शुद्ध विरोधियों

यथायोग्य अभिवादन!

निस्संदेह आजकल कट्टर, अश्लील, भोंडे और भड़काऊ बयानों की बौछार का समय है. किसी भी मजहबी या गैरमजहबी के ऐसे भोंडे बयानों का एक स्वर में विरोध होना चाहिए. लेकिन कई बार आंशिक तौर पर उत्तेजक लगने वाले कुछ बयानों में व्यवहारिक तर्क भी जुड़े होते हैं जिनकी उपेक्षा या उनका पूरी तरह से विरोध करना भी अपने आप में गलत चलन है. लेकिन आजकल हर चीज के विरोध की आंधी इतनी तेज है कि समय के साथ चलने के दबाव में विरोध करना जैसे जरूरी हो गया है.

आज धारा में बने रहने का दबाव इतना ज्यादा है, कि अक्सर आप लोग अपना विवेक खोकर भी विरोध करते हो! हाल ही में साक्षी महाराज का एक बयान आया कि 'इस्लाम में स्त्रियों की स्थिति पैरों की जूती जैसी है'. साक्षी महाराज के इस बयान का आप लोगों ने सोशल मीडिया पर काफी ज्यादा विरोध किया. आप लोगों का कहना है कि पहले उन्हें हिंदू धर्म में महिलाओं की स्थिति देखनी चाहिए. यूं तो दुनियाभर के हर एक मजहब, जात, रंग, नस्ल की स्त्रियों की स्थिति एक इंसान के तौर पर बुरी ही है लेकिन, आप लोगों के इस कथन ने मुझे यहां मुस्लिम और हिंदू स्त्रियों की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन करने को प्रेरित किया है.

व्यवहारिक स्तर पर ऐसे कई बिंदु हैं जिनके आधार पर मैं साफतौर पर कह सकती हूं कि हिंदू स्त्रियों/लड़कियों को मुस्लिम स्त्रियों अपेक्षा ज्यादा आजादी और स्पेस मिला है

मैं सोचने को विवश हुई कि क्या सच में आज हिंदू स्त्रियों की स्थिति इतनी भयंकर है, जितनी कि आप बता रहे हैं? सबसे पहले तो साक्षी महाराज की इस टिप्पणी पर मुझे कहना है कि किसी भी धर्म या जाति विशेष की स्त्रियों (या किसी भी इंसान या जीव मात्र) की दयनीय स्थिति, घोर दुख और शर्म का विषय है. ऐसी स्त्रियों के प्रति अपनी संवेदना और सम्मान में ही उन्हें कम से कम ऐसे बयान नहीं देने चाहिए, जो उन स्त्रियों की दुखती रग छेडते हों! मैं यहां हिंदू और इस्लामिक धार्मिक किताबों में स्त्रियों के लिए दिये गए निर्देशों और अधिकारों की बहस में नहीं पड़ना चाहती. क्योंकि ऐसे में दोनों पक्ष स्त्रियों के अधिकारों को लेकर ऐसे-ऐसे श्लोक और सूराओं का हवाला देंगे कि असल बात की हत्या हो जाएगी! मैं हिंदू और मुस्लिम स्त्रियों की व्यावहारिक स्थिति की बात करने जा रही हूं. ऐसे कई बिंदु हैं जिनके आधार पर मैं साफतौर पर कह सकती हूं कि हिंदू स्त्रियों/लड़कियों को मुस्लिम स्त्रियों अपेक्षा ज्यादा आजादी और स्पेस मिला है.

40-45 डिग्री टेंपरेचर में जहां एक जोड़ी कपड़ा पहनना ही अजाब लगता है, ऐसे में कपड़े के ऊपर काला बुर्का..! एक तो डबल कपड़ा ऊपर से काले रंग का जो कि गर्मी सबसे ज्यादा खींचता है. जिन्होंने नहीं पहना है, वे इस टॉर्चर की कल्पना भी नहीं कर सकते. इस मुद्दे पर बात करते हुए अक्सर ज्यादातर प्रगतिशीलों का बयान आता है 'हिंदुओं में भी तो घूंघट है!' सबसे पहले तो यह कि घूंघट और बुर्के में उतना ही फर्क है जितना कि चेहरा जलने और पूरा शरीर जलने में! दूसरा, हिंदुओं में सिर्फ शादीशुदा महिलायें ही घूंघट काढ़ती हैं, लड़कियां नहीं. और कम से कम मेरी जानकारी में ऐसी कोई महिला नहीं है जो किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में घूंघट में पढ़ने जाती हो. लेकिन मैं ऐसी बहुत-बहुत सारी लड़कियों को जानती हूं जो कि कॉलेज में बुर्का पहन कर जाती हैं. यहां तक कि जेएनयू जैसे वैचारिक स्पेस से भरे विश्वविद्यालय में बुर्का पहने बहुत सी छात्राओं को देखा जा सकता है जो कि उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही हैं! हरियाणा और राजस्थान (जहां कुछ जगहों पर बहुएं सास के सामने भी घूंघट निकालती हैं!) के किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में भी घूंघट पहने शायद ही कोई आपको मिले!

बुर्के में कॉलेज जा रही लड़कियों की दिमागी स्थिति दो तरह की हो सकती है. एक, या तो उन्हें कभी भी बुर्का बेहद असुविधाजनक और अपने व्यक्तित्व पर हमला ही नहीं लगता हो. यदि किसी इंसान को बेहद ‘असहज‘ लगने वाली बात भी सहज लगे तो उसकी दिमागी आजादी की कल्पना की जा सकती है. दूसरा यदि लड़कियां बुर्के का सिर्फ इसलिए विरोध नहीं कर पातीं कि कहीं बुर्का छोड़ने के चक्कर में उन्हें पढ़ाई ही न छोड़नी पड़ जाए तो हम बेहतर समझ सकते हैं कि उन्हें कितना स्पेस मिल रहा है.

कई हिंदू स्त्रियों को तथाकथित नास्तिक होने की भी पूरी आजादी है लेकिन क्या किसी मुस्लिम स्त्री को यह आजादी है कि वह खुले तौर पर अल्लाह को ही मानने से इंकार कर दे?

ज्यादातर (सभी नहीं) हिंदू लड़कियों/स्त्रियों को मनचाहा खा सकने का भी बहुत स्पेस मिला है. मतलब, वे शुद्ध शाकाहारी हो सकती हैं, वे ऐगीटेरियन हो सकती हैं या फिर मांसाहारी हो सकती हैं. लेकिन क्या मुस्लिम स्त्रियों को यह आजादी है कि उनका मन न करे, तो वे मांसाहार न करें? एक बड़ी हद तक इस सवाल का जवाब न में ही हो सकता है क्योंकि इस मामले में उन पर सामाजिक दबाव बनिस्बत कहीं ज्यादा होता है. (ऐसे एक अपवाद को जानने का सौभाग्य मुझे मिला, जिन्होंने बताया कि उनकी बेटी को मांस खाना पसंद नहीं और वे उसे फोर्स भी नहीं करते!) पर ऐसे कितने अपवाद हैं? खाने की ही तरह धार्मिक आस्था प्रकट करने की आजादी भी मुस्लिम स्त्रियों की अपेक्षा हिंदू स्त्रियों को कहीं ज्यादा है. यह ठीक है कि बहुईश्वरवादी होने के कारण हिंदू स्त्रियों को अलग-अलग भगवानों या देवताओं की पूजा करने की आजादी है. लेकिन इससे अलग कई हिंदू स्त्रियों को तथाकथित नास्तिक होने की भी पूरी आजादी है. मतलब कि वे कोई पूजापाठ न करें, भगवान को ही न मानें और ऐसा मत वे खुलेतौर पर प्रकट कर सकती हैं. लेकिन क्या किसी मुस्लिम स्त्री को यह आजादी है कि वह खुले तौर पर अल्लाह को ही मानने से इंकार कर दे? रोजे और नमाज का खुलेआम विरोध कर सके? मेरी जानकारी में ऐसे अपवाद भी नहीं हैं. मस्जिदों में मुस्लिम स्त्रियों के जाने पर एक अघोषित पाबंदी है. लेकिन ऐसा कोई छोटा-बड़ा मंदिर नहीं जहां हिंदू स्त्रियों को जाने की आजादी न हो. जिन कुछेक मंदिरों में यह आजादी नहीं थी वहां हाल-फिलहाल में स्त्रियों ने न केवल जाने के अधिकार की लड़ाई लड़ी बल्कि जीती भी. मस्जिदों में स्त्रियों के प्रवेश के अधिकार को लेकर किसी आंदोलन की कितनी संभावना है, यह भविष्य में पता चल ही जाएगा.

यदि किसी मजार में स्त्रियों को जाने की आजादी है भी तो वे मुख्य पूजास्थल तक नहीं जातीं, उनके लिए अलग से पर्दे वाली जगह में इबादत की व्यवस्था होती है. यह कितना बड़ा भेदभाव है. ऐसे किसी भेद की कल्पना आज के समय में सवर्ण हिंदू स्त्रियां नहीं कर सकतीं. (दलित स्त्रियां/पुरुष इसके अपवाद हैं, पर उनकी स्थिति में भी पहले की अपेक्षा काफी बदलाव है.) निस्संदेह कुछ हिंदू लड़कियों की मनमर्जी से विवाह करने पर ऑनर किलिंग के नाम पर हत्या भी होती है. लेकिन इससे इस बात के साफ संकेत मिलते हैं कि वहां लड़कियां अपनी मर्जी से (सगोत्रीय, अंतरजातीय या दूसरे धर्म में) विवाह करने की हिम्मत जुटा रही हैं, हत्या के डर के बावजूद भी! लेकिन मुस्लिम लड़कियां मजहब से बाहर विवाह की आजादी उस तरह से महसूस नहीं करतीं जैसे कि हिंदू लड़कियां या मुस्लिम लड़के. घर से दूर शहर में अकेले रहकर पढ़ने और नौकरी करने वाली हिंदू लड़कियों का प्रतिशत मुस्लिम लड़कियों की अपेक्षा कहीं ज्यादा है.

मुस्लिम लड़कियां मजहब से बाहर विवाह की आजादी उस तरह से महसूस नहीं करतीं जैसे कि हिंदू लड़कियां या मुस्लिम लड़के

मनचाही जगह में अकेले रहकर, मनचाही पढ़ाई या नौकरी करने की आजादी मुस्लिम लड़कियों को आज भी न के बराबर है. तलाक की नंगी तलवार कैसे ताउम्र मुस्लिम स्त्रियों के सिर पर लटकी रहती है, यह बात बड़ी आसानी से किसी भी मुस्लिम स्त्री से पूछी जा सकती है. विवाह-विच्छेद को लेकर इस तरह का कोई डर हर क्षण हिंदू स्त्रियों के दिमाग में नहीं रहता. तलाक के बाद पुनः अपने पति से विवाह करने के लिए उन्हें ‘हलाला’ के तहत किसी दूसरे व्यक्ति से विवाह करके उसे तलाक देना होता है. शायद ही कोई मुस्लिम स्त्री हलाला की इस प्रक्रिया से खुश हो या इसे तार्किक मानती हो, लेकिन उनके पास इसे न मानने या इसका विरोध करने का जरा सा भी विकल्प नहीं है. जबकि हिंदू स्त्रियों को टूटे हुए विवाह को फिर से ठीक करने के लिए ऐसी किसी प्रक्रिया से नहीं गुजरना होता.

मुझे उम्मीद है कि ‘पहले हिंदू स्त्रियों की स्थिति देखनी चाहिए’ बोलने वालों को हिंदू स्त्रियों की स्थिति दिखाई दी होगी. आप जैसे तमाम तथाकथित प्रगतिशीलों और शुद्ध विरोधियों को मैं कट्टपंथियों की ही तरह (या उनसे भी ज्यादा) खतरनाक और त्याज्य समझती हूं! क्योंकि कट्टरपंथी सामने से वार करते हैं छिपकर नहीं. उनका धर्म कट्टरता है. लेकिन आप जैसे ‘कट्टर प्रगतिशीलों’ को पहचानना बड़ा भारी और मुश्किल काम है. आप कहते हैं कि आप इंसानियत के पक्षधर हैं, लेकिन आपमें हर एक की बुराइयों का समान रूप से विरोध करने का नैतिक साहस नहीं! न ही हर एक की अच्छाईयों की खुलकर तारीफ करने का नैतिक बल और ईमानदारी आप में है! धार्मिक कट्टपंथियों का विरोध करने वाले आप लोग गैर धार्मिक कट्टर हैं! बस इतना ही फर्क है, वर्ना कट्टरपन आपका भी धर्म है और उनका भी! ‘शुद्ध विरोधी‘ होने से कहीं बेहतर है कि आप ‘सच्चे विरोधी’ बने. सच्चे विरोध का मूल धर्म सच्ची तटस्थता है जो कि आप में नहीं है! मैं सच में चाहती हूं कि तरह-तरह के विरोधों की आंधी में आप जैसे ‘कट्टर प्रगतिशीलों’ के विरोध की भी एक बयार बहनी चाहिए!

इसमें कोई शक नहीं कि एक समय हिंदू स्त्रियों के लिए भयंकर कुप्रथाएं चलन में रहीं हैं. लेकिन समय-समय पर बहुत सारे समाज सुधारकों ने उन सब कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाई और उन्हें खत्म किया. सती प्रथा, बाल विवाह या विधवा विवाह न होना इसी का उदाहरण हैं. सती प्रथा पूरी तरह खत्म हो चुकी है. बाल विवाह आज भी हो रहे हैं पर उसके खिलाफ कई स्तरों पर जबरदस्त बुनियादी काम चल रहा है (हाल ही में राजस्थान में लगभग 300 टैंटवालों ने कहा है कि वे किसी भी बालविवाह में अपने टैंट नहीं देंगे). पहले कुछेक घरों की ही हिंदू लड़कियां पढ़ने जाती थीं आज बहुत कम घर ऐसे हैं जहां मां-बाप लड़कियों को पढ़ाना न चाहते हों. आज विधवाओं, परित्यक्ताओं की स्थिति भी उतनी भयंकर नहीं है जैसे कि पहले थी.

आज से 80-100 साल पहले की हिंदू स्त्री और आज की हिंदू स्त्री के जीवन में जमीन-आसमान का फर्क है. लेकिन इन सालों में मुस्लिम स्त्रियों के जीवन में ऐसे कौन से बदलाव हुए हैं मैं जानना चाहती हूं

पैतृक संपत्ति में हिस्सा चाहे व्यावहारिक रूप से अभी भी लड़कियों को न मिलता हो, लेकिन इसका हिंदू समाज में किसी ने विरोध नहीं किया. परदा प्रथा पहले हिंदुओं में बहुत ज्यादा थी लेकिन वह भी समय के साथ तेजी से कम हुई है. पीरियड्स के दौरान लड़कियां जैसे अछूत सी बना दी जाती थीं, आज इस स्थिति में भी जबरदस्त बदलाव है. बल्कि अब ऐसी भी कई लड़कियां/स्त्रियां हैं जो इसी दौरान मंदिर तक जाने में गुरेज नहीं करती. हालांकि यह प्रतिशत बहुत कम है लेकिन इस दिशा में सोचना ही अपने आप में क्रांतिकारी है.

अपनी स्त्रियों को घूंघट रखने वाले हिंदू धर्म ने अपनी बेटियों को ‘ब्यूटी पीजेंट’ बनने का भी मौका दिया है. पर ब्यूटी क्वीन का ताज पहनने की इच्छा किसी मुस्लिम लड़की को होती भी होगी इसमें मुझे शक ही है, क्योंकि उन्हें यह सोचने तक का स्पेस अभी नहीं है व्यवहार में यह आजादी मिलना तो दूर की बात.

आज से 80-100 साल पहले की हिंदू स्त्री और आज की हिंदू स्त्री के जीवन में जमीन-आसमान का फर्क है. इसमें शक नहीं कि शुरुआत में बहुत सारे कट्टर यथास्थितिवादी हिंदुओं ने बहुत सारे सुधारों का विरोध किया, लेकिन कोई भी विरोध इस स्तर का नहीं रहा कि वहां सुधार का कीड़ा दिमाग में कुलबुलाने से पहले ही मर जाए! लेकिन इन पिछले 80-100 सालों में मुस्लिम स्त्रियों के जीवन में ऐसे कौन से बदलाव हुए हैं मैं जानना चाहती हूं या कि वहां सच में सुधार की कोई जरूरत ही नहीं है?... सच्ची बात तो ये है कि वहां सुधार की घोर जरूरत है पर गुंजाइश बेहद-बेहद कम...बल्कि न के बराबर है!

हिंदू दलित स्त्रियों से वर्णव्यवस्था के लिए माफी मांगते हुए मैं कहना चाहती हूं कि कई मामलों में तो उन्हें सवर्ण हिंदू स्त्रियों से ज्यादा आजादी रही है. जैसे घर से बाहर निकलने, कमाने और सार्वजनिक जीवन जीने की आजादी, हिंदू दलित स्त्रियों को सवर्ण हिंदू स्त्रियों से पहले से मिली.

एक सच्ची तटस्थ हिंदू स्त्री