दशकों से मेरे कृपालु मित्र रहे कन्नड़ लेखक यूआर अनंतमूर्ति ने लोकसभा के पिछले चुनाव के दौरान यह घोषणा की थी कि वे मोदी-शासित भारत में रहना नहीं चाहेंगे. अभाग्यवश, मोदीराज शुरू होने के थोड़े दिनों बाद ही उनका देहावसान हो गया.

चुनाव के दौरान दिल्ली प्रेस क्लब ने अनंतमूर्ति और मुझे, तबके प्रसंग में, अपनी बात कहने के लिए आमंत्रित किया था. हम दोनों ने परंपरा की दुर्व्याख्या, ज्ञान और असहमति की अवहेलना, धर्म-विचार के अल्पसंख्यकों को बढ़ते ख़तरों, संस्थाओं के अवमूल्यन आदि की ओर इशारा किया था. दुर्भाग्य से, हमारी आशंकाएं लगभग दैनिक रूप से सच साबित हो रही हैं.

यह अनंतमूर्ति का अन्तिम सार्वजनिक कार्यक्रम था, संभवतः. वे बहुत बीमार थे. उन्होंने बताया था कि वे कन्नड़ में अपना अन्तिम दस्तावेज़ लिख रहे हैं. महात्मा गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ की तरह, जो कि मूलतः गुजराती में लिखा गया था, अनंतमूर्ति का मूल कन्नड़ में लिखा यह दस्तावेज़ अब अंग्रेज़ी अनुवाद में हार्पर कालिन्स द्वारा पुस्तकाकार ‘हिंदुत्व ऑर हिन्द स्वराज’ नाम से प्रकाशित हुआ है.

यह एक लेखक का मृत्यु-शय्या से लिखा एक आवेग-भरा घोषणापत्र है. यह एक स्पष्ट चुनाव करने की चुनौती देता है: हम या तो लगातार हिंसक-आक्रामक और बहुसंख्यकता के आधार पर लोकतंत्र को संकीर्ण और एकात्म करने वाला पौरुषमय हिंदुत्व चुनें या कि गांधी का सौम्‍य, शान्त, अहिंसक और सभ्यतामूलक बहुलता पोसने वाला हिन्द स्वराज. बहुमतवाद में - जो कुल का 30 से कुछ अधिक प्रतिशत ही है और जिससे असली बहुमत बाहर है - अनंतमूर्ति के अनुसार न तो क़ानून का शासन हो सकता है, न ही विवेक का. देशभक्ति और विकास जैसे नारों के पीछे की सच्चाई यह है कि किसी भी तरह के अपराध, हिंसा, नृशंसता और अत्याचार को राष्ट्रीय हित के नाम पर ढिठाई के साथ उचित ठहराया जा सकता है.

अनंतमूर्ति याद दिलाते हैं कि गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे ने अपने आखि़री बयान में भारत के सामने हिंदुत्व और स्वराज में से एक चुनने को कहा था. सावरकर, गोडसे और मोदी एक ही वंशावली के हैं. इस समय संघर्ष ऐसी एकता के लिए है जो बहस और विभिन्नताओं पर आधारित हो, ऐसी एकात्मकता के खिलाफ जो सारी असहमति को दबाकर थोपी जा रही हो.

समाजविज्ञानी शिव विश्वनाथन ने अपनी भूमिका में उचित ही कहा है कि एक लेखक अपने इस चरम वक्तव्य में स्मृति, नैतिकता, लोकमान्यताओं आदि सब को जगाते हुए हमें आगाह कर रहा है कि सावरकर का संकीर्ण हिंदुत्व जीतने के क़रीब आ पहुंचा है, अगर हम ‘हिन्द स्वराज’ की आत्मा ग्रहण कर उसके विरुद्ध एक अथक सत्याग्रह की शुरूआत नहीं करते. लाभ-लोभ के अनैतिक अभियान में लिप्त मध्यवर्ग सब कुछ बेचने-खरीदने की मानसिकता की गिरफ़्त में होने के कारण विकास के झांसे में आकर लोकतंत्र और स्वतंत्रता दोनों को गिरवी रखने में ज़्यादा संकोच नहीं करेगा.

अनंतमूर्ति की पुरानी धारणा यह रही है कि भारत में बहुलता-एकता का रूपक विलक्षण है. अगर हम सावरकर की तरह एकता को चरम पर ले जायेंगे तो बहुलता सिर उठायेगी और अगर हम बहुलता को ही केन्द्र में रखें तो पायेंगे कि भारत एक है.

अनंतमूर्ति अपनी उम्मीद को गहरे यथार्थ-बोध में रोपते हैं. लोहिया के सिद्धांतों का, जिनमें शूद्रों का उन्नयन होना था, यादवीकरण हो चुका है और अंबेडकर के सिद्धांत मायावती की मूर्तियों में परिणत हुए. मोदी का विकास के लिए उत्साह कारखानों के धुओं से भर गया है. वे विकास के बरक़्स गांधी का सर्वोदय प्रस्तावित करते हैं. मरणासन्न होते हुए भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी थी, भले उन्हें जल्दी ही अपनी देह छोड़ देनी पड़ी.

साहित्य में सिद्धांत से बड़ी जगह मानवीयता की है

साहित्य की दुनिया में सिद्धांतपरकता इतनी बढ़ गयी है कि अकसर भूल जाते हैं कि साहित्य सिद्धांतों से आगे जाता है. उसमें सिद्धांत से ज़्यादा बड़ी जगह घेरते हैं जीवन, सच्चाई और मानवीयता. पिछले कुछ समय में संस्मरणों में - जिनमें साहित्यकारों-घटनाओं-अभियानों आदि के संस्मरण शामिल हैं - हमारी दिलचस्पी बढ़ी है पर हमारे यहां बड़े और महत्वपूर्ण, अब तक प्रासंगिक बने हुए साहित्यकारों की सुशोधित जीवनियां अभी भी नहीं हैं.

जिसकी नकल करते हम अघाते नहीं उस पश्चिम में, अकेली अंग्रेज़ी में, यीट्स, ईलियट, नायपाल जैसे मूर्धन्यों के अलावा स्टीफ़ेन स्पैंडर, लुई मैकनीस, फ़िलिप लार्किन्स जैसे मूर्धन्यता के पाये से नीचे के कवियों की भी मोटी-मोटी बेहद रोचक जीवनियां हैं. इसका एक आशय, दुर्भाग्य से, यह होगा कि हमारी दिलचस्पी लेखक के कृतित्व, उसकी दृष्टि और सिद्धांत, उसकी उपलब्धि और सफलता-विफलता आदि में तो है, उसके जीवन में, उसकी मानवीयता में नहीं, जो मुख्यतः उसकी सृजनशीलता का कारक और प्रेरणा होती है.

इस कमी को ध्यान में रखकर हाल ही में हमने कुछ मित्रों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे अपने मनपसंद लेखकों की विस्तृत जीवनियां लिखने की ओर, थोड़े समय के लिए, प्रवृत्त हों. गीता प्रेस पर एक प्रशंसनीय पुस्तक के रचयिता अक्षय मुकुल पहले से ही अज्ञेय की एक जीवनी लिखने पर काम कर रहे हैं. अब मंगलेश डबराल शमशेर बहादुर सिंह की, विष्णु नागर रघुवीर सहाय की, जयप्रकाश गजानन माधव मुक्तिबोध की जीवनियां लिखने पर राज़ी हुए हैं और इन सभी ने काम शुरू भी कर दिया है. उम्मीद है कि नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, श्रीकान्त वर्मा, निर्मल वर्मा आदि की जीवनियां लिखने के लिए कुछ और लेखक-मित्र सामने आयेंगे.

जयशंकर प्रसाद, जैनेन्द्र कुमार, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा आदि की जीवनियां भी देर-सबेर मनोयोग, अध्यवसाय और पैशन से लिखी जाना चाहिये. कौन जानता है कि अगले पांच वर्षों में हम अपने कुछ लेखकों की अदम्य और गहरी, अन्तर्विरोधों से भरी, उत्सुकताओं-बेचैनियों से पटी ज़िन्दगियों के बारे में बेहतर अवगत होंगे और यह एक बार फिर पहचानेंगे कि साहित्य जीवन और अनुभवों के खून-कीचड़ में कितना लिथड़ा-रमा रहता है. वही इसके मर्म, सत्य और अन्वेषण का ठोस आधार होते हैं.

हमारे अधिकांश पुरुष लेखक लेखिकाओं को लेकर अवरुद्ध मानसिकता के शिकार हैं!

एक कथाकार से बात हो रही थी. वे दूरदराज़ कहीं रहती हैं और दिल्ली बहुत कम आती हैं. उनकी धारणा यह है कि भले हिंदी का लेखक-समाज स्त्री-मुक्ति की बात करता है और उसे साहित्य में बराबरी का एक ज़रूरी प्रमाण मानता है, उसके अधिकांश पुरुष लेखक लेखिकाओं को लेकर अवरुद्ध मानसिकता के शिकार हैं. अगर कोई लेखिका किसी पुरुष के साथ यात्रा करती नज़र आये या कि किसी के साथ काफ़ी तक पीती देखी जाये तो ऐसा नतीजा निकालने में कोई देर या हिचक नहीं होती कि उसके इस ‘दूसरे’ के साथ ज़रूर कोई अवैध संबंध होंगे या विकसित होने की राह पर हैं. कोई लेखिका मुक्त भाव से विचर सकती है यह बात ही जैसे ऐसे लेखकों के गले से नीचे नहीं उतरती.

अगर यह सही है तो यह लेखकों के सामाजिक पिछड़ेपन, मुक्ति तथा बराबरी को लेकर उनके पाखंड को ज़ाहिर करता है. जब मैं तरुण लेखक था तो मैंने अमरीकी कथाकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे का एक मत कहीं पढ़ा था जिसमें उन्होंने कहा था कि लेखक की स्वतंत्रता सिर्फ़ इस पर निर्भर नहीं करती कि उसे समाज में कितनी स्वतंत्रता मिली हुई है, वह इस पर भी, बहुत हद तक, निर्भर करती है कि लेखकों को स्वयं लेखक-समाज में कितनी स्वतंत्रता मिली हुई है.

इस पर हमने शायद गंभीरता से विचार नहीं किया है कि जिस स्वतंत्रता और मुक्ति को हम व्यापक समाज में अभीष्ट और वांछनीय मानते हैं उसे हम स्वयं अपने सीमित लेखक-समाज में अपने व्यवहार से अप्रासंगिक बनाते रहते हैं. लेखक निजी तौर पर क्या करते हैं यह, आमतौर पर, ध्यान दिये जाने योग्य नहीं होता. लेकिन अगर उनमें निजी स्तर पर और व्यवहार में पिछड़ापन और पाखंड इतने व्यापक स्तर पर प्रगट हो तो यह उस गहरी फांक को सामने लाता है जिससे हमारे समय में साहित्यिक संस्कृति अब तक ग्रस्त है. हम साहित्य में मुक्त भले हों, निजी आचरण, सामाजिक व्यवहार और विचार में मुक्त नहीं हैं. इस मुक़ाम पर ठिठककर कुछ आत्माकलन, कुछ आत्मालोचन ज़रूरी हो जाता है.

दिल्ली जैसी कास्मोपोलिटन और अग्रगामी राजधानी में ऐसी वृत्तियां पायी जायें तो यह संकट को और गहरा कर देती हैं. निपट गंवारूपन में लिथड़े हुए, हम राजधानी में रहते हुए भी अग्रगामी नहीं हो पाये हैं. यह प्रमाणित करता है कि हम सिर्फ़ समाज से ही नहीं, अपनी राजधानी से भी पिछड़ रहे हैं. यह इसलिए और भयावह लगता है कि इस तरह की राजनैतिक और सांस्कृतिक शक्तियां इस समय सत्तारूढ़ और सक्रिय हैं जो एक तरह के पिछड़ेपन को महिमामंडित कर रही हैं, उसे चिकना-चुपड़ा और चित्ताकर्षक बनाकर पेश कर रही हैं. वह दिन दूर नहीं बल्कि शायद दरवाज़े तक आ ही गया है जब कहा जायेगा कि हम ‘आधुनिक पिछड़े’ हैं. साहित्य की मुक्तिदायी प्रकृति के रहते ऐसा हो यह भयानक और विचित्र दोनों एक साथ है.