लोगों की नींद हराम कर ही रखी है. इस लीक ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि करचोरी और कालेधन की सीनाजोरी में दुनिया भर में सबसे अधिक वे लोग लिप्त हैं जो क़ानून बनाते हैं, सरकारें चलाते हैं, जनता को सच्चाई, ईमानदारी और देशभक्ति का उपदेश देते हैं, जबकि खुद देश को बेशर्मी से लूट रहे होते हैं.