दशकों पहले श्रीकांत वर्मा ने अपनी एक कविता में कोसल (कौशल) को ‘कल्पना में गणराज्य’ बताया था. हाल ही में ईरानी-अमरीकी लेखिका अज़हर नफ़ीसी की एक आलोचना-पुस्तक विलियम हाइनमान ने प्रकाशित की है जिसका नाम है ‘दि रिपब्लिक ऑव इमेजिनेशन’. उनकी एक पुस्तक ‘रीडिंग लोलिता इन तेहरान’ की लाखों प्रतियां बिकी थीं. इस नयी पुस्तक में उन्होंने लोकतांत्रिक समाजों के लिए गल्प के महत्व पर विचार किया है.
इस पुस्तक से ही यह जानकारी मिली कि अमरीका में पुस्तकों की दूकानें, संग्रहालय, रंगशालाएं, प्रदर्शनकारी कलाओं के केन्द्र, ललित कला और संगीत के विद्यालय धीरे-धीरे बंद किये जा रहे हैं. नफ़ीसी यह अटकल लगाती हैं कि क्या विचारों और कल्पना के लिए आदर के बढ़ते अभाव और धनियों और ग़रीबों के बीच बढ़ते अंतर के बीच कोई संबंध है. वे मानती हैं कि अमरीका में शिक्षा की मशीनी धारणा का वर्चस्व हो रहा है जिससे एक ऐसा रूख़ उभर रहा है जो ज्ञान के लिए गहरे पैशन, कल्पना और विचार की जरूरत को ख़ारिज करता है.
यहां यह याद किया जा सकता है कि कम से कम बीसवीं शताब्दी के सबसे महान् वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने कहा था - ‘कल्पना ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण है. ज्ञान सीमित होता है कल्पना सारे संसार को घेरती है.’ व्लदिमीर नाबोकोव का मत था - ‘आपको वैज्ञानिक के पैशन और कवि की सूक्ष्मता की ज़रूरत होती है.’ इन दोनों ने क्रमशः नाज़ी जर्मनी और सोवियत रूस से भागकर अमरीका में शरण ली थी.
प्रसिद्ध चैक लेखक वॉक्लाव हावेल ने, जो बाद में वहां के राष्ट्रपति भी चुने गये थे, कहा था - ‘उम्मीद एक मानसिक अवस्था होती है, संसार की अवस्था नहीं. इस गहरे अर्थ में उम्मीद न तो उस सुख जैसी होती है जो सब कुछ ठीक चलने के भाव से उपजता है और न ही उन उपक्रमों में निवेश करने की इच्छा जैसी, जो सफल होने ही होने हैं. वह तो एक तरह की ऐसा कुछ करने की क्षमता होती है जो अपने आप में अच्छा है.’
नफ़ीसी कहती हैं कि उन्हें लगता है कि सभी महान् कला और साहित्य, मानवता के सभी महान् कार्य इसी नाजुक पर बहुत टिकाऊ उम्मीद पर आधारित होते हैं. कला का एक काम मनुष्य के टिके रहने का गवाह और इतिहासकार होना है, यह निश्चयात्मक साक्ष्य देना है कि ‘हम रहे हैं.’
नफ़ीसी यह भी बताती हैं कि कहानियां टिकाऊ हैं और वे हमारे साथ इतिहास की शुरूआत से रही हैं. उन्हें हर पीढ़ी में नये पाठकों की आंखों और अनुभवों के हिसाब से ताज़ा कहने और फिर कहने की दरकार होती है. ये पाठक उस स्पेस का हिस्सा होते हैं जो राजनीति या धर्म, जातीयता या लिंग की सीमाएं नहीं मानता और एक ऐसा गणराज्य रचता है जो कल्पना का और सबसे लोकतांत्रिक गणराज्य होता है.
अगर किसी एक लेखक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है तो यह हज़ारों पाठकों को भी पढ़ने के अधिकार से वंचित करना है. भारत में आज जिन बंदिशों से हम घिरते जा रहे हैं उनके रहते क्या हम अपने कल्पना के गणराज्य को जीवित, जीवन्त और सशक्त रख पायेंगे’ यह प्रश्न तेज़ी से उठता है.
लोकतंत्र का लगातार सत्यापन होना जरूरी है, इसलिए प्रतिरोध भी जरूरी है
हम कुछ लेखकों-कलाकारों ने मिलकर बढ़ती असहिष्णुता को लेकर 1 नवंबर 2015 को दिल्ली में एक आयोजन ‘प्रतिरोध’ नाम से किया था. इसमें इस मुद्दे पर लेखकों, कलाकारों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों आदि ने अपना आक्रोश और विरोध व्यक्त किया था. उसके बाद से जो वृत्तियां, वर्तमान सत्ता के मौन या मुखर समर्थन से, उभरती-फैलती नज़र आ रही हैं उनके लिए असहिष्णुता शब्द नाकाफ़ी हो गया है.
अब अभिव्यक्ति बहुत सतही स्तर पर उतार दी गयी है और विचारों से मुठभेड़ करने के बजाय नारों आदि को लेकर आपत्ति की जा रही है. पूरी बेशर्मी से पुलिस आदि का सहारा लिया जा रहा है. लोकतांत्रिक अधिकारों का दुरुपयोग खानपान, स्वप्नशीलता, प्रश्न पूछने को बाधित करने के लिए किया जाने लगा है. देश-भक्ति को एक नारे में सीमित कर दिया गया है. जो बोले वह भक्त, जो न बोले वह द्रोही. ज्ञान के संस्थानों पर हमला हो रहा है जिससे स्पष्ट है कि सत्ता ज्ञान, विचार और बुद्धि से, तर्क-संवाद, विवाद से डर या मुकर रही है. अब देश की सबसे बड़ी समस्याएं ग़रीबी, बेरोज़गारी, निरक्षरता, असमानता आदि नहीं है बल्कि देशभक्ति या उसका अभाव है.
सिविल समाज को ध्वस्त करने की साज़िश अब साफ़ ज़ाहिर है. हर व्यक्ति को दूसरे पर शक करने, उस पर निगरानी रखने के लिए उत्साहित किया जा रहा है. सहज मानवीयता पर आधारित सामुदायिकता को धर्म-नैतिकता की संकीर्ण धारणाओं पर आधारित साम्प्रदायिकता में बदलने की लगातार कोशिश हो रही है.
इस बीच छात्रों, युवाओं, अध्यापकों, दलितों आदि ने एकजुट होकर जो सजगता-सक्रियता दिखायी है उसमें प्रतिरोध का नया रास्ता और कारगर विकल्प नज़र आ रहे हैं. दिल्ली में 8 अप्रैल 2016 को आयोजित ‘प्रतिरोध-2’ में इस बार सबसे स्पष्ट और मुखर इलाहाबाद, हैदराबाद और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रनेता ही थे. उनके मार्मिक और प्रभावशाली वक्तव्यों से यह स्पष्ट हुआ कि सौभाग्य से उनकी उग्रता निरी वाम या दलित उग्रता नहीं है. वे अपनी विरासत गांधी और अंबेडकर में, भारतीय संविधान के प्रावधानों, वैचारिक बहुलता में खोज-पा रहे हैं.
इन छात्रों ने जाति प्रथा पर कठोर प्रहार किये और ‘आज़ादी’ को वास्तविक बनाने के लिए आदिवासियों, स्त्रियों, अल्पसंख्यकों, दलितों आदि को पूरी समता और गरिमा दिये जाने के लक्ष्य को रेखांकित किया. कहा जाता है कि लोकतंत्र हर समय अपने को सत्यापित किये जाने की मांग करता है. इन युवाओं की मांगें हमारे कठिन-जटिल समय में पूंजी-बाज़ार-धार्मिक विद्वेष-जातिगत हिंसा-आतंकवाद के बरक़्स लोकतंत्र के नये सत्यापन की है. मावलंकर हाल में, जो तीन घंटे से अधिक पूरी तरह भरा रहा, उपस्थित लेखकों-कलाकारों-बुद्धिजीवियों ने इस युवा ऊर्जा, उनके खुलेपन और वैचारिक ताज़गी से बहुत उत्साहित अनुभव किया.
इसमें संदेह नहीं दैनिक दु:स्वप्नों के घेरे में हम परिवर्तन और प्रश्नवाचकता की नयी लहर उठते, नये स्वप्न को आकार लेते देख पा रहे हैं. यह किसी सौभाग्य से कम नहीं. यह सौभाग्य सिर्फ़ हमारा नहीं समूचे लोकतंत्र का हो सकता है, इसमें कम से कम मुझे संदेह नहीं है.
जैसी बेचैनी कृष्णा सोबती में है, युवा लेखकों में क्यों नहीं दिखती!
‘प्रतिरोध-2’ के आरंभिक वक्तव्य में मैंने महात्मा गांधी के कुछ विचार उद्धृत किये जिन्हें इस बुरे समय में, जो अच्छे दिनों के बदले आया है, याद करने से ताक़त मिलती हैं. गांधी जी ने कहा था: ‘सत्य का सन्धान किसी गुफा में बैठकर नहीं किया जा सकता. चुप्पी का कोई अर्थ नहीं जब बोलना ज़रूरी हो.’ ‘सत्य मानवीय हृदय में रहता है और हमें उसे वहीं खोजना पड़ता है और हमें उसकी रोशनी में चलना चाहिये पर किसी को यह हक़ नहीं है कि वह अपना सत्य दूसरों पर थोपे और उन्हें उसके सत्य के अनुसार चलने पर मजबूर करे.’ ‘ईश्वर ने मनुष्य को बेहतर-बदतर के बिल्ले के साथ नहीं बनाया: ऐसे किसी धर्मग्रन्थ का, जो किसी मनुष्य को निचला या अछूत बताता है, हम अनुसरण नहीं कर सकते क्योंकि यह ईश्वर और सत्य दोनों का निषेध है.’
वयोवृद्ध साहित्यकार कृष्णा सोबती अपनी शारीरिक अशक्तता के बावजूद आयीं और उन्होंने एक बार पूरी ओजस्विता से राष्ट्रपति के नाम लिखा अपना पत्र पढ़कर सुनाया उनका लिखा - ‘राष्ट्र की साहित्यिक संस्कृति नागरिक समाज की थाती है’ शीर्षक का निबंध श्रोताओं में बांटा गया. कृष्णा जी ने इस निबंध में कहा है कि ‘हम यह न भूलें कि हमारी संस्कृति का प्रमुख पक्ष विचार-स्वातन्त्र्य ही रहा है. यह तब भी मौजूद रहा, जब हम दूसरों के अधीन थे. विचार की इस लम्बी प्रक्रिया ने ही भारतीय दर्शन और चिंतन को विशेष बनाया है. यही भारतीय संस्कृति और जीवनशैली का मुखड़ा है... विभिन्न समाजों के प्रभावों को आत्मसात करने की स्वभावगत क्षमता और लचक ने भारतीय संस्कृति को सांस्कृतिक घनत्व प्रदान किया है.’
कृष्णा जी ने आगे कहा है: ‘ऐसे में कोई कट्टरपन्थी विचारधारा अगर राष्ट्रीय अनुशासन की जगह नागरिक की व्यक्तिगत रूचि-वृत्ति पर अपनी संकीर्ण कट्टर अलगाववादी संहिता थोपने का प्रयत्न करेगी तो यक़ीनन जनमानस उसका विरोध करेगा आखि़र कोई भी राजनीतिक दल अपने को भारतीय संस्कृति का अलंबरदार क्यों समझ बैठे? वह किसी राजनीतिक दल की पूंजी नहीं, किसी भी राजनीतिक दल की बपौती नहीं बल्कि नागरिक समाज की थाती है. यह विरासत उन्हीं से उपजी है और उन्हीं में प्रवाहित होती है.’
कृष्णा जी की स्पष्ट मान्यता है - ‘लोगों को विभाजित करने की रणनीतियां न सिर्फ़ लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध होंगी, वे आनेवाली पीढ़ियों और उनके भविष्य के लिए भी खतरनाक हैं. आज युवा वर्ग के लेखकीय और नागरिक रूझान बदल रहे हैं. उन्हें अनदेखा कर हिंसक टोलियों की मदद से पुराते खातों से ऋण उगराने का मसविदा बेमानी है.’ यह स्पष्टता निश्चय ही प्रेरक और वरेण्य है, पर कृष्णा जी के कई हम उम्र लेखक इस समय चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? हर विषय पर सुबह-शाम बोलनेवाले इन मुद्दों पर चुप क्यों हैं? युवा लेखकों में भी इस तरह की व्यापक बेचैनी और तीखा प्रतिरोध विकसित हुआ इसका मुझे पता नहीं है होना ज़रूर चाहिये.
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