सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी में चल रही चर्चाओं पर यकीन करें तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को यहां के उपराज्यपाल नजीब जंग से तकरीबन सवा साल बाद छुटकारा मिल सकता है. पिछले एक-सवा साल से दिल्ली में केजरीवाल और जंग के टकराव के दृश्य बेहद आम रहे हैं. ऐसे में अगर जंग से दिल्ली के उपराज्यपाल की जिम्मेदारी लेकर उन्हें कोई और जिम्मेदारी दी जाती है तो यह केजरीवाल के लिए अच्छी खबर होनी चाहिए.

भाजपा के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो नजीब जंग को भारत का अगला उपराष्ट्रपति बनाया जा सकता है. मौजूदा उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का कार्यकाल अगले साल अगस्त में खत्म हो रहा है. वे 2007 से इस पद पर हैं और अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो लगातार दो बार उपराष्ट्रपति बने हैं. कांग्रेस ने उन्हें यह जिम्मेदारी दी थी जिसके पूरा होने पर नजीब जंग उनकी जगह ले सकते हैं.

नजीब जंग की पहचान एक ऐसे व्यक्ति की रही है जिसने वह काम बड़ी सफाई से किया जिसका जिम्मा उन्हें उस वक्त के निजाम ने दिया. उन्होंने हमेशा पार्टी आदि की चिंता करने की बजाय खुद को मिले आदेश पर प्रभावी ढंग से अमल करने को ही सर्वोच्च प्राथमिकता दी

अब सवाल है कि क्यों भाजपा उन नजीब जंग को इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपने का मन बना रही है जिन्हें हामिद अंसारी की तरह विपक्षी कांग्रेस ने ही दिल्ली का उपराज्यपाल बनाया था. जब केंद्र में मोदी की अगुवाई वाली सरकार आई तो कई राज्यों के राज्यपाल और उपराज्यपाल को बदला गया. लेकिन नजीब जंग बचे रहे. जिन लोगों को हटाया गया, उनके नामों पर नजर डालने से पता चलता है कि उनकी पृष्ठभूमि राजनीतिक थी. जबकि जो लोग सीधे-सीधे कांग्रेस की सियासी पृष्ठभूमि वाले न होकर ब्यूरोक्रेसी से थे, उन्हें मोदी सरकार ने नहीं हटाया. नजीब जंग भी उन्हीं में से एक हैं.

नजीब जंग भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1973 बैच के अधिकारी रहे हैं. वे दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे हैं. जब 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ तो ब्यूरोक्रेसी की पृष्ठभूमि की वजह से उनके लिए यह बहुत मुश्किल नहीं था कि वे खुद को नये सियासी माहौल के हिसाब से ढाल लें. यही वजह है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल उन पर भाजपा का एजेंट होने से लेकर कई तरह के आरोप लगाते रहे हैं. यहां तक कहा गया कि जितनी शिद्दत से दिल्ली में भाजपा विपक्ष का काम नहीं कर रही है उससे कहीं ज्यादा नजीब जंग ऐसा कर रहे हैं.

यही कथित वफादारी उन्हें उपराष्ट्रपति पद के लिए भाजपा के कुछ नेताओं की पसंद बना रही है. जानकार बता रहे हैं कि यह जंग की सरकारों के प्रति वफादारी का ट्रैक रिकॉर्ड ही है जो उन्हें इस पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार बना रहा है. उनकी पहचान एक ऐसे व्यक्ति की रही है जिसने वह काम बड़ी सफाई से किया जिसका जिम्मा उन्हें उस वक्त के निजाम ने दिया. उन्होंने हमेशा पार्टी आदि की चिंता करने की बजाय खुद को मिले आदेश पर प्रभावी ढंग से अमल करने को ही सर्वोच्च प्राथमिकता दी है.

इन बातों से जो संकेत निकलता है, वह यह है कि भाजपा के अंदर जंग को उपराष्ट्रपति बनाने की संभावनाओं को लेकर जो सुगबुगाहट चल रही है, उसके हिसाब से नजीब जंग भी अपनी तैयारी करने में लगे हुए हैं.

नजीब जंग की यही प्रवृत्ति भाजपा को बेहद काम की लग रही है. भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति भी होता है. राज्यसभा में सत्ताधारी पक्ष यानी भाजपानीत गंठबंधन की स्थिति ठीक नहीं है. कुछ जानकारों ने हिसाब लगाया है कि मोदी सरकार के कार्यकाल के अंत तक भाजपा और सहयोगी दलों का राज्यसभा में बहुमत नहीं हो सकता.

राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष के बारे में यह माना जाता है कि ये अपनी पार्टी की राजनीति से ऊपर उठकर काम करेंगे. लेकिन कई मौके ऐसे आए हैं जब इन पदों आसीन लोगों पर सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में काम करने के आरोप लगे हैं. खुद हामिद अंसारी पर भी इस तरह के आरोप लग चुके हैं. मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन पर भी विपक्षी सदस्यों ने कुछेक मौकों पर मोदी सरकार के पक्ष में काम करने के आरोप लगाए हैं. इन जमीनी हकीकतों को ध्यान में रखा जाए तो लगता है कि राज्यसभा के सभापति के तौर पर किसी अनुकूल व्यक्ति के होने पर कभी-कभार इसका फायदा केंद्र सरकार को मिल सकता है.

नजीब जंग को उपराष्ट्रपति बनवाकर नरेंद्र मोदी और भाजपा खुद पर मुस्लिम विरोधी होने के आरोपों को भी काफी हद तक कमजोर कर सकते हैं. अगर जंग उपराष्ट्रपति बनते हैं तो भाजपा लगातार यह कह सकती है कि अगर हम वाकई मुस्लिम विरोधी होते तो भला नजीब जंग को उपराष्ट्रपति क्यों बनाते. जब 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी ने एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनाया गया था तब उसका भी एक कारण यही था.

जेएनयू विवाद पर उन्होंने कहा कि लोगों को अपने राष्ट्र की आलोचना नहीं करनी चाहिए और कन्हैया कुमार पर उनका कहना था कि मैंने कई छात्र नेताओं को आते और खत्म होते देखा है

हाल के दिनों में नजीब जंग के कुछ बयानों पर नजर डालें तो यह संकेत उभरता है कि वे भी भाजपा के साथ अपनी वैचारिक साम्यता बनाने की कोशिश कर रहे हैं. संभव है कि यह पूर्व निर्धारित शर्तों का हिस्सा हो. हाल ही में नजीब जंग ने कहा कि उन्हें ‘भारत माता की जय’ बोलने में कोई समस्या नहीं है. उन्होंने यह भी कहा कि भगवान की पूजा और देश की पूजा में फर्क है. बीफ विवाद पर उन्होंने कहा कि वे ऐसी कोई चीज खाना नहीं चाहेंगे जिससे कई दूसरे लोगों की भावनाएं आहत होती हों. जंग ने यह भी कहा कि इस मसले पर जो विवाद हो रहा है, उसे जानबूझकर पैदा किया गया है. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय विवाद पर उन्होंने कहा कि लोगों को अपने राष्ट्र की आलोचना नहीं करनी चाहिए. कन्हैया कुमार पर उन्होंने कहा कि मैं उनकी तारीफ नहीं करुंगा क्योंकि मैंने कई छात्र नेताओं को आते और खत्म होते देखा है.

जिन बातों का जिक्र नजीब जंग के हवाले से यहां किया गया है, उनमें से अगर जंग का नाम हटा दिया जाए तो एकबारगी किसी को लग सकता है कि ये विचार किसी भाजपा नेता के हैं. इन बातों से जो संकेत निकलता है, वह यह है कि भाजपा के अंदर जंग को उपराष्ट्रपति बनाने की संभावनाओं को लेकर जो सुगबुगाहट चल रही है, उसके हिसाब से नजीब जंग भी अपनी तैयारी करने में लगे हुए हैं. आने वाले दिनों में इस बारे में और स्पष्टता की उम्मीद की जा सकती है.

यहां एक बात का जिक्र और जरूरी है. भारत में उपराष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य मिलकर करते हैं. राज्यसभा में भले ही सरकार के पास संख्या बल नहीं हो लेकिन लोकसभा में उसके पास अच्छी-खासी संख्या है. ऐसे में सरकार के लिए अपने किसी भी उम्मीदवार को उपराष्ट्रपति बनवाना जरा भी मुश्किल नहीं होने वाला है.