आज से बंगाली नववर्ष शुरु हुआ है. इसके पहले दिन को राज्य में पहला बैशाख कहा जाता है. वहीं पंजाब, तमिलनाडु और केरल में भी अपने-अपने समाज के हिसाब से नववर्ष शुरू हुआ है. लेकिन इन सब में बंगाल का नववर्ष अपने कैलेंडर की वजह से सबसे अलग स्थान रखता है. उस कैलेंडर की वजह से जिसे मुगल बादशाह अकबर ने बनवाया था.

मुगल सल्तनत के तीसरे वारिस अकबर का शासन तकरीबन चार दशकों तक रहा. उस दौर में यह दुनिया का सबसे ताकतवर साम्राज्य था. जब शासन सुव्यवस्थित हो गया तो अकबर की दिलचस्पी राजव्यवस्था से इतर समाज के बौद्धिक और दार्शनिक पक्षों में बढ़ने लगी. अमर्त्य सेन ने अपनी किताब द आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन में बताया है कैसे दूसरे धर्मों में बढ़ती दिलचस्पी की वजह से अकबर उनसे जुड़े कैलेंडरों की तरफ भी आकर्षित हुआ. सेन लिखते हैं कि जब मुगल बादशाह ने एक मिलीजुली मान्यताओं वाला ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म चलाया तो इसके साथ ही सन 1584 में एक कैलेंडर – तारीख-ए-इलाही भी शुरू करवाया.

कई इतिहासकारों का मानना है कि अकबर ने कैलेंडर धार्मिक रुझान की वजह से शुरू नहीं करवाया था बल्कि इसके पीछे एक दूसरा मकसद था - कर वसूली को आसान बनाना

कैलेंडर शुरू करवाने की और भी वजहें थीं

कई इतिहासकारों का मानना है कि अकबर ने कैलेंडर धार्मिक रुझान की वजह से शुरू नहीं करवाया था बल्कि इसके पीछे एक दूसरा मकसद था. कर वसूली को आसान बनाना. बंगाली समाज का अध्ययन करने वाले इतिहासकार कुणाल चक्रबर्ती और शुभ्रा चक्रबर्ती इसबारे में लिखते हैं कि मुगलकाल में कर वसूली एक बड़ी पेचीदगीभरी कवायद हुआ करती थी क्योंकि इसका आधार इस्लामी कैलेंडर था और जो चंद्रमा की गति पर आधारित था. इस कैलेंडर में तारीख और महीने मौसम पर आधारित नहीं होते.

इसलिए अकबर ने अपने शाही खगोलविदों से नया कैलेंडर तैयार करने को कहा जो इस्लामिक कैलेंडर, ऐतिहासिक बंगाली कैलेंडर (संस्कृत में लिखे ग्रंथ सूर्य सिद्धांत पर आधारित) और अकबर के बादशाह बनने की तारीख पर आधारित हो.

नए कैलेंडर में भी थोड़ी पेचीदगी थी. इस्लामिक कैलेंडर की तरह इसका भी पहला साल हिज्र की तारीख से शुरू होता था. हिज्र वह दिन है जब पैगंबर मुहम्मद मक्का से मदीना गए थे. इस तारीख और पहली साल से अकबर के बादशाह बनने (सन 1556) तक के साल में तारीख की गणना इस्लामिक कैलेंडर या चंद्रमा की गति के आधार पर ही गई है.

तारीख-ए-इलाही पूरी मुगलिया सल्तनत के लिए शुरू किया गया था लेकिन दीन-ए-इलाही की तरह अकबर की मृत्यु के बाद पूरी सल्तनत में इसे बिसार दिया गया और आज यह सिर्फ बंगाल में प्रचलित है

इस हिसाब से अकबर के राज्यारोहण का साल 963 था. चूंकि यह मुगल सल्तनत के वारिस का बादशाह बनने का साल था शायद इसलिए बाद की तारीखों की गणना अलग ढंग से हुई. अब यहां से परंपरागत बंगाली कैलेंडर के हिसाब से साल शुरू हुए. अब यह सौर कैलेंडर बन गया.

आज से 1425वां बंगाली वर्ष शुरू हुआ है

बंगाली वर्ष की गणना इस सूत्र के हिसाब से होती है :

इस्लामी कैलेंडर के हिसाब से अकबर के राज्यारोहण का वर्ष (963) + वर्तमान में ग्रेगोरियन कैलेंडर का साल (2018) – अकबर के राज्यारोहण का ग्रेगोरियन साल (1556).

इस सूत्र का हल है – 1425, यह बंगाली वर्ष है जो आज से शुरू हुआ है.

तारीख-ए-इलाही पूरी मुगलिया सल्तनत के लिए शुरू किया गया था लेकिन दीन-ए-इलाही की तरह अकबर की मृत्यु के बाद इसे भी बिसार दिया गया. हालांकि इसका अपवाद सिर्फ बंगाल में बचा है जहां तारीख-ए-इलाही कृषि के साथ-साथ हिंदू धर्म का भी अभिन्न हिस्सा है. यह बड़ी ही दिलचस्प बात है कि जब बंगाल में कुछ दिनों के बाद चर्चा होगी कि साल 1425 में दुर्गा पूजा कब पड़ रही है तो अनजाने में इस धार्मिक आयोजन का संबंध पैगंबर मोहम्मद के मक्का से मदीना जाने और अकबर के राज्यारोहण की तारीख से जुड़ जाएगा.