यह एक उचित मान्यता और अपेक्षा है कि हम दंगों और दंगाइयों में भेदभाव न करें और हर तरह की हिंसा की एक सांस में निंदा करें. अगर कश्मीरी नौजवानों के मारे जाने का सवाल उठाते हैं तो कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को भी याद करें और अगर नक्सलियों के मारे जाने का शोक मनाते हैं तो सीआरपीएफ के जवानों के मारे जाने पर भी अफ़सोस करें. इसी तर्क से हमें 1984 की सिख विरोधी हिंसा और 2002 में गुजरात में हुए दंगों को भी एक मानना चाहिए और उसकी आलोचना करनी चाहिए.

लेकिन जो लोग इतनी सात्विकता के साथ सारी हिंसा को एक आंख से देखने की वकालत करते हैं, वे भूल जाते हैं कि हिंसा के कई रूपों को हम न सिर्फ़ स्वीकृति देते हैं, बल्कि उनको सम्मानित भी करते हैं. हमारे समाज में कई हिंसाओं का उत्सव मनाया जाता है और शायद यह सारे समाजों का सच है. हम युद्धों की जिन वीरगाथाओं को गर्व के साथ याद करते हैं, वे असल में हिंसा के सबसे वीभत्स उदाहरण हो सकते हैं. हो सकता है, जब हम अपने किसी सिपाही की शहादत का शोक मना रहे हों, ठीक उसी वक्त पाकिस्तान अपने किसी जवान को इस बात के लिए कोई मेडल दे रहा हो कि उसने सीमा पार किसी को मारा है. इसी तरह संभव है कि जिस समय हमारे यहां के किसी अफ़सर को कोई मेडल मिल रहा हो, उस समय में पाकिस्तान की कोई बच्ची स्कूल जाने से पहले अपने पिता को याद करती हुई सुबक रही हो.

जो लोग इतनी सात्विकता के साथ सारी हिंसा को एक आंख से देखने की वकालत करते हैं, वे भूल जाते हैं कि हिंसा के कई रूपों को हम न सिर्फ़ स्वीकृति देते हैं, बल्कि उनको सम्मानित भी करते हैं.

यह अलग तरह की हिंसा है जिसका अपना राजनैतिक और नैतिक तर्क हमने विकसित कर रखा है. देश के लिए जान लेने और देने से बड़ा पराक्रम कुछ नहीं है, यह मान्यता इतनी गहरी है कि इसके लिए हिंसा या हत्या जैसे शब्द का इस्तेमाल भी अपराध मालूम पड़ता है. कभी - और शायद अब भी - धर्म के नाम पर जान लेने-देने का चलन भी कहीं-कहीं सम्मानित होता दिखाई पड़ता है.

इसलिए यह कहना एक तरह का पाखंड है कि हम हर तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ हैं. राज्य की हिंसा हमें आश्वस्तिकारी लगती हैं. चोरों को पीटने, लुटेरों के हाथ-पांव तोड़ देने या बलात्कारियों और क़ातिलों को फांसी पर चढ़ा देने के सुझाव हमारे समाज में बहुत लोकप्रिय हैं. हम ऐसी हिंसा को स्वीकार इसलिए करते हैं कि इससे हमें सुरक्षा का एहसास होता है. जो हिंसा हमारी रक्षा करे, जो हिंसा हमारे सामुदायिक वर्चस्व को मज़बूत करे, वह हिंसा हमें बुरी नहीं लगती. बाकी सारी हिंसा निंदनीय है.

1984 की सिख विरोधी हिंसा को पहली नज़र में देखें तो लगता है कि वह कांग्रेस के राज में हुई और इंदिरा गांधी की हत्या से भन्नाए कांग्रेसियों ने की. जबकि 2002 की हिंसा बीजेपी के राज में हुई और गोधरा से नाराज़ भाजपा समर्थकों ने यह काम किया. लेकिन इतने सपाट सरलीकरण से हम कभी वह सामुदायिक मनोविज्ञान नहीं समझ पाएंगे जो इन दंगों के पीछे था और जिसकी वजह से राज्य और प्रशासन दंगाइयों के विरुद्ध किसी कार्रवाई से बचते रहे.

यह कहना एक तरह का पाखंड है कि हम हर तरह की हिंसा के ख़िलाफ़ हैं. राज्य की हिंसा हमें आश्वस्तिकारी लगती हैं. चोरों को पीटने, लुटेरों के हाथ-पांव तोड़ देने या बलात्कारियों और क़ातिलों को फांसी पर चढ़ा देने के सुझाव हमारे समाज में बहुत लोकप्रिय हैं.

यह सच है कि 1984 की सिख विरोधी हिंसा की तात्कालिक वजह इंदिरा गांधी की हत्या थी जो उनके सिख अंगरक्षकों ने की थी. यह कांग्रेस समर्थकों द्वारा की गई हिंसा तो थी ही लेकिन उस मध्यवर्गीय और निम्नमध्यवर्गीय बहुसंख्यक आबादी का भी काम था जो उन दिनों हर सिख को जैसे आतंकवादी मान कर चलती थी और जिसने जरा से उकसावे पर अपना सारा गुस्सा इन लोगों पर उतार दिया.

उन दिनों दो लोगों ने 1984 की हिंसा को एक तरह से स्वीकृति या मान्यता दे दी थी. एक तो बिल्कुल दो साल पहले राजनीति में आए नौसिखिए, नौजवान राजीव गांधी थे जिन्होंने जाने-अनजाने यह जुमला बोला कि एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कुछ हिलती ही है. राजीव गांधी से दूसरा अपराध यह हुआ कि जिन लोगों पर इस हिंसा के छींटे थे, उनको टिकट देने में उन्होंने गुरेज नहीं किया. राजीव गांधी के स्तर पर जो एक जुमलेबाज़ किस्म का वक्तव्य था, वह संघ परिवार के सम्मानित नेता नानाजी देशमुख के लेख में सिख विरोधी हिंसा के एक सुचिंतित समर्थन के रूप में उभरा. उन दिनों आरएसएस बीजेपी के नहीं, कांग्रेस और उसकी हिंसा के साथ था.

1984 की हिंसा के बाद बेलगाम यह बहुसंख्यकवाद अगले चार-पांच साल में अयोध्या की ओर मुड़ गया. 84 के लुटेरे कांग्रेसी अब 90 के भक्त भाजपाई थे जो कारसेवक बन कर बाबरी मस्जिद की तरफ़ कूच कर रहे थे. जाहिर है, शाह बानो प्रसंग के बाद बहुसंख्यकों के तुष्टीकरण की कोशिश में कांग्रेस ने जिस नरम हिंदुत्व की राह चुनी थी, बीजेपी का काफ़िला उसी पर चल पड़ा था. जिस तरह राम मंदिर के ताले खोलने से लेकर बाबरी मस्जिद के ध्वंस तक की राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं उसी तरह 84 की हिंसा और 1992 के ध्वंस के गुनहगार भी एक हैं. 2002 के गुजरात दंगे इसी की अगली कड़ी थे. यह उग्र होता बहुसंख्यकवाद 2016 में अपने विरुद्ध एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं है, वह देशभक्ति, देशद्रोह और विकास की अपनी परिभाषाएं बिल्कुल हर्फ़-हर्फ़ लागू करना चाहता है. जो उसके साथ नहीं है, कहीं वह माओवादी है, कहीं अलगाववादी और कई जगह सीधे-सीधे देशद्रोही.

1984 की हिंसा पर कांग्रेस फिर भी शर्मिंदा रही. उसने कम से कम उसको सिख आतंकवाद के विरुद्ध कोई वैचारिक आवरण देने की कोशिश नहीं की. इसके उलट 2002 के दंगों पर भाजपा कभी शर्मिंदा नहीं दिखी.

लेकिन 1984 और 2002 में एक फ़र्क फिर भी है. 1984 की हिंसा पर कांग्रेस फिर भी शर्मिंदा रही. उसने कम से कम उसको सिख आतंकवाद के विरुद्ध कोई वैचारिक आवरण देने की कोशिश नहीं की. इसके उलट 2002 के दंगों पर भाजपा कभी शर्मिंदा नहीं दिखी. गुजरात की पूरी व्यवस्था के भीतर 2002 के इंसाफ को जिस तरह दबाने की कोशिश हुई, वह किसी भी तंत्र के लिए लज्जाजनक है. लेकिन विकास के तथाकथित गुजरात मॉडल के नाम पर दंगों और इंसाफ को छिपाने वाले अपराध को छुपा दिया गया.

इस विकास मॉडल के अलावा भी बीजेपी का 2002 को लेकर एक बचाव यह रहा है कि जिसके नेतृत्व में उसे लगभग दो-तिहाई सीटें मिली हों, उसके ख़िलाफ़ अब दंगों का सवाल उठाना बंद कर देना चाहिए. इस तर्क से तो राजीव गांधी पर भी 84 की हिंसा का कोई दाग़ नहीं लगता और न उनके सिपहसालारों पर, जो चुनाव जीतकर बार-बार संसद पहुंचते रहे. जाहिर है, इंसाफ़ के तकाज़े इस चुनावी राजनीति के नतीजों से कहीं ज़्यादा बड़े हैं.

आज बहुसंख्यकवाद अपने सबसे आक्रामक रूप में है जिसमें वह अपनी परंपरा और आधुनिकता सबको तहस-नहस कर रहा है. हिंदू धर्म की उदार स्मृतियां उसे अपनी कायरता का प्रमाण लगती हैं. इस देश का गंगा-जमनी विकास उसके लगभग विषाक्त हो चुके मानस से मेल नहीं खाता है. 1984 भी उसका ही एजेंडा था और 2002 भी.