इस समय पूरी दुनिया सफेद ‘पनामा पेपर्स’ में दर्ज काले कारनामों के कुछ ग्रे से शेड में रंगी है. गोरे रंग की दीवानी दुनिया हमेशा से ‘ब्लैक मनी’ को साष्टांग प्रणाम करती आई है. ‘ब्लैक मनी’ के आगे ‘व्हाइट मनी’ पानी भरता है, भरता रहेगा! दुनिया में किसी और काली चीज का ऐसा रुतबा नहीं जैसा ‘ब्लैक मनी’ का है!

ऊपर-ऊपर से सब दिखाते हैं कि ब्लैक मनी को वे कितना हेय मानते हैं, पर भीतर-भीतर ‘ब्लैक मनी’ उनकी आराध्या हैं जिसका वे सुबह-शाम स्मरण करते हैं (ब्लैक मनी का डेली अपडेट करते हुए!)

उसकी दुनिया में स्वर्ग सिर्फ मुर्दों के लिए बना है पर यह नए किस्म का मानव निर्मित मायावी हेवेन सिर्फ जिंदा लोगों के लिए हैं! इधर सांस रुकी, उधर ‘टैक्स हेवेन’ से डोर छूटी!

हाल ही में इसी ब्लैक मनी के उजले स्वर्ग (हेवेन) का खुलासा हुआ है. वैसे तो स्वर्ग को खुली आंखों से आज तक किसी ने नहीं देखा. पर इस हेवेन की सबसे चौंकाने वाली बात ही यही है कि हम उसे दुनिया के नक्शे पर देख सकते हैं! चिन्हित कर सकते हैं! उसे छू सकते हैं!... और सबसे अविश्सनीय बात ये है कि उस हेवेन में जीवित लोगों के पाए जाने की पुख्ता खबर है! इस स्वर्ग का नाम है ‘टैक्स हेवेन’

‘टैक्स हेवेन’ निहायत नया स्वर्ग है! वैसे तो स्वर्ग-नरक ईश्वर का महकमा है. उसकी दुनिया में स्वर्ग सिर्फ मुर्दों के लिए बना है. पर ये नए किस्म का मानव निर्मित मायावी हेवेन सिर्फ जिंदा लोगों के लिए हैं! इधर सांस रुकी, उधर ‘टैक्स हेवेन’ से डोर छूटी!

ईश्वर के बनाए स्वर्ग में ‘बीपीएल कार्ड धारकों’ यानी गरीब-गुर्बों को भी जगह मिलने की संभावना रहती है. इस मामले में ईश्वर का स्वर्ग कुछ मार्क्स की थ्योरी से प्रभावित सा लगता है. कुछ-कुछ साम्यवाद वाली किस्म का सा है भगवान का स्वर्ग! वहां हम जैसे दौ कौड़ी के लोगों के जाने की भी उतनी ही संभावना है, जितनी ठन-ठन गोपालों की या फिर बड़े-बड़े धन्ना सेठों की.

पर जब भगवान की बनाई इतनी बड़ी दुनिया में ही साम्यवाद कहीं नहीं टिक पाया तो भला उसके साम्यवादी स्वर्ग के भरोसे हम कब तक बैठे रहते? इसलिए हमने अपने किस्म का हेवेन बनाया. ये मानवनिर्मित ‘टैक्स हेवेन’ विशुद्ध 32 केरेट पूंजीवादी है. यह पूरी तरह दुनियाभर के ‘अभिजात्य वर्ग’ के लिए आरक्षित है. यहां खुली गलाकाट प्रतियोगिता है.

टैक्स हेवेन में अपनी बराबर की जगह बनाने के लिए  स्त्रियों को कड़ी मेहनत करनी होगी. क्योंकि यहां स्त्री-आरक्षण की कोई सुविधा नहीं है!

कई मामलों में यह हेवेन आधुनिक सदी होने का दंभ भर सकता है. ‘टैक्स हेवेन’ रंगभेद से परे है. भेद तो यहां संभवतः लिंग का भी न हो, पर इस स्वर्ग में दुनिया की कितनी औरतों को जगह मिली है यह जरा अभी साफ नहीं!

हालांकि सारी दुनिया की संपत्ति को पुरुष मालिकों की सोहबत ही पता नहीं क्यों ज्यादा पसंद है? स्त्रियों को संपत्ति अपनी तरफ खींचने के लिए और ज्यादा चाकरी करनी होगी. इस हेवेन में अपनी बराबर की जगह बनाने के लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी होगी. क्योंकि यहां स्त्री-आरक्षण की कोई सुविधा नहीं है!

यूं तो कईं मामलों में यह ‘टैक्स हेवेन’ भगवान के स्वर्ग से प्रभावित भी लगता है. मसलन यहां भाषा, भूगोल, संस्कृति आदि की सीमाएं नहीं हैं. दुनिया के किसी भी देश के लोग यहां एंट्री कर सकते हैं. पर फिर भी कुछ बुनियादी फर्क है मानव निर्मित ‘टैक्स हेवेन’ और भगवान के स्वर्ग में.

भगवान के बनाए स्वर्ग की सदस्यता के लिए कुछेक मूलभूत नियम हम सुनते आए हैं. जैसे सबसे पहले आपको निस्वार्थ कर्म करने चाहिए. परोपकार की भावना से भरा होना चाहिए. खुद से पहले दूसरों का सोचें. इंद्रियों का निग्रह करें. गरीबों और पीडि़तों की मदद को हमेशा तैयार रहें. जिस थाली में खाए उसमें छेद न करें. अपने पालनकर्ता के संग नमकहलाली न करें आदि.

‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का सार असल में ‘टैक्स हेवेन’ की सदस्यता वाला यह अभिजात्य वर्ग ही सही मायने में जान सका है. अच्छा-बुरा, सही-गलत, नैतिक-अनैतिक, काला-गोरा सब हमी में है!

इसके विपरीत मानत निर्मित ‘टैक्स हेवेन’ का बुनियादी उसूल ही है कि ‘हद दर्जे के स्वार्थी बनें. ‘आप भरे तो जग भरा’ की भावना का वास रोम-रोम में होना चाहिए. इंद्रियां भोग में आकंठ डूब के ऊब चुकी होनी चाहिए. गरीब और गरीबों को सिर्फ महामारी की तरह देखा जाए, जान बचाने के लिए जिनसे दूर रहना एक मजबूरी है! (गरीबों की मदद पर उतर आए तो जीते जी कभी टैक्स हेवेन की चौखट को भी नहीं छू सकेंगे.)

अपने पालन-पोषण करने करने वालों की आंख में सिर्फ धूल झोंकें. खाने की दो थालियां हमेशा संग में रखें. मौके-बेमौके यदि कभी नमकहलाली के छेदों से छन्नी बनी थाली के संग पकड़े जाएं तो सबसे पहले संयम रखें. फिर शकुनि की सी हंसी में कहें ‘अरे ई थाली है कि छन्नी है, हम साला तैइये नहीं कर पा रहे!...किसका है भाई,...गजबै काम किया है’! बोल के छेद वाली थाली को नीचे रखें और अपनी नई चमकती हुई बिना एक भी छेद वाली थाली आगे बढ़ा दें.

यूं तो भगवान अभी भी इंसानों से कम से कम हजार हाथ आगे है. पर स्वर्ग के मामले में भगवान को इंसान ने पीछे छोड़ दिया है. सदियां बीत गईं, पर भगवन दूसरा भी स्वर्ग नहीं बना सके! अभी तक एक ही स्वर्ग है? जबकि पक्के तौर पर अब आपके स्वर्ग को रेनोवेशन की जरूरत होगी!

सदियों से लोग वहां जा रहें है (माना कि अच्छे कर्म करके स्वर्ग जाने वाले कम ही हैं लोग हैं, पर फिर भी आबादी का भी तो कोई ओर-छोर नहीं) कुछ ज्यादा ही ठूंसा-ठांसी नहीं हो गई होगी! इसी सबको ध्यान में रख के इंसानों ने कम से कम 80 ‘टैक्स हेवेन’ बनाएं हैं. कहां एक कहां 80!.... आप तो आस-पास भी नहीं भगवन हमारे बनाए स्वर्गों के!

कभी हमारे ‘टैक्स हेवेन’ की विजिट पर भी आओ भगवन. पर ध्यान रहे अपने नाम की एंट्री किसी दूसरे के नाम से करवाएं. वर्ना बाद में बड़ी थुक्का-फजीहत होगी!

‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का सार असल में ‘टैक्स हेवेन’ की सदस्यता वाला यह अभिजात्य वर्ग ही सही मायने में जान सका है. अच्छा-बुरा, सही-गलत, नैतिक-अनैतिक, काला-गोरा सब हमी में है! हमी ब्रह्म हैं. हमसे परे कौन है, क्या है, कहां है??

पर एक अजीब लोचा है. आपके स्वर्ग में लोग छिपकर नहीं रहते होंगे. यहां के हेवेन में पता नहीं क्या बात है कि ‘हेवेन लिस्ट’ में नाम पाते ही सब ‘त्राहिमाम-त्राहिमाम’ करने लगते हैं. मानों उन्हें स्वर्ग नहीं जीते-जी नरक की आग दिखा दी गई हो! इस हेवेन की सूची के सुनहरे अक्षरों में लोग अपना नाम तक छिपाकर लिखवाते हैं. माने, जैसे कोई अश्विनी राव हो तो वह पता नहीं क्यों अपना नाम शॉर्ट में एआर लिखवाना चाहता है. वे ‘टैक्स हेवेन’ के मजे तो लेना चाहते हैं पर छिपकर! इसकी गुत्थी जरा मुश्किल है.

कभी हमारे ‘टैक्स हेवेन’ की विजिट पर भी आओ भगवन. पर ध्यान रहे अपने नाम की एंट्री किसी दूसरे के नाम से करवाएं. वर्ना बाद में बड़ी थुक्का-फजीहत होगी!

पकड़े जाने पर आप हमसे जरा भी सहिष्णुता की उम्मीद न करें. हमारी रगों में ‘इंसान का खून’ बहता है. ‘चूक मत चौहान’ हमारा युद्ध मंत्र है और मौका पड़ने पर हम बच्चों तक को नहीं बख्शते! बोल ‘टैक्स हेवेन के सच्चे दरबार की जै! बोल लिस्ट लीक करने वालों की जै!...बोल भारत खाता(धारकों) की जै!