बिहार की सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड की अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिशों के बीच अब यह बात भी सामने आ रही है कि वहां भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दल भी आपस में एक होकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश में है. बीते साल प्रदेश में जब विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने तीन दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. इनमें से रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी 2014 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा के साथ थी. विधानसभा चुनावों में भाजपा के सहयोगियों में जीतन राम मांझी की हिंदुस्तान आवाम मोर्चा भी शामिल हो गई.

अब बिहार में भाजपा की तीनों सहयोगी पार्टियों के विलय को लेकर बातचीत चल रही है. बताया जा रहा है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि भाजपा अपने सहयोगियों के साथ बराबरी का व्यवहार नहीं कर रही है. हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा यानी हम प्रमुख जीतन राम मांझी ने सार्वजनिक तौर पर यह कहा है कि भाजपा को जिस तरह का व्यवहार गठबंधन चलाने के लिए करना चाहिए, वह वैसा नहीं कर रही है. यहां यह जानना भी जरूरी है कि एनडीए के अंदर भाजपा को चुनौती देने के मकसद हो रही इस सियासी मोर्चेबंदी में शामिल रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री हैं.

तीनों दलों के नेताओं को यह लगता है कि एक साथ आकर अगर अपनी ताकत बढ़ाई जाए तो इसमें सबका फायदा है और आने वाले दिनों में उनके लिए भाजपा के अलावा दूसरे विकल्प भी खुल सकते हैं.

इन तीनों दलों के नेताओं को लगता है कि अगर ये एक साथ आए तो इनके लिए एक होकर भाजपा से किसी भी किस्म का सियासी मोलभाव करना आसान होगा. बिहार की राजनीति को जानने वाले लोग यह भी कह रहे हैं कि ये तीनों दल एक होकर यह कोशिश भी करेंगे कि लोग बिहार में इन्हें लोग एनडीए से अलग विकल्प के तौर पर देखना शुरू करें. अभी नीतीश कुमार की जेडीयू और लालू यादव की आरजेडी के महागठबंधन के अलावा सूबे में दूसरा विकल्प एनडीए ही है जिसकी कम से कम बिहार में पहचान भाजपा से ही है.

इसके तीनों घटकों में से अकेले किसी एक की कोई खास अलग पहचान नहीं है. इन तीनों दलों के नेताओं की बात करें तो अकेले रामविलास पासवान ही हैं जिनकी लंबे समय से बिहार की राजनीति में एक पहचान रही है. लेकिन यह पासवान को भी मालूम है कि बिहार के सियासी समीकरण पिछले कुछ सालों में जिस तरह से बदले हैं, उसमें अकेले वे भी कुछ नहीं कर सकते. ऐसे में तीनों दलों के नेताओं को यह लगता है कि एक साथ आकर अगर अपनी ताकत बढ़ाई जाए तो इसमें सबका फायदा है और आने वाले दिनों में उनके लिए भाजपा के अलावा दूसरे विकल्प भी खुल सकते हैं. हालांकि, अभी तक तो इन सभी दलों के नेता यही कह रहे हैं कि अगर उनका विलय होता भी है तो भी वे एनडीए में बने रहेंगे और ऐसा वे महागठबंधन सरकार की नाकामियों को लोगों के बीच मजबूती से पहुंचाने के मकसद से कर रहे हैं.

इन तीनों दलों को एक और चीज आपस में जोड़ती है. ये तीनों पिछड़ों की राजनीति करते हैं. तीनों दलों के प्रमुख नेताओं की पहचान पिछड़ा राजनीति से बनी है. ऐसे में संभव है कि इन्हें लग रहा है कि अगर ये एक होते हैं तो बिहार की ऐसी आबादी इन्हें एक विकल्प के तौर पर देख सकती है. लेकिन यही स्थिति इन सभी पार्टियों में से कम से कम एक में इस विलय के प्रतिकूल भी है. आरएलएसपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा हैं और प्रदेश अध्यक्ष अरुण कुमार हैं. अरुण कुमार जहानाबाद से सांसद हैं. उनका वोटबैंक अगड़ों में है. सूत्रों की मानें तो वे विलय प्रस्ताव का इसी आधार पर पार्टी के अंदर विरोध कर रहे हैं.

भले ही यह विलय प्रस्ताव भाजपा से मोलभाव करने या उसे चुनौती देने के मकसद से हो रहा हो लेकिन भाजपा के अंदर अभी इस बात को लेकर चिंता का भाव नहीं दिखता.

बहरहाल, इन तीनों दलों के विलय पर विस्तृत बातचीत हम के प्रदेश अध्यक्ष बृषण पटेल के वैशाली के फार्महाउस पर कुछ दिनों पहले हुई है. इस बैठक में पासवान, कुशवाहा और मांझी तीनों थे. इनके अलावा चिराग पासवान भी इस बैठक में थे. इस बैठक के अलावा प्रस्तावित विलय के विषय पर दो बैठकें और भी हुई हैं. बताया जा रहा है कि अगली बैठक कुछ ही दिनों में उपेंद्र कुशवाहा के आवास पर होनी है. आरएलएसपी के एक नेता के मुताबिक ‘बातचीत आगे तो बढ़ रही है लेकिन मेरा अनुमान है कि इस बारे में अंतिम घोषणा जून के पहले संभव नहीं है.’ माना जा रहा है कि अगर यह विलय होगा तो जो नई पार्टी बनेगी, वह अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवार उतार सकती है.

भले ही यह विलय प्रस्ताव भाजपा से मोलभाव करने या उसे चुनौती देने के मकसद से हो रहा हो लेकिन भाजपा के अंदर अभी इस बात को लेकर चिंता का भाव नहीं दिखता. भाजपा के एक पदाधिकारी के मुताबिक ‘अगर विलय हो जाता है तो यह भाजपा के लिए ठीक ही है क्योंकि इसके बाद हमें सिर्फ एक पक्ष के साथ बात करनी होगी, अभी तीन अलग-अलग पक्षों से बात करनी होती है.’ हालांकि, भाजपा के ये राष्ट्रीय पदाधिकारी यह भी मानते हैं कि इन तीनों दलों का विलय आसान नहीं है. क्योंकि इनके नेताओं के अहं के टकराव की स्थितियां विधानसभा चुनावों के दौरान दिखी थीं, ऐसे में इनका एक होकर चलना थोड़ा मुश्किल लगता है.

हालांकि, राजनीतिक जानकारों की मानें तो सियासत में अपने लाभ के लिए अपने अहंकार को पीछे रखने के कई उदाहरण हैं. बिहार में लालू और नीतीश का साथ आना भी ऐसा ही एक उदाहरण हैं. ऐसे में बिहार से ही एक और ऐसा उदाहरण सामने आ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.