अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की थी? गूगल इस सवाल का जवाब ‘सर सैयद अहमद खान’ देता है. यह सवाल कई सालों से विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी पूछा जाता रहा है. अब तक सरकारी परीक्षाओं में भी इस सवाल का सही जवाब ‘सर सैयद अहमद खान’ को ही माना जाता रहा है. लेकिन मौजूदा केंद्र सरकार ने इसे सही मानने से इनकार कर दिया है. उसके अटार्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा और हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट के ही एक पुराने निर्णय का हवाला देकर कहा है कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है क्योंकि उसकी स्थापना मुस्लिम समुदाय ने नहीं बल्कि अंग्रेज सरकार ने की थी.

केंद्र ने एएमयू से अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा छीन लेने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक अपील दायर की थी. पिछली केंद्र सरकार द्वारा 2006 में दायर की गई इस अपील को मोदी सरकार अब वापस लेना चाहती है. इसीलिए उसने कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है. तो अब सवाल यह उठता है कि जो हम बचपन से पढ़ते आये हैं और जो गूगल हमें दिखाता है, क्या वह गलत है? क्या एएमयू को सैयद अहमद खान ने नहीं बल्कि अंग्रेज सरकार ने ही स्थापित किया था?

पहली नज़र में ये सवाल जितना लगते हैं उससे भी ज्यादा जटिल हैं और महत्वपूर्ण भी. क्योंकि साफ है कि यदि यह साबित हो जाता है कि एएमयू की स्थापना सर सैयद खान या मुस्लिम समुदाय के लोगों ने की थी तो उसका ‘अल्पसंख्यक संस्थान’ का दर्जा बना रहेगा. इस मामले को पूरी तरह से समझने के लिए इसकी जटिलताओं को सुलझाने की शुरुआत वहीं से करते हैं जहां से कभी एएमयू की शुरुआत हुई थी.

तत्कालीन भारत सरकार ने मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन के सामने यह शर्त रखी थी कि यदि वे तीस लाख रूपये जुटा लेते हैं, तभी यूनिवर्सिटी बनाई जा सकती है. 

बात 1870 की है. मुस्लिम विद्वान और समाजसेवी सर सैयद अहमद खान मुस्लिम समुदाय के पिछड़ेपन को लेकर काफी चिंतित थे. वे इसका मूल कारण मुस्लिम समुदाय द्वारा आधुनिक शिक्षा की उपेक्षा को मानते थे. उन्हें लगता था कि धार्मिक और सांस्कृतिक बातों के साथ ही मुस्लिम समुदाय को साहित्य और विज्ञान की उदार समझ होना भी जरूरी है. इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लिए एक संस्थान बनाने की कल्पना की. मई 1872 में उनके द्वारा एक समिति का गठन किया गया जिसका नाम था ‘मोहमदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज फंड कमेटी.’ इस समिति ने सर सैयद की कल्पना को मूर्त रूप देने के लिए कार्य करना शुरू किया.

समिति की एक साल की मेहनत के बाद मई 1873 में एक छोटे बच्चों के स्कूल की स्थापना की गई जो 1876 में हाई स्कूल बन गया. इसके अगले ही साल, 1877 में तत्कालीन वाइसराय लार्ड लिटन ने इसे एक कॉलेज - मोहमदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज - बनाने की नींव रखी. 1898 में जब सर सैयद की मृत्यु हुई, तब तक यह कॉलेज एक समृद्ध संस्थान के रूप में अपनी पहचान बना चुका था.

माना जाता है कि सर सैयद का मूल उद्देश्य एक मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाने का था और वे कई बार अपनी यह इच्छा जाहिर कर चुके थे. उनकी मृत्यु के बाद मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाने की मांग साल-दर-साल मजबूत होती गई. 1911 में एक ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन’ बनाई गई जिसका उद्देश्य अलीगढ में एक शैक्षिक यूनिवर्सिटी स्थापित करना था. इस एसोसिएशन और तत्कालीन भारत सरकार के बीच कई सालों तक वार्ताएं-चर्चाएं हुई और अंततः 1920 में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का गठन कर दिया गया. यहां यह जानना भी महत्वपूर्ण है कि तत्कालीन भारत सरकार ने एसोसिएशन के सामने यह शर्त रखी थी कि यदि वे तीस लाख रूपये जुटा लेते हैं, तभी यूनिवर्सिटी बनाई जा सकती है. एसोसिएशन ने इस शर्त को स्वीकार किया और यह रकम जुटाने के बाद ही अंग्रेज सरकार ने ‘अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट’ पारित करके यूनिवर्सिटी का गठन किया.

1920 से लेकर देश की आज़ादी तक एएमयू के प्रबंधन या संचालन में कोई दिक्कत नहीं आई. लेकिन आज़ादी के बाद जब भारतीय संविधान लागू किया गया तब 1920 के एएमयू एक्ट में कुछ जरूरी संशोधन किये गए

मोहमदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज ही एएमयू का आधार था. सरल शब्दों में कहें तो इसी कॉलेज को ‘अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ में बदला गया था. इस कॉलेज के साथ ही ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन’ की तमाम संपत्ति और कोष को भी यूनिवर्सिटी में समाहित कर लिया गया था. 1920 के ‘एएमयू एक्ट’ में यह भी प्रावधान था कि यूनिवर्सिटी की ‘कोर्ट’ नामक सर्वोच्च प्रशासनिक इकाई में सभी सदस्य अनिवार्य रूप से मुस्लिम ही होंगे. साथ ही यूनिवर्सिटी में अनिवार्यतः इस्लामिक पढ़ाई कराए जाने का भी जिक्र भी इस एक्ट में था.

1920 से लेकर देश की आज़ादी तक एएमयू के प्रबंधन या संचालन में कोई दिक्कत नहीं आई. लेकिन आज़ादी के बाद जब भारतीय संविधान लागू किया गया तब 1920 के एएमयू एक्ट में कुछ जरूरी संशोधन किये गए. इन संशोधनों के जरिये यूनिवर्सिटी के कोर्ट में सभी सदस्यों के मुस्लिम होने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया. साथ ही इस्लामिक पढ़ाई की अनिवार्यता को भी खत्म कर दिया गया. 1951 और 1965 में हुए ये संशोधन इसलिए किये गए थे कि एएमयू एक्ट के ये प्रावधान भारतीय संविधान के प्रावधानों से मेल नहीं खाते थे. लेकिन मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों को यह संशोधन अपने अधिकारों पर चोट पहुंचाने वाले लगे और इसलिए 1965 में पहली बार एएमयू का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा.

अज़ीज़ बाशा नाम से मशहूर इस मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने की. यहां मुस्लिम समुदाय ने तर्क दिया कि, ‘भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 के अनुसार सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति को बनाए रखने और विकसित करने के लिए अपनी पसंद की शैक्षिक संस्थाएं स्थापित करने और चलाने का मौलिक अधिकार है. लिहाजा 1951 और 1965 में जो संशोधन भारत सरकार ने किये हैं, वे मुस्लिम समुदाय के मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं.’

इस सबके बावजूद भी कानून की तकनीकी समझ यह नहीं मानती कि एएमयू की स्थापना मुस्लिम समुदाय ने की थी. सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस मामले को विशुद्ध तकनीकी तौर पर देखा और 1967 में यह फैसला सुना दिया कि एएमयू की स्थापना मुस्लिम समुदाय ने नहीं बल्कि तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने की थी

अनुच्छेद 30 के तहत अधिकार का दावा करने के लिए यह जरूरी है कि शैक्षिक संस्था को किसी धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित और प्रशासित किया गया हो. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय को अज़ीज़ बाशा मामले में यह तय करना था कि एएमयू की स्थापना मुस्लिम समुदाय ने की थी या नहीं.

मोटे तौर से देखें तो इसमें कोई संदेह नहीं लगता कि एएमयू की स्थापना मुस्लिम समुदाय ने ही की थी. पहले सर सैयद के प्रयासों से एक समिति बनी थी. इस समिति ने फिर अपने ही प्रयासों से एक स्कूल बनाया जिसे पहले हाई स्कूल और फिर कॉलेज में तब्दील किया गया. और अंततः मुस्लिम समुदाय के प्रयासों से ही इस कॉलेज को यूनिवर्सिटी भी बनाया गया. साथ ही यूनिवर्सिटी बानने के लिए मुस्लिम समुदाय ने तीस लाख रूपये (जो 1920 में बहुत बड़ी रकम थी) भी अपने ही प्रयासों से जमा किये थे. लेकिन इस सबके बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को विशुद्ध तकनीकी तौर पर देखा और 1967 में यह फैसला सुना दिया कि एएमयू की स्थापना मुस्लिम समुदाय ने नहीं बल्कि तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने की थी.

सर्वोच्च न्यायालय की संवैधनिक पीठ ने ऐसा इसलिए माना क्योंकि जिस ‘एएमयू एक्ट’ के तहत एएमयू का गठन हुआ था वह एक संसदीय अधिनियम था जिसे तत्कालीन केंद्र सरकार ने पारित किया था. न्यायालय ने माना कि यदि मुस्लिम समुदाय चाहता तो 1920 में एक निजी विश्वविद्यालय की स्थापना कर सकता था. उस दौर में ऐसा कोई कानून नहीं था जो उसे ऐसा करने से रोकता हो. ऐसा कानून 1956 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के गठन के बाद बना. अब यूजीसी की अनुमति के बिना कोई भी विश्विद्यालय स्थापित नहीं किया जा सकता. लेकिन 1920 में ऐसा किया जा सकता था.

‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन’ ने कई सालों के संघर्ष के बाद सरकार को एएमयू के गठन के लिए राजी किया था. इसके लिए मुस्लिम समुदाय ने तीस लाख की रकम के साथ ही ‘मोहमदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज’ और ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन’ की संपत्ति भी उसे दी थी

सर्वोच्च न्यायालय का कहना था कि यदि मुस्लिम समुदाय ने निजी विश्वविद्यालय की जगह संसदीय अधिनियम के जरिये स्थापित हुए विश्वविद्यालय को चुना तो यह कैसे माना जा सकता है कि इसकी स्थापना मुस्लिम समुदाय ने की थी. न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी लिखा कि ‘यह हो सकता है कि 1920 का अधिनियम मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रयासों से ही पारित हुआ हो. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि इस अधिनियम से जो यूनिवर्सिटी स्थापित हुई, वह मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने स्थापित की थी.’

व्यावहारिक तौर पर देखें तो एएमयू के गठन के लिए मुस्लिम समुदाय के पास 1920 में ज्यादा विकल्प थे नहीं. सरकारी मान्यता वाली डिग्री के लिए उन्हें जिस यूनिवर्सिटी की जरूरत थी, वह सिर्फ सरकारी एक्ट से ही बन सकती थी. इसलिए ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन’ ने कई सालों के संघर्ष के बाद सरकार को एएमयू के गठन के लिए राजी किया था. इसके लिए मुस्लिम समुदाय ने तीस लाख की रकम के साथ ही ‘मोहमदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज’ और ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन’ की वह संपत्ति भी दी थी जो अधिकतर मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा ही दान की गई थी.

इसके अलावा तब मुस्लिम समुदाय को इस बात का तो भान भी नहीं रहा होगा कि 1947 में यह देश आजाद होगा और उसके बाद बने उसके संविधान में कुछ ऐसा होगा जो एएमयू पर खड़े आज के सवालों को जन्म देगा. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 30 में मौजूद उस कानूनी पेंच को ज्यादा अहमियत दी जिसके अनुसार किसी केंद्रीय अधिनियम द्वारा स्थापित हुई यूनिवर्सिटी को एक समुदाय द्वारा स्थापित नहीं माना जा सकता था. इस फैसले के साथ ही पहली बार घोषित रूप से एएमयू का ‘अल्पसंख्यक’ दर्जा छिन गया.

1977 में बनी जनता पार्टी सरकार की कैबिनेट ने - जिसमें वाजपेयी और आडवाणी भी शामिल थे - एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने के लिए एक संशोधन को मंजूरी दे दी थी. यह संशोधन सदन के पटल पर लाया भी गया लेकिन इसके पारित होने से पहले ही वह सरकार गिर गई

अज़ीज़ बाशा मामले का एक पहलू यह भी है कि इसकी सुनवाई के दौरान एएमयू न्यायालय में मौजूद ही नहीं था. यानी यह फैसला एएमयू को अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना ही दे दिया गया था. दरअसल, 1951 और 1965 के संशोधनों को एएमयू ने नहीं बल्कि कुछ अन्य मुस्लिम लोगों ने चुनौती दी थी. इन्हीं लोगों की याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुना दिया था. इस फैसले के बाद बड़े पैमाने पर यह मांग उठने लगी कि एएमयू का ‘अल्पसंख्यक चरित्र’ बरकरार रखा जाए और उसे यह दर्जा दिया जाए. यह मांग धीरे-धीरे इतनी बढ़ गई कि कुछ ही समय में एक चुनावी मुद्दा बन गई.

70 के दशक में सिर्फ कांग्रेस ने ही नहीं बल्कि अन्य दलों ने भी लोगों से एएमयू के अल्पसंख्यक चरित्र को बरकरार रखने का वादा किया. 1977 में बनी जनता पार्टी सरकार की कैबिनेट ने - जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी भी शामिल थे - एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने के लिए एक संशोधन को भी मंजूरी दे दी थी. यह संशोधन सदन के पटल पर लाया भी गया लेकिन इसके पारित होने से पहले ही वह सरकार गिर गई. इसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस और जनता पार्टी, दोनों ने अपने-अपने चुनावी घोषणापत्रों में एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा लौटाने का वादा किया.

1981 में अंततः कांग्रेस सरकार ने एएमयू एक्ट में संशोधन कर दिए. इन संशोधनों से 1967 का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पलट दिया गया और 1920 के मूल एक्ट की प्रस्तावना तक में बदलाव कर दिए गए. 1920 के एक्ट में दी गई ‘यूनिवर्सिटी’ की परिभाषा को भी इस संशोधन के जरिये बदल दिया गया. मूल एक्ट में लिखा गया था ‘यूनिवर्सिटी मतलब अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी.’ 1981 में इसे संशोधित कर लिखा गया, ‘यूनिवर्सिटी मतलब भारत के मुसलमानों द्वारा स्थापित किया गया उनकी पसंद का शैक्षिक संस्थान, जिसका जन्म मोहमदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज, अलीगढ के रूप में हुआ था और जिसे बाद में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बदल दिया गया.’

1981 के संशोधन का किसी ने भी विरोध नहीं किया था. तब से यह मामला लगभग शांत हो चुका था और 2005 तक शांत ही रहा. लेकिन 2005 में एएमयू के एक फैसले ने फिर से इस विवाद को हवा दे दी.

एएमयू की वकालत कर रहे अधिवक्ता बहार यू बर्की के अनुसार 1981 में जब कांग्रेस ने संसद में इन संशोधनों का प्रस्ताव रखा था तो जनता पार्टी ने भी इसका समर्थन किया था. उस दौर में भाजपा उपाध्यक्ष रहे राम जेठमलानी और जनता पार्टी से तत्कालीन सांसद रहे सुब्रमण्यम स्वामी भी इन संशोधनों के समर्थन में थे. 1981 में ही ये संशोधन संसद से पारित भी हो गए और एएमयू को उसका अल्पसंख्यक दर्जा वापस मिल गया.

1981 के संशोधन का किसी ने भी विरोध नहीं किया था. तब से यह मामला लगभग शांत हो चुका था और 2005 तक शांत ही रहा. लेकिन 2005 में एएमयू के एक फैसले ने फिर से इस विवाद को हवा दे दी. एएमयू ने साल 2005 से मेडिकल के पोस्ट ग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में 50 प्रतिशत आरक्षण मुस्लिम छात्रों को देने की व्यवस्था कर दी. 2005 से पहले यहां 75 प्रतिशत आरक्षण एएमयू के ही आंतरिक छात्रों (किसी भी धर्म के) के लिए हुआ करता था जबकि 25 प्रतिशत सीटों पर कोई आरक्षण नहीं था. 50 प्रतिशत आरक्षण मुस्लिम छात्रों को दिए जाने के एएमयू के फैसले को कुछ छात्रों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी और इस तरह से यह मामला एक बार फिर से विवादों और न्यायालयों में आ गया.

अक्टूबर 2005 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज जस्टिस अरुण टंडन ने इस मामले में फैसला देते हुए एएमयू का ‘अल्पसंख्यक दर्जा’ एक बार फिर से छीन लिया. न्यायालय ने 1967 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को सही माना और 1981 में किये गए संशोधनों को असंवैधानिक करार दिया. इसके साथ ही न्यायालय से 50 प्रतिशत आरक्षण मुस्लिम छात्रों को देने के फैसले को भी गलत बताते हुए इस पर रोक लगा दी. एएमयू के साथ ही तब की मनमोहन सरकार ने भी जस्टिस टंडन के इस फैसले का विरोध किया और उच्च न्यायालय की ही दो जजों की पीठ के समक्ष इस फैसले को चुनौती दी. 2006 की शुरुआत में इस पीठ ने भी अपना फैसला सुना दिया. पीठ ने जस्टिस टंडन के फैसले को ही सही बताया और माना कि एएमयू की स्थापना मुस्लिम समुदाय ने नहीं बल्कि तत्कालीन सरकार ने की थी लिहाजा उसे ‘अल्पसंख्यक का दर्जा’ नहीं दिया जा सकता.

आम तौर पर किसी एक सरकार के फैसले को अगली सरकार भी बरकरार रखती है. इसीलिए भाजपा सरकार द्वारा अपील वापस लेने पर न्यायालय ने भी मुकुल रोहतगी से सवाल किया था कि ‘क्या यह सिर्फ इसलिए किया जा रहा है क्योंकि केंद्र में सरकार अब बदल चुकी है.’

इस फैसले के खिलाफ भी अपील हुई और मामला अंततः सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया. साल 2006 में एएमयू के साथ ही तत्कालीन केंद्र सरकार ने भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी. तभी से यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित था. अब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी अपील वापस लेने का फैसला किया है.

आम तौर पर किसी एक सरकार के फैसले को अगली सरकार भी बरकरार रखती है और सिर्फ इसलिए कोई फैसला नहीं बदला जाता क्योंकि उसे किसी विपक्षी दल की सरकार ने लिया था. इसीलिए इसी साल अप्रैल में अपील को वापस लेने की सूचना देने पर न्यायालय ने मुकुल रोहतगी से सवाल किया था कि ‘क्या यह सिर्फ इसलिए किया जा रहा है क्योंकि केंद्र में सरकार अब बदल चुकी है.’ इसके जवाब में रोहतगी का कहना था कि वे पिछली सरकार के एक गलत कदम को सुधार रहे हैं.

वैसे अपने फैसले को सही ठहराने के लिए मौजूदा केंद्र सरकार के पास कई मजबूत तर्क हैं: उसके पास कई अदालतों के निर्णय हैं जो उस कानूनी पेंच पर टिके हैं जो कहता है कि किसी केंद्रीय अधिनियम द्वारा स्थापित हुई यूनिवर्सिटी को एक समुदाय द्वारा स्थापित नहीं माना जा सकता था. लेकिन यदि व्यावहारिक होकर इस पूरे मुद्दे को देखा जाए तो तमाम पहलू यही इशारा करते हैं कि एएमयू की स्थापना मुस्लिम समुदाय के लोगों ने ही की थी. अदालत ऐसा नहीं करती लेकिन राजनीतिक नेतृत्व ऐसा कर सकता है. मौजूदा सरकार चाहती तो कानूनी उलझन के दायरे से एएमयू को निकालकर उसे फिर से अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिला सकती थी. कुछ-कुछ वैसे ही जैसे 1980 के दशक में कांग्रेस से लेकर जनता पार्टी और जनसंघ तक ने मिलकर एएमयू को दिलाया था. लेकिन यह तभी संभव होता जब मौजूदा भाजपा नेतृत्व भी वैसी ही उदारता दिखाने को तैयार होता जैसी उसके मार्गदर्शकों ने 80 के दशक में दिखाई थी.