पश्चिम बंगाल में हिंदू धर्म का शाक्त मत काफी प्रचलित है जहां स्त्री शक्ति की दुर्गा के अलग-अलग रूपों में आराधना की जाती है. इस धार्मिक मत को उच्च वर्ग ने खूब बढ़ावा दिया है इसलिए यह बंगाल का मुख्य धार्मिक मत बन गया. हालांकि बंगाल के जनसाधारण में हिंदू धर्म की दूसरी शाखाएं, पूजा पद्धतियां और मान्यताओं का प्रचलन भी कम नहीं है.

कल से बंगाली नववर्ष शुरू हुआ है. इसके ठीक पहले हफ्तेभर यहां एक ऐसी धार्मिक परंपरा देखने को मिलती है जो मुख्यरूप से उत्तर भारतीय है, लेकिन वहां इसे अलग समय पर मनाया जाता है. इस समय राज्य के हुगली जिले और सुंदरबन के कई क्षेत्रों में सड़कों पर एक लाइन में तेजी से आगे बढ़ते सैकड़ों लोग दिखते हैं. ये बंगाल के कांवड़िये हैं.

कांधे पर बांस की कांवड़ और उसके दोनों सिरों पर छोटे-छोटे कलश में गंगाजल लिए ऐसे लोगों जत्था 300 साल पुराने तारकेश्वर शिव मंदिर की यात्रा पर हर साल जाता है. तारकेश्वर मंदिर कोलकाता से 60 किमी दूर उत्तर की तरफ है. कोलकाता से दिल्ली जाने के सड़कमार्ग पर यह मंदिर स्थित है. इसका निर्माण राजा भरमल्ला ने करवाया था और वे बंगाल के पहले नवाब मुर्शिद कुली खान के जमींदार थे.

यह बड़ी दिलचस्प बात है कि तारकेश्वर शिव मंदिर तक की इस कांवड़ यात्रा के बारे में बंगाली समुदाय के एक बड़े तबके को आज भी कुछ खास जानकारी नहीं है. हालांकि सुंदरबन क्षेत्र में ज्यादातर निचली जातियों के बीच यह परंपरा काफी लोकप्रिय है.

यह तीर्थयात्रा बंगाल के गजन त्योहार के दौरान आयोजित होती है. बंगाली वर्ष के आखिरी हफ्ते में मनाया जाने वाला यह त्योहार भगवान शिव, नील और धर्मठाकुर को समर्पित होता है. इसी दौरान कांवड़िए कलशों में गंगाजल भरकर तारकेश्वर मंदिर की तीन दिन की यात्रा पर निकलते हैं और आखिरी दिन यह जल शिव को अर्पित करते हैं.

यह तीर्थयात्रा उत्तर भारत में होनी वाली कांवड़ा यात्रा का एक लघु संस्करण है लेकिन वह सावन के महीने (जुलाई-अगस्त) में होती है और यह चैत्र (मार्च-अप्रैल) के महीने में.