‘यदि तुम्हारे घर के / एक कमरे में आग लगी हो / तो क्या तुम / दूसरे कमरे में सो सकते हो? यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में लाशें सड़ रहीं हों / तो क्या तुम / दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो?’

हिंदी के मशहूर कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने जब यह सवाल पूछा था तब महाराष्ट्र और राजस्थान में सूखा नहीं था और मुंबई-पुणे या जयपुर में आइपीएल के टी-20 मुक़ाबले नहीं हो रहे थे. लेकिन तब भी एक विकराल विषमता थी और अपने चारों तरफ़ पसरी भयावह ग़रीबी, अभाव और लाचारी को अनदेखा कर विलासिता के अनंत उपभोग की अश्लीलता भी- यह बात इस कविता को लिखे जाने की ज़रूरत और उसके बचे रहने की नियति से मालूम होती है. बेशक, बीच में एक बड़ी मध्यवर्गीय पट्टी ऐसी थी जिसे यह अनंत उपभोग चुभता या गड़ता था और जिसकी आंखों में अपने आसपास के अभाव को लेकर इतना पानी उमड़ता था कि लोग कुछ नया खाने या दिखाने में कुछ संकोच करते थे. अंतरात्मा इतनी भर बची थी कि सर्वेश्वर यह सब कह सकते थे और लोग सह सकते थे.

आज वह विषमता कुछ और गहरी हो गई है, विलासिता कुछ और निद्वंद्व, निर्वसन और अश्लील- और मध्यवर्गीय भारत अब ऐसे उपभोक्तावादी भारत में बदला हुआ है जिसमें उपभोग का अनंत अधिकार जीने का इकलौता तर्क है. 

लेकिन आज न सर्वेश्वर हैं, न वह मध्यवर्ग है और न संकोच का वह आवरण जिसके पीछे बहुत सारी विडंबनाएं ढकी-छुपी रहती हैं. आज वह विषमता कुछ और गहरी हो गई है, विलासिता कुछ और निद्वंद्व, निर्वसन और अश्लील- और मध्यवर्गीय भारत अब ऐसे उपभोक्तावादी भारत में बदला हुआ है जिसमें उपभोग का अनंत अधिकार जीने का इकलौता तर्क है. ऐसे भारत में जब कोई यह सवाल पूछता है कि जिन राज्यों में लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है, क्या वहां ऐसे खेल कराए जाने चाहिए जिनके लिए मैदानों को तैयार करने पर लाखों लीटर पानी बहाना पड़ता हो, तो लोग उसे कुछ अचरज से देखते हैं. और अगर कोई अदालत वाकई यह तर्क मानते हुए कुछ मैचों को बाहर भेजने का आदेश देती है तो इसे तो न्याय के साथ सीधे खिलवाड़ मान लिया जाता है.

एक स्तर पर यह बात सच है कि भारत में सूखे के लिए आइपीएल ज़िम्मेदार नहीं है. यह भी सही है कि आइपीएल के कुछ मैचों को कुछ राज्यों से बाहर कर देने के फैसले से लोगों को सूखे से राहत नहीं मिल जाएगी. भयानक विषमताओं से समाज में जो विडंबनाएं पैदा होती हैं, उनमें एक यह भी है जहां एक तरफ कुछ लोगों को साधन नहीं मिलते तो दूसरी तरफ़ कुछ लोग साधनों को बड़ी बेरहमी से जाया होने देते हैं. इस विडंबना की वजह से पानी या संसाधनों की बरबादी हाल के दिनों में एक हिंदुस्तान का स्वभाव बन चुकी है. पिछले दिनों सूखाग्रस्त इलाकों में नेताओं और मंत्रियों के दौरान हेलीकॉप्टर उतरते समय उड़ने वाली धूल को दबाने के नाम पर जो हज़ारों लीटर पानी बरबाद किया गया, वह इसकी एक मिसाल भर है. आइपीएल हो न हो, फाइव स्टार होटलों के स्वीमिंग पूल चलते रहेंगे, नेताओं और अफसरों के बंगलों में, और निजी कंपनियों के चमचमाते माहौल में काम करने वाले मुलाजिमों के फ्लैटों में पानी की कमी नहीं होगी- अगर होगी तो उसे टैंकरों के जरिए मंगा कर या बोलतबंद पानी वाली कंपनियों से ख़रीद कर पूरा कर लिया जाएगा. इन सबके बीच पानी भी बरबाद होता रहेगा. वह इतना भर भी नहीं बचेगा कि सूखे के दौरे में सेल्फी खींचने और फिर उसका बचाव करने में लगी किसी मंत्री को चुल्लू भर हासिल हो सके.

देश नाम का हमारा बहुत विशाल और पुराना घर वाकई अलग-अलग हिस्सों में बंटता जा रहा है. यहां यह लगभग सहज मान लिया गया है कि पांचसितारा होटलों में पार्टियां भी चलती रहें और उनके पिछवाड़े में लोग जूठन भी बीनते रहें

यह आइपीएल को होने देने के पक्ष में की गई दलील नहीं है. यह इस बात की तरफ़ ध्यान खींचने की कोशिश है कि देश नाम का हमारा बहुत विशाल और पुराना घर वाकई अलग-अलग हिस्सों में बंटता जा रहा है. यहां यह लगभग सहज मान लिया गया है कि पांचसितारा होटलों में पार्टियां भी चलती रहें और उनके पिछवाड़े में लोग जूठन भी बीनते रहें. नए बनते फ्लाईओवरों के ऊपर से चमचमाती गाड़ियां तेज़ी से गुज़रती रहें और लोग उनके नीचे कड़कड़ाती ठंड में बेलिबास किसी लाश की तरह सोए रहें. यह सर्वेश्वर के सवाल का शायद सबसे अमानुषिक जवाब है- एक कमरे में लाश पड़ी है और दूसरे कमरे में जश्न हो रहा है.

सवाल है, इस अमानुषिक द्वैत पर हमारी नज़र क्यों नहीं जाती? एक तो इसलिए कि वाकई हम इससे आंख मिलाना नहीं चाहते. दूसरी बात दुर्भाग्य से फिर उस प्रवृत्ति के खाते में जा गिरती है जिसकी नुमाइंदगी आइपीएल जैसी प्रतियोगिताएं करती हैं. इसमें संदेह नहीं कि आइपीएल उस नए बनते भारत का खेल है जो सबकुछ को एक टीवी तमाशे की तरह देखता है- ऐसे मनबहलाव की तरह जिसमें उसे कुछ रोमांच मिले, सोचने-समझने, जांचने-परखने की तकलीफ़ न करनी पड़े. लेकिन आइपीएल मनबहलाव की तरकीब भर नहीं रह जाता, वह एक हथियार भी बन जाता है- बहुत सारे लोगों को भुलावे में रखने का, भटकाए रखने का एक तरीका- जिसमें देश या समाज का विचार या स्मृति न हो, बस ग्लैडिएटरों की तरह मर-मिटने वाली बल्लेबाज़ी करने वाले चंद खिलाड़ियों का खूंरेजी खेल हो. इस प्रतियोगिता के लिए बनाई गई टीमों के नाम में यह स्मृतिहंता संस्कृति झांकती है जिनमें कोई डेयरडेविल है, कोई सुपरजायंट्स है और कोई नाइटराइडर. एक इंडियन भी है लेकिन उस इंडियन का है जिसके पास देश की सबसे ज़्यादा दौलत है.

इस आइपीएल पर रोक लगे न लगे, इस नए बनते इंडियन को रोकने की ज़रूरत है. पिछले दिनों देश को लेकर बहुत सारी बहसें चलीं. भारत माता की जय बोलकर देशभक्त होने का सबूत दिया गया, दूसरों से भी अपनी देशभक्ति साबित करने को कहा गया. लेकिन सर्वेश्वर अपनी मामूली हिंदी में जो कसौटी छोड़ गए हैं, क्या हम उस पर खरे उतरने को तैयार हैं? अगर नहीं तो मुझे कुछ नहीं कहना है- यह कवि कह गया है- ‘देश कागज पर बना / नक्शा नहीं होता / कि एक हिस्से के फट जाने पर / बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें / और नदियां , पर्वत,शहर,गांव / वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें / अनमने रहें . यदि तुम यह नहीं मानते / तो मुझे तुम्हारे साथ / नहीं रहना है .

बस संदर्भ के लिए यह बताना उचित है कि जब अस्सी के दशक के शुरुआती वर्षों में असम जल रहा था तो असम को बचाने के नाम पर निकले एक समाजवादी जत्थे को सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने यह कविता लिखकर दी थी. आज हमारे चारों तरफ़ कई असम हैं- लेकिन सर्वेश्वर नहीं हैं और हम देश को वाकई कागज़ का नक्शा बनाने पर तुले हैं.