इस 14 अप्रैल को लगभग सभी राजनीतिक दल अंबेडकर-अंबेडकर खेलते रहे. प्रधानमंत्री अंबेडकर की दीक्षाभूमि कहे जाने वाले नागपुर जाकर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर आए. इससे पहले उनका कहना था, ‘एक सशक्त, समृद्ध एवं समावेशी भारत के निर्माण के डॉ अंबेडकर के स्वप्न की दिशा में हम अपने प्रयासों के प्रति अटल हैं.’ बीते साल इसी दिन उन्होंने कहा था कि अगर अंबेडकर न होते तो वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाते.

भारतीय राजनीति में अंबेडकर के नाम की यह बढ़ती हुई प्रासंगिकता बताती है कि भारतीय लोकतंत्र का पहिया - कम से कम चुनावी राजनीति के स्तर पर - उन दलित बस्तियों तक जा रहा है जो बरसों और सदियों तक सामाजिक तौर पर अछूत बनी रही हैं. यह इस लिहाज से एक शुभ लक्षण है कि हमारे लोकतंत्र ने इन्हें एक नई स्पृश्यता बख़्शी है.

लेकिन यहीं से खतरा भी शुरू होता है, अंबेडकर के दुरुपयोग का खतरा. ठीक वैसे ही दुरुपयोग का, जैसा एक ज़माने में गांधी का होता रहा. भारतीय राजनीति ने गांधी को ऐसी श्रद्धामूर्ति में बदल दिया जो बस पूजा का सामान रह गई, जिसका भारतीय जीवन और समाज में कोई स्पंदन नहीं बचा.

लेकिन यह गांधी के होने का वैशिष्ट्य है कि अपने सारे दुरुपयोग के बावजूद, बार-बार अपनी प्रासंगिकता पर उठाए जाने वाले सवालों के बाद भी, गांधी न अप्रासंगिक होते दिखते हैं और न ही पुराने पड़ते. वे बार-बार लौटते हैं और हमारी सार्वजनिक शुचिता के इम्तिहान लेते रहते हैं.

अंबेडकर इस पर अडिग थे कि यह भारतीय समाज जब तक अपनी सबसे बड़ी व्याधि - अपने हिंदुत्व - से मुक्त नहीं होगा, तब तक राजनीतिक अधिकारों के बावजूद सामाजिक बराबरी का सपना सपना ही बना रहेगा

इसी अनुभव से यह उम्मीद भी कर सकते हैं कि अपने सारे दुरुपयोग की कोशिश के बावजूद अंबेडकर भी बचे रहेंगे. यही नहीं, अपने कहीं ज़्यादा विकट जीवन और इससे ही निकली ठोस वैचारिकी की वजह से अपना दुरुपयोग करने वालों को पीछे छोड़ते रहेंगे, उन्हें बार-बार मायूस करेंगे.

अंबेडकर इस धारणा को लेकर अडिग थे कि यह भारतीय समाज जब तक अपनी सबसे बड़ी व्याधि - अपने हिंदुत्व - से मुक्त नहीं होगा, तब तक राजनीतिक अधिकारों के बावजूद सामाजिक बराबरी का सपना सपना ही बना रहेगा. इसलिए हिंदूवादी राजनीति के तथाकथित सुधारवादी एजेंडे को वे बार-बार ठोकर मारते रहे. 1936 में जब जात-पांत तोड़क मंडल अपने जलसे की अध्यक्षता के लिए उन्हें न्योता भेजता है तो वे ऐसा भाषण तैयार करते हैं कि वह न्योता वापस ले लिया जाता है. ‘जाति का नाश’ (एनाहिलेशन ऑफ कास्ट) नाम का यह परचा अंबेडकर ख़ुद छापते हैं और बताते हैं कि अंतरजातीय विवाहों से जात-पांत नहीं टूटेंगे, बल्कि उसके लिए उस धार्मिक अवधारणा को ही नष्ट करना होगा कि जिसकी कोख से यह जातिवाद निकला है.

संविधान निर्माता अंबेडकर को याद करने वाले और अपने प्रधानमंत्रित्व का श्रेय तक उन्हें दे डालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक यह नहीं बताया है कि इस मशहूर लेख पर वे, उनका राजनीतिक दल और उनका राजनीतिक परिवार क्या सोचते हैं. वे जय भीम का नारा तो लगा रहे हैं, लेकिन क्या जयश्री राम को छोड़ने को तैयार होंगे? वे मनुस्मृति जलाने वालों पर कानूनी कार्रवाई चाहते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि यह काम सबसे पहले बाबा साहेब अंबेडकर ने ही किया था. उन्हें शायद यह पता भी नहीं होगा कि अंबेडकर बहुसंख्यकवाद के ख़तरों की शिनाख्त आज़ादी के पहले ही कर रहे थे और दुनिया भर के उदाहरण देते हुए कर रहे थे. इसमें शक नहीं कि इस वैचारिक कसौटी पर संघ परिवार के लिए अंबेडकर बिल्कुल लोहे का चना साबित होंगे जिसे चबाना असंभव होगा.

दलील दी जा सकती है कि जब मायावती अंबेडकर के विचारों पर नहीं चल रहीं, जब समाजवादी एजेंडा उनसे दूर खड़ा है तब भाजपा से ही यह अपेक्षा क्यों की जाए कि वह उनके रास्ते पर चलेगी. संसदीय लोकतंत्र में सब जैसे अलग-अलग नामों को भुनाने की कोशिश में लगे हैं वैसे ही भाजपा को भी हक़ है कि वह ये सारे नाम भुनाए. भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल के साथ वह यह कोशिश पहले भी कर चुकी है. यह अलग बात है कि इसमें कोई बड़ी कामयाबी उसे अब तक नहीं मिली है.

बहरहाल, ठोस रणनीतिक स्तर पर भी अंबेडकर भाजपा के बहुत काम आने वाले नहीं हैं. हाल के समय में भाजपा अपनी सवर्ण पहचान को पीछे छोड़, एक ओबीसी पार्टी के तौर पर उभरने की कोशिश कर रही है. नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन में महज कुछ ही साल पहले उनकी जाति खोजी गई और यह बताया गया कि वे पिछड़े हैं. लेकिन इस ओबीसी राजनीति का सबसे तीखा मुक़ाबला दलित राजनीति से ही है. उत्तर प्रदेश इस मुकाबले की सबसे बड़ी बिसात है. क्या ही अच्छा होता कि मुलायम और माया साथ चल पाते - जैसा 1993 में एक बार हुआ था - लेकिन वह इन दोनों वर्गों के सामाजिक अतीत और राजनीतिक वर्तमान को देखते हुए फिलहाल बहुत दूर की कौड़ी लगती है.

भारतीय संदर्भ में मार्क्स कुछ गांधी, कुछ अंबेडकर और लोहिया को मिलाकर ही पूरे होते हैं. इस मिश्रण से वह औषधि बनती है जो हिंदूवादी राजनीति के दुष्प्रभावों को काटती है.  

भाजपा का संकट यह है कि उसकी आस्था और विचारधारा के अंतर्विरोध इतने बड़े हैं कि वह चाहकर भी सहज ओबीसी पार्टी भी नहीं बन सकती है. आरक्षण को लेकर उसके नेता बयान बदलते रहते हैं और जब वे आरक्षण जारी रखने की बात करते भी हैं तो कुछ इस तरह जैसे यह उनकी राजनीतिक मजबूरी हो. इसी तरह अल्पसंख्यकों को लेकर उनका अविश्वासी रवैया अंततः उसे हिंदू पार्टी में तबदील कर देता है. जब यह हिंदू पार्टी पिछड़ों के घरों से आगे आकर दलितों के कुएं तक पहुंचती है तब तो एकदम परायी लगने लगती है.

दरअसल भाजपा जिस सामाजिक जनाधार की कामना करती है, उसका राजनीतिक एजेंडा ठीक उसके ख़िलाफ़ जा पड़ता है. चाहे गौरक्षा का मुद्दा हो, चाहे राम मंदिर का या फिर राष्ट्रवाद का, अंतत: ये सब उसे सवर्ण मानसिकता की और अगड़ी पृष्ठभूमि की ऐसी पार्टी बना डालते हैं जो पैसे वालों को रास आए.

लेकिन इस तात्कालिक राजनीतिक मजबूरी से कहीं ज़्यादा अपने दूरगामी परिणामों में अंबेडकर भाजपा के लिए असुविधाजनक और ख़तरनाक दोनों हैं. इस बात को हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद बने हालात से समझा जा सकता है. यह साफ दिख रहा है कि 2014 में नरेंद्र मोदी ने हिंदूवादी विकास का जो जादू पैदा किया था, उसे सबसे ज़्यादा अंबेडकर के विचार से जुड़े संगठनों ने तोड़ा है. आज संघ की वैचारिकी के खिलाफ़ जो सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा बन रहा है, वह समाजवादियों, मार्क्सवादियों और अंबेडकरवादियों का है.

जेएनयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बीते दिनों उभरा छात्र आंदोलन इसकी मिसाल है. देर-सबेर इसकी वैचारिक और सांगठनिक अगुवाई अंबेडकरवादियों के हाथ में आ सकती है. गांधी, अंबेडकर और मार्क्स का झगड़ा लगाने-निबटाने वाले धीरे-धीरे पा रहे हैं कि कई बुनियादी अंतरों के बावजूद तीनों के यहां सामाजिक और आर्थिक बराबरी का एजेंडा सबसे भरोसेमंद ढंग से खुलता है. भारतीय संदर्भ में मार्क्स कुछ गांधी, कुछ अंबेडकर और लोहिया को मिलाकर ही पूरे होते हैं. इस मिश्रण से वह औषधि बनती है जो हिंदूवादी राजनीति के दुष्प्रभावों को काटती है. दुर्भाग्य से गांधीवादियों में वह तेज नहीं दिखता है जो आज की ज़रूरत है और मार्क्सवादियों के पास वह स्थानीय गंध नहीं है जो सबको जोड़े.

ऐसे में अंबेडकर के चेले ही बचते हैं जो अपने सामाजिक हालात और अपनी राजनीतिक दावेदारी के बीच पूरी आक्रामकता से छद्म राष्ट्रवाद और बहुसंख्यकवाद के एजेंडे का सामना कर सकते हैं. शायद यही वजह है कि भाजपा अंबेडकर को अगवा करने की कोशिश में है. लेकिन कर नहीं पाएगी, क्योंकि अंबेडकर का क़द भाजपा के बाजुओं में नहीं समाएगा. वह अगर जय भीम बोलना चाहती है तो उसे जय श्रीराम छोड़ना होगा. क्या यह उसे मंज़ूर होगा?