कठोपनिषद् में एक वाक्य आता है ‘विज्ञानसार्थिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः’. प्रमुख उपनिषदों का सुंदर और भावपूर्ण अनुवाद करने वाले एकनाथ ईश्वरन ने जब कठोपनिषद् के इस वाक्य में आए ‘विज्ञान’ शब्द का अनुवाद किया तो उन्होंने इसे ‘साइंस’ नहीं लिखा. उन्होंने विज्ञान शब्द के लिए अंग्रेजी में लिखा - ‘डिस्क्रिमिनेटिंग इन्टेलेक्ट’ यानि सत् और असत् का पहचान करने की प्रज्ञा या विवेकशक्ति.

विश्व की सभी प्राचीन भाषाओं में जो ज्ञान मुखरित हुआ, चाहे वह संस्कृत हो, अरबी हो, पालि हो, ग्रीक हो या मंडेरिन, वह जीवन को समग्रता में देखने का विज्ञान था. उसमें एक साथ गणित भी था, तर्क और दर्शन था, नीति, आचार, आरोग्य और अर्थशास्त्र भी था, शासन-व्यवस्था और शासनमुक्ति के सूत्र भी थे. उसमें यौगिक अनुभवों से अपने शरीर और मन से लेकर प्रकृति और समष्टि तक को जान लेने की कला भी थी. उसमें भरपूर मनोविज्ञान के साथ-साथ अतिमानसिक तरंगों को देख लेने की साधना वाला आत्मविश्वास भी था. वह वास्तव में, जीवन को संपूर्णता की ओर ले जाने वाला एक समन्वयवादी और समरसतावादी विज्ञान था. संस्कृत, अरबी, पालि, यूनानी या मंडेरिन उस दौर में इसी संपूर्णतावादी विज्ञान को अभिव्यक्त करने का माध्यम बने.

विश्व की सभी प्राचीन भाषाओं में जो ज्ञान मुखरित हुआ, चाहे वह संस्कृत हो, अरबी हो, पालि हो, ग्रीक हो या मंडेरिन, वह जीवन को समग्रता में देखने का विज्ञान था

आधुनिक शिक्षा-विचार और शिक्षण पद्धति में जो अलग-अलग डिसीप्लिन और अलग-अलग विज्ञान बनाने का विभाजनकारी दौर चला, उससे वास्तविक विज्ञान की क्षति ही हुई है. आज भले ही उसकी भरपाई के लिए इंटर-डिसीप्लिनरी और मल्टी-डिसीप्लिनरी का कृत्रिम दृष्टिकोण अपनाने की बौद्धिक पहल दिखाई देती हो, लेकिन वास्तविक विज्ञान को संपूर्णता में देखने की दृष्टि का ह्रास ही हुआ है. कुछ साइंसदाओं की एकांगी सोच के कारण आज के पदार्थवादी विज्ञान ने एक तरफ जहां अपने चमत्कारी उत्पादों से कथित तौर पर लोगों का जीवन आसान बनाया है, वहीं वह प्रकृति और पूरी मानवीयता के लिए संकट बनकर भी खड़ा हो चुका है.

यह कौन सा विज्ञान और वैज्ञानिक जीवन-शैली है जो पहले तो हमारी गंगा और यमुना जैसी नदियों की हत्या कर डालता है और फिर जब वह मरण-शैय्या पर होती है तो उसको पुनर्जीवित करने का कोई और खर्चीला और अव्यावहारिक लेकिन कथित वैज्ञानिक तरीका ढूंढ़ निकालने का दावा करता है? यह कौन सा विज्ञान है जिसकी वजह से दिल्ली और बीजिंग से लेकर मुजफ्फरपुर और ऋषिकेश तक में लोगों के सांस लेने लायक हवा नहीं रह गई है और 70 फीसदी बच्चे सांस और फेफड़े की बीमारी लिए पैदा हो रहे हैं, और दूसरी तरफ यही विज्ञान इन बीमारियों से निजात दिलाने के लिए ‘आरएंडडी’ करके पेटेंटवादी दवाइयां बनाकर बेच रहा है?

यह विज्ञान एक तरफ जहां आम जन-जीवन को सुविधाजनक और सुविधाभोगी बना रहा है, वहीं यह निराशा, अवसाद और आत्महत्या की प्रवृत्ति को भी जन्म दे रहा है. एक तरफ जहां यह परमाणु बिजली बनाकर हमारे जीवन को रोशन करने का दंभ भरता है, वहीं दूसरी ओर इसी परमाणु से इतने बम बना चुका है कि समूची पृथ्वी को कई बार नष्ट किया जा सकता है. इसी परमाणु के रेडियोएक्टिव कचरे से यह हमारे समुद्रों को दूषित कर चुका है.

कहने का मतलब यह कि पदार्थवादी विज्ञान में जो संपूर्णतावादी वैज्ञानिक दृष्टि चाहिए, वह आधुनिक चिंतन में बढ़ने के बजाय घटती गई लगती है. बचाव में हम केवल यही कह सकते हैं कि यह विज्ञान अभी बच्चा है, और विकासवादी प्रक्रिया में गलतियां कर-करके सीख रहा है. ले-दे कर अभी उसके पास कुछ प्रमेय, कुछ उपकरण, कुछ रासायनिक औषधियां, कुछ मनोवैज्ञानिक नुस्खे और कुछ राजनीतिक और कूटनीतिक चिप्पीकारियां ही मिल पाती हैं. इसलिए वह जीवन के अन्य मौलिक प्रश्नों के समाधान में स्वयं को असहाय पाता है.

यह कौन सा विज्ञान और वैज्ञानिक जीवन-शैली है जो पहले तो हमारी गंगा और यमुना जैसी नदियों की हत्या कर डालता है और फिर उसको पुनर्जीवित करने का कोई और खर्चीला और अव्यावहारिक लेकिन कथित वैज्ञानिक तरीका ढूंढ़ निकालने का दावा करता है? 

दुनिया की तमाम सुख-सुविधाएं और प्रसिद्धि भोग लेने के बाद जब लियो टॉल्सटॉय के मन में आत्महत्या का विचार पैदा हुआ, तो उन्होंने समकालीन दुनिया के सभी बड़े वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, साहित्यिकों और धर्मोपदेशकों के साथ संवाद स्थापित कर जीवन और विज्ञान की इस बहुपक्षीय पहेली को समझने की कोशिश की थी. उन्होंने अपनी आत्मकथा में इस विषय पर एक लंबा प्रसंग लिखा है. उन्होंने प्रचलित सामाजिक विज्ञान और प्राकृतिक विज्ञान की अक्षमताओं और विरोधाभासों के बारे में तात्कालिक निष्कर्ष के रूप में लिखा- ‘मैं समझ गया कि ये सब विज्ञान बड़े दिलचस्प हैं, बड़े आकर्षक हैं; पर जीवन के प्रश्न के ऊपर उनके प्रयोग का जहां तक सवाल है वे उल्टी दिशा में ही ठीक और स्पष्ट हैं. वे जीवन के प्रश्न का उत्तर देने की जितनी ही कोशिश करते हैं, उतना ही अधिक आकर्षण-हीन होते जाते हैं. अगर कोई विज्ञानों के उस विभाग की तरफ ध्यान दे जो जीवन के प्रश्न का उत्तर देने की कोशिश करता है (इस विभाग में शरीर-विज्ञान, मनोविज्ञान, समाज विज्ञान आदि हैं) तो वहां उसे विचारों की आश्चर्यजनक दीनता, सबसे अधिक अस्पष्टता, अप्रासंगिक प्रश्नों को हल करने का एक बिल्कुल अनुचित और झूठा दावा तथा हरेक विज्ञानी द्वारा दूसरे का, और अपने द्वारा अपने ही बातों का, निरंतर खंडन होता दिखाई देगा.

वहीं अगर हम उन विज्ञानों की तरफ देखते हैं, जिनका जीवन के प्रश्नों को हल करने से कोई संबंध नहीं है, पर जो स्वयं अपने विशेष वैज्ञानिक प्रश्नों का जवाब देते हैं; तो इंसान की दिमागी ताकत को देखकर मुग्ध हो जाना पड़ता है. लेकिन हम पहले से ही जान चुके होते हैं कि वे जीवन के प्रश्नों का कोई जवाब नहीं देते हैं. वे तो जीवन के प्रश्नों की उपेक्षा करते हैं. उनका कहना होता है कि ‘तुम क्या हो और क्यों जीते हो’ इस प्रश्न का न तो हमारे पास जवाब है और न उसके बारे में हम सोचते हैं. हां, अगर तुम प्रकाश और रासायनिक मिश्रणों के नियम जानना चाहो... अगर तुम गुण और परिमाण का संबंध जानना चाहो... तो हमारे पास स्पष्ट, यथार्थ और निर्विवाद उत्तर मौजूद हैं.’

ये तो हालत कर दी गई है हमारे विज्ञानों की. ज्यों-ज्यों वैज्ञानिक उपलब्धियों, खोजों और उत्पादों का अहंकार बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे जीवन के प्रश्नों पर हमारी समस्याओं की जटिलता और असहायता बढ़ती जा रही है. लेकिन इसी वैज्ञानिकता के बचाव में हम संस्कृत, अरबी या पालि को दुत्कारते हुए कहने लगते हैं कि तुम वैज्ञानिक हो तो हमें अपने ग्रंथों में रॉकेट साइंस ढूंढ़ के दिखाओ. विज्ञान के इस चलताऊ अर्थ के बजाए नई और ज्यादा वैज्ञानिक पीढ़ियों से अपेक्षा की जाती है कि वह विज्ञान को केवल जेनेटिक्स, रोबोटिक्स, इन्फॉर्मेटिक्स या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे विषयों तक ही सीमित कर देने की भूल न करें. उनको स्वयं में सभी प्रकार के विज्ञानों को आत्मसात करने की विनम्रता पैदा करनी होगी. उन्हें अपने आप में सभी प्रकार के विज्ञानों की व्यापकता और उपयोगिता के प्रति कृतज्ञताभाव पैदा करना होगा. प्रकृति के अद्भुत रहस्यों को अलग-अलग प्रेक्षण बिंदु (कोई स्थान विशेष जहां खड़े होकर आसपास का मुआयना किया जाता है) से समझने की अनेकान्तवादी उदारता विकसित करनी होगी. तब जाकर विज्ञान बनेगा विज्ञान.

ब्रह्मविद्या या अध्यात्म-विज्ञान चाहे किसी भी भाषा या बोली में कही गई हो, उसे जानने की उत्कंठा उनके लिए शर्म या संकोच का विषय भला क्यों हो?

ब्रह्मविद्या या अध्यात्म-विज्ञान चाहे किसी भी भाषा या बोली में कहा गया हो, उसे जानने की उत्कंठा उनके लिए शर्म या संकोच का विषय भला क्यों हो? वास्तव में, धर्म के नाम पर बांटने और लड़ाने वाले पंथवादी या संप्रदायवादी सियासी विचार और अंधविश्वास ऐसे ही विज्ञान की कसौटी पर अपना दम तोड़ देंगे. तब जाकर प्रकट होगा और खिलेगा वैज्ञानिक युग का वैज्ञानिक अध्यात्म. तब जाकर सम्पूर्णता की ओर बढ़ेगा जीवन का भौतिक, नैतिक और भावनात्मक विज्ञान.

इस संदर्भ में विनोबा के वैज्ञानिक अध्यात्म वाली परंपरा में दो जैन आचार्यों का उल्लेख जरूरी है. एक आचार्य तुलसी और दूसरे आचार्य महाप्रज्ञ. संस्कृत के महान ग्रंथों और पालि के जैन आगमों का गहन अध्ययन करके अपनी यौगिक अनुभूति से उसे साबित कर इन्होंने ‘जीवन-विज्ञान’ या ‘साइंस ऑफ लिविंग’ के नाम से एक नए पाठ्यक्रम की ही रचना कर दी. आधुनिक जीव विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान सहित सभी प्रकारों के विज्ञानों का समन्वय करते हुए इन्होंने प्राथमिक से लेकर स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर तक का जीवन-विज्ञान साहित्य भी रचा. प्रेक्षाध्यान पर आधारित इस पद्धति में उन्होंने प्रायोगिक रूप से बताया कि शरीर की विभिन्न ग्रंथियों जैसे एड्रेनल, थाइमस, पैंक्रियास, थाइराइड, पाइनियल, पिट्यूटरी, कोर्टेक्स और गोनाड्स तक में हो रही रासायनिक अभिक्रियाओं को यौगिक अनुभूति से कैसे समझा जाए और उनके प्रति सचेत रहते हुए स्वयं को अनुशासित और जागृत किया जाए. अध्यात्म विज्ञान का अन्य सभी विज्ञानों से समन्वयकर सम्पूर्णतावादी विज्ञान की ओर बढ़ने का यह प्रयास अपने आप में अनूठा है.

राजस्थान के सभी प्रकार की सियासी जमातों पर इसका ऐसा असर रहा कि उन्होंने इसे विद्यालयों और विश्वविद्यालयों से लेकर शिक्षकों की ट्रेनिंग तक में शामिल किया. इसके अच्छे परिणाम भी देखने को मिले हैं. लेकिन यही सरकारें एक दिन इसे महज आज के अर्थों में ‘फिजिकल एजुकेशन’ वाली चटनी बनाकर इसका मौलिक स्वरूप नष्ट कर देंगी, इसका अंदेशा बराबर रहता है.

विज्ञान को अनिवार्य रूप से नास्तिकतावादी मान लेने वाले आज के रेशनलिस्ट भाइयों और बहनों को याद रखना चाहिए कि आज के सतही नास्तिकतावाद और प्रगतिवाद से कहीं अधिक समृद्ध नास्तिकतावादी चिंतन संस्कृत भाषा में सैकड़ों वर्ष पहले हो चुका है और उस पर दुनिया की सभी भाषाओं में इतने अधिक चिंतन, विश्लेषण और भाष्य हो चुके हैं कि होमियोपैथी की दवा की भांति घोंट-घोंट कर उसकी पोटेंसी भी बढ़ चुकी है.

महात्मा गांधी ने उपयोगिता के हिसाब से संस्कृत, अरबी और अंग्रेजी सबकुछ पढ़ने की वकालत की थी. लेकिन उन्होंने चेताया भी था, कि यदि यह मजहबी तालीम की तरह से हो तो सरकार इससे कोई संबंध न रखे

हम ईश्वर, आत्मा और चित्त संबंधी विचारों को मानें या न मानें, लेकिन हममें इतनी उदारता तो होनी ही चाहिए कि कारण-कार्य संबंध से लेकर शरीर के आवेगों और मन की तरंगों तक को अनुशासित करने के ज्ञान को भी विज्ञान का हिस्सा मानें. कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों से लेकर शरीर और मस्तिष्क की आंतरिक ग्रंथियों में हार्मोन और तरंगों के स्तर पर होने वाली रासायनिक क्रियाओं को यौगिक अनुभवों से समझने और संतुलित करने की आजमाइश वैज्ञानिक कसौटियों पर करें. और हम न्यूनतम रूप से भी इतने आशावादी क्यों न हों कि भविष्य की वैज्ञानिक पीढ़ियां इसे भौतिक रूप से भी और ज्यादा सूक्ष्मता में देख और समझ पाएंगी.

आज का यूरोप और अमेरिका अपने जिस उद्योगवादी विज्ञान और लोकतंत्रवादी व्यवस्था के अहंकार में इतराता है, उसकी पूर्वपीठिका उसी रेनेसां या पुनर्जागरण के धरातल पर लिखी गयी थी जिसके पीछे ग्रीक में लिखा वह ज्ञान-विज्ञान था, जिसे यूनानी अपने साथ लेकर आए थे. उसमें अरबी, संस्कृत और मंडेरिन के गणितीय, चिकित्सकीय, खगोलीय और अन्य समाज वैज्ञानिक सिद्धांतों का भी योगदान था.

दुनियाभर में और भारत के भी विश्वविद्यालयों में भले ही मनु, पतंजलि, भतृहरि या व्यास को पढ़ने में प्राच्यवादी या ओरिएन्टलिस्ट हिचक दिखाई देती हो, लेकिन वहां आज भी सुकरात, प्लेटो और अरस्तु को खूब रस ले-ले कर पढ़ा जाता है और पढ़ाया जाता है.

हमारे समय का दुर्भाग्य है कि संस्कृत, अरबी, पालि, तमिल या मंडेरिन जैसी शास्त्रीय भाषाओं से लेकर अन्य अनगिनत देसीय लोकभाषाओं और सधुक्कड़ी बोलियों तक में उपलब्ध जीवन के संपूर्णतावादी विज्ञान को संप्रदायमुक्त होकर समझने के बजाए उसका सांप्रदायीकरण ही ज्यादा हुआ है. मानवीय धरोहर के रूप में बची इन भाषाओं तक को संप्रदायों ने आपस में बांट लिया है. हिंदू कहें कि संस्कृत मेरी, बौद्ध और जैन कहें कि पालि मेरी, मुस्लिम कहें कि अरबी मेरी, ईसाई कहें कि लैटिन मेरी, और ताओ और कन्फ्यूशियसवादी कहें कि मंडेरिन मेरी, तो ये भी कोई बात हुई! इसका कारण यह है कि घोर संकीर्णतावादी और मताग्रही दौर में वैज्ञानिक सोच वाले ऐसे समन्वयवादी लोग बहुत थोड़े रह गए हैं जिनमें इतना धैर्य हो कि वे अध्यात्म-विज्ञानी विनोबा की तरह 21 वर्षों में क़ुरआन शरीफ का अरबी में ही छह बार आद्योपान्त अध्ययन करके उसका निचोड़ ‘रूह-उल-क़ुरान’ या ‘क़ुरान-सार’ लिख सकें और जिसे दुनियाभर के उदार अरबी विद्वान सराहें और पाकिस्तान के सभी बड़े राष्ट्रीय अखबारों में उसके बारे में संपादकीय लिखे जाएं.

सरकारी हस्तक्षेप से यही होगा कि कोई सांप्रदायिक जमात संस्कृत के बचाव में पुष्पक विमान और गणेशजी की सर्जरी गिनाने लग जाएगी, या फिर कोई सेकुलरवादी जमात विश्वविद्यालयों में संस्कृत के नाम पर केवल रसमंजरी वाले साहित्य पढ़ाती रहेगी

महात्मा गांधी ने उपयोगिता के हिसाब से संस्कृत, अरबी और अंग्रेजी सबकुछ पढ़ने की वकालत की थी. लेकिन उन्होंने चेताया भी था, कि यदि यह मजहबी तालीम की तरह से हो तो सरकार इससे कोई संबंध न रखे और उसे केवल मजहबी अंजुमनों पर ही छोड़ दे. सरकारी हस्तक्षेप से यही होगा कि कोई सांप्रदायिक जमात संस्कृत के बचाव में पुष्पक विमान और गणेशजी की सर्जरी बताने लग जाएगी, या फिर कोई सेकुलरवादी जमात विश्वविद्यालयों में संस्कृत के नाम पर केवल रसमंजरी वाले साहित्य पढ़ाती रहेगी. विनोबा ने अपने शिक्षण-विचार में लिखा है- ‘आजकल संस्कृत के नाम पर जो कुछ श्रृंगारिक साहित्य सिखाया जाता है, उतना भर ही साहित्य यदि संस्कृत में होता तो मैं संस्कृत सीखने की परवाह नहीं करता.’

इसलिए सरकार या इसका कोई मंत्रालय न तो संस्कृत, पालि या अरबी के इस विज्ञान को जबरिया पढ़ाने की सबसे उपयुक्त एजेंसी हो सकती है, और न ही आईआईटी और एनआईटी इसके लिए एकमात्र और सबसे उपयुक्त संस्थान. हमारी वैज्ञानिक पीढ़ियां जब भाषा सीखने के मामले में सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होंगी, तभी वे जान पाएंगी कि अंग्रेजी में ‘धर्म या धम्म’, ‘चित्त’ और ‘दर्शन’ तक के लिए कोई उपयुक्त समानान्तर शब्द मौजूद नहीं है. तभी उन्हें ज़ुलू भाषा का ‘उबुन्तू’ जैसा गूढ़ और सुंदर शब्द मिल पाएगा. शास्त्रीय और लोकभाषाओं के बहुअर्थी शब्दों के ऐतिहासिक विकास और पतन का विश्लेषण भी वैज्ञानिक अनुभवों से ही जानने में आ पाएगा. तभी वह पौराणिक साहित्य को भी केवल माइथोलोजी कह कर नकारने के बजाए, उसमें जीवन से लेकर पदार्थ तक के विज्ञान का उपयोगी सूत्र ढूंढ़ पाएंगी.

तैत्तिरीय उपनिषद् में एक प्रसंग आता है जहां यह उद्-घोषणा देखने को मिलती है कि आने वाला युग विज्ञान का है. एक क्रम में ऋषि कहता है- ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्, प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्, मनो ब्रह्मेति व्यजानात्’, और इसके बाद कहता है ‘विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्’. पहले अन्न ब्रह्म था, फिर प्राण ब्रह्म था, उसके बाद मन ब्रह्म था. इसके बाद विज्ञान ब्रह्म होगा. असल विज्ञान के युग में व्यक्तिगत या सामाजिक मन के हिसाब से न ही सोचा जाएगा और न ही किया जाएगा. मन का क्षय हो जाएगा. क्योंकि व्यक्ति और समुदाय जब तक मन के हिसाब से सोचते रहेंगे तब तक मन के साथ मन का टक्कर होता रहेगा. फिर चाहे वह मन जाति का हो, भाषा का हो, धर्म के नाम पर चलने वाले उपासना-पन्थों का हो, या राष्ट्र का हो. जब तक लोग मन की भूमिका से ऊपर नहीं उठेंगे. तब तक विज्ञान युग के लायक नहीं बन सकेंगे.

तैत्तिरीय उपनिषद् में एक प्रसंग आता है जहां यह उद्-घोषणा देखने को मिलती है कि आने वाला युग विज्ञान का है. एक क्रम में ऋषि कहता है- ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्, प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्, मनो ब्रह्मेति व्यजानात्, विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्’

आज संस्कृत और विज्ञान को लेकर समर्थक और विरोधी, दोनों पक्षों की ओर से जिस तरह की दलीलें दी जा रही हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि भविष्य की वैज्ञानिक पीढ़ियां हमें द्वंद्ववादी दौर के ऐसे घोर राजनीतिक और बकवादी लोगों के रूप में याद करेंगी जो हर चीज को खंड-खंड में बांटने में विश्वास करते थे. जो बात-बात पर द्रोह, संघर्ष और अधिकारवादी विक्टिमहुड की आड़ लेकर हिंसक तेवर अपनाते थे. जो परस्पर औपनिवेशकारी दुराग्रहों से पैदा की गई आत्मघृणा, शर्म और संकोच के मारे सर्वसमन्वयवादी व्यापकता तक को अपनाने से परहेज करते थे. जिनका किसी भाषा-विशेष के साथ प्रेम या घृणा भी सियासी रंगों में रंगी होती थी. जिन्होंने इसी विभाजनकारी और सियासी द्वंद के मारे अध्यात्म-विद्या और शास्त्रीय ज्ञान के वैज्ञानिक संभावनाओं से भी मुंह चुरा लिया था. जिन्होंने विज्ञान के सम्पूर्णतावादी प्रवाह में जाने-अनजाने बाधा ही उत्पन्न करने की कोशिश की थी. जो आत्महीनतावश ‘तटस्थता’ और ‘निरपेक्षता’ का नकारवादी अर्थ लेते हुए दुनिया की महान भाषाओं के साथ भी डर और छूआछूत बरतते थे. इनके बीच कुछ रेशनलिस्ट और प्रोग्रेसिव कहलाने वाले ऐसे कृतघ्न लोग भी बसते थे, जो भाषाओं को मृतप्राय ठहराकर उनपर अपमानजनक और क्रूर चुटकुले गढ़ते थे और अहंकार से भरपूर ठहाके लगाते थे. क्या हम भविष्य की संपूर्णतावादी और सर्वसमन्वयवादी वैज्ञानिक पीढ़ियों के बीच इन्हीं रूपों में याद किया जाना पसंद करेंगे?