अंडमान निकोबार द्वीप समूह देश के नक्शे पर ही नहीं, मुख्यधारा की चेतना के भी एक छोटे से कोने में सिमटा हुआ है. लेकिन छोटा सा यह इलाका इसकी एक बड़ी मिसाल है कि कैसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को सबसे अच्छी तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. उत्तरी और मध्य अंडमान जिले में हाशिये पर पड़े समुदायों की जरूरतें पूरी करने के लिए मनरेगा का जैसा इस्तेमाल हुआ है और वह भी तमाम मुश्किलों के बावजूद, उससे देश के कई राज्य सबक सीख सकते हैं.

उत्तरी और मध्य अंडमान में रोजगार के अवसर बहुत सीमित हैं. बुनियादी जरूरतों के लिए यहां के लोग मुख्य भूमि पर निर्भर हैं जबकि पर्यटन, कृषि और मछली पालन के क्षेत्र अभी उतने विकसित नहीं हुए हैं. इस द्वीप समूह के 90 फीसदी हिस्से में आरक्षित वन हैं और साल में लगभग आठ महीने यहां बारिश होती है. 2010 तक यहां रोजगार का मुख्य साधन माचिस और प्लाईवुड की दो फैक्ट्रियां हुआ करती थीं. लेकिन पर्यावरण पर पड़ रहे बुरे असर के चलते उन पर ताले लग गए. ऐसे में अब मनरेगा ही यहां रोजगार के लिहाज से जीवन रेखा का काम कर रही है.

उत्तरी और मध्य अंडमान में रोजगार के अवसर बहुत सीमित हैं. बुनियादी जरूरतों के लिए यहां के लोग मुख्य भूमि पर निर्भर हैं जबकि पर्यटन, कृषि और मछली पालन के क्षेत्र अभी उतने विकसित नहीं हुए हैं

लेकिन अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर इस योजना को लागू करने की अपनी मुश्किलें हैं. इनमें से एक नेटवर्क कनेक्टिविटी भी है. आज इस योजना में पंजीकरण से लेकर भुगतान तक की तमाम प्रक्रियाएं ऑनलाइन हो रही हैं, लेकिन यहां कनेक्टिविटी का हाल यह है कि 'मस्टर रोल्स' यानी हाजिरी रजिस्टर बनाने का काम भी एक अंतहीन इंतजार जैसा हो जाता है.

दुश्वारियां यहीं खत्म नहीं होतीं. यह इलाका तटीय क्षेत्रों से जुड़े नियम-कायदों के तहत आता है जिसके चलते कई उपयोगी कामों के लिए सरकारी मंजूरी लेना बहुत मुश्किल हो जाता है. कठोर वन कानून भी काम के आड़े आते हैं. इसके अलावा निर्माण सामग्री भी काफी महंगी है क्योंकि उसे समुद्र के रास्ते मंगवाना पड़ता है जिससे उसकी लागत बढ़ जाती है.

ऐसी तमाम बाधाओं के बावजूद अंडमान निकोबार में मनरेगा से जुड़ी कई सफलताएं दिखती हैं. वित्त वर्ष 2014-15 में यहां औसतन 37 दिन का रोजगार सृजित हुआ. 2011-12 में यह औसत सर्वाधिक (42 दिन) था. योजना के तहत लगभग 46 फीसदी ग्रामीण परिवारों को रोजगार मिला है और इसमें औसतन 167.69 रुपये प्रतिदिन की दर से मजदूरी का भुगतान हुआ. श्रमिकों में महिलाओं (जो आबादी में 48.07 फीसदी हैं) की हिस्सेदारी 49.67 फीसदी रही. महिलाओं की भागीदारी और श्रमिकों की पृष्ठभूमि से पता चलता है कि यह योजना सर्वसमावेशी भी है. आदिवासी आबादी (मुख्य रूप से निकोबारी) का एक बड़ा हिस्सा भी इससे रोजगार पा रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों में इसने युवाओं को आजीविका का एक भरोसेमंद विकल्प दिया है.

ग्रामीण समुदाय की एक बड़ी आबादी अब मनरेगा में काम कर रही है
ग्रामीण समुदाय की एक बड़ी आबादी अब मनरेगा में काम कर रही है

इन आंकड़ों से भी ज्यादा प्रभावशाली है उस संपत्ति का निर्माण जो स्थानीय समाज के हमेशा काम आएगी. पोक्कादेरा ग्राम पंचायत में 2009-10 के बाद तीन अलग-अलग मौकों पर मैंग्रोव वनों में फिर से जान फूंकने का काम किया गया. ग्राम रोजगार सेवक (गांव में मनरेगा पदाधिकारी) बताते हैं कि जब लोगों को बताया गया कि मैंग्रोव की वजह से समुद्र द्वारा होने वाला जमीन का कटाव रुकता है तो तब से लोगों में इस काम के लिए काफी उत्साह आ गया है.

इस काम के दौरान सबसे पहले वन विभाग के अधिकारियों ने तटों पर बाढ़ के जोखिम वाले उन इलाकों को चिह्नित किया, जहां मैंग्रोव खत्म हो गए थे. इसके बाद दूसरी जगह से मैंग्रोव के पौधे मंगवाए गए. इन्हें रोपने में मनरेगा श्रमिकों का इस्तेमाल किया गया. अब इनकी आगे की देखभाल का काम वन विभाग कर रहा है. ये मैंग्रोव पर्यावरण के लिहाज से उपयोगी तो हैं ही, पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए भी इनका इस्तेमाल किया जा रहा है. जैसे साबरी पंचायत में इनके साथ लगता एक आकर्षक रास्ता बनाया गया है. यहां एक विशेष केंद्र भी है जिसमें पर्यटकों को इनके बारे में जानकारी भी दी जाती है. कुछ जगहों पर मैंग्रोव की हरियाली के साथ लगते पार्क और खेल के मैदान भी बनाए गए हैं.

मनरेगा ने दूरदराज के गांवों को भी मुख्यधारा से जोड़ा है. दसतपुर गांव पहली बार पक्की सड़क से जुड़ा है. यहां लोग 1950 के दशक में बसे थे. आमकुंज में पहली बार सड़क बनने से मछुआरों के लिए समुद्र तक पहुंचना अब आसान हो गया है. कौशल्या नगर और उर्मिलपुर में बने पुश्तों का फायदा यह हुआ है कि अब कृषि भूमि खारे पानी से सुरक्षित हो गई है. पशुओं के लिए चारागाह बनने से पशुपालन को बढ़ावा मिला है. मनरेगा के तहत बने तालाबों में किसान मछलियां पाल रहे हैं. इससे न सिर्फ उनकी खाने की जरूरत पूरी हो रही है बल्कि उनके लिए आजीविका का एक नया स्रोत भी बना है. मनरेगा के तहत ही यहां आगनवाड़ी और शौचालय बनाने का काम भी हुआ है जिसकी लागत देश में सबसे कम आई है.

देश के बाकी इलाकों से जब-तब मनरेगा से जुड़े भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं. लेकिन उत्तरी अंडमान में बिल्कुल अलग ही स्थिति देखने को मिलती है

देश के बाकी इलाकों से जब-तब मनरेगा से जुड़े भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं. लेकिन उत्तरी अंडमान में बिल्कुल अलग ही स्थिति देखने को मिलती है. ऐसा नहीं है कि यहां शिकायतें नहीं हैं. लेकिन लोगों से बात करने पर पता चलता है कि उनका लेना-देना पर्याप्त रोजगार सृजित न होने और कई मौकों पर मजदूरी के भुगतान में देरी से है. भ्रष्टाचार की शिकायत कोई नहीं करता. कमजोर कनेक्टिविटी और मात्र आठ प्रतिशत आधार पंजीकरण को देखते हुए यह उपलब्धि और भी असाधारण हो जाती है. हर जगह पर काम पूरा होने के बाद एक स्थायी बोर्ड लगाया जाता है जिस पर कुल खर्च, सृजित कार्य दिवसों की संख्या और सामग्री-श्रम के अनुपात सहित तमाम सूचनाएं लिखी होती हैं. इसी साल फरवरी में दिल्ली में हुए नरेगा सम्मेलन में इस योजना से आजीविका सृजन के लिए उत्तरी और मध्य अंडमान को पुरस्कृत किया गया है.

यह उदाहरण बताता है कि अगर ईमानदारी और प्रतिबद्धता हो तो कोई भी बाधा आपको लक्ष्य हासिल करने से नहीं रोक सकती.

(सुधा नारायणन, कृष्णा रानावारे और आई बालू का यह लेख मूल रूप से हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉनइन पर प्रकाशित हुआ है.)