मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में संस्कृत के पढऩे-पढ़ाने का प्रस्ताव क्या रखा, तथाकथित बुद्धिजीवियों को गहरी अपच हो गई. किसी प्राचीनतम भाषा का विरोध करने की हल्की राजनीति शुरू हो गई. अब कोई समझाए तो सही कि ईरानी ने आखिर गलत क्या कहा! क्या भारत जैसे परंपराबद्ध सांस्कृतिक देश में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन को बढ़ावा देना गलत है? जिस देश की अमर परंपरा का लोहा विश्व साहित्य का रंगमंच मानता है, उस अपूर्व साहित्य की वाहक भाषा संस्कृत को मात्र इसलिए नकार दिया जाए कि वह ‘सनातन’ है?

असल में इन आधुनिकों की समस्या संस्कृत नहीं, बल्कि कुछ और है. वे संस्कृत को हिंदूवाद के जाल में फंसाकर राजनीति करना चाहते हैं. लेकिन ऐसा करने से पहले यदि संस्कृत और उसके साहित्य को वे जरा भी जान-पढ़ लें तो उन्हें संस्कृत का महत्व समझ आ जाए. क्या संस्कृत को मिटाकर हम वाल्मीकि और कालिदास की स्मृतियां संजोकर रख पाएंगे?

हकीकत में स्मृति ईरानी के सुझाव का संबंध 14 सितंबर, 1949 को हुई संविधान सभा से है. इस दिन डॉ. भीमराव अंबेडकर और प्रो. नाजिरुद्दीन अहमद ने संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का सुझाव संविधान सभा को दिया था. इस सलाह के पीछे उन दोनों का एक खास तर्क था कि राष्ट्रभाषा का दर्जा पाने की पात्रता सारी भारतीय भाषाओं की ‘मां’ में ही हो सकती है. बंगाल से निर्वाचित दलित और मुस्लिम लीग के इन नेताओं के जेहन में इसके पीछे यह मंशा थी कि स्वतंत्र भारत का भाषाई आधार पर बंटवारा न हो. भारत को भाषाई एकसूत्र में पिरोने का काम संस्कृत ही करती है. किसी भी भारतीय के लिए संस्कृत को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकारने में कोई कठिनाई न तो पहले थी और न ही आज होगी क्योंकि सारी भारतीय भाषाएं संस्कृत का अपना आस-पड़ोस है. कह सकते हैं कि संस्कृत का हिमालय पिघलता है तो भारतीय भाषाई नदियों में पानी आता है.

बंगाल से निर्वाचित दलित और मुस्लिम लीग के इन नेताओं के जेहन में इसके पीछे यह मंशा थी कि स्वतंत्र भारत का भाषाई आधार पर बंटवारा न हो. 

जो कांग्रेस ईरानी के इस बयान का विरोध कर रही है, उसे पता होना चाहिए कि आजादी के तुरंत बाद 1956 में पं. जवाहरलाल नेहरू ने प्रसिद्ध भाषाशास्त्री सुनीति कुमार चटर्जी की अध्यक्षता में प्रथम संस्कृत आयोग का गठन कर संस्कृत शिक्षा की जमीनी हकीकत जाननी चाही थी. उसी आयोग की रिपोर्ट पर तीन केंद्रीय संस्कृत संस्थानों की स्थापना हुई है. दूसरे संस्कृत आयोग का गठन डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार में 2012 में किया. इसके अध्यक्ष प्रो. सत्यव्रत शास्त्री ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को आईआईटी और आईआईएम में संस्कृत कोर्स शुरू करने का प्रस्ताव दिया है. अब कोई बताए कि क्या ऐसा करने से कांग्रेस सांप्रदायिक हो गई? नहीं ना. तो फिर ईरानी के बयान पर बेवजह का बवाल क्यों है?

2006 में यूनेस्को ने मानव इतिहास का सबसे पुराना जीवित दस्तावेज ऋग्वेद को माना था. साफ है कि यदि ऋग्वेद सर्वप्राचीन है तो उसकी भाषा संस्कृत सबसे प्राचीन भाषा है. याद कीजिए, संस्कृत विरोध की राजनीति करने वालों ने उस समय यूनेस्को के इस बयान का भारी विरोध किया था. जेएनयू में लंबी हड़ताल और प्रदर्शन करके यूनेस्को से इस घोषणा को वापिस लेने का असफल आंदोलन तक किया था. ठीक उसी तरह आज भी वे यह समझने को तैयार नहीं है कि संस्कृत सतानत सत्ता का सत्य है. संस्कृत का इतिहास किसी से पूछने की जरूरत नहीं है. यह सनातन है, ठीक उसी तरह जैसे सनातन धर्म है. भला सनातन धर्म का इतिहास कोई बता सकता है कि वह कब, कहां और कैसे शुरू हुआ? संस्कृत ने जो सत्य उद्घाटित किए, वे पूरी दुनिया में माने जा रहे हैं. पिछले साल 21 जून को मनाया गया विश्व योग दिवस इसका प्रमाण है. संस्कृत पूरी मानवता को जोड़ने की सामर्थ्य रखती है, क्योंकि वह किसी धर्म, राष्ट्र या जाति के बंधन में नहीं बांधी जा सकती. जैसे सूर्य-चंद्रमा किसी एक के नहीं, सभी के हैं ठीक वैसे ही संस्कृत सारी मानव जाति के लिए है.

2006 में यूनेस्को ने मानव इतिहास का सबसे पुराना जीवित दस्तावेज ऋग्वेद को माना था. साफ है कि यदि ऋग्वेद सर्वप्राचीन है तो उसकी भाषा संस्कृत सबसे प्राचीन भाषा है. 

कम ही लोगों का ध्यान इस ओर है कि डॉ. अंबेडकर ने वेद-पुराणों का विस्तृत अध्ययन किया था. इस अध्ययन से उन्होंने एक निष्कर्ष निकाला कि भारत में एक महान सभ्यता रही है. संस्कृत उसकी वाहक है. उसमें धर्म और दर्शन का मेल है. वहां ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग साध्य और साधन, दोनों रूपों में मिलता है, लेकिन पद्धति कभी मंजिल नहीं होती. पद्धति की कट्टरताएं टकराव पैदा करती हैं. इस टकराव का अचूक समाधान संस्कृत के पास है, क्योंकि उसका यह सिद्धांत ही है कि ‘आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्’ अर्थात जो तुम्हें अपने लिए अच्छा न लगे, उसे दूसरों के लिए भी न करो. ऐसे मूल्यों की जरूरत आज हरेक राष्ट्र, समाज, धर्म, पंथ, परंपरा और भाषा को है.

क्या अब भी संस्कृत में दम बचा है? क्या वह आधुनिक समाज को सांस्कृतिक उन्नति के रास्ते पर ले जाने में समर्थ है? इसका जवाब ‘हां’ अथवा ‘ना’ में नहीं हो सकता. संस्कृत के बारे में लोगों के दो नजरिये हैं. एक वर्ग वह है जो संस्कृत में सबकुछ ठीक ही देखता है. इस वर्ग की रोजी-रोटी संस्कृत से चलती है. उनका तर्क है कि संस्कृत सनातन है, ऐसे भाषण का प्रभाव तब तक ही रहता है जब तक वक्ता बोलता रहता है. दूसरा समूह उन लोगों का है जिन्हें संस्कृत में दोष ही नजर आते हैं. वे ऊंच-नीच सहित सारे दोषों को संस्कृत के माथे मढ़ना चाहते हैं. लेकिन इसमें संस्कृत का क्या दोष? क्या विचारों की वाहक भाषा कभी दोषी होती है? कोई बताए.

यह जरूर है कि आज संस्कृत उपेक्षित सी है. इसके बारे में घोर अज्ञान है. इसकी विडंबना यह है कि इसकी हर शाखा तना बन गई. शाखाओं ने वृक्ष का रूप ले लिया. मूल मरता चला गया. फिलहाल उसके खंडहर दिखाई पड़ते हैं. संस्कृत की इस दुर्दशा के लिए वे लोग जिम्मेदार हैं जो संस्कृत के पक्ष-विपक्ष में खड़े होकर वोटों की राजनीति करते हैं. इन्होंने संस्कृत की आड़ में अपने स्वार्थ सिद्ध किए हैं. संस्कृत तो गंगा है, जो वाल्मीकि और व्यास को पैदा करती है. संस्कृत का यही सच्चा चरित्र इसका भविष्य में कल्याण करेगा. संस्कृत जब आबाद होगी तो सामाजिक समरसता के आंदोलन का आकार लेगी जिसका उद्घोष होगा-सर्वे भवन्तु सुखिन:.

(लेखक राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)