बीता शनिवार निर्विकार सिंह के लिए वह खुशखबरी लेकर आया जिसका उन्हें दो साल से इंतजार था. निर्विकार उत्तराखंड पुलिस में उप निरीक्षक हैं. ठीक दो साल पहले, मई 2014 में उन्हें इस पद से निलंबित कर दिया गया था. यह इसलिए हुआ कि उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए उत्तराखंड के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक, बीएस सिद्धू से सीधी दुश्मनी मोल ले ली थी. सिद्धू बीती 30 अप्रैल तक उत्तराखंड पुलिस के इस सर्वोच्च पद पर रहे. इस दौरान निर्विकार निलंबित ही रहे. लेकिन सिद्धू के इस पद से हटने के एक सप्ताह के भीतर ही निर्विकार को उनके पद पर बहाल कर दिया गया है.

बीती 30 अप्रैल को उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक के पद से रिटायर हुए बीएस सिद्धू अपने दामन पर कई दाग लेकर रिटायर हुए हैं. कुछ समय पहले ही रेलवे की एक पूर्व महिला कर्मचारी ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे. इस महिला का आरोप था कि रेल सुरक्षा बल में मुख्य सुरक्षा आयुक्त रहते हुए सिद्धू ने उसका यौन शोषण करने की कोशिश की थी. इस आरोप के अलावा प्रदेश की राजधानी देहरादून में जमीन संबंधित घोटालों में भी सिद्धू का नाम काफी समय से आता रहा है. बल्कि रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले ही उन्हें ऐसे एक मामले में उनके खिलाफ आरोपपत्र भी सौंपा गया है. इसी मामले के चलते उनकी निर्विकार से दुश्मनी भी हुई थी. लेकिन निर्विकार ने कभी उनके सामने घुटने नहीं टेके. अपने विभाग के सर्वोच्च अधिकारी से बैर मोल लेकर और तमाम उत्पीड़न सहकर भी निर्विकार ने न सिर्फ अपनी लड़ाई अकेले लड़ी, बल्कि जीती भी.

अलावा प्रदेश की राजधानी देहरादून में जमीन संबंधित घोटालों में भी सिद्धू का नाम काफी समय से आता रहा है. बल्कि रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले ही सिद्धू को ऐसे एक मामले में उनके खिलाफ आरोपपत्र भी सौंपा गया है. 

इस पूरे प्रकरण को शुरुआत से समझते हैं. 59 वर्षीय निर्विकार सिंह उत्तराखंड पुलिस में उप निरीक्षक हैं. साल 2012 में उन्हें तत्कालीन राज्यपाल द्वारा 'उत्कृष्ट सेवा पदक' से सम्मानित किया गया था. इसके बाद 2013 में भी उन्हें तत्कालीन पुलिस महानिदेशक बीएस सिद्धू द्वारा 'पुलिसमैन ऑफ़ दि इयर' का सम्मान दिया गया. लगातार दो साल उन्हें यह सम्मान बेहतरीन जांच करने की उनकी योग्यता के लिए दिए गए थे. लेकिन अगले ही साल, 2014 में उन पर आरोप लगे कि वे बेहद लापरवाही से जांच करते हैं. उनकी पदोन्नति रोक दी गई, उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हो गए और अंततः उन्हें उत्तराखंड पुलिस से निलंबित ही कर दिया गया. उन पर मुसीबतों का यह पहाड़ तब से टूटना शुरू हुआ जब वे एक ऐसे मामले में जांचकर्ता नियुक्त हुए जिसके शिकायतकर्ता खुद प्रदेश के पुलिस महानिदेशक बीएस सिद्धू थे. इस मामले की जांच के दौरान निर्विकार सिंह ने अपने सर्वोच्च अधिकारी के हितों को नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को वरीयता दी थी.

घटना 2013 की है (विस्तृत जानकारी के लिए पढें - जुर्म के दोषी भी, उत्तराखंड पुलिस के डीजीपी भी). देहरादून के वीरगिरवाली क्षेत्र की आरक्षित वन भूमि पर कई पेड़ काटे गए. जिस जमीन पर ये पेड़ कटे, उसे कुछ ही समय पहले आईपीएस बीएस सिद्धू ने खरीदा था. सिद्धू उस वक्त महानिदेशक (रूल्स/मैन्युअल) के पद पर तैनात थे. यदि इस जमीन को बेचा जा सकता तो सरकारी मानकों के अनुसार इसका बाजार मूल्य करीब सात करोड़ रुपये होता. सिद्धू ने कागजों में इसे एक करोड़ पच्चीस लाख रुपये में खरीदा हुआ दिखाया.

जब स्थानीय अखबारों में पेड़ कटने की ख़बरें आई तो जांच के बाद वन विभाग ने बीएस सिद्धू के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करवा दिया. बाद में जब यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पहुंचा तो राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव सुभाष कुमार ने एनजीटी को दिए अपने शपथपत्र में बताया कि यह जमीन 1970 में ही रिज़र्व फारेस्ट घोषित कर दी गई थी. लेकिन रेवेन्यू रिकार्ड्स में इसके पुराने मालिक नत्थूराम का ही नाम दर्ज रह गया था. शपथपत्र के मुताबिक सिद्धू द्वारा अपने पद और 'रेवेन्यू विभाग की त्रुटियों का फायदा उठाते हुए अवैध तरीके से जमीन खरीदी गई तथा पेड़ों का कटान किया गया.'

बीएस सिद्धू
बीएस सिद्धू

इस मामले में पुलिस विभाग ने भी एक गोपनीय जांच की थी. यह जांच मसूरी के तत्कालीन क्षेत्राधिकारी स्वतंत्र कुमार द्वारा की गई. इसमें सामने आया कि जिस नत्थूराम के नाम यह जमीन रेवेन्यू रिकार्ड्स में दर्ज थी उसकी भी 1983 में मृत्यु हो चुकी थी. बीएस सिद्धू ने 2012-13 में नत्थूराम से ही इस जमीन को खरीदना दिखाया था. स्वतंत्र कुमार ने अपनी जांच रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को सौंप दी. तत्कालीन पुलिस महानिदेशक सत्यव्रत बंसल ने इस रिपोर्ट को गम्भीरता से लिया और यह माना कि इस जमीन की खरीद में भारी गड़बड़ की गई है. इस संबंध में उन्होंने तत्कालीन मुख्य सचिव को एक पत्र भी लिखा. लेकिन बीएस सिद्धू ने नौ जुलाई 2013 को वन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ ही एक एफआईआर दर्ज करवा दी. इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा ही पेड़ काटे गए हैं और ऐसा उन्हें बदनाम करने और उनकी आड़ में जमीन का सौदा करने के लिए लिया जा रहा है. इसी प्रथम सूचना रिपोर्ट की जांच आगे चलकर निर्विकार के पास आई.

बीएस सिद्धू द्वारा लिखवाई गई इस प्रथम सूचना रिपोर्ट पर शुरुआत में एक अन्य पुलिस अधिकारी जांच कर रहे थे. उन्होंने दो लोगों को हिरासत में भी लिया जिन्होंने यह स्वीकार किया कि उन्होंने ही कुलदीप नाम के एक ठेकेदार के कहने पर ये पेड़ काटे थे. 16 नवंबर 2013 को इन दोनों के बयान मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज होने थे. लेकिन इस मामले की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी 15 नवम्बर को छुट्टी पर चले गए. ऐसे में निर्विकार को कुछ समय के लिए इस मामले में जांचकर्ता नियुक्त कर दिया गया. 16 नवम्बर को निर्विकार ने इन दोनों लोगों के बयान न्यायालय में दर्ज करवाए और उसी दिन शाम को कुलदीप ठेकेदार को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

'मुझे उसी दिन इंस्पेक्टर साहब ने फोन करके एसपी (सिटी) साहब से बात करने को कहा. मैंने कंट्रोल रूम से एसपी (सिटी) साहब का नंबर लिया और उन्हें फ़ोन किया. उन्होंने मुझसे कहा कि डीजीपी (सिद्धू) साहब के आदेश हैं कि कुलदीप के पुलिस को दिए बयान में यह लिखो कि हमने पेड़ 'पॉवर कट आरे' (बिजली से चलने वाली आरा मशीन) से काटे. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि न्यायालय से कुलदीप की तीन दिन की पुलिस रिमांड यह कहते हुए मांगो कि इस मामले में वन विभाग के बड़े अधिकारी भी शामिल हैं जिनकी जानकारी कुलदीप से जुटानी है' निर्विकार बताते हैं, 'इसके बाद मैंने अपने निरीक्षक साहब को फ़ोन किया. मैंने उन्हें बताया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता. मुझसे पहले जो जांचकर्ता इस मामले की जांच कर रहा था उसने जांच में लिखा था कि पेड़ 'मैन्युअल आरे' (हाथ से चलाए जाने वाला आरा) से काटे गए हैं. साथ ही मैन्युअल आरा बरामद भी किया जा चुका था. ऐसे में मैं पॉवर कट आरे की बात कैसे लिख सकता था?'

'उन्होंने मुझसे कहा कि डीजीपी (सिद्धू) साहब के आदेश हैं कि कुलदीप के पुलिस को दिए बयान में यह लिखो कि हमने पेड़ 'पॉवर कट आरे' (बिजली से चलने वाली आरा मशीन) से काटे. 

निर्विकार पर जांच के दौरान 'पॉवर कट आरे' की बात जोड़ने का दबाव इसलिए बनाया जा रहा था क्योंकि बीएस सिद्धू ने अपनी प्रथम सूचना रिपोर्ट में लिखवाया था कि पेड़ 'पॉवर कट आरे' से वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा काटे गए हैं. लेकिन निर्विकार के रहते न तो जांच में पॉवर कट आरे की बात जुड़ पाई और न ही कुलदीप ठेकेदार की ही रिमांड पुलिस को मिल सकी. 20 नवंबर को पुराने जांचकर्ता वापस लौट आए और निर्विकार इस मामले से हट गए. लेकिन इस मामले की चार दिन की जांच के दौरान ही निर्विकार ने अपने सबसे बड़े अधिकारी, पुलिस महानिदेशक बीएस सिद्धू से दुश्मनी मोल ले ली थी. इसके बाद से ही निर्विकार के उत्पीडन का दौर भी शुरू हो गया.

17 दिसंबर को निर्विकार विभाग के काम से प्रदेश की रुद्रपुर अदालत जा रहे थे. इसी दौरान उन्हें फोन आया कि उनका तबादला किया जा चुका है. न्यायालय का काम निपटाने के बाद निर्विकार 19 दिसंबर को वापस देहरादून पहुंचे. अगले ही दिन उन्हें सूचना मिली कि उनके छोटे भाई का देहांत हो गया है. निर्विकार बताते हैं, 'भाई के देहांत की सूचना मिलने पर मैं छुट्टी लेने अपने उच्च अधिकारियों के पास गया. मैंने सोचा कि मैं अंतिम संस्कार से लौट कर देहरादून से अपनी रवानगी करवा लूंगा और रुद्रप्रयाग में ऑफिस ज्वाइन कर लूंगा. लेकिन मुझे बताया गया कि मेरी रवानगी तो 18 दिसंबर को ही देहरादून से दर्शाई जा चुकी है. जबकि उस दिन मैं रुद्रपुर न्यायालय में विभाग का काम कर रहा था. मेरा पूरा दिन ऑफिस की औपचारिकताओं में निकल गया. जब तक मैं अपने गांव पहुंचा तब तक भाई का अंतिम संस्कार किया जा चुका था.'

गांव से लौटकर निर्विकार ने रुद्रप्रयाग में कार्यभार ग्रहण किया. अगले ही महीने (जनवरी 2014 में) पुलिस उपनिरीक्षकों की पदोन्नति की जानी थी. निर्विकार का नाम भी उनकी सेवा के आधार पर पदोन्नत होने वाले अधिकारियों में था. सेवा के आधार पर उनके कुल 90 अंकों में से 74.5 अंक थे. उन्हें बस साक्षात्कार की औपचारिकता निभानी थी जो दस अंकों का होता है. साक्षात्कार लेने वाली टीम का मुखिया प्रदेश का पुलिस महानिदेशक ही होता है. इस साक्षात्कार में निर्विकार को दस में से सिर्फ चार अंक दिए गए. सेवा के आधार पर उनसे काफी कम अंक पाने वाले अधिकारियों में से 18 को इसमें आठ या नौ अंक देकर पदोन्नत कर दिया गया. निर्विकार 19वें स्थान पर रहते हुए पदोन्नति की दौड़ से बाहर हो गए. देहरादून में ही कार्यरत एक पुलिस अधीक्षक बताते हैं, 'निर्विकार के सर्विस रिकॉर्ड बेहतरीन थे. 2013 में भी उनके एनुअल रिमार्क में 'आउटस्टैंडिंग' लिखा गया था. लेकिन जब इंटरव्यू लेने वाला ही उनका दुश्मन हो तो क्या उम्मीद बचती है. पुलिस की नौकरी में तो यूनियन बनाना भी मना है. हम यदि हिम्मत भी करते तो निर्विकार की मदद नहीं कर सकते थे.'

जिन निर्विकार को इस विवाद से पहले लगातार बेहतरीन जांच करने के लिए सम्मानित किया जाता था, अब अचानक ही उनकी जांच में कई खामियां निकाली जाने लगी थीं.

निर्विकार के उत्पीड़न का सिलसिला यहीं समाप्त नहीं हुआ. जिन निर्विकार को इस विवाद से पहले लगातार बेहतरीन जांच करने के लिए सम्मानित किया जाता था, अब अचानक ही उनकी जांच में कई खामियां निकाली जाने लगी थीं. इनमें से भी ज्यादातर खामियां एक ही दिन यानी 15 अप्रैल 2014 को ही निकाली गईं. दरअसल अप्रैल 2014 में निर्विकार ने देहरादून में बैठे पुलिस के उच्चाधिकारियों को एक पत्र लिखा था. इस पत्र में उन्होंने वे सभी तथ्य लिखे थे जो बीएस सिद्धू की शिकायत पर जांच करते हुए बतौर जांचकर्ता उन्होंने पाए थे. इस पत्र में उनका कहना था कि इन तथ्यों को भी बीएस सिद्धू मामले की जांच का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

यह पत्र 15 अप्रैल 2014 को देहरादून के एसएसपी को मिला. ठीक इसी दिन, अचानक तीन अलग-अलग क्षेत्राधिकारियों को निर्विकार द्वारा की गई विभिन्न जांचों में खामियां मिल गईं और उन्होंने निर्विकार के खिलाफ शिकायती पत्र एसपी (सिटी) देहरादून को भेज दिए. एसपी (सिटी) ने उसी दिन ये सभी पत्र अपनी रिपोर्ट के साथ एसएसपी, देहरादून को भेज दिए जिन्होंने उसी दिन ये शिकायतें डीआईजी (गढ़वाल) को भेज दीं. इतना ही नहीं, 15 अप्रैल को ही डीआईजी ने इन्हें एसपी (रुद्रप्रयाग) को भेजते हुए निर्विकार के खिलाफ जांच के आदेश भी दे दिए. यह सब कुछ एक ही दिन से भी कम समय में हो गया. भारत के किसी भी राज्य की पुलिस इतनी तेजी से काम करते हुए शायद ही पहले कभी देखी गई हो.

अपने विभाग में जब निर्विकार अकेले पड़ते चले गए तो उन्होंने जनता से उम्मीद की. 17 मई 2014 को उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. इसमें उन्होंने सभी पत्रकारों को तथ्यों के साथ सारी हकीकत बताई. इसके बाद उन्हें कुछ हद तक जनता का समर्थन तो मिला लेकिन दो दिन बाद ही उन्हें निलंबित भी कर दिया गया. उन पर पुलिस (द्रोह उद्दीपन) अधिनियम, 1922 के अंतर्गत मुकदमा दायर कर दिया गया. तब निर्विकार ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करते हुए न्याय की गुहार लगाई. न्यायालय ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए पुलिस को यह भी निर्देशित किया कि उनका किसी भी प्रकार से उत्पीड़न नहीं होना चाहिए.

अपने विभाग में जब निर्विकार अकेले पड़ते चले गए तो उन्होंने जनता से उम्मीद की. 17 मई 2014 को उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. इसके दो दिन बाद ही उन्हें निलंबित कर दिया गया.

नवम्बर 2014 में निर्विकार को एक तरफ उच्च न्यायालय से कुछ मदद मिली तो दूसरी तरफ उनके खिलाफ एक और षड्यंत्र भी रचा गया. देहरादून में एक महिला ने सूचना के अधिकार के तहत निर्विकार की सभी शैक्षिक योग्यताओं का ब्यौरा मांगा. इसके बाद उनके खिलाफ देहरादून में एक और मुकदमा दर्ज करवाया गया. इसमें यह आरोप लगाए गए कि निर्विकार फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पुलिस में भर्ती हुए हैं और उनके पास कोई भी प्रमाणपत्र नहीं हैं. भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 एवं 474 के अंतर्गत उनके खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर दी गई. निर्विकार को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने स्वयं ही अपने सारे दस्तावेज प्रस्तुत कर दिए. वे बताते हैं, 'मेरी लगभग 35 साल की नौकरी हो चुकी है. इसी साल मेरा रिटायर्मेंट है. अब मुझ पर आरोप लग रहा है कि मैं फर्जी दरोगा हूं. सर्विस रिकॉर्ड में पांच अंक अलग से शैक्षिक योग्यता के होते हैं. इसमें मुझे दोनों बार पूरे अंक मिले हैं. तो क्या यह पूरा विभाग भी फर्जी है जो एक फर्जी दरोगा को पूरे अंक देता है?'

सिद्धू के जमीन से जुड़े विवाद को विभिन्न स्तरों पर उजागर करने वाले भाकपा (माले) के गढ़वाल सचिव इन्द्रेश मैखुरी बताते हैं, 'जिस व्यक्ति ने एक भ्रष्ट अधिकारी के खिलाफ आवाज़ बुलंद की उसे कई तरीकों से प्रताड़ित किया गया और पुलिस का जो सर्वोच्च अधिकारी सरकारी जमीन की खरीद-फरोख्त में लगा रहा उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई. उसने बतौर पुलिस महानिदेशक अपना कार्यकाल पूरा किया.' इन्द्रेश मैखुरी के साथ ही कुछ अन्य लोग भी हैं जो अपने-अपने स्तर से निर्विकार सिंह की मदद के प्रयास करते रहे हैं.

बीएस सिद्धू के इस भूमि विवाद का एक पक्ष और भी है. जब इस मामले के चर्चा में आने पर यह जमीन दुबारा वन विभाग के नाम चढ़ा दी गई तो सिद्धू ने एक प्रार्थना पत्र देकर अपने वे 35 लाख रुपये वापस किए जाने की माग की थी जो उन्होंने इस जमीन को अपने नाम कराने के लिए बतौर स्टांप ड्यूटी दए थे. दिलचस्प यह है कि सिद्धू को अपने इन 35 लाख रुपयों का तो मलाल है लेकिन उन एक करोड़ पच्चीस लाख रुपयों का नहीं जो उन्होंने जमीन बेचने वालों को चुकाए थे. बीएस सिद्धू द्वारा उनके खिलाफ जालसाजी आदि की कोई भी रिपोर्ट या मुकदमा दर्ज नहीं करवाया गया जिन्होंने धोखे से उन्हें वन विभाग की जमीन बेच दी थी. इस मामले से जुड़े एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक साफ है कि उनके खिलाफ किसी ने कोई जालसाजी नहीं की थी बल्कि यह सब खुद उनका किया-धरा था.

यदि संयोग से सिद्धू का रिटायर्मेंट निर्विकार से तीन महीने पहले न होता तो शायद निर्विकार को निलंबित रहते हुए ही रिटायर भी होना पड़ता. ऐसा होने की काफी संभावनाएं थीं.

अपने दामन पर कई दाग लेकर भी बीएस सिद्धू ने पुलिस के सर्वोच्च पद पर रहते हुए हाल ही में अपना कार्यकाल पूरा किया है. दूसरी तरफ निर्विकार हैं जो ईमानदारी से जांच करने के बावजूद भी पूरे दो साल निलंबित रहे. हालांकि आज वे बहाल हो चुके हैं लेकिन, यह तभी संभव हो सका जब सिद्धू उत्तराखंड पुलिस के सर्वोच्च पद से हट गए. सिद्धू ने अपने रहते निर्विकार को बहाल नहीं होने दिया और यदि संयोग से सिद्धू का रिटायर्मेंट निर्विकार से तीन महीने पहले न होता तो शायद निर्विकार को निलंबित रहते हुए ही रिटायर भी होना पड़ता. ऐसा होने की काफी संभावनाएं थीं. उत्तराखंड पुलिस के एक उच्च अधिकारी बताते हैं, 'यदि इन दिनों प्रदेश में राष्ट्रपति शासन न होता और हरीश रावत ही मुख्यमंत्री होते तो बहुत मुमकिन था कि सिद्धू को छह महीनों का सेवा विस्तार मिल गया होता. उस स्थिति में सिद्धू कभी भी निर्विकार को बहाल नहीं होने देते और उन्हें निलंबित रहते हुए ही रिटायर होना पड़ता. इसलिए कहा जा सकता है कि किस्मत ने ईमानदारी का साथ दिया.'

वैसे इस पूरे प्रकरण को ऐसे भी देखा जा सकता है कि भले ही निर्विकार ने बीते दो सालों में बहुत उत्पीड़न झेला हो लेकिन अंततः उनकी जीत हुई और आने वाले जुलाई महीने में वे अपनी ईमानदार छवि के साथ ही रिटायर होंगे. दूसरी तरफ सिद्धू लंबे समय तक उत्तराखंड पुलिस के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद भी अंततः कई गंभीर आरोपों और अपने खिलाफ एक आरोपपत्र लिए रिटायर हुए हैं.