हमारी उच्च शिक्षा-व्यवस्था बहुत गहरे संकट के दौर से गुजर रही है. संभव है कि कुछ लोगों को मेरा यह कहना व्यक्तिगत हताशा ज्यादा लगे. लेकिन इस क्षेत्र में काम करते हुए मैं ऐसा महसूस करता हूं तो इसके कुछ बेहद ठोस कारण हैं.

मौजूदा शिक्षा-व्यवस्था में ज्ञान पर सबसे कम जोर दिया जा रहा है. इसकी तुलना में एक निरर्थक कागजी कार्यवाही शिक्षा पर लगातार हावी होती जा रही है. विश्वविद्यालयों को मानव संसाधन विकास मंत्रालय का सचिवालय समझ लिया गया है. यह बेहद चिंताजनक स्थिति है कि एक शिक्षक के काम को घंटों के हिसाब से जोड़ा जा रहा है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का नियम है कि शिक्षकों को अपने संस्थान में कम से कम पांच घंटे प्रतिदिन रहना होगा. साथ ही यह समय सप्ताह में 40 घंटे से कम नहीं होना चाहिए. यह व्यवस्था ऐसी क्यों नहीं हो सकती कि शिक्षक अपनी क्लास लेकर रुकना चाहे तो रुके और जाना चाहे तो जाए? ऐसी व्यवस्था के खिलाफ तर्क दिया जा सकता है कि इस तरह शिक्षक को खुला छोड़ देने पर वह पढ़ने-पढ़ाने में ढील दे सकता है. लेकिन मुख्य प्रश्न तो यह है कि क्या शिक्षक होना महज एक नौकरी करना भर है? जिनकी अध्ययन -अध्यापन में रुचि नहीं है उन्हें इस क्षेत्र में आने की जरूरत ही क्या है?

शिक्षा को रोजगारपरक बनाने के लिए पाठ्यक्रमों पर दबाव बनाया जाता है. क्या यह जरूरी है कि शिक्षा ही रोजगारपरक हो? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि रोजगार ही शिक्षा के अनुकूल हो?

मेरी बातें कई लोगों को आदर्शवादी लग सकती हैं लेकिन, मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि जो पढ़ने-पढ़ाने में रुचि के कारण शिक्षक बनते हैं, वे कभी अपनी 'क्लास बंक' नहीं कर सकते और उन्हें विद्यार्थियों से गहरा लगाव होता है. ऊपर कागजी कार्यवाही की भी बात की गयी है. वह इसलिए कि आजकल शिक्षकों के ऊपर कई तरह के कागजी कामों का दबाव डाल दिया गया है. मसलन प्रत्येक विद्यार्थी की उपस्थिति को गिन कर उसे ऑफिस में सौंपना, उनका रिजल्ट एक्सेल शीट में भरना, यांत्रिक सेमेस्टर प्लान बनाना, अनेक प्रकार की प्रशासनिक समितियों में शिक्षकों को डाल देना आदि. ऐसे तमाम तरह के कामों में शिक्षकों को व्यस्त किया जा रहा है. इस पूरी प्रक्रिया में शिक्षक की पढ़ाई से जुड़ी तैयारी का बंटाधार हो जाता है. यह समझा ही नहीं जाता कि शिक्षक को क्लास में तैयारी से जाना पड़ता है जिसमें बहुत धैर्य, अभ्यास और परिश्रम लगता है.

अब तो एक और नई बाधा पैदा होने लगी है. विश्वविद्यालय प्रशासन यह उम्मीद करने लगा है कि छात्रों की संख्या बढ़ाना भी शिक्षकों की जिम्मेदारी है. निजी कंपनियों के लाभ-नुकसान के ढांचे की तरह से इसे जांचा जाता है. अगर किसी विषय में छात्रों की संख्या कम या नगण्य है तो उस विषय के शिक्षक को कोई भी, कहीं भी, हिकारत या उपदेश की घुट्टी पिलाने से बाज नहीं आता. उच्च प्रशासनिक अधिकारी किसी बाॅस की तरह व्यवहार करते हैं. इस प्रक्रिया से यह स्पष्ट है कि सरकार विश्वविद्यालय-शिक्षण से राजस्व की प्राप्ति की उम्मीद करने लगी है. इस वजह से भी शिक्षा को रोजगारपरक बनाने के लिए पाठ्यक्रमों पर दबाव बनाया जाता है. क्या यह जरूरी है कि शिक्षा ही रोजगारपरक हो? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि रोजगार ही शिक्षा के अनुकूल हो? यानी जहां शिक्षा को रोजगार की कसौटियों पर कसा जा रहा है वहां क्या यह संभव नहीं कि रोजगार ही शिक्षा की कसौटियों पर अपने को स्थापित करे?

क्या हम ऐसा समाज बना देना चाहते हैं जहां प्रश्न की कोई जगह ही नहीं हो? बस एक दौड़ के नशे की सुई सबको दे दी जाए और उनसे चूस कर काम लिया जाए?

सवाल यह भी है कि विभिन्न विषयों में रोजगारपरकता की तलाश एक ही मानदंड पर क्यों हो? उदाहरण के लिए हिंदी साहित्य के विद्यार्थी के लिए अगर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दरवाजे बंद हैं तो यह कंपनियों की सीमा है, हिंदी साहित्य या उसके पाठ्यक्रम की नहीं. लेकिन आज हर विषय के पाठयक्रम पर रोजगारपरक होने और बिकने के हिसाब से खुद को ढालने का दबाव है. अकारण नहीं कि इतिहास विभागों को 'टूरिज्म' से जोड़ा जा रहा है. ऐसा न कर पाने पर समाजशास्त्र और दर्शनशास्त्र जैसे विषयों को तो मरा हुआ मान ही लिया गया है. इसका प्रमाण यह है कि 2009 में नए खुले केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से किसी में भी दर्शनशास्त्र विभाग अभी तक नहीं है.

कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जिन विषयों का संबंध चिंतन से है उन्हें जानबूझकर किनारे किया जा रहा है. दूसरी ओर यह दावा भी खूब बढ़-चढ़ कर किया जाता है कि हम विद्यार्थियों में स्वतंत्र चिंतन, तार्किक क्षमता, निर्भीक आलोचनात्मक चेतना और ज्ञानजन्य आत्मविश्वास विकसित करना चाहते हैं. लेकिन जिन विषयों का इनसे सीधा रिश्ता है उन्हें बड़ी सफाई और बेरहमी से नष्ट किया जा रहा है. क्या हम ऐसा समाज बना देना चाहते हैं जहां प्रश्न की कोई जगह ही नहीं हो? बस एक दौड़ के नशे की सुई सबको दे दी जाए और उनसे चूस कर काम लिया जाए? मैं बचपन में सुनता था कि जो लोग बाहर मजदूरी करने जाते हैं उन्हें फैक्टरी द्वारा मिलने वाली चाय में अफीम मिलाकर दी जाती है ताकि वे और तेज गति से काम कर सकें. पता नहीं यह सच है या नहीं पर आज जब चिंतन, तर्क और विश्लेषण पर विचार करता हूं तो लगता है कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था उसी अफीम की तरह व्यवहार कर रही है जिसमें विद्यार्थियों को तेज गति से बगैर सोचने वाले तबके में बदलने की कवायद चल रही है.

जैसे जीवन और प्रेम का कोई नियम नहीं होता, उन पर किसी प्रकार की यांत्रिकता का बंधन नहीं होता और वे भरोसे और सहयोग से विकसित होते हैं उसी तरह का अनुभव अध्ययन-अध्यापन है.

उच्च शिक्षा में शोध की बहुत चर्चा होती है. लेकिन आज इस शोध की प्रक्रिया को भी पूरी तरह यांत्रिक बना दिया गया है. यूजीसी द्वारा जारी एपीआई (एकेडमिक परफ़ॉरमेंस इंडीकेटर) व्यवस्था इसका सटीक उदाहरण है. इसके प्रारूप से ही समझा जा सकता है कि कैसे हमारे शोध के आकलन को एक गणितीय रूप में ढाल दिया गया है. यहां गुण से अधिक मात्रा की पूछ है. प्रत्येक लेखन या शोध गतिविधि पर अंक निर्धारित हैं. ऐसे में जाहिर है कि यदि किसी के पांच लेख हैं और किसी के तीन तो पांच लेख वाला आगे निकल ही जाएगा. फिर चाहे गुणवत्ता के पैमाने पर वह तीन लेख कितने ही बेहतर रहे हों, उन लेखों में लेखक ने अनेक नए ज्ञान-क्षितिजों का स्पर्श किया हो, लेकिन पांच लेख लिखने वाला ही बेहतर समझा जाएगा.

एक बार मैंने अपने वरिष्ठ सहयोगी से पूछा कि 'सर, आप इतना कैसे लिख लेते हैं? मुझसे तो इतना नहीं हो पाता.' उनका जवाब था, 'अरे यार प्रोफेसर बनने तक लिखना पड़ता है. उसके बाद मैं नहीं लिखूंगा. बस बोलूंगा, यदि दुकान ठीक-ठाक चल गई तो.' व्यावहारिक और दुनियावी दृष्टि से उनकी योजना एकदम दुरुस्त ही कही जाएगी. एपीआई का चक्कर तो प्रोफेसर बनने तक ही है. लेखन के अलावा एपीआई में प्रोजेक्ट पर भी अंक निर्धारित हैं. इसलिए उच्च अधिकारी 'प्रोजेक्ट लाइए, प्रोजेक्ट लाइए' ही कहते मिलते हैं. लेकिन इसे लेकर ज्यादातर का अनुभव यह है कि इसमें 'ज्ञान कांड' से अधिक 'कर्म कांड' को महत्ता मिली हुई है. ऊपर से प्रोजेक्ट की राशि के खर्च की वैधता प्रमाणित करने में ही आप की सारी ऊर्जा छीज जाती है.

अध्ययन -अध्यापन एक अत्यंत सुकुमार और रचनात्मक प्रक्रिया है. जैसे जीवन और प्रेम का कोई नियम नहीं होता, उन पर किसी प्रकार की यांत्रिकता का बंधन नहीं होता और वे भरोसे और सहयोग से विकसित होते हैं उसी तरह का अनुभव अध्ययन-अध्यापन है. अगर प्रशासन को शिक्षकों पर और शिक्षकों को प्रशासन पर भरोसा नहीं हो पा रहा हो तो इस दारुण परिस्थिति में विद्यार्थियों का पिसना तय है. अगर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की प्राथमिकता में अध्यापन न हो, हाॅस्टल में पानी और खाने की समस्या हो, अगर किसी तपती दोपहर में विद्यार्थी लगभग सवा सौ किलोमीटर की यात्रा कर रहे हों और प्रशासन एक एसी बस का भी इंतजाम न करना चाह रहा हो तो भारत के विश्वविद्यालयों को 'वर्ल्ड क्लास' बनाने का सपना देखना व्यर्थ है.

(लेखक दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी के सहायक प्राध्यापक हैं )