‘उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी यादव परिवार की कथा रामायण से भी मिलती है और महाभारत से भी. रामायण से इसलिए कि यहां भी परिवार के मुखिया की दो पत्नियों से दो पुत्रों के बीच उत्तराधिकार का सवाल था और महाभारत से इसलिए कि यहां भी भाइयों में हस्तिनापुर के सिंहासन को लेकर कूटनीति चलती रहती है.’ व्यंगकार रंगनाथ बिजनौरी की ये पक्तियां भले ही व्यंग्य में कही गई हों मगर उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के लगातार फैलते जा रहे कुनबे के लिए यह एक तरह की हकीकत ही है.

ताजा मामला शिवपाल सिंह यादव को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने का है. जब मुलायम सिंह के हाथ में उत्तर प्रदेश की कमान थी तो शिवपाल उनके उत्तराधिकारी और पार्टी में नंबर दो माने जाते थे. वे नेता प्रतिपक्ष भी रहे और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी. उस वक्त यह माना जाता था कि मुलायम के पूरी तरह केन्द्रीय राजनीति में सक्रिय हो जाने के बाद शिवपाल ही उत्तर प्रदेश संभालेंगे. लेकिन कुछ पुत्र मोह में और कुछ पारिवारिक समस्याओं के चलते मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव के हाथों अपना राजनीतिक उत्तरधिकार सौंप दिया. उन्होंने अपने दूसरे पुत्र और अखिलेश के सौतेले भाई प्रतीक यादव को कारोबारी बनने की छूट दे दी.

शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश प्रभारी नियुक्त करने का पत्र मुलायम सिंह यादव के हस्ताक्षर से जारी हुआ है और इसकी प्रतिलिपि शिवपाल सिंह यादव, अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव को उनके पदनामों से भेजी गई है

इससे मुलायम के अपने खुद के घर में तो मामला व्यवस्थित होने लगा लेकिन शिवपाल यादव को इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ा. वे अचानक नंबर दो की हैसियत से नीचे भीड़ में पहुंच गए. राजनीतिक रूप से शिवपाल ने मुलायम सिंह के पदचिन्हों पर चलने की भरपूर कोशिश की है. पार्टी में भी पुरानी पीढ़ी के समाजवादियों में उनकी खासी पकड़ है. खुद को सही उत्तराधिकारी साबित करने के लिए वे मुलायम की हर अदा का अनुसरण करने का प्रयास भी करते हैं.

इसके उलट प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री होने के बावजूद अखिलेश मुलायम युग के समाजवादियों से तालमेल नहीं बना पाए है. उनकी अपनी टीम है, अपने विश्वासपात्र हैं लेकिन पार्टी का एक बड़ा तबका उनके करीब नहीं है. जबकि शिवपाल मुलायम युग के समाजवादियों से लेकर नए सपाइयों तक सबके चहेते हैं. अब जब उन्हें समाजवादी पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश के प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई तो यह बात फिर चर्चा में आ गई कि पार्टी में सत्ता की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है.

शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश प्रभारी नियुक्त करने का पत्र मुलायम सिंह यादव के हस्ताक्षर से जारी हुआ है और इसकी प्रतिलिपि शिवपाल सिंह यादव, अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव को उनके पदनामों से भेजी गई है. पत्र से स्पष्ट होता है कि पार्टी के अन्दर शिवपाल को एक बार फिर से प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव से अधिक महत्व दे दिया गया है. दरअसल सपा में तो उत्तर प्रदेश के प्रभारी की व्यवस्था पहली बार हो रही है लेकिन अगर कांग्रेस या बीजेपी को देखें तो इनमें प्रभारी का पद प्रदेश अध्यक्ष से बड़ा माना जाता है.

वैसे पार्टी इस पर यह सफाई दे रही है कि चुनाव वर्ष में मुख्यमंत्री की व्यस्तता बढ़ जाएगी इसलिए शिवपाल को प्रदेश प्रभारी बनाया जा रहा है लेकिन ऐसी स्थिति में उन्हें प्रभारी के बजाय प्रदेश अध्यक्ष भी तो बनाया जा सकता था. जाहिर है तब यह अखिलेश के अधिकारों में कटौती की बात हो जाती. इसलिए मुलायम ने ऐसा तरीका निकाला है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यानी शिवपाल भी प्रसन्न हो जाएं और अखिलेश को भी कोई नाराजगी न हो.

बताया जाता है कि प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव इतने भर से संतुष्ट नहीं हैं. उनकी राजनीतिक महत्वाकाक्षांए हैं और वे नरेंन्द्र मोदी की तारीफ करने से भी गुरेज नहीं करती हैं. इसी दबाव के कारण पार्टी ने उन्हें लखनऊ कैंट सीट से विधानसभा उम्मीदवार घोषित कर दिया है

लेकिन सत्ता का झगड़ा इतने भर से खत्म होना बेहद मुश्किल लगता है. पंचायत चुनाव के वक्त प्रभारी बनाए जाने पर शिवपाल ने अखिलेश के कई युवा सपाई साथियों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण बाहर का रास्ता दिखा दिया था. इस पर अखिलेश नाराज हो गए थे और उन्होंने सैंफई महोत्सव का बॉयकॉट कर दिया था. बाद में बीच का रास्ता निकाल कर उनकी नाराजगी दूर की गई और अब उनकी टीम के सारे बर्खास्त और निलंबित साथी पार्टी में तो आ ही गए हैं, सरकार और सदन के सदस्य भी बना दिए गए हैं. इसलिए समझा जा सकता है कि इस नई नियुक्ति के बाद शह और मात का खेल कुछ और जोर पकड़ेगा.

मुलायम सिंह यादव के घरेलू मोर्चे पर एक और समस्या है. उन्होंने अपने दो बेटों को राजनीति और व्यवसाय के दो अलग-अलग धंधों में लगा दिया था. मगर बताया जाता है कि प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव इतने भर से संतुष्ट नहीं हैं. उनकी राजनीतिक महत्वाकाक्षांए हैं और वे नरेंन्द्र मोदी की तारीफ करने से भी गुरेज नहीं करती हैं. इसी दबाव के कारण पार्टी ने उन्हें लखनऊ कैंट सीट से विधानसभा उम्मीदवार घोषित कर दिया है. हालांकि उन्होने सार्वजनिक कार्यक्रमों में खुद के लिए वोट मांगने शुरू तो कर दिए हैं लेकिन चर्चा है कि वे इस सीट से चुनाव नहीं लड़ना चाहती थीं क्योंकि यहां से सपा आज तक जीती नहीं है. यह भी चर्चा है कि वे अपने पिता अरविंद सिंह बिष्ट, जो अखिलेश सरकार में सूचना आयुक्त बनाए गए थे, के लिए भी विधान परिषद में जगह चाहती हैं.

यानी कुल मिला कर बात यह कि एक ओर बसपा, भाजपा और कांग्रेस गठबंधन समाजवादी पार्टी से उत्तर प्रदेश की सत्ता छीनने की तैयारी कर रहे हैं और दूसरी ओर समाजवादी पार्टी में परिवार के भीतर ही रेबडि़यों की बंदरबांट को लेकर उठापटक चल रही है. आने वाले दिनों में यह सिलसिला कुछ और गति पकड़ सकता है क्योंकि राजनीति में शकुनि की भूमिका के माहिर अमर सिंह फिर उत्तर प्रदेश में सक्रिय दिखने लगे हैं.