केरल के कोल्लम जिले में रविवार को घटे हादसे से हुआ नुकसान असाधारण है. आतिशबाजी के लिए रखे गए पटाखों के ढेर में विस्फोट से मरने वालों का आंकड़ा 112 तक पहुंच गया है. करीब 400 लोग घायल हैं. अब खबरें आ रही हैं कि इतनी बड़ी त्रासदी होती ही नहीं अगर नियमों का पालन किया जाता. खबरों के मुताबिक स्थानीय प्रशासन ने मंदिर में आतिशबाजी पर रोक लगा दी थी. लेकिन मंदिर प्रबंधन ने उसकी नहीं सुनी. नतीजा सामने है.

खेलों से लेकर शादी और धार्मिक आयोजनों तक देश में कहीं भी कोई बड़ा समारोह हो, आतिशबाजी उसका अहम हिस्सा बन गई है. कई बार इसमें भी एक होड़ चलती है जो लगातार बढ़ती जा रही है.

खेलों से लेकर शादी और धार्मिक आयोजनों तक देश में कहीं भी कोई बड़ा समारोह हो, आतिशबाजी उसका अहम हिस्सा बन गई है. कई बार इसमें भी एक होड़ चलती है जो लगातार बढ़ती जा रही है. ‘वेडिंग प्लानरों’ और ‘इवेंट मैनेजरों’ की कोशिश रहती है कि आतिशबाजी के मामले में भी वे अपने प्रतिस्पर्धियों से आगे दिखें. केरल में हिंदू और ईसाई समुदाय के धार्मिक संगठन अपने आयोजनों में आतिशबाजी की प्रतियोगिता रखते हैं. इसलिए पटाखे बनाने वालों की कोशिश रहती है कि धमाके और रोशनी ज्यादा से ज्यादा हो. इसके चक्कर में वे कभी-कभी गलत तरीकों का सहारा भी ले लेते हैं. पटाखे बनाने में इस्तेमाल होने वाले खतरनाक रसायन और धमाके और रोशनी ज्यादा से ज्यादा करने की कोशिश के चलते हर स्तर पर समझौते होते हैं. इसका नतीजा यह है कि हर स्तर पर लोग मारे जा रहे हैं. बनाने से लेकर चलाने तक और उसके बाद भी.

निर्माण के दौरान हादसे

पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्स सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन इस क्षेत्र पर निगरानी रखने वाली एक संस्था है. इसके आंकड़े बताते हैं कि पटाखे बनाते हुए हर साल औसतन 25 मजदूरों की मौत होती है. इनमें से ज्यादातर मौतें तमिलनाडु के शिवकाशी में होती हैं जहां देश के करीब 90 फीसदी पटाखा उत्पादक स्थित हैं. ज्यादातर हादसे इसलिए होते हैं कि खतरनाक कच्चे सामान के साथ काम करते हुए लापरवाही बरती जाती है.

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि ये मजदूर ऐसे माहौल में काम करने को मजबूर हैं जिसमें सुरक्षा मानकों की कोई खास परवाह न करते हुए इनसे विस्फोटक पदार्थों पर काम करवाया जाता है. 

शिवकाशी के बारे में ऐसी खबरें आती रहती हैं जिनमें पटाखा फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों की व्यथा-कथा का जिक्र होता है. यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि ये मजदूर ऐसे माहौल में काम करने को मजबूर हैं जिसमें सुरक्षा मानकों की कोई खास परवाह न करते हुए इनसे विस्फोटक पदार्थों पर काम करवाया जाता है. शिवकाशी का पटाखा उद्योग बाल मजदूरी के लिए भी कुख्यात है.

वायु प्रदूषण

हर साल दीवाली के समय पर छोड़े जाने वाले पटाखों से हवा में घुला जहर और बढ़ जाता है. आंकड़े बताते हैं कि 2010 से दीवाली के दौरान प्रदूषण के स्तर में सामान्य से दस गुना ज्यादा तक बढ़ोतरी हो रही है. बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने दीवाली पर पटाखों पर प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया था. अदालत का कहना था कि वह कोई ऐसा आदेश नहीं दे सकती जिसका पालन न किया जा सके. इसके साथ ही उसने इस संबंध में पुराने दिशा-निर्देश मानने के आदेश जारी किए. 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने दीवाली के मौके पर रात 10 बजे से सुबह छह बजे के बीच पटाखों पर रोक लगाई थी.

बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने दीवाली पर पटाखों पर प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया था. अदालत का कहना था कि वह कोई ऐसा आदेश नहीं दे सकती जिसका पालन न किया जा सके

यह हाल तक है जब भारत में वायु प्रदूषणजनित बीमारियों के चलते हर साल औसतन 10 लाख से ज्यादा मौतें हो रही हैं. पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते जरूर दीवाली के दौरान पटाखों की बिक्री में गिरावट आई है. लेकिन दूसरे मौकों पर बाकी पूरे साल होने वाला उनका इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है.

खतरनाक सामग्री

जैसा कि पहले भी जिक्र हुआ धमाका और चमक ज्यादा से ज्यादा रखने के चक्कर में अक्सर पटाखा निर्माता उन रसायनों का इस्तेमाल भी कर देते हैं जिन पर प्रतिबंध लगा हुआ है. इस दिशा में सरकार ने कुछ कोशिशें जरूर की हैं. जैसे कि उसने सस्ते चीन पटाखों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है जिनमें पोटैशियम क्लोरेट नाम के प्रतिबंधित रसायन का प्रयोग होता है. उसने ऐसे ही कुछ दूसरे खतरनाक रसायनों पर निगरानी भी बढ़ाई है. लेकिन पटाखों की निर्माण प्रक्रिया और उनके भंडारण में भी तापमान और आर्द्रता के एक नाजुक संतुलन की जरूरत होती है. यही वजह है कि साल भर रहने वाली उमस के चलते शिवकाशी पटाखा निर्माताओं की पहली पसंद है. लेकिन दूसरी गर्म जगहों पर हादसों की आशंका ज्यादा होती है. उदाहरण के लिए 2013 में केरल के पलक्कड़ जिले में एक पटाखा फैक्ट्री में हुए धमाके से सात लोगों की मौत हो गई थी.

 पटाखों की निर्माण प्रक्रिया और उनके भंडारण में भी तापमान और आर्द्रता के एक नाजुक संतुलन की जरूरत होती है. यही वजह है कि साल भर रहने वाली उमस के चलते शिवकाशी पटाखा निर्माताओं की पहली पसंद है. लेकिन दूसरी गर्म जगहों पर हादसों की आशंका ज्यादा होती है. 

इस तरह के हादसों को देखते हुए केरल सरकार ने पटाखा उत्पादन और निगरानी के लिए सख्त दिशा-निर्देश बनाए हैं. लेकिन जैसा कि ज्यादातर मामलों में होता है, वे मुश्किल से ही अमल में आ पाते हैं. इससे न सिर्फ बड़े हादसों बल्कि खतरनाक विस्फोटकों के गलत हाथों में जाने का खतरा भी बना रहता है.

आतिशबाजी की होड़

करीब आधी सदी पहले केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में आतिशबाजी से जुड़े एक हादसे ने 68 लोगों की जान ले ली थी. इसके कुछ समय बाद मंदिर ने आतिशबाजी पर रोक लगा दी. हालांकि सबरीमाला में भगदड़ के चलते मौतें अब भी होती हैं, लेकिन इस कदम से कम से कम आतिशबाजी की वजह से होने वाले हादसों पर लगाम लग गई है.

लेकिन यही बात राज्य के दूसरे मंदिरों या चर्चों के बारे में नहीं कही जा सकती जिनके लिए आतिशबाजी परंपरा का हिस्सा है. केरल में मंदिर या चर्च प्रशासन से जुड़े दो गुटों द्वारा खुद को दूसरे से आगे दिखाने के चक्कर में ज्यादा से ज्यादा आतिशबाजी करना आम बात है. इस तरह का चलन बढ़ता देखकर केरल सरकार और राज्य हाईकोर्ट ने कुछ किस्म की आतिशबाजी पर पूरी तरह रोक लगा दी है. नियम यह भी है कि हर तरह की आतिशबाजी के बारे में पहले जानकारी दी जाएगी और उसके लिए प्रशासन से इजाजत लेनी होगी.

केरल में मंदिर या चर्च प्रशासन से जुड़े दो गुटों द्वारा खुद को दूसरे से आगे दिखाने के चक्कर में ज्यादा से ज्यादा आतिशबाजी करना आम बात है. इस तरह का चलन बढ़ता देखकर केरल सरकार और राज्य हाईकोर्ट ने कुछ किस्म की आतिशबाजी पर पूरी तरह रोक लगा दी है.

आतिशबाजी की यही होड़ थी जिसे कोल्लम में स्थानीय प्रशासन ने इजाजत देने से इनकार कर दिया था. लेकिन इसे धता बताते हुए मंदिर प्रशासन ने वही किया जो यह करना चाहता था. शनिवार को सुबह ही लाउडस्पीकर पर ऐलान हो गया था कि रोक के बावजूद आतिशबाजी होगी. रिपोर्टों के मुताबिक रात को यह शुरू हुई तो अनाउंसर लगातार आयोजकों को कहता रहा कि वे जल्दी करें और दर्शकों को कोई बड़ी चीज दिखाएं. इसके चलते जो हुआ वह 100 से ज्यादा लोगों की मौत का कारण बन गया. यह फिर से याद दिलाता है कि सिर्फ कानून बनाने से हादसे नहीं टाले जा सकते.

इस हादसे के बाद भी केरल में मंदिरों में आतिशबाजी के प्रदर्शन पर प्रतिबंध की मांग हो रही है. लेकिन राज्य में 1,255 मंदिरों का प्रबंधन करने वाले त्रावणकोर देवास्वोम बोर्ड (टीडीबी) ने कहा है कि वह इस तरह की आतिशबाजी पर पूर्ण प्रतिबंध के पक्ष में नहीं है. टीडीबी अध्यक्ष पी गोपालकृष्णन ने कहा कि बोर्ड त्यौहारों के दौरान आतिशबाजी पर प्रतिबंध लगाने के खिलाफ रहा है क्योंकि यह रस्मों का हिस्सा है. हालांकि उनका कहना था कि यह नियमों के तहत जरूरी सुरक्षा उपायों के साथ की जानी चाहिए. केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी का भी कहना है कि सरकार आतिशबाजी के प्रदर्शन पर नियमों को लागू कर सकती है लेकिन इसे प्रतिबंधित नहीं कर सकती. उन्होंने कहा कि परंपरा के कारण सरकार की सीमाएं हैं.

प्रशासन आतिशबाजी रोक नहीं सकता और सुरक्षा के लिहाज से उसके बनाए नियमों को मंदिर प्रशासन ठेंगा दिखा रहे हैं. यानी कोल्लम में हुआ यह हादसा आखिरी नहीं है.

(यह हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर प्रकाशित आलेख का संपादित स्वरूप है)