‘पनामा पेपर्स’ ने जर्मन दैनिक ‘ज़्युइडडोएचे त्साइटुंग’ के दो युवा पत्रकारों को रातोंरात दुनिया में मशहूर कर दिया है. दक्षिणी जर्मनी में म्यूनिक से प्रकाशित होने वाला यह दैनिक जर्मनी के सबसे बड़े अखबारों में से एक है. 38 वर्षीय बास्टियान ओबरमायर और 32 साल के फ्रेडरिक ओबरमायर का कुलनाम भले ही एक जैसा है – और दोनों इस दैनिक के संपादकीय कार्यालय वाली गगनचुंबी इमारत की 24 वीं मंजिल पर भले ही एक ही कमरे में बैठते भी हैं –लेकिन उनके बीच सहकर्मी होने के सिवाय और कोई आपसी रिश्ता नहीं है. तीन अप्रैल को 76 देशों के 109 अख़बारों, टेलीविज़न चैनलों और ऑनलाइन मीडिया में ‘पनामा पेपर्स’ का एकसाथ प्रकाशन शुरू होने से पहले, साल भर की छानबीन और तैयारियों पर प्रकाश डालते हुए, दोनों ने मिलकर एक किताब लिखी है. 350 पन्नों की इस किताब के जर्मन नाम का हिंदी में अर्थ है- ‘एक विश्वव्यापी भंडाफोड़ की कहानी.’

अपने उस कमरे को ये दोनों पत्रकार 'वॉर रूम' कहना पसंद करते हैं जहां ‘पनामा पेपर्स’ के साथ-साथ उनकी पुस्तक ने भी आकार लिया. 

अपने उस कमरे को ये दोनों पत्रकार 'वॉर रूम' कहना पसंद करते हैं जहां ‘पनामा पेपर्स’ के साथ-साथ उनकी पुस्तक ने भी आकार लिया. फ़ाइलों से भरी ढेर सारी ऑलमारियों और दीवारों पर लगे कई चार्टों वाले इस कमरे के कांच के दरवाज़े को अपारदर्शी बनाने के लिए उस पर एक फ़ोलियो चिपका दिया गया है. अपने लैपटॉप वे ज़ंजीर से बांध कर तिजोरी-जैसे एक विशेष आवरण में रखते हैं. आवरण के स्क्रू एक ऐसे चमकीले रंग की मदद से सील कर दिये जाते हैं कि अगर किसी ने उनके साथ कोई छेड़छाड़ की तो तुरंत दिखाई पड़ जाए. कमरे का कांच का दरवाज़ा कुल जमा केवल चार लोग खोल सकते हैं. यह युद्धस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था इसलिए कि गुमनाम स्रोत उनके कंप्यूटर पर जो अत्यंत गोपनीय सनसनीखेज़ सामग्रियां भेजता रहा है, उनकी किसी और को भनक तक न लग सके.

अब तक की सबसे बड़ी लीक

‘पनामा पेपर्स’ का प्रकाशन गोपनीय दस्तावेज़ों को उड़ा कर मीडिया के माध्यम से लीक करने की अब तक की सबसे बड़ी घटना है. इसने वर्तमान और पूर्व राष्ट्रपतियों-प्रधानमंत्रियों सहित विश्व के 143 देशों के नेताओं, 50 अरबपति धनकुबेरों, सैकड़ों बड़े-बड़े मैनेजरों, कई नामी खिलाड़ियों, अभिनेताओं, कलाकारों, तस्करों और कारोबारी बैंकों तक की पोल खोली है.

अमेरिका में 1941 में बनी जॉन डू नाम की एक फ़िल्म बहुत लोकप्रिय हुई थी. तभी से अपने आप को गुमनाम रखने के इच्छुक अमेरिकी अपना परिचय अक्सर इसी नाम से देते हैं. 

बास्टियान ओबरमायर ‘ज़्युइडडोएचे त्साइटुंग’ के ‘इनवेस्टिगेटिव रिसर्च’ विभाग के सहप्रमुख हैं. वे कहते हैं, 'इस लीक की कहानी 2015 की गर्मियों वाली एक शाम को शुरू होती है. उस दिन, देर शाम को उन्हें कंप्यूटर पर एक संदेश दिखाई पड़ा – ‘हैलो, मैं जॉन डू बोल रहा हूं. डेटा पाने में दिलचस्पी है? मैं साझा करने को तैयार हूं.’

कौन था अज्ञात स्रोत

अमेरिका में 1941 में बनी जॉन डू नाम की एक फ़िल्म बहुत लोकप्रिय हुई थी. तभी से अपने आप को गुमनाम रखने के इच्छुक अमेरिकी अपना परिचय अक्सर इसी नाम से देते हैं. तो क्या इसका अर्थ यह लगाया जाये कि मध्य अमेरिकी देश पनामा की क़ानूनी सहायता देने वाली मोसाक-फ़ोन्सेका नाम की जिस एजेंसी के डेटाबैंक में सेंध लगा कर ‘पनामा पेपर्स’ चुराये गए थे, उन्हें चुराने और लीक करने वाला व्यक्ति कोई अमेरिकी है? ‘

ज़्युइडडोएचे त्साइटुंग’ के दोनों पत्रकार न तो अपनी किताब और न ही मीडिया के साथ अपने साक्षात्कारों में इस अटकल का खंडन या मंडन करते हैं. उनका कहना है कि वे नहीं जानते कि किसने और क्यों 21 देशों में चल रही 2,14,000 हज़ार दिखावटी फ़र्मों की पोल खोलने वाले एक करोड़ 15 लाख दस्तावेज़ उन्हें मुफ्त में दिये. ये देश करचोरी और काले धन को छिपाने के स्वर्ग कहे जाते हैं.

बास्टियान ओबरमायर का कहना है कि इन दस्तावेज़ों की पेशक़श इतनी आकर्षक थी कि उन्होंने इसे स्वीकार करने में देर नहीं की.

बास्टियान ओबरमायर का कहना है कि इन दस्तावेज़ों की पेशक़श इतनी आकर्षक थी कि उन्होंने इसे स्वीकार करने में देर नहीं की. उन्होंने बिल्कुल नहीं सोचा कि जिस अज्ञात स्रोत ने संदेश भेजा था, वह न सिर्फ बदले में एक पैसा तक नहीं लेगा, बल्कि तरह-तरह की ऐसी असाधारण जानकारियों का अंबार लगा देगा कि दुनिया में भूकंप आ जायेगा. उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि वे कुछ ऐसा करने जा रहे हैं जो देखते ही देखते उन्हें दुनिया भर में मशहूर कर देगी.

सूचनाओं का अंबार

बास्टियान ओबरमायर की तरह ही उनके कनिष्ठ सहयोगी फ्रेडरिक ओबरमायर भी पुलकित थे. सूचनाओं का अंबार इतना विशाल था कि उसे इकट्ठा करने के लिए ‘ज़्युइडडोएचे त्साइटुंग’ ने 17 हज़ार यूरो की लागत से उच्च क्षमता वाला एक नया कंप्यूटर ख़रीदा और दोनों खोजी पत्रकारों को एक साल तक केवल यही काम करने की पूरी छूट दे दी. जर्मनी में ऐसा शायद ही पहले कभी हुआ होगा कि किसी पत्रकार को किसी एक ही विषय पर पूरे साल काम करने की छूट दे दी गई हो.

तब भी, दोनों खोजी पत्रकार जानते थे कि वे इन सारे दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता और उनके पीछे छिपे नामों व चेहरों की छानबीन अपने ही बलबूते पर नहीं कर सकते. उन्हें दूसरे देशों के पत्रकारों का भी सहयोग लेना होगा. इस बात को भी अचूक ढंग से सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी देश में रत्ती भर भी कोई जानकारी समय से पहले लीक नहीं होनी चाहिये. मीडिया ही नहीं, सरकारों और गुप्तचर सेवाओं को भी कोई भनक नहीं लगनी चाहिये. उन्हें यह भी सुनिश्चित करना था कि छानबीन से जो कुछ भी सामने आए, वह किसी भूकंप की तरह एक साथ सारी दुनिया को हिला दे.

खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय कंसोर्टियम

यही हुआ. बास्टियान और फ्रेडरिक ओबरमायर ने वॉशिंगटन स्थित खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय गठबंधन (इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ़ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स – आईसीआईजे) से संपर्क किया. आईसीआईजे 65 देशों के लगभग 200 पत्रकारों का एक ऐसा नेटवर्क है, जो खोजी पत्रकारिता के सामूहिक हित में बना तो था 1997 में, लेकिन जगप्रसिद्ध हुआ था तीन साल पहले तथाकथित ‘ऑफ़शोर लीक्स’ के द्वारा.

दोनों जानते थे कि वे इन सारे दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता और उनके पीछे छिपे नामों व चेहरों की छानबीन अपने ही बलबूते पर नहीं कर सकते. उन्हें दूसरे देशों के पत्रकारों का भी सहयोग लेना होगा.

उस समय किसी ने इस गठबंधन के प्रमुख जेराल्ड रायली को करचोरी का स्वर्ग कहलाने वाले देशों से संबंधित ऐसी ढेर सारी गोपनीय जानकारियां भेजी थीं, जो विदेशों में अमेरिकी दूतावासों और उसके विदेश मंत्रालय के बीच संदेशों के आदान-प्रदान वाली ‘विकीलीक्स फ़ाइलों’ से भी 160 गुना भारी-भरकम थीं. इन फ़ाइलों का प्रकाशन ‘विकीलीक्स’ की अपनी इंटरनेट साइट पर नवंबर 2010 में शुरू हुआ था. आईसीआईजे द्वारा ‘ऑफ़शोर लीक्स’ के बाद विदेशों में चीनी नेताओं की संपत्तियों और लक्सेमबुर्ग तथा स्विट्ज़रलैंड के बैंकों के गोरखधंधों की पोल खोलने वाले गोपनीय दस्तावेज़ भी प्रकाश में लाए गए थे.

हर दिन कुछ नई बातें

जेराल्ड रायली का कहना है कि इन पिछले भंडाफोड़ों ने ही ‘पनामा पेपर्स’ की भूमिका का काम किया. वे कहते हैं, ‘हम बहुत कम लागत पर वर्चुअल (कंप्यूटरों वाले आभासी) न्यूज़रूम बना सकते हैं. ‘पनामा पेपर्स’ के दस्तावेज़ हम ऐसे सर्वर कंप्यूटरों पर रख रहे हैं जिन्हें इस अभियान में शामिल दुनिया भर के सभी न्यूज़रूम जब चाहे तब देख सकते हैं. पांच-दस साल पहले यह सब असंभव होता.’ आईसीआईजे के आभासी समाचारकक्षों में बैठे खोजी पत्रकार, अपने देशों और महाद्वीपों की सीमाओं के पार अब भी एक-दूसरे के संपपर्क में हैं. वे प्रश्नों और समस्याओं पर बातचीत करते हैं. विचारों का आदान-प्रदान करते हैं. अब भी सारे दस्तवाज़ों को हर तरफ से जांचा-परखा नहीं जा सका है. हर दिन कुछ नई बातें सामने आ रही हैं.

दोनों जर्मन पत्रकारों ने आईसीआईजे का सहयोग प्राप्त करना इसलिए भी उचित समझा कि उसके वॉशिंगटन कार्यालय के पास रिपोर्टरों और कंप्यूटर डेटा विशेषज्ञों के रूप में 12 लोगों की एक अनुभवी टीम है.

‘ज़्युइडडोएचे त्साइटुंग’ के दोनों जर्मन पत्रकारों ने आईसीआईजे का सहयोग प्राप्त करना इसलिए भी उचित समझा कि उसके वॉशिंगटन कार्यालय के पास रिपोर्टरों और कंप्यूटर डेटा विशेषज्ञों के रूप में 12 लोगों की एक अनुभवी टीम है. इससे खोज में मिली जानकारियों का त्वरित विश्लेषण आसान हो जाता है. इस नेटवर्क से जुड़े और दुनिया भर में फैले सभी खोजी पत्रकारों की तरह ही आईसीआईजे का स्टाफ़ भी परम गोपनीयता की शपथ से बंधा होता है. अब तक के अनुभव दिखाते हैं कि इस शपथ का सभी पूरी ईमानदारी से पालन करते हैं. खोजी पत्रकारिता ख़तरे से ख़ाली भी नहीं होती. उदाहरण के लिए, आईसीआईजे को पनामा के दैनिक ‘ला प्रेन्सा’ के रिपोर्टरों की सहायता लेनी पड़ी. वे बुलेटप्रूफ़ जैकेट पहने बिना सड़क पर नहीं जाते.

काले धन वालों के नाम पर कालिख

भारत के द इंडियन एक्सप्रेस, ब्रिटेन के गार्डियन और फ्रांस के ले मोंद जैसे नामी दैनिकों के अलावा जर्मनी के एनडीआर और ब्रिटेन के बीबीसी जैसे बड़े सार्वजनिक प्रसारकों के सहयोग से लगभग एक साल तक विश्वव्यापी गुप्त तैयारी चलती रही. यह तैयारी सोमवार चार अप्रैल के दिन एक ऐसे धमाके के साथ सामने आई, जिसने लाखों लोगों के होश उड़ा दिये. दुनिया को पता चला कि कैसे नेताओं से लेकर अभिनेताओं और खिलाड़ियों तक कई लोग पूरी बेशर्मी के साथ अपने देशवासियों को लूट रहे हैं.

भारत के द इंडियन एक्सप्रेस, ब्रिटेन के गार्डियन और फ्रांस के ले मोंद जैसे नामी दैनिकों के अलावा जर्मनी के एनडीआर और ब्रिटेन के बीबीसी जैसे बड़े सार्वजनिक प्रसारकों के सहयोग से लगभग एक साल तक विश्वव्यापी गुप्त तैयारी चलती रही. 

‘पनामा पेपर्स’ का मुख्य सूत्रधार होने के नाते बास्टियान ओबरमायर के लिए खाने-पीने और सोने का कोई निश्चित समय नहीं रहा. एक वर्ष का सारा समय देश-विदेश की यात्राओं में निकल गया. एक रेडियो इंटरव्यू में पीछे मुड़ कर देखते हुए उन्होंने कहा, ‘पहली बात, इतना काम था कि पूछिये मत! हम तो पहले से ही साफ़-साफ़ जानते थे कि यह हमारे अकेले के बूते की बात नहीं है. दूसरी बात यह थी कि हमें इतनी सारी अंतरराष्ट्रीय कथा-कहानियां मिलीं, अफ्रीका या दक्षिणी अमेरिका में भ्रष्टाचार कांडों के इतने सारे तार और सुराग मिले कि हमने सोचा कि अगर हम सब कुछ लिखने लगे, तो कौन जाने वे हमें क्या-क्या ऐसा सुनाने लगें, जिनको पढ़ने में जर्मनी में किसी की रुचि ही न हो. लेकिन वहां, उन देशों में लोगों की उन्हें जानने में बेहद दिलचस्पी हो. हम नहीं चाहते थे कि वे कथा-कहानियां अनकही रह जायें. इसलिए यह किताब लिखी.’

‘एक विश्वव्यापी भंडाफोड़ की कहानी’ नाम की यह पुस्तक करचोरी और काले धन को छिपाने के विश्वव्यापी गोरखधंधे को उजागर करने की कहानी है. दोषी पनामा जैसे वे छोटे-मोटे देश ही नहीं हैं, जहां की फलती-फूलती अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह गोरखधंधा रीढ़ की हड्डी बन गया है. मुख्य दोषी वे सफ़ेदपोश भद्रजन हैं, जो अपने देशों के कर्णधार हैं. जिनके दांत खाने के और, दिखाने के और होते हैं और जो मुंह में राम, बगल में छुरी लेकर चलते हैं.

पुस्तक अपने प्रथम संस्करण में 50 हज़ार प्रतियों के साथ छह अप्रैल से जर्मनी में बिक रही है. उसके प्रकाशक हेल्गे माल्शो का कहना है, ‘यह एक बेहद दिलचस्प किस्सा है, जो पढ़ने में किसी जासूसी उपन्यास की तरह लगता है. पढ़ने वाला समझ पाता है कि टैक्स हैवन सिस्टम कैसे काम करता है. राजनीति, अर्थव्यवस्था, कला, खेल-कूद, मनोरंजन और भद्रजनों से संबंधित वे किस्से-कहानियां, जिन्हें अख़बारों में जगह नहीं मिलती, उनका क्या आयाम है.’