हम जब युवा थे तो परिदृश्य पर तीन तरह के लेखक सक्रिय थे. एक वे जो लोकप्रिय थे पर जिन्हें महत्वपूर्ण नहीं माना जाता था. इनमें कवि सम्मेलनी कवियों से लेकर लोकप्रिय कथाकार आदि शामिल थे. दूसरे वे थे जो महत्वपूर्ण तो थे पर लोकप्रिय न थे. इनमें अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर-रघुवीर सहाय आदि कवि, निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वेद, कृष्णा सोबती जैसे कथाकार आदि गिने जाते थे. तीसरे वे थे जो लोकप्रिय और महत्वपूर्ण दोनों थे जैसे बच्चन, दिनकर, भवानी प्रसाद मिश्र, नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, अमृतलाल नागर, यशपाल आदि.

युवाओं में लोकप्रिय होने का आकर्षण होना स्वाभाविक है. लेकिन, कम से कम उस समय याने पिछली सदी के साठ के दशक में, जब हम लोगों ने लिखना-पढ़ना गंभीरता से शुरू किया, हम जैसों को लोकप्रिय ने बहुत जल्दी रिझाना बंद कर दिया. हमें यह समझ में आ गया कि अधिक ज़रूरी है ज़िम्मेदारी और कल्पनाशीलता से लिखना. लोकप्रियता परिणाम हो सकती है पर अगर न हो तो इससे लिखे का महत्व न तो निर्धारित होता है, न कम आंका जा सकता है. यह कहना अनुचित न होगा कि यह पूर्वाग्रह आज तक बरक़रार है.

आज लोकप्रियता का दबाव, उसका आकर्षण कई गुना बढ़ चुके हैं. प्रायः सभी माध्यमों में, जिनमें भाषापरक अभिव्यक्ति संभव होती है, लोकप्रियता का आतंक सा है. कुछ समय पहले हिन्दी में ‘दिनमान’, ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘कहानी’, ‘नई कहानियां, ‘सारिका’ जैसे प्रकाशन थे, जो महत्वपूर्ण और लोकप्रिय को साथ लेकर चलते थे. बल्कि वहां महत्वपूर्ण के लोकप्रिय हो जाने की पूरी संभावना रहती थी. वह समय लगभग बीत गया.

साहित्य के लिए यह विभाजन स्वस्थ और हितकर निश्चय ही नहीं रहा है. नतीजा यह है कि अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में हिन्दी समाज अपने श्रेष्ठ साहित्य से, अपनी महत्वपूर्ण समकालीन रचनाशीलता से प्रायः बेख़बर रहता आया है. उसमें लोकप्रिय लेखक दुर्भाग्य से हिन्दी के बड़े लेखक नहीं हैं. हिन्दी के वर्तमान लोकप्रिय लेखकों में प्रायः कोई भी नहीं है जिसे बच्चन-दिनकर-नागार्जुन-भवानी प्रसाद मिश्र आदि के क़द का माना जा सके. इसका एक दुष्परिणाम यह भी है कि इस कारण व्यापक हिन्दी समाज की साहित्य में रुचि बहुत घटी है.

हमारी अकादेमिक आलोचना ही नहीं तथाकथित सृजनशील आलोचना की एक बड़ी विफलता यह है कि दोनों ही सुरुचि और संवेदनशीलता में दीक्षित पाठक वर्ग तैयार नहीं कर पायी हैं. पिछले दिनों पुरस्कार-वापसी के स्वतःस्फूर्त अभियान के समय लेखकों को लेकर जो गाली-गलौज कइयों ने की वह इसका एक दुखद प्रमाण थी. कोई और समाज अपने लेखकों का, उनसे असहमत होते हुए भी, ऐसा असम्मान नहीं करता.

अगर ऐसा होता रहा है तो उसका प्रतिरोध भी होता ही रहा है

भारतीय समाज के सामने इस समय जो भयावह संकट संकीर्णता, एकात्मकता, धार्मिक-साम्प्रदायिक-सामाजिक विद्वेष, भारतीय कट्टरता, हिंसक राष्ट्रवाद आदि के रूप में बढ़ रहा है उसे लेकर बहुत लोग यह मानते हैं कि ये कोई नयी प्रवृत्तियां नहीं हैं और हमारे समाज में पहले से रही हैं. इन लोगों का मानना है कि ऐसी प्रवृत्तियों को लेकर अतिरिक्त सजगता और प्रतिरोध की सक्रियता ज़रूरी नहीं हैं क्योंकि यह तो राजनीति है जिसमें यह सब चलता ही रहता है. कुछ दंगे-फ़साद, कुछ हत्याएं और आत्महत्याएं, कुछ हिंसा आदि में कुछ भी नया नहीं है जो हमें या हमारे अन्तःकरण को उत्तेजित करे. इसके बावजूद अगर कुछ हम जैसे लोग अन्तःकरण की आवाज़ उठाने और प्रतिरोध करने पर आमादा है तो उन्हें भी राजनीति से प्रेरित कहा-माना जा सकता है.

यह अकसर भुला दिया जाता है कि प्रतिरोध अकसर और मूल रूप से एक नैतिक कार्रवाई है जो राजनीति के रूप में देखी-समझी जाने के लिए अभिशप्त है. जो कुछ पहले होता था या कि होता आया है वह अपनी धारावाहिकता के कारण उचित या स्वीकार्य नहीं हो जाता. लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी आदि पहले भी अपने-अपने ढंग से प्रतिरोध करते रहे हैं. अगर हिंसा और विद्वेष की एक लंबी परंपरा, हमारे यहां दुर्भाग्य से, रही है तो उसके प्रतिरोध की भी उतनी ही लंबी परंपरा रही है. हम कुछ सिरफिरे उसी परंपरा को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं.

हम सत्ता से पोसे जाने के कारण बेहद आक्रामक और व्यापक हो उठी हिंसा-विद्वेष शायद रोक नहीं सकते पर उसे नैतिक-बौद्धिक-सर्जनात्मक ढंग से अनुचित, अस्वीकार्य और अवैध तो बना सकते हैं. सामाजिक अन्तःकरण को, अगर सारे घातक प्रहारों के बावजूद वह बचा हुआ है तो, विचलित कर सकते हैं. आततायी शक्तियां कई रूप धर सकती हैं, कई तरह के लुभावने स्वांग भर सकती हैं, उन्हें अप्रतिरूद्ध आगे नहीं जाने दिया जा सकता.

हमने ‘प्रतिरोध’ नाम से दो आयोजन दिल्ली में किये. कई हितचिंतकों का यह सुझाव है कि ‘प्रतिरोध’ का एक ढीलाढाला साझा मंच तैयार किया जाये जिसका मूल उद्देश्य उन सब लेखकों-कलाकारों-बुद्धिजीवियों आदि को एकजुट करना है जो स्वतंत्रता-समता-न्यास में विश्वास रखते हैं और जिन्हें लगता है कि इन मूल्यों के हित में, सत्ताकामिता से सर्वथा मुक्त रहकर, हम व्यापक सामाजिक चेतना का एक अभियान चला सकते हैं. साधनों की कमी, वैचारिक मतभेद, हिंसक से लेकर छिछले प्रहार आदि अनेक बाधाएं रास्ते में आयेंगी. उनसे धीरज, समझ और हिम्मत के साथ निपटना होगा. अगर संकीर्ण लाभों के लिए राजनीति में सर्वथा अप्रत्याशित गठबंधन हो सकते हैं तो व्यापक और बड़े लक्ष्यों के लिए साहित्य-कला-बुद्धि जगत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? समय कम है, सोचने-समझने-करने की रफ़तार तेज़ करना ज़रूरी है.

कविता में गीति-क्षण

बरसों पहले ब्रिटिश काउंसिल में एक शाम श्रीलंका में जन्‍मे और लगभग 45 वर्षों से कनाडा में बसे अंग्रेज़ी कवि माइकेल ओनदाजे को सुना था. वे उपन्‍यासकार और कवि दोनों हैं और उन्‍हें बुकर पुरस्‍कार मिल चुका है. उनकी कविता में व्‍यापक भारतीय कल्‍पना की उपस्थिति साफ़ पहचानी जा सकती है. उन्‍हें उस कल्‍पना के क्षीण होने का अवसाद भी है. एक कविता, हिंदी अनुवाद में यों है:

जो हमने गंवाया.

आन्‍तरिक प्रेमकविता

आत्‍म के गहरे स्‍तर

दैनिक जीवन के दृश्‍यालेख

ति‍थियां जब कुछ सिद्धांतों को तजा गया.

सौजन्‍य का नियम- कैसे प्रवेश करना

एक मन्दिर या वन में, कैसे छूना

एक गुरु के चरण, पाठ या प्रदर्शन के पहले.

तालवाद्य की कला. नयन चित्रित करने की कला.

कैसे एक बाण बनाना. प्रेमियों के बीच मुद्राएं.

उसकी त्‍वचा पर उसके दन्‍तक्षतों का रूपाकार

एक भिक्षु द्वारा स्‍मृति से उकेरे गये.

विश्‍वासघात की सीमाएं. पांच विधियां

एक प्रेमी द्वारा एक भूतपूर्व प्रेमी का उपहास करने की.

नौ हस्‍तक और नयनों की मुद्राएं

नौ रसों का संकेत करते हुए.

एकान्‍त की नन्‍हीं नौकाएं.

गीत जो उठे

प्रेम से

वापस पवन में

कपट और प्रशंसा से

दिगम्‍बर.

हमारे काम और दिन.

हम जानते थे कि कैसे मानसून

(दक्षिण-पश्चिम, उत्‍तर-पूर्व)

हमारा व्‍यवहार शासित करती थी

और कब पता लगाना

दिवंगतों के ज्ञान का

छुपा हुआ बादलों में,

नदियों में, अटूट चट्टान में.

यह सब हमने जला दिया

या शक्ति और संपदा के लिए सौदा किया

प्रतिशोध के आठ कुतुबनुमा निर्देशों से

ईर्ष्‍या के दो स्‍तरों से