कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश की नीमच मंडी से प्याज की कीमत 30 पैसे प्रति किलोग्राम तक गिर जाने की खबर आई. यह खबर उपभोक्ता के लिहाज से अच्छी जबकि किसानों के लिहाज से निराश करने वाली थी. कहा गया कि इस बार उत्पादन ज्यादा है और मांग कमजोर है.

छह महीने पहले यही प्याज अपनी अधिकतम कीमत के चलते चर्चा में था. अब खबर है कि कीमत इतनी कम हो गई है कि नीमच में किसान फसल मंडी में ही फेंककर वापस जा रहे हैं क्योंकि खरीददार हैं नहीं और फसल को वापस ढोकर ले जाना खुद पर और आर्थिक बोझ लादना है.

सवाल उठता है कि मांग कमजोर हुई है या उपलब्धता बढ़ गई है. क्या ऐसी स्थितियां केवल मांग-आपूर्ति का असंतुलन भर हैं या कारण कुछ और है?

प्याज की कीमतों में उतार-चढ़ाव के आंकड़े बताते हैं कि बात उत्पादन और मांग के असंतुलन तक सीमित नहीं है. इसमें सरकार की आयात-निर्यात नीति सहित कई चीजें शामिल हैं.

पिछले साल अगस्त-सितंबर में प्याज की थोक और खुदरा कीमतों में उछाल आया था. दीवाली आते-आते राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्याज की कीमत 80 रुपए प्रति किलो की दर को पार कर गई. देश भर में प्याज की किल्लत का ऐसा माहौल बना या बनाया गया कि हर छोटी-बड़ी मंडी में यह सामान्य कीमत से दोगुना और तिगुना दाम पर बिकने लगा. महाराष्ट्र में एशिया की सबसे बड़ी प्याज मंडी लासलगांव में प्याज का अधिकतम मूल्य जून-जुलाई में 19 और 23 रुपये प्रति किलो था, जो अगस्त-सितंबर में उछलकर 46 और 45 रुपये किलो हो गया. अक्टूबर-नवंबर में यह 36-29 रुपये बना रहा लेकिन, दिसंबर आते-आते कीमतें जून से भी नीचे चली गईं. 2016 में कीमतों में कोई सुधार नहीं हुआ. जनवरी में अधिकतम मूल्य 14 रुपये, फरवरी में 11 रुपये, मार्च में आठ रुपये और अप्रैल में (अब तक) नौ रुपये रहा.

मध्य प्रदेश की नीमच मंडी में भी यही हुआ. नेशनल हॉर्टीकल्चर रिसर्च एंड डवपलपमेंट फाउंडेशन के आंकड़े बताते हैं कि यहां पिछले साल अक्टूबर में प्याज का अधिकतम मूल्य 35 रुपये प्रति किलो था, जो जनवरी में 11 रुपये, फरवरी में दो रुपये, मार्च में सात रुपये और अप्रैल में (अब तक) तीन रुपये रहा. ध्यान रखना होगा कि यह थोक बाजार में प्याज का अधिकतम मूल्य है, न कि न्यूनतम.

चूंकि महंगाई को उपभोक्ता के लिहाज से समझने की नीति लागू है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी का लाभ किसानों के बजाय बिचौलियों और कालाबाजारी करने वालों की जेब में पहुंच जाता है.

प्याज की कीमतों में उतार-चढ़ाव के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पता चलता है कि बात उत्पादन और मांग के असंतुलन तक सीमित नहीं है. इसके तार सरकार की आयात-निर्यात नीति, किसानों को उचित मूल्य दिलाने की मंशा और उपभोक्ताओं की प्राथमिकता से भी जुड़ते हैं. चूंकि महंगाई को उपभोक्ता के लिहाज से समझने की नीति लागू है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी का लाभ किसानों के बजाय बिचौलियों और कालाबाजारी करने वालों की जेब में पहुंच जाता है. इस उपभोक्ता केंद्रित नीति में उत्पादकों (किसानों) का हित पीछे छूट जाता है.ऐसा नहीं है कि यह किसी खास दल की सरकार के समय में ही होता है, बल्कि लगभग सभी दलों की सरकारें महंगाई को उपभोक्ता पर पड़ने वाले असर के रूप में समझती हैं.

प्याज, दाल और तेल जैसी जरूरी चीजों की कीमत में जब भी असाधारण बढ़ोतरी होती है तो इस समस्या का समाधान आयात के रूप में निकाला जाता है. आयात से उपलब्धता बढ़ जाती है. तिस पर नई फसल आ जाए तो उपलब्धता इतनी बढ़ जाती है कि किसानों को सही कीमत मिलना मुश्किल हो जाता है.

इसे प्याज के जरिए आसानी से समझा जा सकता है. प्याज की कीमत जून-जुलाई में उछलती है और दिसंबर आते-आते पहले से कहीं ज्यादा गिर जाती है. यह लगभग हर साल होता है, लेकिन जिस साल प्याज आयात किया जाता है, हालात बदतर हो जाते हैं. शीतकालीन सत्र में वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा को बताया था कि मेटल्स एंड मिनरल्स ट्रेडिंग कार्पोरेशन (एमएमटीसी) की ओर से आयातित प्याज की मांग नहीं रह गई है, क्योंकि बाजार में खरीफ की नई फसल आ चुकी है.

वाणिज्य मंत्री का बयान आयातित प्याज के साथ नई फसल की भी समस्या की ओर संकेत करता है. कुल मिलाकर उपभोक्ता केंद्रित सोच महंगाई का लाभ किसानों तक नहीं पहुंचने देती है. ऐसे में अच्छी कीमत की उम्मीद के साथ जब किसान नई फसल लेकर मंडी पहुंचता है, ठगा सा रह जाता है.