महात्मा गांधी ने एक बार कहा था, ‘मैं सनातनी हिंदू हूं. इसलिए मैं मुसलमान, ईसाई, बौद्ध हूं. इसी विचार को समन्वयवादी अध्यात्म-विज्ञानी विनोबा ने ऐसे कहा था - 'मैं हिंदू हूं' यह कहना सही है, लेकिन 'मैं मुसलमान नहीं हूं' यह कहना गलत है. मैं हिंदुस्तान में रहता हूं, यह सही है. तो भी इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि 'मैं तुर्कस्तान में नहीं रहता'. मैं जिस जगत में रहता हूं, तुर्कस्तान भी उसी का एक अंग है. इसलिए मैं तुर्कस्तान में भी रहता हूं. लेकिन मेरी जिम्मेदारी उठाने की शक्ति अल्प है, इसलिए मैं अपने आप को हिंदुस्तानी कहता हूं, केवल इतनी सी बात है. क्योंकि वैसे देखा जाये तो मैं हिंदुस्तान में भी कहां रहता हूं? हिंदुस्तान के किसी एक प्रांत के, किसी एक गांव में, किसी एक घर में, किसी एक शरीर के छोटे से हृदय में या कहो कि 'स्व' में रहता हूं. इसका अर्थ यह है कि मनुष्य की मर्यादित शक्ति के अनुसार वह अपने लिए जो धर्म स्वीकार करता है, उस धर्म का पालन करते हुए उसमें दूसरे धर्मों के लिए भी गुंजाइश रखने की सहिष्णुता होनी चाहिए. उसे दर्शनकारों ने 'समन्वय' कहा है.

समूचे वैदिक वाड़्मय में ‘हिंदू’ संप्रदाय का कहीं उल्लेख नहीं है. लेकिन एक खास भौगोलिक क्षेत्र में रहने वालों की पहचान के रूप में उनका एक क्षेत्रीय स्वरूप उभरा और नामकरण हो गया

पंथ एक संकीर्ण विचारधारा है जिसने सिर्फ बांटने का काम किया है

समूचे वैदिक वाड़्मय में ‘हिंदू’ संप्रदाय का कहीं उल्लेख नहीं है. लेकिन एक खास भौगोलिक क्षेत्र में रहने वालों की पहचान के रूप में उनका एक क्षेत्रीय स्वरूप उभरा और नामकरण हो गया. इसी तरह भगवान बुद्ध के विचारों से जुड़े 82 लाख सुत्त जो आज उपलब्ध हैं उनमें कहीं भी ‘बौद्ध’ शब्द का उल्लेख नहीं है. ऐसे ही वर्द्धमान महावीर के एक हज़ार वर्ष बाद ‘जैन’ शब्द का उल्लेख मिलता है.

गुरु नानक ने तो जपुजी साहब में इतना तक कह दिया कि ‘मनैं मगु न चलै पंथु. मंनै धरम सेती सनबंधु’ यानी जो परमेश्वर का नामस्मरण करनेवाले हैं, वे किसी पंथ पर नहीं चलते, क्योंकि धर्म के साथ उनका सीधा संबंध होता है. इस तरह नानक ने पंथ को धर्मविरुद्ध कहा है. जिसका धर्म के साथ सीधा संबंध होता है, उसे इन बीच की एजेंसियों की जरूरत नहीं होती. गुरु नानक ने समझ लिया था कि पंथ बनने से सिर्फ नुकसान होगा इसीलिए वे पंथ से दूर रहे. उन्होंने मनुष्य का संबंध पंथ के बजाय धर्म के साथ जोड़ने पर बल दिया. हालांकि बाद के पंथवादी सिख पंथ चलाए बिना नहीं माने. बाद में तो वह किस प्रकार सांप्रदायिक, राजनीतिक और हिंसक तक हो गया, वह सब हम देख चुके हैं.

आज जो रिलीजन वाले धर्म के नाम पर मजहब यानि पंथिक धर्म चल रहे हैं वे किसी जमाने में लोगों को अनुशासित और संगठित करने के उद्देश्य से बने थे. तब का समाज व्यक्ति-व्यक्ति में बिखरा होगा तो उसका एक समाज बनाने में इन मजहबों ने उस जमाने में मदद की होगी. लेकिन आज जब हम सारी दुनिया को एक करने की बात कर रहे हैं, तब ये सारे पंथ तोड़ने वाले साबित हुए हैं. हिंदू और मुस्लिम, बौद्ध और ईसाई, शैव और वैष्णव - इस तरह आज टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं. विज्ञान युग में जहां एक तरफ इन पंथों ने अपने लिए विश्वसनीयता और प्रासंगिकता का संकट खड़ा कर लिया है, वहीं राजनीतिक लामबंदी का एक माध्यम बनकर यह समूचे मानव समाज को हिंसा और प्रतिक्रिया की आग में झोंक चुका है.

बुद्ध ने भी कोई ‘बौद्ध’ धर्म नहीं चलाया. लेकिन उनके समय में और उनके बाद भी बौद्धवाद के नाम पर शासकों में आपसी युद्ध तक हुए. चीनी यात्री ह्वेन सांग ने विस्तार से इसका वर्णन किया है

स्वामी विवेकानंद का एक वाक्य है, ‘धर्म सब सत्य नहीं है, सब धर्मों में सत्य है.’ वास्तविकता भी यही है. जिस ऋषि, साधक, श्रमण और पैगंबर को धर्म का दर्शन हुआ था, वे सभी अनुभवी दृष्टा पुरुष और स्त्री थे. वे साक्षात्कारी थे. उन्हें जो दर्शन हुआ, वह समाधि में हुआ. गौतम बुद्ध, कपिल महामुनि, महावीर, ईसा, मुहम्मद पैगंबर, इन सबको जो अनुभव आया, वह समाधि में ही आया था. इस वास्ते वह सत्य ही होना चाहिए. फिर भी उनके द्वारा (या उनके नाम पर) फैलाए गए धर्मों (पंथों) में सबकुछ सत्य ही हो ऐसा नहीं हो सकता. क्योंकि महापुरुषों को समाधि की अवस्था में जो आत्मानुभूति हुई, जो करुणा जागी उसे वह बिल्कुल उसी गहराई में सामाजिक स्तर पर पंथ के रूप में भी उतार पाते ऐसा नहीं हो सकता था. इसलिए बाद में उन्होंने या उनके अनुयायियों ने लोगों के सामने जो धर्म रखा, उसमें उनकी और उनके अनुयायियों के मानवीय पूर्वाग्रह, असत्य और भूलें अवश्य ही दाखिल हुई होंगी.

बुद्ध ने भी कोई ‘बौद्ध’ धर्म नहीं चलाया. लेकिन उनके समय में और उनके बाद भी बौद्धवाद के नाम पर शासकों में आपसी युद्ध तक हुए. चीनी यात्री ह्वेन सांग ने विस्तार से इसका वर्णन किया है. इसी राज्याश्रय और राजनीति के फंदे में उलझकर बौद्ध आचार्यों और भिक्षुओं ने मठों और विहारों में अय्याशी और भोग-विलास का स्वच्छंद खेल शुरू किया और यही अंततोगत्वा इस संप्रदाय के ऐतिहासिक पतन का कारण भी बना.

आज बुद्ध के राजनीतिक अपहरण की कोशिश हो रही है

जिस बुद्ध ने अहिंसा, क्षमा, ब्रह्मचर्य, संयम, अभय, राग-द्वेष मुक्ति और समता को जीवन धर्म और मुक्ति का मूल बताया उसी बुद्ध के नाम पर पहले की ही तरह आज एक बार फिर से देश भर में हिंसक, प्रतिक्रियावादी और सांप्रदायिक किस्म के राजनीतिक प्रयास जोर-शोर से चल पड़े हैं. दलितवाद और अंबेडकरवाद के नाम पर बुद्ध के राजनीतिक एप्रोप्रिएशन या अपहरण की वही कोशिश की जा रही है, जैसा कि कभी वामपंथियों ने कबीर के साथ करने की कोशिश की थी.

वामपंथी बुद्धिजीवियों ने देश की कई पीढ़ियों को यह बताने से परहेज ही किया कि कबीर मूल रूप से साधक थे जिन्होंने योग साधना, सहज अध्यात्मिक अनुभूति और करुणामय भक्ति के जरिए मुक्ति का मार्ग दिखाया था

कबीर को मसखरा, प्रतिक्रियावादी व्यंग्यकार, हिंसक रूप से गरियाने वाला कवि और राजनीतिक नेता समझ लेने की भूल करने वाले कथित वामपंथी बौद्धिकों और राजनीतिकों को कबीर बहुत प्रिय लगने लगे थे. देखा-देखी कइयों ने अपने बच्चों के नाम भी कबीर रखे. लेकिन इन भाइयों-बहनों का कबीर प्रेम वहीं तक सीमित था, जहां तक वे पाते थे कि कबीर किसी बाभन को गरिया रहे हैं, किसी मुल्ला को गरिया रहे हैं. इन्होंने देश की कई पीढ़ियों को यह बताने से परहेज ही किया कि कबीर मूल रूप से साधक थे जिन्होंने योग साधना, सहज अध्यात्मिक अनुभूति और करुणामय भक्ति के जरिए मुक्ति का मार्ग दिखाया था. कबीर ने मानव-धर्म के समन्वय का कार्य कर्मयोगी संत की भांति किया. लेकिन कबीर के सधुक्कड़ी डांट-फटकार में जो करुणा थी उसे समझने और ग्रहण करने की बजाए हमारे बौद्धिकों ने उन्हें बाभन-पिछड़ा, बुर्जुआ-सर्वहारा और हिंदू-मुस्लिम की राजनीति से जोड़कर देखा, समझा और बताया.

महान व्यक्तियों के साथ ऐसा होता है कि हर कोई उन्हें अपनाना चाहता है क्योंकि ऐसे व्यक्तियों का जीवन-संदेश भी सबके लिए होता है. लेकिन जिनको अपनी वैचारिक अहंकार-तुष्टि और राजनीतिक घात-प्रतिघात के लिए ऐसे ऐतिहासिक महापुरुषों की आड़ चाहिए होती है, वे उनका बेजा इस्तेमाल कर ले जाते हैं. आज के भारत में बुद्ध के नाम पर फिर से वही सब हिंसा करने की होड़ सी मची है.

निकट अतीत में ही एक आचार्य सत्यनारायण गोयनका हुए हैं. उन्होंने बुद्ध द्वारा बोधि प्राप्ति हेतु की गई विपश्यना साधना को पूरे विश्व में फिर से लोकप्रिय बनाने के लिए उल्लेखनीय कार्य किया था. गोयनका अक्सर यह दोहराते थे, ‘जब कोई व्यक्ति बुद्ध होता है, जीवनमुक्त होता है, परम परिशुद्ध होता है तो धर्म ही सिखाता है, बौद्ध धर्म नहीं. बौद्ध धर्म तो केवल बौद्धों का ही होगा न? ठीक वैसे ही कि जैसे हिंदू धर्म केवल हिंदुओं का है और मुस्लिम धर्म मुसलमानों का. परंतु बुद्ध की शिक्षा तो सब के लिए होती है... बुद्ध कोई व्यक्तिवाचक या जातिवाचक या संप्रदायवाचक शब्द नहीं है... जब कोई व्यक्ति सम्यक सम्बुद्ध बनता है, चाहे सिद्धार्थ गौतम हो अथवा कोई और, तो वह कदापि कोई संप्रदाय स्थापित नहीं करता. शुद्ध धर्म ही लोगों को सिखाता है. शुद्ध धर्म यानी कुदरत का वह कानून जो सब पर एक जैसा लागू होता है, जो किसी का पक्षपात नहीं करता. विश्व में कोई बुद्ध बने या न बने, यह कानून सदैव अपना काम करते रहता है.’

बुद्ध का कहना था, ‘ जो समभाव बरतता है, जो शांत, दमनशील, संयमी और ब्रह्मचारी है, जिसने दंड-त्याग करके सब भूतों को अभय दिया है, वह ब्राह्मण है, वह श्रमण है, वह भिक्षु है.’

विपश्यना साधना का अभ्यास करने वालों को गोयनका जी हमेशा चेताते रहते थे कि देखना तुम लोग किसी दिन अपने को श्रेष्ठ विपश्ची समझकर विपश्चियों का संप्रदाय न बना बैठना. पंथ या मतवाद के स्थान पर शुद्ध धर्म का संदेश देने वाले उनके दोहे बड़े लोकप्रिय हुए. उदाहरण के लिए, वे कहते हैं -

धर्म न हिन्दू बौद्ध है, धर्म न मुस्लिम जैन.
धर्म चित्त की शुद्धता, धर्म शांति सुख चैन.
हिन्दू हो या बौद्ध हो, मुस्लिम हो या जैन.
शुद्ध धर्म का पथिक हो, रहे सुखी दिन रैन.

आज के राजनीतिक और सांप्रदायिक मतवादी बौद्धों ने गोयनका जी की भी जाति निकाली. उन्हें बनिया कह-कह कर चिढ़ाया गया. दलितों को ऐसे गोयनका के ब्राह्मणवादी षड्यंत्रों से अलग रहने और इससे सतर्क रहने की सलाह दी गई.

जबकि बुद्ध की बात करें तो शाक्यमुनि गौतम से पहले भी अनगिनत बुद्ध हुए, उनके सामने और उनके बाद भी हुए. बोधि प्राप्त करने के बाद बुद्ध हो चुके गौतम ने भिक्खु, ब्राह्मण, श्रमण, परिव्राजक, श्रोत्रिय, आर्य, पंडित, वेदज्ञ आदि शब्दों की भी सही और गुणवाचक सार्वजनीन (सार्वभौमिक) धर्ममयी व्याख्याएं की, क्योंकि ये सभी शब्द उस समय भी लोकजीवन में अधिकांशतः संप्रदायवाचक ही हो गए थे. लेकिन जो बुद्ध होंगे वे शुद्ध, सार्वजनीन, सार्वदेशिक और सार्वकालिक धर्म ही सिखाएंगे.

गौतम बुद्ध के जीवनकाल की एक घटना है. सभिय नाम का एक परिव्राजक गौतम बुद्ध से मिलकर उनसे अपनी शंकाओं का समाधान करने के लिए पूछता है - बुद्धो कथं पवुच्चति? यानी बुद्ध किसे कहते हैं?

गौतम बुद्ध ने कई स्थानों पर कहा है - ‘एकं एव चरे धम्मं, न धम्मद्धजका भवे.’ यानि हर व्यक्ति अलग-अलग इस शुद्ध धर्म का आचरण करे, धर्म की ध्वजा न बना ले

गौतम बुद्ध इसका उत्तर देते हैं - कप्पानि विच्चेय्य केवलानि - तृष्णा के संपूर्ण क्षेत्र का विश्लेषण करके, संसार दुभयं चुतुपपातं - जिसने संसारचक्र (प्रपंच) की उत्पत्ति और विनाश दोनों को जान लिया है, विगतरजमनङ्गणं विसुद्धं - जो चित्त पर पड़े मैल से विमुक्त हो गया है, जो विशुद्ध विमल है, पत्तं जितिक्खयं - जिसने जन्म-क्षय की अवस्था प्राप्त कर ली है, तमाहु बुद्धन्ति - उसे बुद्ध कहते हैं.

समन्वयकारी विनोबा ने अपने संपादकत्व में धम्मपदं की नवसंहिता का हिंदी अनुवाद 1958 में प्रकाशित करवाया था. उसकी प्रस्तावना में उन्होंने कहा था कि समन्वय का कार्य हम क्या करेंगे वह काम तो गौतम बुद्ध ने स्वयं ही कर रखा है. गौतम बुद्ध से पहले ज्ञानी ब्राह्मणों और तपस्वी श्रमणों की एक परंपरा भारत में चली आ रही थी, बुद्ध ने उन सबके प्रति नितांत आदर रखकर अपने विचार पेश किए. बुद्ध ने तो यह कहा कि जो ‘समभाव बरतता है, जो शांत, दमनशील, संयमी और ब्रह्मचारी है, जिसने दंड-त्याग करके सब भूतों को अभय दिया है, वह ब्राह्मण है, वह श्रमण है, वह भिक्षु है.’

आर्य-अनार्य को लेकर आज के सांप्रदायिक बुद्धवादी जब-तब हिंसक प्रतिक्रियाएं व्यक्त करते ही रहते हैं. मूलनिवासी बनाम यूरेशियन का रंग देकर वह कथित आर्यों को भारत से मार भगाने की बात तक करते रहते हैं. ऐसे बुद्धवादियों को स्वयं गौतम बुद्ध की वाणी पढ़नी चाहिए.

आर्य कौन हैं? इस पर गौतम बुद्ध ने कहा- ‘न तेन आरियो होति येन पाणानि हिंसति / अहिंसा सब्बपाणानं अरियो ति पवुच्चति.’ यानी प्राणियों पर हिंसा करने वाला कोई भी आर्य नहीं होता. प्राणिमात्र के प्रति अहिंसा बरतने वाला ही आर्य कहा जाता है.

इसी प्रकार जो हमारे जो राजनीतिक इतिहासकार, बुद्धिजीवी और राजनेता भाई-बहन गौतम बुद्ध को जब-तब ‘ब्राह्मण’ से लड़ा-लड़ा कर अपने को बुद्धवादी कहते फिरते हैं. क्या वह बुद्ध का यह प्रसंग भी पढ़ना चाहेंगे?

किसी बुद्ध को राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के रेकॉगनीशन की जरूरत भला क्या पड़ गई? बुद्ध और बुद्धत्व का क्षुद्र राजनीतिकरण और सरकारीकरण करके हम यह कौन सा बुद्धवादी बन रहे हैं और बना रहे हैं?

ब्राह्मण कौन है? इस पर गौतम बुद्ध ने कहा-न जटाहि न गोत्तेन न जच्चा होति ब्राह्मणो / यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुचि सो च ब्राह्मणो. यानी न जन्म के कारण, न गोत्र के कारण, न जटाधारण के कारण ही कोई ब्राह्मण होता है. जिसमें सत्य है, जिसमें धर्म, वही पवित्र है, और वही ब्राह्मण है. इसके आगे भी गौतम बुद्ध ने विस्तार से ब्राह्मण के वास्तविक स्वरूप की विस्तार से गुणवाचक व्याख्या की. भारत की प्राचीन परंपरा में ब्राह्मण कोई जन्म-आधारित या जातिवाचक संज्ञा नहीं है. ग्रंथों में ये मिलावटबाजियां बाद में की गई हैं जो अत्यंत ही सतही और विरोधाभासी होने के कारण स्पष्ट रूप से अलग ही दिख जाती हैं.

और तो और धर्म अथवा धम्म के बारे में उपनिषदों और गीता की ही भावना को आगे बढ़ाते हुए स्वयं गौतम बुद्ध ने कई स्थानों पर कहा है - ‘एकं एव चरे धम्मं, न धम्मद्धजका भवे.’ यानि हर व्यक्ति अलग-अलग इस शुद्ध धर्म का आचरण करे, धर्म की ध्वजा न बना ले. फिर आगे कहा - ‘अत्तनो पन सभावं धारेती’ति धम्मो’. यानि अपने शुद्ध स्वरूप का स्वभाव धारण करता है तो धर्म कहलाता है. अंत में, प्रकृति के सतत चलने वाले इस नियम को, ऋत को उन्होंने कहा- ‘एस धम्मो सनातनो’ यानि यह धर्म सनातन है. असल ‘धर्म’और ‘धम्म’ पीछे छूट गया, और शब्दों के अर्थदूषण, हर जगह द्वेष, विभाजन और अंधता ने हमें कहां से कहां पहुंचा दिया है.

आज कोई कहता है कि देखो राष्ट्रपति भवन के सबसे महत्वपूर्ण सभागार में बुद्ध की प्रतिमा इसलिए लगाई गई है कि ‘हमारा बुद्ध’ तुम्हारे वैदिक देवी-देवताओं या किसी भी महावीर और ईसा से बढ़कर है. कोई कहता है कि अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रधानमंत्री को मजबूरी में बुद्ध को भारत का प्रतिनिधि कहना पड़ता है क्योंकि ‘हमारा बुद्ध’ ऐसा महान है वैसा महान है. कोई इसका आंदोलन छेड़े बैठा है कि रुपये के नोट पर से गांधी को हटाकर वहां अशोक का धम्मचक्र बड़े आकार में डाल दो जिससे कि उसका नीला रंग स्पष्ट दिखता हो. हमारे राजनीतिक प्रतीकों वाला ‘नीला रंग’ स्पष्ट दीखता हो. अच्छा! यह बुद्ध-संबुद्ध गौतम ‘मेरा बुद्ध-तेरा बुद्ध’ कैसे हो गया? या गांधी, अंबेडकर और कबीर ‘केवल हमारा गांधी’, ‘केवल हमारा अंबेडकर’ और ‘केवल हमारा कबीर’ कैसे हो गया? और किसी बुद्ध को राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के रेकॉगनीशन की जरूरत भला क्या पड़ गई? बुद्ध और बुद्धत्व का क्षुद्र राजनीतिकरण और सरकारीकरण करके हम यह कौन सा बुद्धवादी बन रहे हैं और बना रहे हैं?

खोखली राजनीतिक अखबारी बयानबाजियों से अलग बुद्ध के नाम पर एक नए प्रकार का प्रचंड अस्मितावादी आंदोलन तैयार हो चुका है, जिसका बुनियादी स्वरूप ही हिंसक और प्रतिक्रियावादी है

आज उसी बुद्ध के नाम पर मारो, भगाओ, नाश करो, राज करो इत्यादि के तेवर में कुछ स्वयंभू नवनायकों द्वारा इस प्रतिक्रांति के हिंसागीत रचे जा रहे हैं, जिन्हें इस हिंसक माहौल में स्वाभाविक रूप से हाथोंहाथ लिया जा रहा है. बौद्ध, असुर, अनार्य और मूलनिवासी जैसे सरनेम लगाकर ऐसे कवि-सम्मेलनों और म्यूज़िक नाइट्स तक के आयोजन हो रहे हैं जिनमें बुद्ध के नाम पर प्रचंड हिंसक भावों और अश्लील फिल्मी धुनों तक पर गीतों और नाचों का मंचन हो रहा है. जेएनयू के शोधार्थी ऐसे ही किसी बुद्धवादी नवनायक के ‘क्रांतिगीत’ और कविताओं की बानगी देखिए -

तुम एक मारोगे तो हम हजारों मारेंगे / मनुवादियों तुम्हें हम कभी न छोड़ेंगे

अन्य स्थानों पर वे कहते हैं -

उस दौर में बाबा, तन्हा लड़े मनुवाद से / बोले बच्चे दुश्मन को, दौड़ा मारते रहो.

अट्ठाइस हजार पेशवा को पांच सौ मारे थे / गर मरना है तो दुश्मन को मार के मरो

बौद्ध धम्म फैलाने वाले, महान हो गए / हर मजलूमों के नेता कांशीराम हो गए.

नवाबों का शहर लखनऊ, अब जाना जाता है बहुजन से / इस कांशीराम की नगरी में, बुद्ध अम्बेडकर परचम से.

मनु तेरा खून पीने में मुझे कुछ हर्ज नहीं / हम तो सड़ा मांस भी खाए हैं इक ज़माने में
हमें नीचता का दंश मिला है तुमसे क्यों / तुम्हें डुबा-डुबा के मारेंगे गंदे नालों में

यह रश्क का विषय नहीं होना चाहिए लेकिन जानना दिलचस्प होगा कि इस लोकप्रिय, युवा और ‘बुद्धवादी’ कवि के ऊपर देश के बड़े-बड़े अंग्रेजी अखबारों ने तमाम भंगिमाओं में इनके फोटो खींचकर आधे-आधे पेज के फीचर छापे हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं ने उभरती हुई महान प्रतिभाओं की कतार में उनके लंबे साक्षात्कार छापे हैं. सोशल मीडिया पर इन्हें सैकड़ों लाइक्स, वाहवाहियां और शेयरिंग प्राप्त होती हैं.

क्या ‘नमो बुद्धाय’ और ‘भवतु सब्ब मंगलम्’ कहने के पहले और कहने के बाद ‘जय भीम’ कहना हमारे लिए अनिवार्य हो जाएगा?

खोखली राजनीतिक अखबारी बयानबाजियों से अलग बुद्ध के नाम पर एक नए प्रकार का प्रचंड अस्मितावादी आंदोलन तैयार हो चुका है, जिसका बुनियादी स्वरूप ही हिंसक और प्रतिक्रियावादी है. बुद्ध के मूल अध्यात्मिक और मुक्तिपरक विचारों का संभवतः न इन्हें ज्ञान है, और न ही वे इसे समझना चाहते हैं. हमारे इन भाइयों-बहनों ने बुद्ध को अपने हिंसक राजनीतिक आंदोलन का नेता और प्रतीक घोषित कर दिया है. राजनीतिक दलों में होड़ मची है कि इस नए प्रकार के सांप्रदायिक उभार से पैदा हुई राजनीतिक भीड़ का अपने पक्ष में अधिक से अधिक इस्तेमाल कर चलें.

वास्तव में, इसके लिए प्रथम दृष्ट्या वैसे विश्वविद्यालयी प्रोफेसर और बुद्धिजीवी ही जिम्मेदार लगते हैं जिन्होंने पिछले कई दशकों से एक घोर अज्ञानतापूर्ण और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक फ्रेमवर्क में ही बुद्ध को समझा है और पढ़ाया है. कोई बुद्ध को धुर-वामपंथी समझता है तो कोई उसे दलितों का राजनीतिक उद्धारक. कइयों ने तो उसे वणिकों अथवा बनियों का सायास अर्थशास्त्रीय प्रवक्ता तक बनाने की कोशिश की है. इन बौद्धिकों और राजनीतिकों का एक ऐसा वर्ग उभरा है जिसने फैशन स्टेटमेंट के तौर पर अपने ड्राइंगरूम से लेकर बड़े-बड़े पार्कों तक में बुद्ध की प्रतिमा और तस्वीरें लगाकर स्वयं को ‘प्रगतिशील’ दिखाने के लिए बुद्ध का सजग रूप से इस्तेमाल किया है. अब इसी राजनीतिक और प्रतिक्रियावादी बुद्ध को असली बुद्ध बताकर नई पीढ़ियां जाने-अनजाने समाज और राजनीति में बौद्ध सांप्रदायिकता का जहर फैलाने के कार्य में लग चुकी हैं.

दिलचस्प यह है कि बुद्ध के नाम पर इस हिंसक लामबंदीकरण में बार-बार उसी मैजोरिटेरियनिज़्म या बहुमतवाद का ताल ठोंका जा रहा है जिसके प्रति डॉ. अंबेडकर ने स्वयं चेताया था. अंबेडकर के नाम पर यह सब करने वाले एक पल के लिए सोचें कि क्या अंबेडकर ने हिंसक हिंदू सांप्रदायिकता का जवाब हिंसक बौद्ध सांप्रदायिकता से देने का रास्ता दिखाया था? क्या हिंदू बहुमतवाद की प्रतिक्रिया में लामबंद हो रहा बौद्ध बहुमतवाद भी अपने मूल स्वरूप में ही हिंसक और अलोकतांत्रिक नहीं है?

अब हमारे कथित ‘बौद्धों’ को भी अपनी संख्या बढ़ाने और घटाने के राजनीतिक खेल में बड़ा आनंद आ रहा है और वे स्वयं को भारत के भावी शासकों के रूप में देख रहे हैं

आप सार्वजनिक ढिंढ़ोरा पीट करके व्यक्तिगत प्रतिक्रिया और राजनीतिक स्टेटमेंट के तौर पर अनुष्ठानिक रूप से ‘बौद्ध धर्म’ स्वीकार करते हैं और हिंदू संप्रदायवादियों को थू-थू कह कर चिढ़ाते हुए कहते हैं कि लो तुम 'माइनस 2' रह गए. वाह रे आपका ‘बौद्ध धर्म’ और वाह रे इनका ‘हिंदू धर्म’. और कथित ‘धर्म-परिवर्तन’ कर संख्या बढ़ाने और घटाने वालों की हिंसा, युद्ध, असत्य और दुराचार हम कथित ‘ख्रिस्ती’ मिशनरियों और कथित ‘मुस्लिम’ जिहादियों का भी देख चुके हैं और देख रहे हैं. अब हमारे कथित ‘बौद्धों’ को भी अपनी संख्या बढ़ाने और घटाने के राजनीतिक खेल में बड़ा आनंद आ रहा है और वे स्वयं को भारत के भावी शासकों के रूप में देख रहे हैं.

लेकिन हमारे ये भाई-बहन सोचें कि क्या हम बुद्ध के नाम पर सेना, मोर्चा, यूनियन, फ्रंट, संघ, पक्ष और पार्टी बनाकर वास्तव में ‘धम्म’ का प्रचार कर रहे हैं? हिंसक सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रतीकों से क्या हम नए बुद्धों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं? क्या हमने सत्य, अहिंसा और करुणा की अनिवार्य शर्त से समझौता नहीं कर लिया है? क्या ‘नमो बुद्धाय’ और ‘भवतु सब्ब मंगलम्’ कहने के पहले और कहने के बाद ‘जय भीम’ कहना हमारे लिए अनिवार्य हो जाएगा? अन्यथा क्या ‘जय भीमेत्तर’ बुद्धमार्गी या ‘अंबेडकरेत्तर’ धम्ममार्गी के रूप में हिंसक दुष्परिणाम झेलने के लिए लोगों की पहचान कर ली जाएगी? कभी 69 प्रतिशत, कभी 79 प्रतिशत तो कभी 95 प्रतिशत पिछड़ा, दलित, मूलनिवासी, अनार्य, अब्राह्मण और बौद्ध इत्यादि का राजनीतिक आंकड़ा हम किसे डराने और चेताने के लिए बताते रहते हैं?

अच्छा तो यह भी बता दीजिए कि फिर उन जैसे बाकी लोगों का क्या होगा, जो विनोबा के शब्दों में यह कहने की हिम्मत करेंगे- ‘हम किसी देश-विशेष के अभिमानी नहीं, किसी भी धर्म-विशेष के आग्रही नहीं, किसी भी सम्प्रदाय या जाति-विशेष में बद्ध नहीं. विश्व में उपलब्ध सभी सद्-विचारों के उद्यान में विहार करना हमारा स्वाध्याय, सद्-विचारों को आत्मसात् करना यह हमारा धर्म, विविध विशेषताओं में सामंजस्य प्रस्थापित करना, विश्ववृत्ति का विकास करना यह हमारी वैचारिक साधना है.’