ज्यादातर अपनी गरीबी और अशिक्षा के लिए ही सुर्ख़ियों में रहने वाले नबरंगपुर से बीते दिनों एक अच्छी खबर आई है. देश के सबसे गरीब और पिछड़े जिलों में शामिल इस जिले ने शिक्षा के क्षेत्र में राज्य और देश के लिए एक मिसाल पेश की है.

उड़ीसा में हाल में घोषित हुए दसवीं कक्षा के परीक्षा परिणामो में नबरंगपुर ने ए-प्लस श्रेणी हासिल की है. इस बार इस जिले के 91.87 फीसदी छात्र उत्तीर्ण हुए हैं. इस लिहाज से दक्षिण उड़ीसा के इस जिले ने राज्य के 30 जिलों में पांचवां स्थान प्राप्त किया है. इस साल के परीक्षा परिणाम में नबरंगपुर ने नौ प्रतिशत का सुधार किया है. पिछले साल यह 82.60 प्रतिशत परीक्षा परिणाम के साथ 18 वें स्थान पर रहा था.

2011 की जनगणना के अनुसार नबरंगपुर की साक्षरता दर मात्र 46.43 प्रतिशत है. जबकि यहाँ के 57.35 फीसदी लोग कभी स्कूल ही नहीं गए.

नबरंगपुर की पृष्ठभूमि को देखते हुए इस नतीजे को किसी आश्चर्य से कम नहीं कहा जा सकता. 2011 की जनगणना के अनुसार नबरंगपुर की साक्षरता दर मात्र 46.43 प्रतिशत है जबकि देश की साक्षरता दर 74.04 और उड़ीसा की 72.87 है. महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा और भी कम होकर 35.80 फीसदी तक पहुंच जाता है. देश में सबसे गरीब कहे जाने वाले इस जिले में पहला सरकारी डिग्री कॉलेज पिछले महीने ही बनकर तैयार हुआ है.

बारह लाख से ज्यादा की जनसंख्या वाले नबरंगपुर में करीब 56 फीसदी आदिवासी और 15 फीसदी दलित हैं. अगर, इस क्षेत्र के पिछड़ेपन को देखें तो 2011 की जनगणना आंकड़ों के अनुसार यहां सिर्फ 12.60 प्रतिशत घरों में ही बिजली के कनेक्शन हैं. यानी ज्यादातर घरों में केरोसीन से उजाला होता है. इसके अलावा यहां सिर्फ 3.4 फीसदी परिवारों को ही एलपीजी के कनेक्शन उपलब्ध हो पाए हैं. इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि नबरंगपुर के करीब 90 फीसदी घरों में शौचालय की व्यवस्था नहीं है. बाकी आंकड़े भी एक निराशाजनक तसवीर ही बनाते हैं. नबरंगपुर में 24.1 फीसदी लोगों के ही बैंकों में खाते हैं. गरीबी का स्तर इससे भी समझा जा सकता है कि यहां सिर्फ 18.5 फीसदी लोगों के पास मोबाइल फोन है.

ऐसी विपरीत परिस्थतियों में नबरंगपुर के 92 प्रतिशत छात्रों का उत्तीर्ण होना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि ही माना जाएगा.

नबरंग के शिक्षा अधिकारी के अनुसार उन्होंने इस परिणाम को हासिल करने के लिए कई तरह कर उपाय किये थे जिनमें से एक परीक्षा से पहले सुबह-शाम स्पेशल कक्षाओ को शुरू करना था. इनमें छात्र अपनी किसी भी समस्या का समाधान प्राप्त कर सकते थे.

एक अखबार से बात करते हुए नबरंग के जिला शिक्षा अधिकारी कुलमणि नाथ शर्मा बताते हैं कि इस शानदार परिणाम को हासिल करने के लिए उनके अधिकारियों ने कड़ी मेहनत की है. उनके मुताबिक यह लगातार निगरानी, निरीक्षण और अध्यापकों की उपस्थिति पर निगाह का नतीजा है. शर्मा दावा करते हैं कि उनके जिले में एक भी बच्चा ऐसा नहीं है जिसका स्कूल में दाखिला न किया गया हो. वे बताते हैं कि उन्होंने परीक्षा शुरू होने से पहले जनवरी-फरवरी के महीने में पूरे जिले में अलग से सुबह-शाम विशेष कक्षाओं की व्यवस्था करवाई थी. इन कक्षाओं में छात्र पढाई से संबंधित अपनी किसी भी समस्या का समाधान प्राप्त कर सकते थे.

एक अन्य शिक्षा अधिकारी के अनुसार नबरंगपुर में शिक्षा के मामले में अभी भी बहुत सुधार की गुंजाइश है. उनके शब्दों में 'यह क्षेत्र काफी गरीब है और यहां के दूर-दराज के ज्यादातर इलाके ऐसे हैं जो ब्लॉक और जिला मुख्यालय से पूरी तरह से कट गए हैं. अब इन इलाकों में जब किसी अध्यापक को भेजा जाता है तो वह या तो ट्रांसफ़र करवा लेता है या फिर छुट्टी लेकर चला जाता है.' अधिकारी के मुताबिक इन इलाकों में प्रशासन द्वारा नियमित निरीक्षण भी नहीं हो पाता है. हालांकि वे कहते हैं कि इन इलाकों के विद्यालयों में स्थानीय अध्यापकों को रखकर इस समस्या को दूर किया जा सकता है.

वहीं, नबरंगपुर के अधिकारियों के आगे एक समस्या यह भी है कि वे कैसे छात्रों के पढ़ाई छोड़ने (ड्रापआउट) के बढ़ते मामलों को रोकें. जिला मुख्यालय के 2014-15 के डेटा के अनुसार यहां कक्षा आठ के बाद 24.23 फीसदी छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं. अधिकारियों का कहना है कि जिले में शिक्षा का अधिकार क़ानून काफी सख्ती से लागू है लेकिन, यह सिर्फ आठवीं कक्षा तक ही लागू होता है जिस वजह से आठवीं कक्षा के बाद छात्र आसानी से स्कूल छोड़ने में सफल हो जाते हैं.