उत्तराखंड के जंगलों में हर साल लगने वाली आग एक बार फिर सुर्खियों में है. गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र के कई जिलों में जंगल धू-धू कर जल रहे हैं. चारधाम यात्रा पर भी इसका खतरा मंडराने लगा है. यात्रियों को सुरक्षा मुहैया कराना सरकार के लिए चुनौती बन गया है. वन विभाग और राज्य आपदा मोचन बल (एसडीआरएफ) की टीमें आग बुझाने के काम में लगी हैं. बिगड़ते हालात को देखते हुए अधिकारियों की छुट्टियां भी रद्द कर दी गई हैं.

लेकिन इतिहास पर नजर डालें तो कहा जा सकता है कि हर साल की तरह इस साल भी यह आग मानसून से पहले होने वाली बारिश से ही बुझेगी. इसी तरह अगले साल भी इसका लगना और तबाही मचाना तय है. दरअसल इस आग से निपटने की जो रणनीति दिखती है वह बीमारी की जड़ से ज्यादा लक्षणों का इलाज करने जैसी है.

हर साल गर्मियों में उत्तराखंड के जंगल जलते रहे हैं. इतने लंबे समय बाद कुछ सबक सीखे जाने चाहिए थे लेकिन, ऐसा होता नहीं दिखता. आग लगती है तो इसके बाद का कुछ समय आग लगने के कारणों, उसे बुझाने के उपायों और जिम्मेदारी तय करने से जुड़ी बहस में बीत जाता है. फिर जून के दूसरे पखवाड़े मानसून से पहले की बारिश शुरू होने के साथ आग भी खत्म हो जाती है और बहस भी. तब तक 65 फीसदी वन क्षेत्र वाले राज्य का हजारों हेक्टेयर जंगल राख हो चुका होता है. यह हाल तब है जब देश का वन अनुसंधान संस्थान राज्य की राजधानी देहरादून में ही है.

कुछ साल पहले खबर आई थी कि देहरादून में स्थित फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने देश भर में लगने वाली आग की सूचना पहुंचाने के लिए सेटेलाइट आधारित सूचना देने की एक प्रणाली विकसित की है. इसकी मदद से जंगल में कहीं भी आग लगने के चार घंटे के भीतर अपने आप ही उस इलाके में तैनात डीएफओ के मोबाइल पर इसकी सूचना आ जाती है. यानी आग लगने के कुछ समय बाद ही उसे काबू किया जा सकता है. लेकिन अभी जो स्थिति है उससे साफ पता चल रहा है कि इस व्यवस्था पर ठीक से अमल नहीं हो रहा. राज्य के वन विभाग के पास वित्तीय और मानव संसाधनों की कमी की खबरें भी जब तब छपती ही रहती हैं.

कारण

वन विभाग अक्सर कहता है कि ज्यादातर मामलों में आग का संबंध कुदरत के बजाय इंसानों से होता है. उसके मुताबिक ग्रामीण अपने खेतों या पास के वनों में आग लगाते हैं ताकि बरसात के बाद पशुओं के लिए अच्छी घास उगे. उधर, ग्रामीण आरोप लगाते रहे हैं कि हर साल होने वाले फर्जी वृक्षारोपणों की असफलता को छिपाने के लिए वनकर्मी खुद भी जंगलों में आग लगाते हैं. कहा यह भी जाता है कि शीशम और सागौन जैसे बहुमूल्य पेड़ काटने के लिए टिंबर माफिया भी इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं. कई बार इसके पीछे शिकारियों का भी हाथ बताया जाता है क्योंकि जब जंगल में आग लगती है तो जीव-जंतु बाहर आ जाते हैं और उनका शिकार करना आसान हो जाता है.

उत्तराखंड में करीब 16 फीसदी भूमि पर अकेले चीड़ के जंगल हैं. मार्च से लेकर जून का समय इन पेड़ों की नुकीली पत्तियां गिरने का भी होता है. इन्हें पिरुल कहा जाता है. भारतीय वन संस्थान के एक अध्ययन के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले चीड़ के जंगल से साल भर में छह टन तक पिरुल गिरता है. उत्तराखंड में अधिकांश सड़कें जंगलों से गुजरती हैं. सड़कों पर गिरे पिरुल पर गाड़ियों के चलने से सड़क के किनारे पिरुल का बुरादा जमा हो जाता है जिसमें मौजूद तेल की मात्रा इसे किसी बारूद सरीखा बना देती है. माचिस की अधबुझी तीली या किसी यात्री की फेंकी गई बीड़ी-सिगरेट से यह बुरादा कई बार आग पकड़ लेता है. चीड़ के जंगलों में बहुत कम नमी होती है इसलिए भी इन जंगलों में आग जल्दी लगती है और तेजी से फैलती है.

जंगल से टूटता रिश्ता

यहीं इस समस्या का नाता पारंपरिक ज्ञान की उपेक्षा से भी जुड़ता है. दरअसल एक समय उत्तराखंड में चीड़ का इतना ज्यादा फैलाव नहीं था जितना आज है. तब इस इलाके में देवदार, बांज, बुरांश और काफल जैसे पेड़ों की बहुतायत थी. इमारती लकड़ी के लिए अंग्रेजों ने इन पेड़ों को जमकर काटा. इसके बाद खाली हुए इलाकों में चीड़ का फैलाव शुरू हुआ.अंग्रेजों ने भी इस पेड़ को बढ़ावा दिया क्योंकि इसमें पाये जाने वाले रेजिन का इस्तेमाल कई उद्योगों में होता था. विकसित होने के बाद चीड़ का जंगल कुदरती रूप से जल्दी फैलने की क्षमता भी रखता है. जानकारों के मुताबिक यही वजह है कि अंग्रेजों के जाने के बाद वन विभाग भी वन विकास के लिए लंबे समय तक इसी पेड़ पर ध्यान देता रहा. नतीजतन चीड़ धीरे-धीरे उत्तराखंड के बड़े इलाके में पसर गया.

लेकिन इस पेड़ का उत्तराखंड के समाज से कोई खास रिश्ता नहीं बन पाया. इसके कारण भी थे. बांज और बुरांस जैसे दूसरे स्थानीय पेड़ इस समाज के बहुत काम के थे. उनकी पत्तियां जानवरों के चारे की जरूरत पूरी करती थीं. उनकी जड़ों में पानी को रोकने और नतीजतन स्थानीय जलस्रोतों को साल भर चलाए रखने का गुण था. लेकिन चीड़ में ऐसा कुछ भी नहीं था. बल्कि जमीन पर गिरी इसकी पत्तियां घास तक को पनपने नहीं देती थीं. तो लोगों में यह सोच आना स्वाभाविक था कि इनमें आग ही लगा दी जाए ताकि बरसात के मौसम में थोड़े समय के लिए ही सही, घास के लिए जगह खाली हो जाए और जानवरों के लिए चारे का इंतजाम हो जाए. इस स्थिति के साथ सख्त वन्य कानूनों का भी मेल हुआ तो स्थानीय लोगों के लिए जंगल पराए होते चले गए. पहले वे इन्हें अपना समझकर खुद इन्हें बचाते थे, लेकिन अब वे इन्हें सरकारी समझते हैं.

कुछ समय पहले एक बातचीत में प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने कहा था, ‘जब तक आप उत्तराखंड के लोगों को उनका वही जंगल वापस नहीं लौटाएंगे तब तक आग को भी नहीं रोक पाएंगे.’ आज भी उत्तराखंड में जहां मिश्रित वन (बांज, बुरांस और काफल जैसी प्रजातियों वाले जंगल) हैं उनमें आग की घटनाएं कम भी होती हैं और पानी की मौजूदगी के चलते उनमें आग से निपटना बनिस्बत कम मुश्किल है.

आग समझदारी से लगाई जाए तो फायदे भी

कई जानकार मानते हैं कि सीमित तरीके से लगाई गई आग के फायदे भी हैं. तब वह बड़ी दावाग्नि को रोक सकती है और जैव विविधता खत्म करने के बजाय उसे बढ़ा भी सकती है. ऐसी आग को कंट्रोल्ड फायर कहा जाता है. बताते हैं कि पहले यह वन विभाग की कार्ययोजना का हिस्सा हुआ करती थी. तब जनवरी के महीने जंगलों में कंट्रोल फायर लाइनें बनाई जाती थीं. इसमें एक निश्चित क्षेत्र को आग से जला दिया जाता था. इससे होता यह था कि कहीं भी आग लगे और वह फैलती हुई इस क्षेत्र तक पहुंचे तो उसे भड़कने के लिए कुछ नहीं मिलता था और वह वहीं थम जाती थी. जानकारों के मुताबिक आज भी कई जगहों पर ऐसी कंट्रोल फायर लाइनें बनती हैं जिनका दायरा बढ़ाने की जरूरत है.